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डूबेगा_बिहार_तभी_तो_धन_आयेगा_अपार


कल भारत की आज़ादी की 71वीं वर्षगाँठ मनाई गयी । 70 साल पूरे हुये हमें आज़ाद हुये । पूरे देश में इसे ले कर जश्न कि माहौल था । देश के हर कोने से लोगों ने इस जश्न को मनाते हुए अपनी रंग बिरंगी तस्वीरें सोशल मीडिया पर शेयर कीं । सभी तस्वीरें अपने गौरव का गान सुना रही थीं मगर इन सभी तस्वीरों में एक तरह की कुछ तस्वीरों ने लोगों को बहुत प्रभावित किया । एक स्कूल की वो तस्वीर जिसमें एक मास्टर जी और तीन बच्चे तिरंगे को सलामी दे रहे हैं । लोगों को प्रभावित उनकी सलामी नहीं बल्कि उस हालत ने किया जिस हालत में वो तिरंगे को सलामी दे रहे थे । 
तीनों बच्चों की छाती तक और मास्टर जी की कमर तक पानी भरा हुआ था और वो सब इस आपदा को ठेंगा दिखाते हुए अपने देश की आज़ादी के जश्न को मनाने में लगे थे । एक तरफ मैने उस सलामी को लाल किले पर माननीय प्रधानमंत्री जी द्वारा दी गयी सलामी से ज़्यादा महत्वपूर्ण माना तो दूसरी तरफ उनकी इस दशा पर मन रो भी पड़ा । 
इस वक्त असम, बिहार, यू पी के कुछ क्षेत्रों में बाढ़ ने अपना कहर बरसा रखा है । इस बाढ़ से केवल बिहार के 13 जिलों में लगभग 70 लाख लोग प्रभावित हैं जिनमें 72 लोग अपनी जान गंवा चुके हैं । यह स्थिति कोई नयी नहीं है, हाँ इस बार इसका रूप पिछले कुछ सालों के मुकाबले ज़्यादा विकराल है और आप सब तक मिडिया द्वारा यह खबर पहुंचाई जा रही है तब आपको इसका पता लगा मगर मैं इसे बच्चपन से जानता हूँ और अपने पिता और बाबा के माध्यम से तो तब से जब बाबा ही बहुत छोटे थे । 
बिहार के सीतामढ़ी जिले के मेजरगंज थाना में स्थित मेरा गाँव बिसनपुर जो बिहार के बाक़ी गाँवों की तरह बाढ़ से हर साल प्रभावित होता है । यहाँ की बांघमति धार से बनी मनुसमारा नदी हर साल अपने रूप का विस्तार कर लेती है और हर साल यहाँ बना बम्मा पुल टूट जाता है । गाँव का इसके इकलौते बाज़ार मेजरगंज से लगभग संबंध टूट जाता है क्योंकि वहाँ तक पहुंचने का यह इकलौता रास्ता है । बाक़ी रास्ते दस कि.मी घुमा कर आपको बाज़ार वाली सड़क से जोड़ते हैं और वो भी कितनी मशक़तों के बाद । 
यह मेरा एक गाँव है और पूरे बिहार में ऐसे अनगिनत गाँव हैं जो हर साल बाढ़ की मार के कारण दुल्हन से विधवा बन जाते हैं । गाँव वाले जब तक अपने गाँव को पहले की तरह संवारते हैं तब तक दोबारा बाढ़ आ जाती है इन्हें उजाड़ने । 
मैं मानता हूँ बरसात, बाढ़ ये सब प्राकृतिक आपदाएं हैं मगर ऐसा भी नहीं की इनकी रोकथाम नहीं की जा सकती और ऐसा भी नहीं कि इनकी रोकथाम के लिए कोई कदम उठाने की मंजूरी नहीं दी जाती मगर हाँ मंज़ूरी तो दी जाती है मगर कदम उठता नहीं । उस कदम को उठाने के लिए मिलने वाली राशी ना जाने कौन से बस्ते में रखी जाती है।जो फिर दोबारा दिखाई ही नहीं देता । केवल बिहार क्यों पूरा देश ही समय समय पर इस बाढ़ नामक आपदा से प्रभावित होता है मगर इन्हें हर साल अपने मंत्रियों के उड़ रहे हैलीकाॅपटरों के दर्शन के सिवा और कुछ हाथ नहीं लगता । 

ऐसा नहीं कि केंद्र सरकारें इन आपदाओं की रोकथाम के लिए कोई राशि नहीं देती । हाँ मगर वह राशि पूरी तरह से यहाँ तक पहुंचती ही नहीं । जैसा कि गृह मंत्रालय की एक रिपोर्ट का कहना है कि बाढ़ प्रबंधन कार्यक्रम के तहत 2007 से 2017 के बीच 12,243 करोड़ रुपये की 517 परियोजनाओं को मंजूरी दी गई थी मगर इनमें से अब तक केवल 297 परियोजनाएं ही अपनी मंजिल तक पहुंच पाई है और बाकिओं को अगर अब भी पूरा किया जाए तो 13 साल तक का समय लगेगा । समय लग कर भी कुछ बेहतर हो जाए तो भी कोई बात नहीं मगर यहाँ तो राशि ही गायब हो जाती है । 

सीएजी की रिपोर्ट में परियोजनाओं के पूरा होने में लेट-लतीफी की वजह केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा पैसे जारी में देरी करने के साथ-साथ जमीन का अधिग्रहण न होना बताया गया है । 2007 से मार्च, 2016 के बीच केंद्र ने एफएमपी परियोजनाओं के लिए प्रस्तावित 18 हजार करोड़ रु में से केवल 4,723 करोड़ रुपये ही जारी किए हैं । असम में 141 परियोजनाओं के लिए कुल 2,043 करोड़ रु देने की बात कही गई थी लेकिन अभी तक 812 करोड़ रु (करीब 40 फीसदी) ही दिए गए हैं । 
बाढ़ प्रबंधन कार्यक्रम के प्रावधानों के मुताबिक राज्यों द्वारा परियोजनाओं पर खर्च की गई रकम की ऑडिट स्टेटमेंट रिपोर्ट सौंपने पर ही केंद्र द्वारा फंड जारी किया जा सकता है  लेकिन सीएजी के ऑडिट में पाया गया है कि 2007 से मार्च, 2016 के बीच स्टेटमेंट रिपोर्ट न सौंपने के बावजूद छह राज्यों (असम, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, झारखंड, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश) को 2161.79 करोड़ रु जारी कर दिए गए । इनमें से असम को सबसे ज्यादा 814 करोड़ और उत्तर प्रदेश को 402 करोड़ रु जारी किए गए । इसके अलावा पांच राज्यों (असम, बिहार, ओडिशा, उत्तराखंड और पश्चिम बंगाल) ने अब तक कुल मिलाकर 183 करोड़ रुपये के यूटिलाइजेशन सर्टिफिकेट जमा नहीं किए हैं ।
ये रकम जिसका कोई ब्यौरा नहीं बना आखिर वह गयी कहाँ  ? ये सब देखने और इस पर सोचने के बाद एक ही बात आती है दिमाग में कि शायद यह जो गाँव के फूस के छप्परों में रहने वाले अमीर लोग हैं इनका मरना ही सही है क्योंकि यह बाढ़ के नाम से बलि नहीं चढ़ेंगे तो फिर उन गरीबों के घर खुशहाली कैसे आएगी जो, कितनी मेहनत से झूठ बोल बोल कर मंत्री बने हैं, जो कुदरत के बरस रहे कहर का मुआईना कोक पीते हुए हैलीकाॅप्टर में बैठ कर करते हैं, जो दर्द से कराह रहे लोगों की आहों को नज़र अंदाज़ कर सेल्फियों के लिए पोज़ देते नहीं थकते, जिनके लिए आपदाएं सिर्फ एक मुद्दा होती हैं जिसको वो चुनाव के वक्त खूब अच्छे से भुना कर जनता को ठगते हैं । 
अगर देश में कोई आपदा ही ना हो, सब ठीक हो जाए तो भला कौन चुनाव जीतने में करोड़ों खर्च करेगा । तो इन गरीबों के बने रहने के लिए गाँव के अमीरों का डूबते  रहना ज़रूरी है । 
धीरज झा

​स्वतंत्रता को बचा सकते हैं तो बचा लीजिए 

लेख कल ही लिख लिया था मगर पोस्ट आज कर रहा हूँ क्योंकि आज रविवार है, छुट्टी का दिन है सोचने का वक्त ज़्यादा मिलेगा ।
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ये दो दिन बाद स्वतंत्रता दिवस मनाया जाएगा । स्कूल, काॅलेज, सरकारी दफ्तरों आदि हर जगह तैयारियाँ ज़ोरों पर हैं । दो दिन बाद भारत की हवा को आज़ाद हुये  पूरे 70 साल हो जाएंगे । मैं भी सोच रहा था कि कोई ऐसी कहानी लिखूँ जिसे पढ़ते ही नसों में दौड़ता लहू लावा बन जाए, नसें तन जाएं, रोंगटे खड़े हो जाएं । जिसे जो भी पढ़े वो याद करे कि वो आज़ादी कितने मायने रखती है जिसे पाने के लिए हज़ारों देशभक्तों ने अपनी जाने कुर्बान कर दीं । वो आज़ादी किस तरह की दिखती होगी जिसके गृह प्रवेश के दिन से ही देश को चीर कर दो भागों में बांट दिया, जिसका लहू आज भी कश्मीर के रास्ते टपकता रहता है, उस क्षतिग्रस्त अंग में पनप उठे कीड़े अभी भी रह रह कर चीख़ चिल्लाहटें दे जाते हैं । आखिर कैसा रहा होगा खून से लथपथ ही सही मगर खुली हवा में सांस लेना । 
यही सब सोच कर मैने कलम उठाई और लिखना शुरू किया “आज़ाद भारत” हाँ इतना ही लिखा और फिर अचानक से दिमाग की नस फड़कने लगी । ऐसा लगा जैसे सब रुक गया है । ऐसा अनुभव हुआ जैसे किसी ने मेरे हाथ पकड़ कर कहा हो कि “ज़रा ठहरो, थोड़ा सोच लो अपनी आज़ादी के बारे में तब आगे लिखना ।” मैं सोचने लगा अपनी आज़ादी के बारे में । मगर मुझे कुछ ऐसा महसूस नहीं हुआ कि कहीं भी मेरी आज़ादी में कोई रोक हो । अपनी मर्ज़ी का पहनना है अपनी मर्ज़ी का खाना है जो मुंह में आये बक्क देना है उस बक्के हुए को लिख देना है अब भला इससे बेहतर आज़ादी और क्या हो ? इस जवाब के साथ ही मन ने एक सवाल और दाग दिया “अच्छा फिर बहन आना चाहती है तो उसे लेने कोई क्यों जाएगा ? अकेली क्यों नहीं आने देना चाहते ?” वैसे तो मन का दागा हुआ ये सवाल ज़ोर से लगा था मगर फिर भी संभलते हुये जवाभी हमले में जवाब दे मारा “अरे लड़की है ऊपर से माहौल कैसा है देख नहीं रहे ।” 
“फिर ये आज़ादी किस काम की ?” ये सवाल गोली से तेज़ लगा, कुछ पल के लिए एक दम सुन्न । 
“अच्छा ये छोड़ो, ये बताओ कि दोस्त क्या कहा जाने के बारे में ?”
“बोल रहा था 14 को या 16 को जाएंगे ?”
“15 को क्यों नहीं ?”
“कह रहा था खतरा रहता है, दिल्ली वैसे भी निशाने पर रहती है सो हर बार इस दिन सफ़र से बचते हैं ।”
“कमाल है ना ? अपने ही देश की आज़ादी के दिन अपने ही देश में खतरा महसूस होना ! सच में अजीब है ।” मैं चुप था, वो भी चुप हो गया मगर बहुत से सवाल और बहुत से मुद्दे दिमाग में छोड़ गया सोचने के लिए । एक के बाद एक कई बातें दिमाग में अव्यवस्थित ढंग से हुड़ दंग करने लगीं । वो जैसे जैसे ज़हन में उछलीं मैने वैसे वैसे पकड़ कर कागज़ पर कैद कर दीं । 

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कुछ दिनों के अंदर ही एक के बाद एक मुद्दा आँखों के सामने से ऐसे गुज़रा है जैसे ये आईना हो उस भ्रम का जो आज़ादी के नाम पर मन में पाले बैठे हैं हम लोग । अच्छा ये भी ग़ौर करने वाली बात थी कि जब देश आज़ाद हुआ तो दो हिस्सो में बंटा मगर जैसे जैसे देश पर आज़ादी का चढ़ा रंग गहरा हुआ वैसे वैसे देश आज़ादी के नाम पर ही कई टुकड़ों में बंटता गया । आज़ाद तो हम सब एक साथ हुए थे फिर कुछ लोग गुलाम क्यों रह गये ? या फिर ये आज़ादी के नाम पर मनमानी की मांग कर रहे हैं ? आज़ादी से वंचित अभी बहुत से लोग हैं मगर उन पर किसी का ध्यान नहीं जाता । यहाँ सिगरेट के छल्ले उड़ा कर शराब की बोतलें खाली कर के कहते हैं “हम ले के रहेंगे आज़ादी” । मगर आज़ादी किस से ? किसके लिये आज़ादी  माँग रहे हैं ये ? जहाँ, जिनके लिए आज़ादी चाहिए उनकी बात आते तो लाल सलाम को पीलिया पकड़ लेता है । फिर क्यों ये बेकार का हल्ला ?
अभी तो शायद साल भर या शायद उससे भी कम हुआ है जब एक पति किसी पार्टी की सुप्रीमो को गाली देता है और बदले में सुप्रीमो के समर्थक उसकी पत्नी से बेटी तक को अपने विरोध में सड़क तक ला कर नंगा करने की बात करते हैं । उन साहेब की पत्नी जनता से अपील करती है, उभर रही पार्टी से अपील करती है और पार्टी भी बेटी के सम्मान के लिये मैदान में कूद जाती है । महोदय की पत्नी को भरपूर जनसमर्थन मिलता है, नारे लगते हैं और देवी जी देखते ही देखते यू पी की महिलाओं की मसीहा टाईप बन कर सामने आ जाती हैं । हर रोज़ महिला सम्मान में रैलियाँ, आज फलानी देवी यहाँ सम्मानित हुईं तो आज यहाँ महिलाओं का सम्मान बढ़ाया । तब हम भी उभरती पार्टी के जबर प्रशंसक थे । ताजा ताजा बुलंदशहर हादसा हुआ था, मगर इनके आने के बाद सब थम गया । हमको भी लगा कि महिला में दम है । अब कम से कम यू पी की महिलाएं सुरक्षित होंगी । चुनाव आये, शोर शराबा तेज़ हुआ । गालियों से शुरू हुई राजनीति विधायक उम्मीदवार पर जा कर थमी । उम्मीदें प्रबल थीं, देवी जी जीत गईं । 
बस जीत गयीं, अब क्या ढूंढते हो ? जीत तक का तो खेल था सारा, जीत हाथ लगी खेल खत्म । चार दिन पहले बलिया के बजहा गाँव की एक छात्रा रागिनी को कुछ लड़के घेर कर उस पर तब तक वार करते हैं जब तक वो दम नहीं तोड़ देती है और सबके सामने से ऐसे निकल जाते हैं जैसे कुछ हुआ ही नहीं । ये सब बस इसलिये कि लड़का रागिनी का पीछा करता था और रागिनी पीछा छुड़ाती थी । उसी के कुछ दिन बाद मऊ के एक काॅलेज में 15 20 लड़के हाॅकी स्टिक लेकर काॅलेज में घुसते हैं और छात्राओं से छेड़छाड़ करते हैं । जब छात्रों द्वारा विरोध किया जाता है तो उनकी जम कर पिटाई करते हैं । इन सबके बावजूद यू पी की वो बेटी जिसने यहाँ कि बहू बेटियों के सम्मान की रक्षा के लिए शपथ लिया था उनका इन वारदातों एक बयान तक नहीं आया जबकि बलिया तो उनका ससुराल और मायका दोनो है । अपने ही गृह क्षेत्र की इस विभत्स घटना पर ऐसी चुप्पी कैसे कि एक संवेदना बोल तक मुंह से ना फूटा, कार्यवाही तो दूर की बात है ? क्या ये सब बस वोट भर के लिए था ? क्या हम समझ लें कि नारी सम्मान की ब्रांडऐंबेसडर बनना बस दिखावा मात्र था ? क्या ये सोच लें कि महिला हो कर महिलाओं के नाम का इस्तेमाल किया आपने सिर्फ और सिर्फ जीत के लिए ? क्या हमारी आँखों में उभरी उम्मीद को हम फिर से मार दें ? क्या मान लिया जाये कि अब बेटियों की आज़ादी छिन गयी ? उन्हें अब माँ बाप पढ़ने तक ना भेज़ें ये सोच कर कि कोई बड़े बाप की बिगड़ी औलाद उसकी सोलह सतरह साल की बेटी को छेड़ेगा और जब उसकी बेपी विरोध करेगी तो उसकी चाकूओं के वार से जान ले लेगा । 
निर्भया के साथ जो हुआ उसके बाद लगा सब बदल जायेगा मगर नहीं आज़ादी तो छिनती गयी, बिहार में नैसी झा से, हिमाचल की गुड़िया और रागीनि जैसी कितनी मासूम बच्चियाँ इस गलतफहमीं में अपनी जान गंवा बैठीं कि देश आज़ाद है यहाँ हमारे सम्मान हमारी इज्ज़त की उतनी ही रक्षा की जाएगी जितनी एक आज़ाद देश की सरकार अपने नागरिकों की करती है । इनकी आज़ादी किस दिन मनाई जाएगी ? 
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इधर गोरखपुर में बच्चे बिमारी से मर गये । हाँ भाई मर गये वो भी बिमारी से । मैं नहीं कह रहा अधिकारी कह रहे हैं । स्वास्थ मंत्री तथा माननीय मुख्यमंत्री जी का भी यही कहना है । बिमारी फैली है, हर साल बच्चे मरते हैं तो इसकी रोकथाम कौन करेगा ? या समझ लिया जाए कि गोरखपुर अब रहने लायक जगह नहीं रही इसे खाली करवा दिया जाए ? क्योंकि यहाँ तो हर साल बच्चे मरते हैं, कौन जाने अगले साल किस माँ को अपने लाल के लिये बीच सड़क चीख़ना चिल्लाना पड़ जाए । योगी जी आपके आते ही हर हर महादेव का उद्घघोष किया था । फेसबुक सहित दो चार ब्लाॅगों पर भी आर्टिकल लिखा था कि योगी से डर लग रहा है तो डरिये मगर सिर्फ वो जो अराजक्ता फैलाने के आदी हो गये हैं सिर्फ वो जो सिस्टम को अपने ठेबल पर पड़ा गोल वाला पेपर वेट समझते हैं और जब चाहे घुमा देते हैं । और साथ ही आपसे प्रार्थना भी की थी कि हमारा यकीन बनाए रखिएगा । आप आए मजनूओं की पिटाई होने लगी हालांकि बीच में बेकसूर भी पिटे पर हमने आँटे घुन वाली भात सोच कर वाह वाही की सोचा चलो लड़किया सुरक्षित हैं । बहन बेटियाँ राहत महसूस करेंगी अब । आपने बड़े बड़े भाषण दिये, राजनीति से कोसों दूर रहने वाली हमारी माँ भी बोल पड़ीं ‘ जोगी जी कुछ तो अलग करेंगे विश्वास है ।’ सोचिए सर यू पी से कोई नाता ना रखने वाली साधरण सी गृहणी ने आपसे कितनी उम्मीदें लगाईं ? आपने तो आवाज़ भी ना सुनी उन टूटती कराहती और मरती उम्मीदों की । साठ बच्चे तड़प तड़प कर दम तोड़ गये सिर्फ लापरवाही की वजह से । फिर भी कोई मानने को तैयार नहीं की मौत का असलकारण असल कारण नहीं । अरे, जो भी हो बच्चों की जान तो गयी है ना ? इसका ज़िम्मेदार कौन है ? इसका पता कौन लगायेगा ? इनसे तो साँस लेने तक की आज़ादी छीन ली गयी । 
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उपराष्ट्रपति जाते जाते अपना मुस्लिम प्रेम दिखा कर बोल गये कि मुस्लिम समाज में सुरक्षा का अभाव महसूस किया जा रहा है ।” वो गलत बोले यहाँ मुस्लिम समाज नहीं यहाँ हर कोई असुरक्षित महसूस कर रहा है । माँ बाप बेटियों को पढ़ाने में असुरक्षित महसूस कर रहे हैं, लोग इलाज के लिए अस्पतालों में जाने पर असुरक्षित महसूस कर रहे हैं, महिलाएं सड़क पर चलने में असुरक्षित महसूस कर रहे यहाँ तक कि अब तो बोलने तक में असुरक्षा महसूस होने लगी है । 
जो हो रहा है उसका तो जितना होना चाहिए उतना दुःख है ही मगर इसके खिलाफ़ आवाज़ उठाने पर जो अपने ही मुँह दबा रहे उससे और ज़्यादा दुःख होता है । इन लाशों से ज़्यादा डर उन संवेदनाओं की लाशों का है जो बच्चों की मृत्यु के बाद सरकार का बचाव करते हुए मर गयीं, जो सड़क पर छेड़ी जा रही लड़की को उल्टा बदनाम करते।हुए मर गयीं । आज़ादी से अच्छा है इन संवेदनाओं की मौत का मातम मनाया जाए । 
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60 साल कांग्रेस का राज रहा । कुछ तो बात रही होगी इतने सालों तक एकछत्र राज करने वाली इस पार्टी में । ज़्यादा तो नहीं पर कुछ कुछ याद है कि जो कांग्रेस की रैलियों में अपने पिता और दादा के पीछे पीछे निक्कर सही करते हुए हाथ छाप ज़िंदाबाद करते नहीं थकते थे जो, वो आज भाजपा के बचाव के लिए सबसे नीचले स्तर तक आने को तैयार हैं । खुद में बदलाव किये बिना लोग हमेशा सरकारों में बदलाव चाहते रहे । हम भारतीय हैं जी, हमें खुद को बदलने से आसान लगता है इल्ज़ाम किसी और पर थोप देना ।  पिता  जी चले गये मगर कभी भाजपा का साथ नहीं छोड़ा । जब वोट होती तो मैं पूछता था किस छाप को दिये वोट तो कहते अपना तो हमेशा कमल छाप ही होता है । मैं खुद समर्थक रहा हूँ क्योंकि उम्मीदें जगाई गयी थीं । पर अब उम्मीदें मरती जा रही हैं । सच कहूँ तो राजनीति और राजनीतिक पार्टियों दोनों से मन उचट गया है । सब के सब एक जैसे हैं । चुनाव के वक्त ज़मीन के नीचे चुनाव जीतते ही आसमान से ऊपर । असल बात ये है कि हम जबसे आज़ाद हुए हम तब से ही आज़ादी के लिए लड़ते आ रहे हैं । तमाम वादों से आज़ादी की लड़ाई, अपना रूप विकराल कर के तानाशाह बनती जा रही पार्टियों से आज़ादी, गीरी हुई सोच से आज़ादी । आज़ादी मिली होती तो हर बार ये विरोध क्यों होता । कोई तानाशाही दिखाता है उसका विरोध होता है, होते होते विरोध करने वाले ही तानाशाह बन जाते हैं फिर उनके विरोध के लिए कोई और खड़ा हो जाता है । इन सबके बीच पिसती रहती है वो जनता जिसे आज़ादी नाम का झुनझुना पकड़ा दिया गया मगर आज़ादी कभी दी नहीं गयी । यहाँ गलियाने की आज़ादी है मगर सही तरीके से विरोध करने की आज़ादी नहीं, चिल्लाने की आज़ादी है मगर सही मुद्दों पर बोलने की नहीं । आप राजनीति को पार्टियों में बांटते बांटते खुद को ही बांट बैठे हैं साहब । 

मैं किसी का विरोध या समर्थन नहीं कर रहा । आज़ादी की 71वीं वर्षगांठ है मुझे बेहद खुशी है इस बात की मगर उससे ज़्यादा इस बात की चिंता है कि जो आज़ादी हमें हज़ारों देशभक्तों के बलिदानों से मिली क्या उसे हमने अब भी उतना ही संभाल कर रखा है ? अगर नहीं तो कैसे संभालें उसे । साहब हम विरोधी या समर्थक होने से पहले इस आज़ाद देश की जनता हैं । कुछ तो लक्षण खुद में जगाईए आज़ाद जनता होने का । जिसे समर्थन करते हैं उसके बुरे काम की आलोचना को भी तैयार रहिये जिससे उन्हें हर हाल में सुधार करना पड़े । 
आईए इस स्वतंत्रता दिवस पर स्वतंत्र हो जाएं हर पार्टी हर सोच हर विचार से सिर्फ और सिर्फ जनता बन कर अपने विचार से सोचें और उसी पर अमल करें । आईए एक आवाज़ उठाई जाए, हर तरह से हर तरफ से । 
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नोट – स्वतंत्रता दिवस है अभिव्यक्ति की भी स्वतंत्रता है तो अगर किसी को कुछ बुरा लगे तो उसे बुरा मानने की भी स्वतंत्रता है । 
जय हिंद 

जय भारत 
धीरज झा 

जब_तक_बलात्कार_ना_हो_जाए_तब_तक_मुँह_मत_खोलना

#जब_तक_बलात्कार_ना_हो_जाए_तब_तक_मुँह_मत_खोलना
अच्छा, बड़ी शर्मिंदगी के साथ सभी लड़कियों के लिए एक सलाह देना चाहूँगा कि अगर कोई लौंडा, कोई बिगड़े बाप की कमीनी औलाद, कोई नशेड़ी, कोई भेड़िया तुम सब पर बुरी नज़र डालता है तो चुप चाप स्माईल कर के निकलने की कोशिश करना । उसके खिलाफ़ अगर एक शब्द भी बोला तो तुम्हारी अगली पिछली सारी कुन्डली खोल दी जाएगी । तुम अगर हीर राँझे से प्रेरित किसी के साथ सच्ची मोहब्बत कर रही होगी तो तुम्हें बद्चलन कहा जाएगा, तुमने कभी एक दो शाॅट लगा लिये होंगे और वो फोटो कहीं एफ बी पर अप्लोड हो गयी होगी तो तुम्हें पियक्कड़ कहा जाएगा, हो सकता है तुम रंडी भी कहला जाओ और उसके बाद जितनी शर्मिंदगी आपको उन लफंगों के छोड़ने से नहीं हुई होगी उससे कहीं ज़्यादा अपने ही चरित्र पर उछाले गये कीचड़ के धब्बे देख कर होगी । 
और कहीं वो लफंगा, नशेड़ी किसी पार्टी के माननीय मंत्री जी (‘जी’ का मतलब आप अपनी ज़ुबान की सुविधानुसार तय कर सकते हैं ) का राजदुलारा हुआ फिर तो आप चूं तक ना करें । हाँ अगर वो लफंगे आपको पकड़ने के बाद हैवान बन कर आपका बलात्कार कर के आपके शरीर को टुकड़ों में बाँट कर जलाने में कामयाब हो जाते हैं फिर आपकी आत्मा जो खुद सौ बार मर चुकी होगी वो कराहने के लिए आज़ाद है, और फिर तो हम भी आज़ाद होंगे आपके हक़ में आवाज़ उठाने के । मतलब कम शब्दों में कहूँ तो जब तक आपका हाल निर्भया, नैंसी, गुड़िया या उन जैसी हज़ारों बच्चियों जैसा भयानक नहीं हो जाता तब तक आप चुप ही रहें तो अच्छा है । 
 हाँ एक चीज़ और अगर आपके पिता सरकारी नौकर हैं, किसी बड़ी पोस्ट पर हैं और वो सक्षम हैं आपके खिलाफ हुई छेड़छाड़ के खिलाफ आवाज़ उठाने में तो उन्हें सख़्त मना कर दें कि वो एक लफ्ज़ ना बोलें । क्योंकि अगर वो बोले तो मीडिया ईशू बन जाएगा और हर जगह ये कहा जाएगा कि अफ़सर की बेटी थी इसी लिए मीडिया इतना बोल रही है । ग़रीब की बेटी के हक़ में कोई बोलेगा नहीं, अफ़सर को अपनी बेटी के साथ हुई छेड़छाड़ के मामले में दूसरी बच्चियों को आगाह नहीं करने दिया जाएगा बस हो गया “विकास” के रास्ते का रोड़ा अपने आप हट जाएगा । 
और अंतिम सलाह कि अगर आपने कभी सुट्टा लगाया है या कभी काॅकटेल के शाॅट लगाये या आप देर रात बाहर निकल रही हैं घर से तो फिर आपको छेड़ने का आपसे बलात्कार करने का पूर्ण अधिकार है किसी को भी । आपके कपड़े अगर छोटे हैं तो कोई भी आपके कपड़ों के अंदर झांक कर अपनी आँखों में नंगी हवस जगाने के लिए पूर्णतः स्वतंत्र है । सो देख लीजिए अगर आप ऐसा कुछ करती हैं तो फिर हैवानियत आज़ाद है आपके साथ मनचाहा सलूक करने के लिए । 
अच्छा बहुत ज्ञान दे लिया अब एक आख़री बात उन अच्छे लोगों से जिनकी नज़रों में अच्छा या बुरा इस बात पर टिका होता है कि अच्छा या बुरा करने वाला कहीं उस पार्टी से तो नहीं जिसके हम कट्टर समर्थक हैं । नवाब देवबंदी साहब आप सबके लिए ही कुछ फरमाते हैं ग़ौर फरमाईएगा 
जलते घर को देखने वालों फूस का छप्पर आपका है

आपके पीछे तेज़ हवा है आगे मुकद्दर आपका है
उस के क़त्ल पे मैं भी चुप था मेरा नम्बर अब आया

मेरे क़त्ल पे आप भी चुप हैं अगला नम्बर आपका है
तीन साल पहले हम सब ने एक चिंगारी को यह सोच कर एक साथ हवा दी थी कि वह मशाल बन जाए और अंधेरा जो फैला हुआ है उसे दूर करे मगर देखते ही देखते वो विरोधी हवा जो मशाल बुझाने में लगी थी उसी ने मशाल को गिरा कर आग में बदल दिया और देखते देखते आग फैलने लगी जिसके हाथ में मशाल थी वो चुपचाप बैठ गये और आग अहंकार में चूर बढ़ती चली गयी । अब तो वो आग इतनी फैल गयी है कि हवा जब भी उसे बुझाने उठती है उल्टा उस आग को और बढ़ा देती है । 
आप तालियाँ पीट रहे हैं आग से उठने वाली रौशनी को देख कर क्योंकि आपका घर अभी चपेट में नहीं आया । आप उस आग को और बढ़ा रहे हैं भिना ये सोचे कि मशाल आपके हाथ तक रहती मगर ये आग तो किसी की सगी नहीं ना जाने कब कहाँ कैसे किसके घर को अपनी आग़ोश में ले ले । तब कहाँ जाएंगे आप ? किससे फरियाद करेंगे । 
समर्थन और विरोध से ऊपर उठिए साहब सही और ग़लत को पहचानिये । जो लब बोलना चाहते हैं उन्हें बोलने दीजिए । ऐमरजैंसी पर लानत फेरने वाली अपनी इस ज़ुबान से दूसरी ऐमरजेंसी वाला माहौल ना बनाएं तो बेहतर होगा । ये साँप हैं, इनके सपोले भी साँप ही बनेंगे और साँप का क्या पता कब किसे काट खाएं । 

धीरज झा

तीन लाशें 

#तीन_लाशें (पढ़ना ज़रूरी नहीं पढ़ कर महसूस करना ज़रूरी है )
छः साल हो गये लगभग घर छोड़े हुए ( घर छोड़ने का मतलब लगातार घर पर ना रहने से है) । कभी गाँव कभी पटना के होस्टल में तो कभी जाॅब के लिए बाहर । इस दौरान हर रोज़ घर से फोन आ जाता था और किसी कारण ना आए तो मैं कर लेता था । और अगर कभी ना बात हो पाये (हालांकि ऐसा बहुत कम बार हुआ है ) तो अगले दिन या तो घर से आये फोन की वजह से आँख खुलती थी या मैं आँख खुलते ही घर फोन कर लेता था । पापा जब तक थे तब भी ऐसा ही था पापा के बाद माँ का भी ऐसा ही है । 
याद है मुझे दो साल पहले इन्हीं दिनों की बात है जब मैं गाँव था और बाकि लोग यहाँ पंजाब में थे । बहन की नई नई शादी हुई थी तो ससुराल में पहली राखी थी तो मैं अपने चचेरे भाईयों के साथ गया था । आने जाने के चक्कर में मैं एक दिन बोन नहीं कर पाया । सब अच्छा चल रहा था, बहन को खुश देख कर मैं भी बहुत खुश था मगर अंदर से एक भय एक डर सा महसूस हो रहा था जिसे मैं बार बार दबा रहा था क्योंकि तब ऐसी डरने वाली कोई बात तो थी नहीं । 
बहन के घर से वापिस आया, इधर मन की घबराहट बढ़ती चली जा रही थी । समझ नहीं आ रहा था कि आखिर ऐसा हो क्यों रहा है । तब सोचा कि पापा को फोन लगाया जाए, उनसे बात कर के हमेशा मन शांत हो जाया करता है । 
यही सोच कर पापा का नंबर मिलाया तो काफी देर रिंग होने के बाद भी किसी ने नहीं उठाया जबकि पापा अपना फोन हर समय साथ ही रखते थे कभी दूसरी से तीसरी रिंग नहीं होपे देते थे । मैने फिर फोन मिलाया तो फोन भाई ने उठाया । उसकी हैलो ने मन की घबराहट और तेज़ कर दी । एकदम बुझी सी डरी सहमी हैलो थी उसकी । हाल समाचार पूछने पर पता लगा कि पापा को कल चक्कर आगया था और वो गिर पड़े । 
इतना सुनते ही जो चक्कर उन्हें उस वक्त आया होगा मैं तब महसूस किया और छत की सीढ़ियों पर निढाल सा हो कर बैठ गया । भाई पर भड़कने लगा कि उसने मुझे बताया क्यों नहीं, मैं आ रहा हूँ । तब उसने समझाया कि अब ठीक हैं पापा घबराने वाली बात नहीं । सारी बात जान कर मैने फोन रख दिया । मन स्थिर नहीं हो रहा था, ना जाने बुरे ख़यालों के उस भयावह जंगल में मेरा मन कहाँ तक घूम आया । अगले दिन फोन किया तो भाई बोला कि पापा को बहुत घबराहट हुई और हम यहाँ लोकल हाॅस्पिटल ले आये मगर ये लोग आगे रैफर कर रहे हैं । इतना सुनते ही मैने फोन फैंक दिया, अजीब सा डर गुस्सा घबराहट सबका मिला जुला असर मेरी आँखों और चहरे में साफ दिखने लगा । बिना देरी किये मैं अगले दिन ही पंजाब के लिए निकल गया । 
वो समय जो मैने उस सफर के दौरान काटा वो मेरी ज़िंदगी के सबसे बेचैन पलों में से एक है । उस दिन से ही हमारे परिवार के सबसे भयानक दिनों की शुरुआत हो गयी थी । जालन्धर पहुंचा तो सबसे पहले हास्पिटल गया । वार्ड ब्वाॅय से मिनन्तें कर के पापा को दो मिनट देखने की मंज़ूरी ली । वो रौबदार चेहरे वाला इंसान जिसकी एक झाड़ से हमारी रूह तक कांप जाती थी ये सोच कर कि आज तो शामत आयेगी, वो निसहाय सा उस आई सी यू के बेड पर सुईयों से गुंथा हुआ पड़ा था । एक क्षण के लिए लगा कि अंदर से आत्मा पर कोई तेज़ धार से वार कर रहा है और आत्मा का अंग अंग कट कर शरीर के भीतर ही गिर रहा है । पैर कांपने लगे एक दम आँखें आँसुओं की भीड़ के कारण धुंधली गयीं । 
उस दिन हमने अपने पिता को खो दिया था क्योंकि उसके बाद जो दो महीने के लिए घर आए थे वो पापा नहीं बस एक बुझी हुई उम्मीद थी उनके ठीक हो जाने की । मगर हमने उनकी आखरी सांस तक उस उम्मीद को मरने नहीं दिया । ऐसा लगता था जैसे वो जा रहे हों और हम उन्हें खींच रहे हों अपनी तरफ । हर कोशिश की, हर दरवाज़ा खटखटाया । हम क्या, हर वो औलाद ऐसा करती जिसे अपने माँ बाप से थोड़ा भी लगाव है । 
मैं नहीं कहता कि अपने पिता या अपनी माँ के प्रति समर्पित सिर्फ हम ही थे । बहुत से ऐसे बच्चे हैं जो अपने माता पिता के लिए हर तरह से समर्पित हैं मगर दुःख ये देख कर होता है कि हमारे ही बीच कुछ ऐसी भी औलादें हैं जिनकी संवेदनाओं को लालच के बोछ ने कुचल दिया है । 
आज आशा केदार सहनी नामक एक वृद्ध महिला के बारे में जब अखबार में पढ़ा तो मन का दुःख आँखों तक आते आते गर्म खून सा हो गया । वो बेटा जिसके जन्म पर ढोल बजे होंगे, बधाईयाँ गाई गयी होंगी, मिठाईया बंटी होंगी, जिसको हर दिन बढ़ता देख आशा ताई और उनके पति की उम्मीदें भी बढ़ती रही होंगी, जिसके भविष्य को सुनहरे रंग से पोतने के लिए ना जाने माँ बाप ने अपना क्या कुछ नहीं दांव पर लगाया होगा, ना जाने उसके खूबसूरत सपनों को पूरा करने के लिए कैसे अपने इकलौते बेटे को अमेरिका भेजा होगा, उस बेटे की संवेदनाएं इतनी आसानी से मर गयीं ?कैसे एक साल से कोई फोन नहीं किया होगा उस बेटे  ने अपनी उस अकेली माँ को जिसने आखरी बार बात होने पर यह इच्छा जताई थी कि “उसका अकेले मन नहीं लगता उसे किसी वृद्धाश्रम में भेज दिया जाए ।” 


क्या ज़िमेदारियाँ या काम का बोझ किसी को इतना अपाहिज बना सकता है कि उसके हाथ अपनी बूढ़ी माँ का नंबर तक ना मिला सके, क्या उसकी ज़ुबान इतनी कमज़ोर हो सकती है कि अकेली माँ को झूठा दिलासा ही दे सके, क्या दिमाग इतना सुस्त हो सकता है कि उसे याद ही ना आये कि उसकी माँ ने कितने समय से फोन नहीं किया, वो अकेली थी, घबराई थी, कहीं कुछ हो ही ना गया हो ? 
जब वो किसी काम से मुंबई आता है और यह सोच कर घर की तरफ निकल जाता है कि चलो उन दो फ्लैटस की हालत ही देख लें जो बूढ़ी माँ के ज़िम्मे छोड़े हैं (हाँ ऐसा ही सोचा होगा क्योंकि माँ को मिलने का सोच कर जाता तो माँ को फोन करता ) तब घंटे भर बैल बजाने पर उसे अंदर से खोई जवाब नहीं मिलता । वो पुलिस बुलाता है दरवाज़े की डुप्लीकेट चाबी बनवा कर दरवाज़ा खोलता है तो पाता है कि अंदर तीन लाशें पड़ी हैं जो कई महीनों से पड़े पड़े  कंकाल हो गयी हैं । एक लाश उसकी माँ आशा सहनी की है और बाकी दो लाशें उस बेटे की खुदकी  और आस पड़ोस के लोगों की संवेदनाओं की है जो आशा ताई के साथ ही दम तोड़ कर आठ दस महीने से वहीं सड़ रही हैं । उन लाशों की बू तक किसी के नाक में नहीं पड़ती । 
महसूस कीजिए उस साठ साल से ऊपर की औरत की वो पीड़ा जो उसने अपने आखरी समय में झेली होगी । ना जाने वो कितने दिन से बीमार रही होगी, शायद उसने एक टक दरवाज़े को कई घंटों तक ये सोच कर निहारा होगा कि शायद उसका बेटा या कोई आस पड़ोस वाला ये देखने आजाए कि उस बूढ़ी औरत को कई दिनों से नहीं देखा चलो पता तो करें वो है कैसी । शायद वो इतनी कमज़ोर या बीमार हो गयी होगी कि उससे कुछ खाया तक ना गया जिस कारण पुलिस  कह रही कि इनकी मौत भूख और कमज़ोरी की वजह से हुई होगी । 
आज उनके पाँच करोड़ के दो फ्लैट, उनके बेटे के अकाऊंट में पड़े लाखों डाॅलर सब अपनी बेबसी पर आँसू बहा रहे होंगे । मुंबई महानगर जो हर रोज़ किसी ना किसी कि दुर्दशा पर रोता है वो आज शर्मिंदगी से ज़मीन में गड़ने का सोच रहा होगा । आज मुंबई अपने महानगर होने पर शर्मिंदा होगा उसे छोटे शहर या वो गाँव देहात अपने आगे बड़े लग रहे होंगे । जहाँ दोपहर तक आस पड़ोस वाले किसी कि सूरत ना दिखे तो लोग उनके घर पता लेने चले जाते हैं । मगर यहाँ हर किसी ज़िंदगी इतनी व्यस्त है कि दूसरा मरा या ज़िंदा है इस बात से किसी को फर्क नहीं । यहाँ की धूल और गंदगी की बू ने लोगों के नाक को इतना सुन्न कर दिया है कि किसी लाश की गंध तक इन नाकों को महसूस नहीं हो पाती । 
आज मुझ जैसे कितने ऐसे बच्चे तड़पे होंगे ज़िन्होंने हर संभव कोशिश के बाद भी किसी अपने को खो दिया । आज मातृत्व फिर से किसी कोने में बैठी आँसू बहा रही होगी । वे जिनके मन कठोर हैं उन्हें हाथ जोड़ प्रार्थना है कि ज़्यादा ना सही मगर इतना ज़रूर पिघला लें अपने मन को कि आप किसी अपने की आखरी आवाज़ तो कम से कम सुन पाएं । 
आशा साहनी, ईश्वर से प्रार्थना है कि वो आपकी आत्मा को शांति दें और आपको अगले जन्म में भले ही बांझ रहना पड़े मगर आपकी कोख ऐसी औलाद को फिर से जन्म ना दे । 
धीरज झा

वो आखरी रात

#वो_आखरी_रात (काल्पनिक) 
कलम के सिपाही, हिंदी साहित्य के सेनानायक धनपत राय उर्फ नवाब राय उर्फ मुंशी प्रेमचंद जैसे महान कहानीकार और उपन्यासकार को मैं इस काल्पनिक कहानी के रूप में एक छोटा सा उपहार भेंट करता हूँ । इस कहानी का सारा दर्द मेरा है, ये सारी पीड़ा मेरी महसूस की हुई है । 
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काली स्याह रात की चाबुक की मार से दम तोड़ती पीली और बेहद कमज़ोर पड़ चुकी दिए की रौशनी में पलंग पर लेटे थे नए युग के वेदव्यास और उनके सिरहाने बैठी शिवरानी देवी उनके सर को सहला कर उनकी पलकों को कुछ देर झपक जाने के लिए मनाओन कर रही थीं । मुंशी जी का शरीर कुछ इस तरह का होगया था जैसे चार पांच दिन से लटके गुब्बारा हो जाता है, मानों जैसे सारे शरीर की हवा खींच कर पेट में भर दी गयी हो ।  पेट को छोड़ बाकि सारे शरीर से गोश्त गायब था, बस थी तो सिर्फ हड्डियों से चिपकी हुई सूखी चमड़ी । पेट फूल कर सख्त हो गया था । 
कमरे की उस पीली और कमज़ोर रौशनी को अंधेरे के साथ साथ उस कमरे में पसरे सन्नाटे की भी मार सहनी पड़ रही थी । हवा भी आज मानो रूठ गयी थी । कहीं कोई शोर ना था । सारी रात चर्र मर्र की आवाज़ करने वाला खिड़की का ढीला पड़ चुका पल्ला भी आज इतना उदास था कि एक बार भी आवाज़ नहीं निकाली थी उसने । शिवरानी देवी की आँखों में घर किये भय का आकार आज पहले के दिनों से भी विकराल था । भय इतना हावी हो चुका था उन पर कि उनके दिल धड़कनें भी बेआवाज़ ही धड़क रही थीं । 
तब सन्नाटे को पराजित करने का ज़िम्मा उठाया मुंशी जी की लंबी सांसों ने । शिवरानी देवी ने घबरा कर पूछा “आप ठीक हैं ?” 
“हूं ।” मुंशी जी ने इतना सा उत्तर ही दिया ।
“कुछ सोच रहे हैं ?”
“आज कल सोचने के सिवा और काम ही क्या है ।” 
“मत सोचिए, सब ठीक हो जाएगा ।” ‘सब ठीक हो जाएगा’ सुनकर मुंशी जी के सूखे होंठ पीड़ा की कोठरी से एक सूखी और बासी हंसी निकाल लाए । 
“सब ठीक हो जाएगा ? लेकिन कब शिवरानी ? अब तो अंतिम बेला आगयी । ‘सब ठीक’ हुए तो वर्षों बीत गये । सब ठीक हुआ करता था जब मैं चुपके से बेपरवाह सा माँ द्वारा छुपाये गुड़ का सफाया कर दिया करता था । पहले उस चोरी के गुड़ से मुंह मीठा होता और फिर माँ की डांट से मन मीठा हो जाता । मगर फिर माँ चली गयी और उसके बाद से कुछ ठीक ना रहा । उसके बाद ना मुंह मीठा हुआ ना मन । आज तक उस गुड़ और उस डांट का स्वाद दोबारा कभी ना चखने को मिला ।” बुदबुदाते बुदबुदाते मुंशी जी की सांस फूलने लगी । 
“आप निराश मत होईए, बहुत मान सम्मान और ख्याति पाई है आपने अपनी मेहनत से । आपको तो खुश होना चाहिए ।” शिवरानी देवी भी जानती थीं कि वह झूठा हौंसला दे रही हैं मुंशी जी को मगर उस वक्त उनके पास इस झूठे हौंसले के सिवा कुछ और था भी नहीं उन्हें देने को । 
“बात सिर्फ मुझ तक होती तो मैं संतोष कर भी लेता मगर यहाँ बात तुम्हारी है, हमारे बच्चों की है । मैं तुम सबको विरासत में क्या देकर जाऊंगा ? तुम जी जान से मेरी सेवा कर रही हो, मेरा मल साफ करती हो मेरी कै साफ करती हो, नहलाती धुलाती हो, खाना खिलाती हो । एक पत्नी के साथ साथ मेरी माँ बन गयी हो । इतना त्याग इतना बलिदान कर रही हो मेरे लिए और बदले में मैं तुम्हें क्या देकर जाऊंगा ? दोबारा विधवा बना जाऊंगा । तुम्हें तुम्हारे शेष जीवन के लिए एक भयावह सूनापन उपहार में देकर जाऊंगा ।” मुंशी जी के मन में दबी हुई आग अब लावा बन कर उनकी आँखों से बहने लगी थी । 
“मैं कल को जब मर जाऊंगा तो मेरे आस पास के लोग ही मुझे नहीं जानते होंगे । उन्हें पता ही नहीं होगा कि मैने हिंदी साहित्य के लिए क्या योगदान दिया । वे बस मुझे एक मास्टर समझेंगे । हाँ निःसंदेह आने वाले समय में मेरी कहानियों और उपन्यासों को प्रकाशित कर के कुछ प्रकाशक अपना पेट भरेंगे उसके बदले मुझे सम्मान दिया जाएगा, हिंदी साहित्य का भिष्म पितामह कहा जाएगा मगर उससे मुझे और मेरे परिवार को क्या मिलेगा ? उस ज़माने में मेरी कहानियाँ और उपन्यासों को पढ़ कर समाज पर आँसू बहाने के बाद मुझे नमन करने वाले क्या मेरे इस दर्द इस पीड़ा को महसूस कर पायेंगे जो मैं बच्चपन से अब तक सहता आया हूँ ? उस समय भारत आज़ाद हो गया होगा, मेरी प्रतिबंधित रचनाएं भी लोगों के बीच उपलब्ध होंगी, वे सब उन्हें पढ़ कर समाज और देश की बड़ी बड़ी बातें करेंगे मगर क्या वे जान सकेंगे कि इन्हें लिखने के लिए मुझे किस दौर किन यातनाओं और किस तरह के प्रतिबंधों से हो कर गुज़रना पड़ा ? क्या उन्हें समझ आएगी ये बात कि मैने सच को ज़िंदा रखने के लिए अपने माता पिता द्वारा दिया नाम तक बदल दिया ? नहीं शिवरानी ये कोई नहीं समझेगा । सिर्फ और सिर्फ मेरी कहानियाँ मनोरंजन के लिए पढ़ी जाएंगी । वो ऐसा वक्त होगा जब मुंशी वंशीधर जैसे ईमानदार कर्मचारी तो इक्क दुक्का मिल जाएंगे मगर पंडित अलोपीदीन जैसा कोई ईमानदारी को पहचानने वाला बेईमान नहीं मिलेगा । उस रोज़ भी कोई ना कोई हल्कु कंबल के बिना पूस रात में तड़पेगा । तब भी पेट की आग को बुझाने वाले आलुओं के आगे लोगों को किसी के जीवन की कीमत शून्य लगेगी । तब ना जाने हामिद अपनी दादी के लिए मेले से चिमटा लाएगा या सारे पैसे ऐय्याशी में उड़ा देगा । शिवरानी मैं सोचता हूँ मैने अपनी रचनाओं के रूप में आने वाले समाज को अपने हाथों की परवाह किये बिना उन्हें तराश कर एक आईना तो भेंट कर दिया मगर क्या वे इसका फायदा उठा पाएंगे ? क्या वे इस आईने में वो देख पाएंगे जो मैं उन्हें दिखाना चाहता हूँ ? नहीं वे बस इस आईने की बनावट देख कर वाह वाह कर के चलते बनेंगे । मैं ना चाह कर भी भयभीत हो जाता हूँ ये सोच कर कि ये आने वाला कल कहीं आज से भी भयावह ना हो जाए ।” शिवरानी देवी ने मुंशी जी के मन में दबी आग को उनकी आँखों और बातों से बह जाने दिया । 
“हो सकता है तब किसी विशेष कलमकार को लोग मेरे नाम से संबोधित कर के उसका सम्मान करें मगर मैं प्रार्थना करता हूँ उस ईश्वर से कि वो फिर से कोई मुंशी प्रेमचंद ना गढ़े । भविष्य में कलम के जो सिपाही हों वो मुझ से कहीं ज़्यादा बेहतर हों मगर कोई मुंशी प्रेमचंद बन कर वो सब ना झेले जो मुझे झेलना पड़ा । मुंशी प्रेमचंद की तरह किसी की कलम को जंज़ीरें ना पहनी पड़ें, किसी को मेरी तरह प्रेम के लिए ना तरसना पड़े, किसी को अपनी अथाह पीड़ा को लिखने के लिए कागज़ और कलम की मिन्नतें ना करनी पड़ें, जो जिस लायक हो उसे उसके जीवन में उसी लायक सम्मान दे दिया जाए,किसी को मरने के बाद महान ना बनाया जाए । मुंशी प्रेमचंद होना बेहद कष्टदायक है शिवरानी । ऐसा कष्ट ईश्वर किसी कलमकार को ना दे ।” मुंशी जी अपने अंतिम बोल के साथ ही फूट फूट कर रो पड़े ।
“मनुष्य अपने कर्म का भागीदार होता है । आपने अपना कर्म कर दिया अब निश्चिंत हो जाईए । आपने जो धरोहर आने वाले कल के लिए संजो कर रख दी है उसका इस्तेमाल वे अपने हिसाब से कर लेंगे । वो उनका कर्म होगा । अब आप सो जाईए ।” इतना कह कर शिवरानी देवी उन्हें चुप कराते हुए उनके माथे से पैर की तरफ आगयीं तथा उनके पैर के तलुओं की मालिश करने लगीं । मुंशी जी शीवरानी देवी के धैर्य और सहनशीलता से आनन्दित हो उठे । एक ही क्षण में सारी चिंता और भय दूर भाग गया । उस रात वह काफी दिनों बाद चैन से सोये । 
सुबह उठे और कुल्ला करने बैठे तो सारा शरीर अकड़ गया । मानों जैसे मन की आग के लावा बन कर बह जाने के बाद मन खोखला हो गया हो । मुंह का कुल्ला मुंह में ही रह गया और हिंदी साहित्य के भीष्म पितामह इस निर्मोही जगत को अलवीदा कह गये । 
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 लाखों हिंदी पाठकों और लेखकों की तरह आप मेरे भी पहले गुरू हैं । पढ़ने और पढ़ कर फिर लिखने की चाह आपने ही हम सब में जगाई है । मैं हर संभव प्रयास करूंगा कि गुरू दक्षिणा के रूप में आपको कुछ ऐसा भेंट करूं जिसकी कल्पना आपने उन दिनों कल के लिए देखे गये सपने के रूप में की हो । 
मुंशी प्रेमचंद जी की 137वीं जयंती पर उन्हें भावपूर्ण श्रद्धांजली व शत् शत् नमन ।


धीरज झा

हे स्त्री विशेष

​हे स्त्री विशेष
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हे स्त्री विशेष

जिन्हें तुम ढूंढते हुए 

उधेड़ रही हो बखिया

समूचे पुरुष समाज की 

वह ना पुरुष हैं ना ही मानव

वे हो भी नहीं सकते पशु

पशु करता है शिकार केवल

शांत करने के लिए 

अपने उदर की अग्नि

जिनको तुम ढूंढ रही हो 

वो वासना से लिप्त कीटों का

एक समूह है

जिनका कोई सरोकार नहीं 

मानवता या पशुता से 

उन्हें केवल आता है 

अपनी वासना को शांत करना 

फिर जानवर हो या मासूम बच्ची

उन्हें इस बात से फर्क नहीं पड़ता 
हे स्त्री विशेष

क्या ऐसे नीच कुकर्मी के लिए

सही रहेगा समूचे पुरुष समाज 

को एक ही तराजू में तोलना

तुलना करना उनके लिंग की 

परम आराध्य महादेव से 

क्या तुमें ज्ञात नहीं शिवलिंग 

है क्या ? 

क्या तुम अपने आक्रोश की 

आग में जला चुकी हो अपनी 

सोचने की क्षमता ? 
मैं गौरवान्वित होता हूँ 

ये स्वीकार करने में 

कि मैं रहा हूँ 

गर्भ में नौ महीने 

मैं जन्मा हूँ योनि के मार्ग से

मगर क्या तुम ये भूल गई कि 

तुम्हारे जीवन की बूंद 

उत्पन्न हुई है लिंग से ही 

क्या तुम भूल गई 

तुम्हारा सहोदरा, तुम्हारे पिता 

तुम्हारा प्रेमी या पति 

सब लिंगधारी पुरुष ही हैं ?
तुम्हारी कुंठा ने क्यों उस पुरुष को 

इतने नीचले दर्जे का बना दिया 

जो तुम्हारा पालनहार रहा 

जिसने तुम्हारे सुख सुविधाओं 

के लिए अपनी छोटी से बड़ी

हर खुशी के साथ कर लिया समझौता 

क्या तुम एक वहशी से करोगी तुलना 

उस पिता उस पति उस प्रेमी या 

अपने ही बेटे की ? 

जिनका प्रेम सदैव समर्पित रहा 

तुम्हारे लिए ।
हे स्त्री विशेष

मत पीसो घून जैसे वहशियों को

गेंहूँ जैसे पुरुषों के साथ

गेंहूँ कम है 

घून ज़्यादा हैं 

कहीं गेंहूँ घून 

के गंदे लहू के कारण

लाल हो गया तो 

आँटे को तरसोगी 

वैसे भी गेंहूँ की तरह पुरुष

पहले ही बहुत बुरी तरह

पिस रहा है
हे स्त्री विशेष

इसे पुरुषों का 

विनम्र निवेदन ही समझो 

कि मत करो संबोधित

किसी घृणित वहशी को 

पुरुष कह कर 
धीरज झा

हाँ मैं सच में अन्नदाता हूँ 

​#हाँ_मैं_सच_में_अन्नदाता_हूँ 
“जाओ किसान बन कर हुड़दंग करो ।”

“जींस में हूँ, घिसा पजामा और फटी बनियाईन तो पहनने दो ।”

“किसान यही पहनते हैं क्या ?”

“इसीलिए कहता हूँ ए सी कार में बैठे बैठे ही सही गाँव देहात घूम आया करो । ऐसे नेतागिरी नहीं चलेगी ।”

“ठीक है तुम भाषण ना दो वो मेरा काम है । तुम जाओ और हाँ भीड़ ले जाना साथ ।” 

“दूध, फलों और सब्जियों का क्या हुआ ।”

“वहाँ सब इंतज़ाम है जाओ तुम ।”

“सालों इतना सब सीधा किसानों से खरीदा होता तो आज किसान खुशहाल होता ।”

“अबे कम अक्ल किसान खुशहाल होता तो अभी ये नाटक करना ही क्यों पड़ता । चौकीदार ने इनका नाम ले कर अपना काम निकाला अब हम इनका नाम ले कर चौकीदार का काम तमाम करेंगे ।” 

“हो तो जन्म से ही हरामी ।”

“हेहेहेहेहेहे नहीं नेता हैं, हेहेहेहेहे ।”
दूसरी तरफ 
“सुना किसान मर रहे हैं ।”

“सभी नकली हैं ।”

“कोई तो मर रहा है ना ।”

“मरने दो, नकली किसानों की मौत में हमारी कोई ज़िम्मेदारी नहीं है ।”

“अरे मौत तो देश में ही हो रही है ना । और दूसरा, इन किसानों की यह दुर्दशा ही क्यों हुई कि उनके नाम पर सबको सड़कों पर उतरना पड़े ।”

“कहा ना नकली किसान हैं । जींस टी शर्ट पहने थे ।” 

“तुम झोंपड़ी के पागल हो क्या समझ क्यों नहीं रहे ।”

“तुम नहीं समझ रहे कि वह सब नकली किसान थे । अब चुप रहो मुझे इंग्लैंड आतंकी हमलों पर ट्वीट करने दो ।” 
तीसरे कोने में कोई खड़ा था जो चाह कर भी कुछ बोल नहीं पा रहा था । जिसका पेट पीठ से सटा हुआ था । जिसकी आँखें सियासी धूप ने सुखा कर बंजर बना दी थीं । जिसके होंठ उस सूखे तट की तरह थे जहाँ पड़ा एक पुराना नांव देख कर खोजकर्ता बता देते थे कि यहाँ पहले पानी हुआ करता था । और उसकी पीठ पर लदा था एक बस्ता जिस पर कुछ लिखा था । शायद ये ‘कर्ज’ लिखा था । दोनों कोनों की बात सुन कर उस पीठ में सटे पेट वाले इंसान ने लंबी सांस खींचने की असफल कोशिश की और बिना कुछ बोले आँखें मूंद कर सो गया । 
उसके सोते ही सामने दो कुछ लोग आए । पहले शीशे में अपना चेहरा संवारा फिर केरा सेट किया और फिर “ब्रेकिंग न्यूज़ :- किसान ने की आत्महत्या । मगर क्या ये असली किसान था ।”  

“हाँ ये असली किसान था ।”

“नहीं जींस पहने था ।” 
इधर सोशल मीडिया वार शुरू हो गया । “किसान नहीं विपक्षी थे । चाल है चाल । जींस टी शर्ट वाले किसान नहीं होते ।” 

“तुम साले गधे भक्तों । तुम्हें क्या पता किसान क्या होते हैं उनकी भूख क्या होती है ।” 

भीड़ अपना काम करती रही और इधर किसान की लावारिस लाश को जानवर और चील कौए खाने लगे । किसान की आत्मा मुस्कुरा कर सोच रही थी “जिया तो खेत में उपजा कर इंसानों को खिलाया, मरा तो जानवरों का पेट भर रहा हूँ । हाँ मैं तो सच में अन्नदाता हूँ । हाहाहाहाहाहाहा सही सही मैं सच में अन्नदाता हूँ ।” 
आसमान मौन है धरती लज्जित है राजनीति बेशर्म है मुद्दे गर्म हैं । “जय जवान जय किसान”
धीरज झा