Category Archives: खुशियाँ

कृष्णा, के नाम पत्र 

कृष्णा, आपके लिए पत्र लिखा है, पढ़ ज़रूर लेना
हे कृष्ण
वैसे तो मुझे उसी तरह इस बात का पूर्ण विश्वास है कि आप पूर्णतः ठीक होंगे जिस तरह मुझे आपके अस्तित्व पर, महादेव की कृपा पर और अपनी माँ के मातृत्व पर हमेशा विश्वास रहता है मगर फिर भी औपचारिक्ता निभाना भी तो कोई चीज़ होती है ना । बड़े दिन हुए आपसे भेंट नहीं हुई तो सोचा इस आनंदमय अवसर पर आपको एक पत्र लिख कर वो बातें सांझा करूं जो साथ रहते कभी ना कह पाया । 
प्रभु ने भी मनुष्य नाम का बड़ा विचित्र फ्राणी बनाया है, ये कभी भी उसका मोल नहीं जान पाता जो साथ रहता है और उसके बिछड़ते ही उसे उसके अनमोल होने का आभास होने लगता है और फिर बिना कारण दुःखी होता रहता है । ख़ैर ये सब मैं आपको क्यों बता रहा हूँ, आप तो खुद सर्वज्ञाता हैं तो अच्छा होगा आपको इधर उधर से बटोरा हुआ छुटपुटिया ज्ञान देने बजाय वो कहूँ जिस कारण मैने पत्र लिखा । 
हे कृष्ण, आदर मैं आपका उतना ही करता हूँ जितना महादेव का, ना एक मिसिया ज़्यादा ना एक मिसिया कम । मैं जानता हूँ आप श्री हरि के तेईस अवतारों में पूर्ण अवतार हैं ठीक उसी तरह जिस तरह प्रभु श्री राम हैं । मगर एक बात साफ़ कहूँगा कि मैं आपको भगवान नहीं मानता । मेरे मन में आपके प्रति रत्ती बराबर भी भगवान या ईश्वर वाली भावना नहीं है । मुस्कुराईए मत सुन लीजिए फिर फैसला करिएगा कि मेरी बात बच्चकानी है या सयानी । 
बहुत छोटा था जब आपसे मिला था । मुझे तो याद भी नहीं, माँ ही बताती हैं कि अपनी पहली जन्माष्टमी जो आपके साथ मनाई थी तब आपको बहुत तंग किया था । सब ने आपको खूब अच्छे से सजा कर पालने में रख दिया था । उस चमचमाती चाँदी की मूर्ति में आपका रूप बड़ा खिल रहा था । आस पास गुब्बारे लगा दिये थे सब ने । हर कोई आता था आपको बड़े प्यार से झुलाता था, बड़ी श्रद्धा से माथा टेकता था । मगर मैं अधर्मी जिससे आपकी पूछ और सबका आपके प्रति प्रेम देखा नहीं जा रहा था, जाता था और पालने को खूब जोर से हिला कर आपको गिरा देता था । माँ आती थीं, प्यार से, थप्पड़ दिखा कर, आँखें तरेर कर हर तरह से समझाती थी कि मत कर ऐसा वो भगवान जी हैं उन्हें तंग नहीं करते मगर मैं तो अबोध था, कहाँ समझने वाला था माँ की डांट मैं फिर से आपको गिरा देता था । 
फिर मेरी नज़र आपकी बांसुरी पर पड़ी थी और मैने वो बांसुरी ले कर मुंह में लगा ली । माँ फिर दौड़ी थी मुझे डांटते हुए मगर मैं आपकी बांसुरी बजाने की नाकाम कोशिश में मग्न था । माँ ने चार बार आपकी बांसुरी धोई थी और मैने पाँच बार उसे फिर से मुंह लगा लिया था । अंत में हार कर माँ मुस्कुरा दी थी और आप तो शुरू से ही मुस्कुराते आ रहे थे । भला क्यों ना मुस्कुराते, आप तो नटखटों के सरदार रहे हैं । 
मंदिर में स्थापित आपकी वो प्रतिमा जिसमें आप बड़े लग रहे हैं मगर वो नटखटपन वो मासूमियत वो बच्चपना आपके उस स्वरूप में भी उसी तरह झलक रहा है जिस तरह उस छोटी बच्चपन वाली मूर्ति में झलकता है । आपको देख देख मैं भी बड़ा होने लगा । मैं किसी बात से परेशान हो कर आपके मंदिर के सामने वाले बरामदे में मुंह लटकाये बैठा रहता था और आप हमेशा मुस्कुराते रहते थे । मैं जितना परेशान होता था आप उतना ही मुस्कुराते प्रतीत होते थे । मगर मेरी परेशानी को हल करने का रास्ता भी तो आप ही ढूंढते थे । 
आपको याद है, मैं जब पहली बार प्रेम का अहसास बटोरे आपके पास आया था और शर्माते हुए सारी बात बताई थी ? कितना हँसे थे ना आप, आपकी मुस्कुराहट गहरी होती साफ़ दिख रही थी तब । राधा रानी आपको कनखियों से चुप रहने का ईशारा कर रही थीं मगर आपको तो मुझे चिढ़ाने में ही मज़ा आता है । लगा था जैसे आप कह रहे हैं कि “बेटा अभी नौवीं कक्षा में पढ़ते हो । ज़्यादा उड़ो मत पर कतरे जाएंगे ।” मैं बहुत गुस्सा हुआ था आपसे मगर जब मेरे ही प्रेम ने उसके प्रति मेरे प्रेम की धज्जियाँ उड़ा कर अपने पिता जी को फारी बात बताने की धमकी दी थी तो भागता।हुआ आया था आपके पास और कान पकड़ कर कहा था कि कृष्णा इस बार गिरने से बचा लो, अब नहीं उड़ूंगा और आपने मुझे बचा भी लिया था । जानते हैं अपने उस अहसास के बारे में पहले ले मैं महादेव को बताने गया था मगर उनका लाल तमतमाया हुआ मुख देख चुप चाप लौट आया और आपको आकर शर्माते हुए सारी बात बता दी । इसीलिए तो कहता हूँ कि आपको भगवान नहीं मानता । भगवान से सही गलत ऊंच नींच का डर लगता है मगर आपसे नहीं । जैसे आप विष्णु अवतार हैं वैसे ही मुझे लगता है कि आपके ही अंग का कोई हिस्सा हूँ मैं, भले ही आपके घने केशों में से ही एक मगर हूँ आपसे ही जुड़ा हुआ । 
हमेशा आप पहले मुस्कुराए हैं और फिर मेरी सहायता भी की है । हाँ सच याद आया कृष्णा, माँ की तरफ से मुझे माफी माँगनी है आपसे । जानता हूँ उसने मन ही मन माँग ली होगी और आपने मन ही मन कबा होगा कि माफी जैसा कुछ था ही नहीं । पापा जा रहे थे और माँ कैसे आपको बोल रही थी ना । उसका गुस्सा भी तो जायज़ ही था । भला कोई तीस साल की सेवा के बदले अपने सबसे प्रिय की जान भी आपसे नहीं माँग सकती ? वो कितना चिल्ला रही थी ना आपको अपनी पीड़ा सुना सुना कर । कृष्णा उस दिन पहली बार मैने आपका मलीन मुख देखा था । मुझे लगा कि कहीं मर्यादा ना टूट जाये आपके पलकों पर पड़े आँसू कहीं आपके नयनों का साथ ना छोड़ दें । मुख मलीन होता भी कैसे ना तीस साल आपकी सेवा करने वाला वो पुजारी आपको छोड़े जा रहा था जिसने आपके साथ हमेशा ऐसे बर्ताव किया जैसे आप उनके साथ हों, उनके सामने हों । आपके सामने रोये भी, आपसे गुस्सा भी हुये, आपको मनाया भी । मैं समझ ही नहीं पाता था कि कई बार वो बहुत ज़्यादा परेशान होने पर घंटों आपके सिरहाने क्यों बैठे रहते थे । मैने जब जब पिता जी से पूछा उन्होंने हंस कर टाल दिया मगर अब मैं समझता हूँ कि वो क्या करते थे । 
अभी भी जब मैं अपने प्रेम को पाने के लिए तड़प कर आपको याद करता हूँ और कहता हूँ कि “आप तो प्रेम को सबसे ज़्यादा समझते हैं, फिर क्यों हम दोनों की दशा पर केवल मुस्कुरा कर रह जाते हैं ?” तब लगता।है जैसे आप राधा रानी की तरफ़ इशारा कर के कहते हो कि “प्रेम पा लेने की वस्तु नहीं प्रेम तो जी लेने का नाम है । तुम प्रेम को जी कर देखो फिर हर वक्त उसे अपने पास ही पाओगे, जीवन के बाद भी वो तुमारे साथ रहेगा । मुझे और राधा को ही देख लो ।” 
मगर कृष्णा मैं भी इस पर यह साफ़ कर दूँ कि मुझ में आप जैसी सहनशक्ति नहीं है । आपकी तरह त्याग मुझ में नहीं । राधा को ना पा सकने की जितनी पीड़ा राधा रानी को हुई उससे ज़्यादा आपने सही मगर फिर भी त्याग उनका ही बड़ा माना गया । किसी ने आपने मन की वेदना को तो नहीं जाना । आपकी तरह मुझमें सबकी बातें सुन कर मुस्कुराते रहने का साहस नहीं । लोग आपकी रानियों और पटरानियों की संख्या गिनवाते हैं मगर कोई ये महसूस नहीं करता कि बंट जाना आसान नहीं होता और वो भी हज़ारों के बीच । किस लिये ? सिर्फ और सिर्फ सबकी खुशी के लिए । हिर्फ इसलिये कि समाज में उन्हें निरादर ना सहना पड़े । किसी एक का हो कर रह जाना कठिन नहीं मगर हज़ारों में बंट कर सिर्फ राधा का हो कर रह जाना कठिन है और यह सिर्फ कृष्णा ही कर सकते हैं । 
बहुत भावुक हो गया कृष्णा और आप तो मुस्कुराते ही रहे हमेशा की तरह । चलो अब चलता हूँ । कहना तो बहुत कुछ है मगर सब कुछ मैं कह दूँगा तो आप महसूस कैसे करेंगे वो जो अनकहा रहना चाहिए । आखिर में फिर कहता हूँ, आप मेरे भगवान नहीं हैं, आप तो मेरे मित्र हैं, गुरू हैं, मार्गदर्शक हैं, आप आराध्य हैं मेरे मगर भगवान नहीं । आपके सामपे रो सकता हूँ, हँस सकता हूँ।अपने मन की कोई भी बात कोई भी दुविधा आपको निसंकोच कह सकता हूँ । आपको भगवान बनाकर मैं अपना ये अधिकार खोना नहीं चाहता । 
जन्मदिन की हार्दिक शुभकाभनाएं मेरे कृष्णा । बस यही माँगूँगा कि भले ही  रूठ जाना मैं मना लूंगा, बुरा लगे तो डांट भी देना, बुरा करूं तो सज़ा भी देना मगर खुद को कभी मुझ से विमुख ना होने देना । भले ही अपना अंश भर ही सही मगर मेरी आत्मा में समाहित ज़रूर रहना । 
जय श्री कृष्णा 
आपका 
धीरज झा 

मुझे यकीन था वो आयेगा

#मुझे_यकीन_था_वो_आयेगा (रक्षबंधन स्पैश्ल कहानी)
*******************************************************
 मेरी ये कहानी मेरी उन सभी बहनों को समर्पित है जो फेसबुक से जुड़ कर मेरे दिल में अपनी जगह और सम्मान बना गयीं 
*******************************************************

“सारा दिन घर के काम करो और फिर इन लोगों की बातें भी सुनों । अपना सामान खुद नहीं संभालना होता और जब गुम हो जाए तो मुझ पर आ कर रौब जमाओ । पता नहीं मेरी किस्मत में ही गुलामी लिखी है, शादी हुई तो सास ससुर की गुलामी, बाहर आ गये तो इनके पिता की गुलामी और अब इन बच्चों की गुलामी । ऐसे ही एक दिन मर जाओ ।” सरिता आज सुबह से ही झुंझलाई हुई थी । बेटे आशीष ने एक बार ही कहा माँ मेरी साईंस की बुक नहीं मिल रही और तब से सरिता घर के कोने कोने में ढूंढ रही है और साथ में यही सब बड़बड़ा रही है । गीतिका और आशीष एक दूसरे का चेहरा देख रहे कि आखिर माँ को हो क्या गया । 
“माँ, ये रही बुक, ड्राईंग रूम में टेबल पर ही पड़ी थी ।” आठ साल की गीतिका ने माँ के मूड को भांप कर डरते हुए कहा । 
“हम्म, ठीक है, भईया को दे दो ।” गीतिका का सहमा चेहरा देख सरिता को अहसास हुआ कि वो बच्चों पर बेफिज़ूल में ही गुस्सा कर रही है ।
फेसबुक पर अपने मन की हर छोटी बड़ी बात लिखने वाली सरिता ने आज एक बार भी फोन को हाथ नहीं लगाया था । आफिस जाते हुए गोपाल भी अच्छे से नहीं बुलाया बस नाशता और टिफिन दे कर अपने काम में लग गयी । गोपाल सब समझता था इसीलिए चुपचाप ऑफिस के लिए निकल गया । 
अब सरिता खुद को थोड़ा शांत करने की कोशिश कर रही थी मगर ना जाने क्यों आज वो हवा के आसरे लहराती हुई कटी पतंग बन गयी थी जिसका खुद पर कोई ज़ोर नहीं चल रहा था । अभी अभी उसने सोचा कि आज उसने सबका मन खराब किया है इसलिए वो रात के खाने में सबके पसंद की डिशिज़ बनाएगी जिससे सब खुश हो जाएं । बच्चे अपने कमरे में बैठे पढ़ रहे थे । सरिता अपने मन को शांत करने की कोशिश करते हुए खाना बना रही थी । कुछ पुराने ख़याल उसके ज़हन को इस तरह खरोंच रहे थे कि उसकी आँखों में ना चाहते हुए भी दर्द भर आया था । 
वो बुरी तरह चिल्ला कर रो देती उससे पहले ही दरवाज़े की घंटी बजी । आशीष ने दरवाज़ा खोला तो कोई अंजान सा चेहरा हाथ में चमचमाता बाॅक्स लिए खड़ा था ।
“तुम आशू हो ना ?” उस अंजान चेहरे पर सजे खुबसूरत होंठों ने मुस्कुराते हुए पूछा ।
“जी हाँ, पर आप कौन ?”
“मैं कौन ये तो अब आपकी मम्मी ही बताएंगी । कहाँ हैं वो ?”
“किचन में हैं । मैं बुलाता हूँ ।” इतना कह कर आशीष सरिता को बुलाने चला गया ।
“माँ, बाहर कोई अंकल आए हैं ।” 
“ये कौन अंकल आगये इस वक्त ।” ये सोचते हुए सरिता बाहर निकली ।
दरवाज़े पर देखा तो एक छब्बीस सत्ताईस साल का लड़का हाथ में कुछ गिफ्टस् पैक जैसा लिये खड़ा था । दो मिनट उसके चेहरे को ग़ौर से देखने पर सरिता उसे पहचान गयी । 
“अरे समीर, तुम ! व्हाॅट ए प्लैज़ेंट सरप्राईज़ ।” सरिता ने हैरानी से उसकी तरफ देखते हुए कहा ।
“कैसी हैं दी ?” समीर ने मुस्कुरा कर सरिता का हाल पूछा ।
“मैं तो ठीक हूँ । पर तुम अचानक यहाँ कैसे ? तुम्हें तो घर का पता भी ठीक से नहीं मालूम था, फिर कैसे पहुंच गये । ना कोई मैसेज ना फोन ?” सरिता की आँखों में हैरानी और खुशी दोनों के मिले जुले भाव झलक रहे थे । 
“दी एक सलाह दूं ?” अचानक से ऐसा बोलने पर सरिता और हैरान हो गयी ।
“हाँ भोलो ना ।” अपनी हैरानी को दबाते हुए बोली 
“अगर आप मेहमानों से ऐसे ही दरवाज़े पर खड़ा रख कर बात करती हैं तो अच्छा होगा यहाँ एक कुर्सी लगवा दें । मेरे जैसे।कुछ आलसी खड़े खड़े थक भी जाते हैं ।” समीर के इस व्यंग से सरिता को ख़याल आया कि अभी तक समीर बाहर ही खड़ा है । अपनी गलती का ध्यान आते सरिता शर्मा गयी और फिर समीर की बात पर हंसने लगी ।
“हाहाहाहा नहीं नहीं, वो तुमें अचानक देख कर इतनी हैरान हो गयी कि ध्यान ही नहीं रहा । आओ ना तुम्हारा अपना घर है ।” इतना कह कर सरिता समीर को अंदर बुला लाई । बच्चे अभी तक इस दुविधा में फंसे थे कि वो बस कभी अपनी माँ तो कभी समीर की सूरत निहार रहे थे । 
“माँ ये कौन हैं ?” छोटी सी गीतिका ने अपनी माँ के कान में फुसफुसाते।हुए सवाल किया ।
“बेटा ये वही समीर मामू हैं जिनसे फोन पर बात होती है । नमस्ते करो ।” बच्चों ने समीर को पहचान लिया क्योंकि उससे बच्चों की हमेशा बात कराया करती थी सरिता । बच्चों से समीर को नमस्ते की तो समीर ने अपने बैग से बड़ी बड़ी दो चाॅक्लेट्स निकार कर दोनों के हाथ में थमा दी । 
“दी अचानक से आगया, इससे कोई परेशानी तो नहीं हुई ना ।”
“अरे पगलू हो क्या ? तुम और मैं पिछले तीन साल से भाई बहन का रिश्ता निभा रहे हैं । ऐसा लगता है जैसे बच्चपन से जानती हूँ तुम्हें । हर खास दिन पर तुम्हारा घंटो फोन आता है । हाँ बस थोड़ा अच्छा इसलिए नहीं लग रहा।कि पहले बता दिये होते आने के बारे में तो सारा इंतज़ाम कर के रखती ।” 
“पहले बता दिया होता तो आपके चेहरे पर सजी ये खुशी और हैरानी के मिले जुले भाव कैसे देख पाता ।” इस पर सरिता मुस्कुरा दी 
“अच्छा मैं पहले ही बहुत लेट हूँ तो आप जल्दी से मुझे राखी बांध दीजिए ।” समीर की बात सुन कर सरिता की आँखों में ना जाने क्यों आँसू मुस्कुरा उठे । 
जल्दी जल्दी सरिता पूजा के कमरे में से सजी सजाई राखी की थाल उठा लाई । उसने समीर को राखी बांधी और उस दौरान वो समीर के चेहरे में कुछ तलाशती रही, शायद वो किसी अपने का चेहरा तलाश रही थी जो उसे समीर के चेहरे में साफ दिख रहा था । समीर ने वो गिफ्ट पैक जो वो अपने साथ लाया था वो सरिता को दिया । पहले तो सरिता ने साफ मना किया पर फिर समीर के कई बार आग्रह पर उसे लेना पड़ा । 
इसके बाद समीर बच्चों के साथ बातें करने लगा इतने में सरिता ने खाना लगा दिया । समीर ने भी बड़े चाव से खाना शुरू किया । 
“अच्छा समीर ये सब कैसे प्लाॅन किया तुमने । अभी परसो हमारी बात हुई पर तुमने आने का कोई ज़िक्र नहीं किया ।” 
“दी तीन साल से हम फेसबुक पर सा हैं । इस दौरान आपकी सभी पोस्ट जिन्हें आप दिल की बातों के हैश टैग में लिखती हैं वो सब दिल से महसूस की हैं मैने । मेरी हर चिंता फिक्र को आपने बड़ी बहन बन कर बांटा है हमेशा । हमेशा मेरी सहायता के लिए तैयार रही हैं आप । कल जब अपनी छोटी बहन के पास बैठा था और फिर ऐसे ही बातें होने लगीं तो मैने आपकी पिछले साल की पोस्ट का ज़िक्र किया।जिसने आपने कहा था कि “कोई भी खास दिन या त्यौहार किसी खास से जुड़ा होता है और उसके रूठ जाते ही उस खास दिन के मायने भी बदल जाते हैं । फिर वो खास दिन जो कभी बेशुमार खुशियाँ दिया करते थे बाद में शूलों की तरह चुभते हैं ।” मैने कभी आपने नहीं पूछा कि आखिर क्या है ऐसा जो आपको इतना दुःखी करता है मगर आपका दर्द हमेशा महसूस किया है । मैं फेसबुक से जुड़ा था इसी लिए पर्सनल होना मुझे कभी सही नहीं लगा । यही सब भातें मैने जब बहन से बताईं तो उसने मुझसे कहा कि भईया हो सरिता दी हम सब से भले ना मिली हों मगर जब फोन आता है तो लगता ही नहीं कि वो हम सब से अलग हैं । आप कल उनके यहाँ जाईए और राखी बंधवाईए, उन्हें खुशी होगी और उनकी यही खुशी मेरे लिए आपका गिफ्ट होगा ।” मैं मुस्कुरा दिया उसकी बात सुन कर क्योंकि मैने पहले से ये सोच रखा था । पता मैने जीजू से ले लिया था और उन्हें कहा कि आपको ना बताएं । वो कुछ देर में आते ही होंगे ।” 
ये सब सुन कर सरिता की आँखें ना चाहते हुए भी छलक पड़ीं । आज सुबह से वो जितना दुःखी थी उससे कहीं ज़्यादा वो इस वक्त खुश थी । उसके मन में इतनी खुशी भर गयी थी कि उसकी आँखों से छलकने लगी थी अब । 
“समीर, तुम नहीं जानते आज तुमने मुझे क्या कितना कीमती तोहफा दिया है । तुमने मेरे अंदर की वो कमी पूरी कर दी जिसने मुझे हमेशा अधूरा रखा । मेरा भाई रमन जो मुझे दुनिया की हर चीज़ से बढ़ कर प्यार करता था वो मुझसे ऐसे मुँह मोड़ गया जैसे मैं कभी थी ही नहीं । मैं पूरा साल अपने आप को बांधे रखती थी मगर इस दिन आकर टूट जाती थी । हर साल राखी की थाली इसी आस में तैयार रखती थी कि वो इस बार पक्का आयेगा मगर हर बार भूल जाती थी कि वो अब कभी नहीं आ सकता । ये राखी का दिन मुझे कचोटता है समीर पागल कर देता है ।” सरिता रो पड़ी 
“वो दूर था मुझसे, मैने ही उसे ज़िद में आकर कहा था कि हर हाल में राखी पर आना है । मेरी ज़िद्द पूरी करने के लिए ही वो आरहा था मगर रास्ते में ही ना जाने कहाँ खो गया कि फिर दोबारा घर नहीं लौटा । मैं सोचती हूँ तो खुद से चिढ़ लगती है मुझे, मैं ज़िद्द ना करती तो वो ज़िंदा होता आज । मेरा प्यार ही उसके लिए काल बन गया । मगर मैने कभी नहीं माना कि वो चला गया है, मुझे हमेशा लगता था वो आयेगा । सब मुझे पागल समझते थे मगर देख समीर आज रमन आगया । आज इतनी तपस्या के बाद मुझे मेरा रमन मेरे समीर के रूप में मिल गया । आज मेरी राखी की थाली यूं ही पड़ी नहीं रही ।” समीर का राखी वाले हाथ पर सर रख के सरिता फूट फूट कर रो पड़ी और बच्चे उससे लिपट गये । 
“साॅरी दी, मैने आने में बहुत वक्त लगा दिया । मुझे बहुत पहले आजाना चाहिए था । मगर अब वादा करता हूँ मैं कभी आपको छोड़ कर नहीं जाऊंगा ।” समीर भी खुद को भावनाओं की इस लहर में बहने से ना रोक पाया और फूट फूट कर रो पड़ा । 
******************************************************
 कई बार भगवान आपके हिस्से से कोई चीज़ आपको नहीं देता जिससे आपको कई बार उसकी कमी बहुत महसूस होती है । मगर असल बात ये है कि अगर आपके पास वो एक चीज़ नहीं तब ही आप उसका असल महत्व जान पाते हैं और उस चीज़ के प्रति आपका सम्मान बढ़ता जाता है । फिर आपको बाहर बाहर से ही वो चीज़ इतनी ज़्यादा मिल जाती है कि आपको अहसास ही नहीं होता कि आपके खुद के पास वो नहीं है । 
अब मुझे ही देख लीजिए । हम तीन भाई, सगी बहन का खाता निल मगर इस बात का जब तक हमको अफ़सोस होता तब तक हमारे पास दो बहने थीं । और उन दो बहनों ने कभी ऐसा महसूस ही नहीं होने दिया कि मेरी कोई बहन नहीं । मुझ बिना बहन वाले भाई को स्नेह मिलने का सिलसिला यहीं नहीं थमा । आज फेसबुक बेहतरीन से लेकर बेकार तक हर तरह की सामग्री का बाज़ार है, बिल्कुल इस दुनिया की तरह । अब आप पर है आप यहाँ क्या चुनते हैं । मैने यहाँ रिश्ते कमाए हैं, हर तरह का रिश्ता और हर रिश्ते को दिल में जगह दी।  बिना पाने की उम्मीद किये हर रिश्ता निभाया । आज के दिन जब मुझे रोना चाहिए कि मेरी कोई बहन नहीं तब मैं फूला नहीं समा रहा क्योंकि मेरे हाथ में पाँच राखियाँ और ढेरों दुआएं हैं उन सभी बहनों कीं जिन्होंने इस मंच से मुझ कांच खे टुकड़े को भाई नाम का हीरा बना कर अपने रिश्तों की माला में जोड़ लिया । शालिनी दी कहती हैं कि बात हो ना हो मगर स्नेह बना रहना चाहिए । सच में भले ही मैं इन सभी बहनों से बात नहीं कर पाता मगर सबका स्नेह मेरे साथ हमेशा बना रहा और हमेशा बना रहेगा । Shalini दी, इंदर दी, आशू दी, राधिका बहिनी, पूनम दी इन सबसे बात हो गयी । और जो बहनें बच गयीं उन सबको यहीं सेरक्षाबंधन की शुभकनाएं । सभी बहनें हमेशा खुश रहें, उनकी हर मनोकना पूरी हो । साथ ही साथ सबको ढेर सारा स्नेह ।

आप सबका भाई 
धीरज झा

पहली तस्वीर

​#पहली_तस्वीर 
मेरी हज़ार ज़रूरते हैं, हज़ारों इच्छाएं हैं जिनको पूरा करने के प्रयास में ज़िंदगी कतरा कतरा हो कर हर दम बहती चली जा रही हैं मगर इन सब के बाद भी मेरी एक इच्छा जो सबसे ऊपर है । मैं ये भी जानता हूँ कि यह कभी पूरी नहीं हो सकती मगर फिर भी यह सबसे ऊपर है । ईश्वर अगर मुझसे पूछें कि तुम्हारी कोई एक इच्छा पूरी कर सकता हूँ तो मैं अपनी उस कभी ना पूरी होने वाली इच्छा के पूरा होने का वरदान माँगूंगा । मगर वह इच्छा आज मांगने से पहले ही पूरी हो गई । असल में रह तो गई अधूरी ही मगर इस अधूरेपन में भी खुश हूँ । 
*******************************************
कल रात बड़े ही बेचैन मन के साथ करवटें बदल रहा था । एक तो गर्मी बहुत है गाँव में, ऊपर से चिंताएं अपने लिए कुछ वक्त खुद से निकाल ही लेती हैं और रात का यह वक्त उनके हिस्से का होता है जिसमें।वह सिर्फ अपनी कहती हैं । इस भयंकर गर्मी और बिना बिजली के इस गाँव में खिड़कियाँ और उन से आने वाली हवाएं जीवनदायनी साबित होती हैं । उसी खिड़की से एक जानी पहचानी आवाज़ में लिपटे हुए मेरे नाम को हवाओं ने मुझ तक पहुंचाया । मैने चौंक कर खिड़की से बाहर देखा, मेरे चौंकने की सबसे बड़ी वजह यह थी कि उस आवाज़ से मैं इस तरह वाकिफ़ था कि बेहोशी की हालत में भी वह आवाज़ मेरे कानों में पड़े तो मैं उठ कर कह दूं “जी पापा” । 
हाँ वो आवाज़ पापा की ही तो थी । मैने खिड़की से बाहर देखा तो पापा लूंगी और बनियाईन में खड़े थे । गाँव आने के बाद गर्मियों में हमेशा उनका यही पहनावा होता था । उनके आते ही सुबह भी आगई थी । मगर मेरी तरह सुबह भी आज स्तब्ध सी थी , उसकी महक और चहक गायब थी, हाँ नमी ज़रूर थी इसमें, शायद पापा को ऐसे अचानक देख कर उसे मेरी तरह हैरानी हुई और उसका मन भी भर  आया था । मैने चौंक कर कहा “पापा आप ? अंदर आईए ना बाहर क्यों खड़े हैं ?” मुझे यकीन नहीं हो रहा था कि पापा मेरे सामने खड़े हैं मगर इस हैरानी के साथ भी मैं शांत था एक दम शांत ।
“नहीं ! गर्मी बहुत है । तू बाहर आ तुझसे बात करनी है और अपना फोन लेते आना ।” मैं सोचने लगा कि इतनी रात को पापा को मुझसे भला क्या काम पड़ सकता है और वो भी फोन के साथ । यह सोचते सोचते मैं ग्रिल तक पहुंच गया था । पापा के पास पहुंचा तो पापा के पैर छूए और पापा बिना कुछ बोले सर पर हाथ फेरते हुए आगे बढ़ने लगे । हमारे नए घर (जिसे पापा ने बड़े उमंग से बनाया मगर उसमें रह नहीं पाए) के सामने से गुज़रते हुए पापा का हाथ उस घर की दीवारों को छूने की कोशिश कर रहा था मगर ना जाने क्यों उन्हें छू नहीं पा रहा था जैसे कि वह दीवार नाराज़ हो और पापा की छुअन से दूर जाते हुए कह रही हो कि “नाराज़ हूँ तुम से, तुमने इतनी खुशी इतने उत्साह से मुझे बनाया और फिर बिना बताये चले भी गए । कम से कम एक दिन तो खुद को मेरी गोद में सोने दिया होता ।” 
पापा खामोश थे, चेहरे का भाव शून्य था ना खुशी ना दुख जैसे पत्थर हो गए हों । इसी तरह दीवार के आखरी छोर को छूने की नाकाम कोशिशों के बाद हम बड़ी दादी की बैठक तक पहुंच गए थे । आगे रास्ता बंद था क्योंकि आगे ढलान है और फिर नदी । नदी पहले शोर कर रही थी मगर हमारे आते ही शांत हो गई थी मानो पापा को पहचान गई हो और हमारे बीच होने वाली बातों को सुनना चाह रही हो । आम तौर पर सुबह में सब जाग जाते थे मगर आज ऐसे लग रहा था जैसे सब गायब हो गए हों । मुझे पापा और प्रकृति को छोड़ कर वहाँ कोई नहीं था ।
मैं कुछ बोलता इससे पहले पापा बोल पड़े “सब ठीक है, अब उठने बैठने और चलनेएं कोई दिक्कत नहीं है । दर्द होता भी होगा तो अब महसूस नहीं होता । तुम सबकी याद बहुत आती है मगर दुःख महसूस नहीं होता । मैं पहले ही कहता था ना सब ज़िम्मेदारियों से मुक्त हो कर गाँव चला आऊंगा । भले ही खुद से ना सही मगर समय ने मुझे ज़िम्मेदारियों से मुक्त कर ही दिया इसीलिए गाँव चला आया । मुझे पता था तू ज़रूर आएगा ।” मैं शांत था । केवल मैं ही नहीं मेरे साथ सुबह, यह हवा, येह नदी, पंछी, पूरा गाँव सब कुछ शांत था । मानो जैसे सिर्फ पापा को सुनते रहना चाह रहे हों । मैं चाह रहा था पापा के गले लग जाऊं और उनके हिस्से के बचे कुछ आँसू उनके पैरों में बहा दूं । मगर ऐसा लग रहा था जैसे मुझे बांध दिया गया हो ना मैं हिल पा रहा हूँ ना मैं बोल पा रहा हूँ । 
पापा फिर बोलते हैं “जानता हूँ मैं अपने सारे फर्ज़ ना निभा पाया । अभी मुझे रहना था कम से कम तुम सब को संभालने के लिए कम से कम तुम सब को वक्त वक्त पर हिम्मत देने के लिए मुझे रहना था मगर मैं नहीं रह पाया । चाह कर भी रुका ना गया मुझ से । मैं अपने मन में कितने मलाल ले कर चला गया । मगर आज तू आया है मेरे सामने है तो बता कोई ऐसी इच्छा हो जो मैं अभी पूरी कर सकता हूँ । तू मेरे स्थिति जानता है मैं चाह कर भी कुछ नहीं कर सकता मगर फिर भी तू कुछ ऐसा माँग ले जो मेरे बस का हो और मैं पूरा कर दूँ तो मुझे बहुत शांति मिलेगी ।” 
मैं पापा से कहना चाह रहा था कि “आपने अपना हर फर्ज़ हर ज़िम्मेदारी बहुत अच्छे से निभाई । किसी भी कमीं के लिए आपसे हमें कोई शिकायत नहीं । हम तो बस इतना चाहते थे कि आप हमेशा हमारे साथ रहें ।” मगर मैं यह सब बोल नहीं पा रहा था बस मेरी आँखों के कोर पर कुछ कुछ आँसू लटक गए थे जो ज़मीन पर कूदने को बेचैन थे मगर कूद नहीं पा रहे थे । 
मैं बस इतना बोल पाया कि “पापा मुझे आपसे कुछ नहीं चाहिए । हाँ हो सके तो बस एक इच्छा पूरी कर दीजिए ।मैं जब भी खोजता हूँ तो मुझे आपके साथ अपनी एक भी तस्वीर नज़र नहीं आती । गलती मेरी ही है जो मैं कभी कह ही नहीं पाया कि पापा मुझे आपके साथ एक फोटो क्लिक करनी है । अगर हो सके तो आज मेरे साथ एक तस्वीर ले खिंचवा लीजिए ।” 
मेरी आँखों के कोर पर आँसुओं का एक भाग अब पापा की आँखों में नज़र आ रहा था जैसे मेरी आँखों से टपक कर उनकी आँखों में चला गया हो । मैं पापा के पास गया उनसे लिपटते हुए एक तस्वीर खींच ली । तस्वीर लेते ही हवाओं, सुबह, नदी और पंछियों ने अपनी चुप्पी तोड़ दी । मेरे चेहरे पर अपार खुशी थी मगर पापा मेरे बगल में नहीं थे । मुस्कुराहट मेरे चेहरे से चाह कर भी नहीं जा रही थी मैं पापा के जाने पर उदास होना चाहता था मगर हो नहीं पाया क्योंकि शायद पापा ये नहीं चाहते थे कि मैं उनके जाते उदास हो जाऊं । 
प्रकृति के मौन तोड़ते ही सारा गाँव भी जाग गया और गाँव के जागते ही मेरी नींद भी खुल गई । उदास मन के साथ चेहरे की मुस्कुराहट वैसे की वैसे ही बनी थी । फोन में पापा के साथ की वो तस्वीर गायब थी । मगर पापा के कंधे पर हाथ रखे कैमरे की तरफ देख मुस्कुराता हम दोनों का चेहरा मेरी आँखों के सामने अभी भी घूम रहा था । 
*******************************************
आज पापा का जन्मदिन है और पापा ने अपने जन्मदिन पर मुझे यह बेहतरीन तोहफा दिया है । मगर अफसोस मैं आज फिर पापा को कुछ नहीं दे पाया सिवाए इस एडिट की हुई हम दोनों की तस्वीर और “जहाँ रहें सुकून से रहें” की दुआ के । 


जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं पापा । हमारे चेहरों से लेकर हमारे मन तक में हमेशा अपनी मौजूदगी बनाए रखिएगा  । जहाँ रहें खुश रहें सुकून में रहें । आशीर्वाद और स्नेह बनाए रखें हमेशा 😊
आपका नालायक बेटा 
धीरज झा

​बिहार यात्रा, थकान और भगवान 
बिहार आना हो तो आपको सबसे पहले टिकट की मारा मारी के लिए कमर कसनी पड़ती है । कभी कभी तो सोचता हूँ कि शायद बिहार से लोग शायद डेली अॅप डाऊन करते होंगे दूसरे राज्यों में इसीलिए जब भी टिकट खोजो तो टिकट चार्ट रिग्रेट फील करने लगता है । हमको भी दया आ जाती है जब कोई इतने मासूम तरीके से अफ़सोस जताता है तो । फिर मजबूरी में खुद दक्षिणा के अधिकारी हो कर उल्टा हमहीं को ऐजेंट भाईयों को दक्षिणा दे कर टिकट जुगाड़ करना पड़ता है । 
कहते हैं ना मजबूरी जो ना कराए । शरीर से हष्ट पुष्ट हो कर भी जनरल का मार झेलने की हिम्मत नहीं हो पाती अब । भीड़ गर्मी सब सहन हो जाता है जरनल का मगर ये साईलेंट बम का अटैक असहनीय होता है इसीलिए कान पकड़ लेते हैं जनरल का नाम सुनते ही । 
चलिए 565 के स्लीपर का 1390 दे कर टिकट मिल भी जाता है तो अब दिक्कत आती है स्लीपर में बढ़ रही वेटिंग वालों की भीड़ । कुछ वेटिंग वाले तो बड़े सज्जन होते हैं, उन्हें देखते आपको खुद दया आ जाएगी और आप अपनी सीट का आधा हिस्सा उनको उस हक़ से दे देंगे जैसे बड़े लोग किसी गरीब पर मेहरबान हो कर अपनी ज़मीन का टुकड़ा उन्हें घर बसाने को दे देते थे । 
और कुछ वेटिंग मानव भारतीय जुगाड़ संस्कृति के धरोहर होते हैं । ये सबसे पहले किसी बकलोल दिखने वाले पैंट्री वाले को पकड़ कर खाने पीने वाली चिज़ों के गलत रेट का उदाहरण दे कर कंप्लेन बुक की मांग करते हुए दिखाएंगे कि इन्होंने बजाबते रेलवे टूरिज़्म की डिग्री ले रखी है । फिर ये आपके हाव भाव देखेंगे, कहीं आपको इन्होंने अपनी बातों से प्रभावित पाया तो झट से कहेंगे “अरे भाई साहब, ऐ.सी तक में ट्राई किए पर टिकट नहीं मिला । टी सी को पच्चीस सौ दे रहे थे पर साला टिकट नहीं दिया ।” अब सामने वाला सोचता है इतना बुद्धिमान आदमी ऐसे कैसे खड़े हो कर जाएगा । मगर आपके सोचने से पहले वो आपके बगल में लेटने की जगह बना चुका होता है और धीरे धीरे शर्णार्थी से इस्ट इंडिया कंपन्नी बनते उसे देर नहीं लगती और कुछ ही देर में आपकी सीट पर उसका कब्जा होता है और आप भी दाँत चिआर कर कह देते हैं कोई ना लेटे रहिए हम टहल लेते हैं । अब जनाब जुगाड़ू लाल अंदर ही अंदर अपनी विजय पर मुस्कुरा रहे होते हैं । 
स्लीपर का धीरे धीरे जरनल होते जाना आपके तीन गुने दाम पर कटाए टिकेट की खिल्ली उड़ा रहा होता है और दूसरी तरफ़ । ट्रेन का तपता हुआ तवा हो जाना आपकी बची खुची सहनशक्ति भी छीन लेता है । सीट पर लेटे लेटे बदन जल रहा होता है और ट्रेन का अकारण ही लेट होते रहना दिल को जला रहा होता है । ना धुंध है ना कोहरा ना बाढ़ ना बारिश फिर भी प्रभू की दया सै ट्रेन 6 घंटे से ज़्यादा लेट हो रही है । प्रभू भी सोचते हैं ससुरों जल्दी पहुंच कर करोगे भी क्या, तुमको कौन सा मिनिस्ट्री संभालनी है । हम भी करेजा पर मुक्का मार कर कह लेते।हैं जैसे प्रभू की माया । वैसे माया किसी की नहीं है । माया तो काशी की ना हुई जहाँ स्वयं भगवान शिव विराजे थे तो और किसी की क्या होगी । 
खैर हमको क्या लेना इन सबसे । गर्मी की मार, बकचोदों की बकचोदी, ट्रेन की 6 घंटे लेट की सुस्ती ये सब झेल कर थका हुआ शरीर ले कर जब पटना पहुंचा तो लग रहा था जैसे महीने पहले पैदल ही पटना के लिए निकला था और आज पहुंचा हूँ । 
मगर जब सुबह अपनी बेटू से मिला और उसने “पलनाम चाचू” कह कर पैर छूने के बाद कैसे नानी यहाँ गई तो चोट लग गई उसे, कैसे उसके पप्पी ( खिलौने वाला ) का बेरहमी से एक कान नोच दिया गया, स्कूल में उसने कौन कौन सी कविताएं सीखीं, जैसी कई गाथाएं (जिनमें।अधिकतर मुझे समझ नहीं आईं, सुनने के बाद उसे देखते हुए मेरी सारी थकान सारा गुस्सा गायब हो गया । सच में बच्चे भगवान का रूप हैं, बस आपको इन में भगवान देखने की नज़र चाहिए । 
धीरज झा

माँ बनना मुश्किल नहीं माँ हो जाना मुश्किल है 😊

​#मदर्स_डे_स्पैश्ल 
माँ बनना मुश्किल नहीं माँ हो जाना मुश्किल है 😊
माँ कोई ख़ास नही हैं । आम ही हैं ये जो आम सी उछलती कूदती शोर मचाती या शांत चुप चाप तितलियों को निहारती बच्चियाँ या लड़कियाँ आपके आस पास हैं इन्हीं की तरह वो भी आम सी ही हैं । उनका रोज़ सुबह उठना घर साफ़ करना, नाशता और दो टाईम खाना बनाना, सारा दिन काम में उलझे रहने पर भी आपकी फरमाईशों को पूरा करते रहना, ये सब कोई बहुत ख़ास बात नहीं है जिसके लिए आप उन्हें सबसे महान बना दें । इतना काम तो आपके घर की कामवाली भी मन ही मन आपको कोसते हुए कर देती है ।  
ऐसे तो पिता बेचारे सारा दिन सौ झूठ बोल कर सौ बातें सुन कर मेहनत कर के कमाते हैं फिर उन्हें माँ से ज़्यादा महान क्यों नहीं कहते सब लोग ?
मैं धीरज झा जो हमेशा माँ का गुणगान करता रहता हूँ पिछले छः दिनों से मदर्स वीक मना रहा हूँ वो कह रहा है कि माँ का ये सब करना खास नहीं है । हाँ भई मैं ही कह रहा हूँ मैं तो ये भी कहता हूँ कि माँ का बच्चे को नौ महीने पेट में रखना भी कोई महान काम नहीं है । अब कहोगे तुम रख के दिखाओ अरे यार अगर प्रकृति ने मर्द को इसके लिए चुना होता तो हम भी रखते बच्चे को नौ महीने मगर ये जिम्मा तो महिलाओं को ही सौंपा गया ना । ये सब उनके काम हैं इसके लिए माँ को महान बताना सही कहाँ है भई ।
हाँ मगर माँ महान तो ज़रूर है जानते हैं क्यों ? क्योंकि माँ अपने दायित्व अपने काम अपनी ज़िम्मेदारी को बहुत ही सच्चे मन से निभाती है । उसके लिए ना वो कभी अहसान जताती है ना ही कभी उसका बदला माँगती है । उसके लिए आपको नौ महीने अपने अंदर सहेज कर रखना कोई ज़िम्मेदारी नहीं है बल्कि उसकी सबसे बड़ी खुशी है । ऐसा करना उसके लिए ईश्वर को पा लेने जैसा है । ये उसके मन को सबसे बड़ा सुकून देता है । उसे अच्छा लगता है, ठीक वैसे ही जैसे एक सच्चे फौजी को देश की रक्षा का दायित्व उठाना अच्छा लगता है । जैसे एक सच्चे डाॅक्टर को किसी की जान बचाने का ज़िम्मा सौंपा जाना अच्छा लगता है वैसे ही जैसे एक सच्चे पुजारी या मौलवी को सारा जीवन अपने ईश्वर की सेवा करना अच्छा लगता है । जिसको अच्छा नहीं लगता वो निकाल फेंकती हैं, इसे बोझ समझ कर, इसीलिए वो बस औरत रह जाती हैं आम सी औरत माँ नहीं बन पातीं । माँ महान है क्योंकि उसे ये सब करना बोझ नहीं लगता, माँ महान है क्योंकि उसे आपके लिए काम करते हुए थक कर चूर होने में भी आनंद आता है, माँ महान है क्योंकि उसे माँ होना बोझ नहीं लगता उसे गर्व है अपने माँ होने पर । 
मगर क्या बच्चों को उनके फर्ज़ को निभाना अच्छा लगता है क्या एक बेटा या बेटी अपने औलाद होने का दालित्व सच्चे मन से निभा पाते हैं ? ठीक है आप अमीर है आपकी माँ ए सी के नीचे सोती हैं अच्छा खाती हैं अच्छा पहनती हैं बड़ी गाड़ी में घूमती हैं । हर औलाद यही सुख सुविधाएं अपने स्तर और हैसीयत के मुताबिक अपनी माँ को दे कर गर्व से फूलता है कि उसने अपने बेटे होने का फर्ज़ निभा लिया और यही गर्व से फूलना उसे माँ जैसा महान नहीं बनने देता । कभी बूढ़ी हो रही माँ से पूछा है कि वो अकेले वक्त कैसे काटती है ? वो गाँव में ठीक से है ना ? वो आपके साथ क्यों नहीं रहती ? वो आपसे अपने मन की बात क्यों नहीं कह पाती जैसे आप कह दिया करते थे ? आप ये सब कर भी लें तब भी माँ जैसे महान नहीं हो सकते क्योंकि आप इसे अपनी ज़िम्मेदारी समझ कर बस निभा देंगे । 
एक पिता अपने बच्चों की कामयाबी चाहता है और एक माँ अपने बच्चे की खुशी और यहीं माँ पिता से एक कदम आगे बढ़ कर सबसे महान हो जाती है ।  दुनिया भले आपको नाकारा समझ ले मगर माँ का यकीन आप पर से तब तक नहीं उठता जब तक आप ने दुनिया का सबसे बुरा कर्म ना कर दिया हो । माँ का आप पर से यकीन उठ जाए तो आप समझ लें कि आप खुद के यचीन के लायक भी नहीं हैं । 
आज मदर्स डे है सभी माँओं के लिए ख़ास दिन अगर कुछ सीखना है तो माँ से सीखिए कि अपने काम को जिया कैसे जाता है अपने कर्तव्यों को बिना बोझ समझे हँस कर कैसे निभाया जाता है । अगर आप ये सीख गए तो अपने काम में ज़रूर महान हो जाएंगे । माँ बनना मुश्किल नहीं है माँ होना मुश्किल है और माँ ईश्वर से बढ़ कर है क्योंकि उसे माँ होना भी मुश्किल नहीं बल्कि गौरवशाली लगता है । 
आज के दिन उन सभी माँओं को नमन जिन्होंने माँ शब्द को बोझ नहीं अपना गर्व समझा और बिना शिकायत मुस्कुराते हुए अपने बच्चे की हर खुशी का ध्यान रखा । और एक सलाम उन चंद बच्चों के नाम जिनके लिए उनकी माँ ज़िम्मेदारी नहीं बल्कि एक खुशी है एक चैन है जिनके लिए उनकी माँ उनकी आत्मा है 😊 
धीरज झा

​#घर_वाकई_स्वर्ग_है

शाम होने के बाद घर से बाहर मत जाना । बाज़ार का कुछ अलूल जलूल मत खाना । किसी से झगड़ा किया तो मार मार के टाँगें तोड़ दूंगा । फिल्म देखेगा हाँ बिगड़ा हुआ बनेगा, घर में टी वी पर देखो सिनेमा हाॅल में कभी भी नहीं । इतनी बंदिशें थीं घर में कि हमेशा सोचता था यार कब इस जेल से निकलूंगा । समय बीता समय के साथ घर के नियम कानून बदले या पापा को मेरी वजह से बदलने पड़े पता नहीं मगर पहले से बहुत अच्छा था शायद पापा समझ गए थे कि बेटा बड़ा हो गया है अब अपने अच्छे बुरे को खुद समझ सकता है इसीलिए रोकना टोकना बंद । सब अच्छा था मगर घर से बाहर रहने की ललक मन से मिटी नही थी । आखिर ये सपना भी पूरा हुआ । पिछले छः सालों से घर से बाहर का हो कर ही रह गया हूँ । इतना बाहर का कि कोई अगर पूछता है कि भाई कहाँ रहते हो तो सोचना पड़ता है पटना कहूँ दिल्ली कहूँ पंजाब कहूँ यूपी कहूँ या इंतज़ार करूं इस बात का कि कहीं और किसी राज्य में ना निकलना पड़ जाए । 
इतना वक्त बाहर रह कर बस एक ही बात जान पाया कि किसी ने ये क्यों कहा “घर दूसरा स्वर्ग है” । पिछले डेढ़ दो महीने से मध्यप्रदेश में था । जब से बिमार हुआ उसके बाद से धूल मिट्टी ज़हर सी हो गई है मेरे लिए । ज़रा सी धूल और खाँसी शुरू । और एम पी के बिहड़ इलाकों में तो धूल मिट्टी माँ के दुलार जैसी है मतलब हद से ज़्यादा । अब धरती माँ का इतना दुलार मिलते ही खाँसना शुरू । मगर घर से इतनी दूर आपको अपनी खुद परवाह नही होती तो और कोई क्या परवाह करेगा । फिर भी प्राणप्यारी के भेजे कफ सिरप ने थोड़ा आराम दिया था मगर ये खांसी थोड़े से मानती कहाँ है और ज़्यादा ध्यान वो भी खुद का हमसे रखा नही जाता । इसीलिए जैसे तैसे वक्त काट लिया आलसी सा बन कर । आप काम पर कहीं बाहर हों तो रात भर बाहर ही बिता दो किसे परवाह होती है । मन खुद ही सोच लेता है यार भला अपना कौन इंतज़ार कर रहा है फिरते रहो बाहर ही । 
मगर जब आप घर आ रहे होते हैं तो माँ की दो आँखें बड़ी बेसब्री से आपके इंतज़ार में होती हैं । एक दिन पहले ट्रेन मिस हो गई थी माँ परेशान थी की बैटा पहुंचा क्यों नही । परसों जब ट्रेन फिर पकड़ी तब से माँ ने भाई को नेट पर आँखें गड़ाए रखने पर मजबूर कर दिया । भार बार उससे कहे जा रही थी “देख ना उसकी ट्रेन कहाँ पहुंची, कितनी लेट है ट्रेन ? कब तक पहुंचेगा वो ?” घर आया तो सबसे पहले माँ ने गले लगाते हुए कहा “शुक्र है तू पहुंच तो गया ।” ये था घर के स्वर्ग होने का पहला प्रमाण । दूसरा प्रमाण माँ के हाथों का प्यार में डूबा हुआ खाना और तीसरा प्रमाण जब मैं एक बार खांसता तो माँ का डर से मेरे चेहरे को देखना । मुझे खांसी आती है तो उसे वो पल याद आजाते हैं जब मैं बिमार था । जब मुझे देखते ही सामने वाले के मन में आजाता था ये नहीं बचेगा । इसीलिए माँ का डरना लाज़मी था । 
दवा मंगा कर दी और जब थोड़ा शांत देखा खांसी को तब उसे थोड़ा आराम मिला । बच्चों की छोटी सी बिमारी माँ को बहुत बिमार कर देती है और यही वजह है कि लाख परेशान कर ले ज़िंदगी मगर हम इसकी परेशानियों को किनारा कर के मुस्कुरा देते हैं माँ के लिए । ज़िंदगी अपना धर्म निभाए हम अपना कर्म करते रहेंगे । माँ है तो घर वाकई में स्वर्ग है । पहले घर आने की खुशी दो भागों में बंटी होती थी, आधी माँ के लिए आधी पापा के लिए । मगर अब तो पापा वाला हिस्सा भी माँ का ही है । घर में घुसते ही पापा वाला खाली पलंग जब तक रुलाए तब तक माँ की मुझे देख चमकती आँखें मुस्कुराने पर मजबूर कर देती हैं और लगता है माँ में ही कहीं पापा भी बाहें फैलाए सीने से लगाने को बेचैन हैं 😊 
धीरज झा

​तुम मेरा अभिमान हो (छोटी सी प्रेम वार्ता)

“रवि आप पागल हो गए हो क्या ? यार ये कितना महंगा हार है और मुझे तो इन सब का शौख भी नहीं । पहले ही आपने इतना कुछ दिया है कि अलमारियां भरी पड़ी हैं और अब ये एक नई सौगात ।” रति ने ख़ुशी में डूबी हुई नाराज़गी दिखाई जिसका अंदाज़ा उसे देख कर एक दम से लग रहा था ।

“क्या यार तुम भी औरतज़ात के नियमों के विरुद्ध चलने वाली अपने ही कौम की दुश्मन हो । भार्गव जी हमेशा अपना फुला हुआ मुंह ले कर क्लब में आते हैं और रोज़ एक ही राग अलापते हैं कि आज बीवी ने फिर से नई फ़रमाइश रख दी । बाकियों का भी लगभग यही हाल है मगर एक मैं हूँ जो ये दुखियारे शब्द बोलने को तरस गया हूँ । आखिर क्यों हो ऐसी आप ? रवि ने भी हैरान होते हुए रति से कहा 
“क्योंकि भार्गव जी और बाकि पतियों की तरह मेरे पतिदेव मुझे फरमाइश का कोई मौका ही नहीं देते तो क्या करूँ । मैं फर्मईश करूँ आप उस से पहले ही इतना ला कर सामने रख देते हो कि मैं खुद हैरान रह जाती हूँ । शिकायत तो मुझे आपसे करनी चाहिए कि कभी तो मुझे भी मुझे फर्मईश का मौका दो । 
“मौके तो तुम्हे बहुत मिले मगर तुमने ही कभी फायदा नहीं उठाया । चाहती तो उन दिनों फरमाईशों का बहाना बना कर छोड़ कर जा सकती….।” इस से आगे रवि बोल ना पाया । रति ने झट से उसे अपनी बाँहों में भर लिया । 
थोडा संभल कर रवि फिर बोला “कुछ नहीं भूला हूँ मैं सब याद है मुझे कि कैसे पैसे पैसे को मोहताज था मैं । अपनी ना पूरी हो पा रही ज़रूरतों की कम और तुम्हे कहीं खो न दूँ इस बात की ज्यादा फ़िक्र रहती थी । उन दिनों बस लिख लिख कर तुम्हे गिफ्ट दिया करता था । और तुम पागल तब भी इतना ही खुश होती थी जितना आज होती हो । जब किसी को देखता था कि अपनी प्रेमिका को महंगे तोहफे दे रहा है तो भगवन से शिकायत करता था मैंने क्या बिगाड़ा है किसी का जो मेरे पास इतना नहीं कि मैं भी तुम्हे कुछ अच्छा सा उफरदे सकूँ । मगर तुमने कभी शिकायत नहीं की । सबने तुम्हे समझाया कि मुझसे शादी मत करो मेरा कोई भविष्य नहीं मगर तुमने किसी की ना सुनी बस अपने फैसले पर अड़ी रही । मैंने भी तुमसे कहा था ना कि सोच लो । तब तुम्हारा एक ही सवाल था “तिन वक़्त खाना और साल में दो जोड़ी नए कपडे दिला सकोगे ना ? बस होगया इस से ज्यादा कुछ नहीं चाहिए ।” मुझे सब याद है रति । तब मैं हालातों से मजबूर था तो तुम्हे कुछ नहीं डे पाया मगर अब तो किस्मत ने रुख बदला है मैं तुम्हे हर ख़ुशी डे सकता हूँ और देता रहूँगा सारी उम्र ।” इस से ज्यादा कुछ बोल पाने की हालत में रवि नहीं था । 
“ये आपकी ख्वाहिश है रवि, आप इसे पूरा कर रहे हो और खुश हो मैं इसी में खुश हूँ, मगर मेरे लिए वो शब्द भी इतने ही अनमोल थे जितने ये महंगे तोहफ़े । मैं उन दिनों भी आपसे उतना ही प्यार और आप पर उतना ही विश्वास करती थी जितना आज करती हूँ । मुझे यकीन था कि तुम वो सूरज हो जो भले ही बादलों में ढाका है मगर एक घनी छाँव और अँधेरी रात के बाद इतनी जोर से चमकेगा कि देखने वाले की ऑंखें चुंधिया जाएँगी । और वही हुआ । जिन्होंने मुझे समझाया था आज वो मेरी किस्मत से जलते हैं मुझे कहते हैं कि तुम्हारा फैसला गलत नहीं था । मेरे लिए यही सबसे बड़ी ख़ुशी है । एक बात और आपसे प्यार कर के मैंने आप पर कोई अहसान नहीं किया, आप इसके हक़दार थे क्योंकि आपमें वो ईमानदारी थी जो आज कल बहुत कम देखने को मिलती है । ऐसे मत रोया करो तुम तो मेरा अभिमान हो और मैं अपने अभिमान को यूँ रोता नहीं देख सकती ।” रति की आँखों में गर्व चमक रहा था, रवि ने अपना सर उठाया और रति ने उसका माथा चूम लिया । 
प्यार की जीत बहुत संजोग से देखने को मिलती है, कहीं दिल नहीं मिलते जहाँ दिल मिलते हैं वहां हालात उन्हें नहीं मिलने देते बहुत कम ही ऐसा हुआ है कि दो दिल ख़ुशी खुशी एक हुए और उम्र भर खुश रहे । आज का ये मोहब्बत भरा दिन उन्ही तमाम सच्चे प्रेमियों के नाम जिन्होंने इस बनावटी प्रेम के दौर में भी असल प्रेम को जिंदा रखा । ईश्वर सच्चे प्रेमियों को एक करे और तभी एक करे अगर वो सारी उम्र इसी प्यार के साथ एक हो कर रह सकें ।     
आप सभी को ये प्यार का दिन बहुत बहुत मुबारक हो 
धीरज झा