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कुछ_बातें_कल्पनाओं_से_उधार_ले_कर

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“एक नया रिश्ता ढूँढा है पापा ने ।” 
“हम्म्म्म्म ।” 
“बस हम्म्म्म्म ?” 
“तो और क्या कहूँ ।” 
“कुछ मत कहो । चुपचाप बैठे रहो ।”
“मेरे कहने से होने भी क्या वाला है । तुमे डर लगता है तो तुम बोलोगी नहीं, मैं बोल भी लूँ तो मेरी कोई सुनेगा नहीं । बताओ क्या करूँ ?”
धड़कनों को छोड़ बाक़ी सब खामोश 
“अच्छा लड़का कैसा है ?” 
“लड़के जैसा है और कैसा होगा ।”
“अरे मतलब करता क्या है ? दिखता कैसा है ?”
“मुंबई में किसी मल्टीनेश्नल कंपनी में अच्छी पोस्ट पर है, देखने तुम्हारे मुकाबले आधे का भी आधा नहीं है । माथा ऊंचा है, दांत बाहर हैं थोड़े, रंग सांवला है ।” 
“तो फिर पापा अपनी लाडली बेटी का रिश्ता ऐसे लड़के से क्यों कर रहे हैं ?” 
“क्योंकि लाखों का पैकेज है, एक घर लखनऊ में है, दो फ्लैट मुंबई में हैं । अच्छी खासी संपत्ती है । दो ही भाई हैं, माँ नहीं है तो सास का भी झंझट खत्म । यही सब वजहें हैं उसे पसंद करने की ।”
“और उसका स्वभाव ?”
“वो मायने नहीं रखता । उनके हिसाब से उनकी लड़की को उन्होंने इतने अच्छे संस्कार दिये हैं कि वो यानी मैं हर तरह एडजेस्ट कर लूंगी, चाहे लड़के का स्वभाव जैसा मर्ज़ी हो ।” 
“वाह रे नारीवादी लड़की । बेसबुक पर पोस्ट करती नहीं थकती और यहाँ समझौता कर रही हो वो भी अपनी ज़िंदगी से ।” 
“फेसबुक से बहुत अलग है असल दुनिया, पापा का दिल नहीं दुःखा सकती ।” 
“और मेरे दिल का क्या ?” 
फिर से सन्नाटा 
“खैर मुझे तो आदत है सहने की मगर तुमें एक नसीहत देना चाहूँगा । मेरे बारे में भले घर में कुछ मत बताओ, मगर अपनी खुशियों और आज़ादी से समझौता मत करना । पापा के कहे मुताबिक ही शादी करनी है तो उनसे कहना कि तुम खुद लड़के से मिलना चाहती हो जांच परख के शादी करना । वरना क्या फायदा होगा इस प्रेम को बलि चढ़ाने का । इससे तो आगे चल कर वो पिता भी खुश नहीं रह पाएंगे जिनके लिए तुम इतना बड़ा बलिदान कर रही हो ।”
“पता नहीं कहाँ से इतनी हिम्मत लाते हो । ये सब बोलते हुए अंदर से टूट रहे हो मगर चेहरे पर वो टूटने का दर्द ज़रा भी नहीं झलकने दे रहे ।”
“दर्द झलका के फायदा भी क्या । मैं कुछ और कर भी तो नहीं सकता तुम्हारी मर्ज़ी के बिना ।”
“कर सकते हो ना ।”
“क्या ?” 
“पापा को कनविंस कर सकते हो ।” 
“हुंह, यहीं हे दिल से दिल की तार जोड़ कर ना ।”
“नहीं कल शाम चाय पर ।”
“क्या ?”
“हम्म्म्म पापा को बता दिया कल बुलाये हैं ।”
“तो पागल इतना ड्रामा क्यों ?”
“अच्छा लगता है देख कर ना कि किसी की आँखों में तो मुझे खोने का डर झलकता है । मेरे कुछ तो मायने हैं ।”
शाम की गोद में सूरज ढल रहा था, नमिता ने अभय को अपनी बाहों में समेट लिया । सूरज कल फिर से अपने नये सवेरे के बारे में सोचने लगा, अभय कल की शाम जो उसके जीवन का नया सवेरा लेकर आएगी उसके बारे में सोच कर मुस्कुरा उठा । 
धीरज झा  

गंगा माई उसके साथ उसके सारे दुःख बहा कर ले गयी 

#गंगा_माई_उसके_साथ_उसके_सारे_दुःख_बहा_कर_ले_गयी (काल्पनिक कहानी)

नदी के समानांतर चल रही पगडंडियों का पड़ाव उस छोटे से जंगल में थोड़ा ठहर जाता था सुस्ताने के लिए । उसी पड़ाव पर सबसे छुपछुपा कर बैठी सरिता से बिसंभर ने बड़े भारी मन से कहा “ए सरिता, तू तो गंगियां माई हो गयी रे ।” 
“ऐसा काहे कहते हो ?” अपनी मजबूरियों का बांध बना कर सरिता ने आँखों में उमड़ रहे सैलाब को रोकने की कोशिश करते हुए बिसंभर की ओर देख कर पूछा । 
बिसंभर को पता था अगर अब वो कुछ बोला तो उसकी थरथराती ज़ुबान में सरिता उसकी टूटती हुई हिम्मत की गुमसुम आवाज़ को पहचान लेगी । इसीलिए चुपचाप बस सामने धोबी घाट को देखते हुए सरिता के सवाल दोहराने से पहले खुद को मजबूत करने लगा । 
“बोलोगे भी नहीं अब ?” हिम्मत की बांध में छोटा सा छेद बना कर एक आँसू चुपके से पलकों पर से लुढ़कता हुआ उसके उन सूखे होंठों पर फैल गया जो कुछ दिन पहले तक कश्मीर की वादियों से खूबसूरत थे मगर अब रेगिस्तान से बंजर हो गये थे । 
“तुम से ना बोलेंगे तो जाएंगे कहाँ ।” आवाज़ में थरथराहट अभी भी कायम थी । 
“बताओ काहे अईसा कहे ।” 
“नदी को गौर से देखो सरिता, कितनी शांत है ना ? मगर ये शांति बस ऐसे ही नहीं है, ये चिंतन है उस विकराल स्वरूप का जो कुछ दिनों में ये धारन करने वाली है ।  का का नहीं देखी ई, छठ घाट की रौनक से में झलकती खुशी देखी है, गाँव के बच्चों को अपनी गोद में तैरना सिखा कर उनकी आँखों में उमड़ आए उत्तसाह को देखा है इसने, गरीब किसानों को अपना आँचल निचोड़ कर उनके खेतों को जल रूपी जीवन देने के बाद उनकी चेहरे पर उम्मीद भरी मुस्कान देखी है इसने । मगर जब ई बौराती है ना तो इसका मन एक दम से बदल जाता है । फिर ये अपने बगल के खेतों में जलती लाशों को देख कर उठते मातम को भी चुपचाप सुनती है, जब ये बौराती है तो उन खेतों को जिन्हें इसने अपने आँचल को निचोड़ पानी दिया उन्हें पूरी तरह बर्बाद कर देती है, वो बच्चे जो इसकी गोद में तैरना सीखे वो सब इसी की गोद में समा।जाते हैं हमेशा के लिए और ये उफ्फ़ तक नहीं करती । इसका भावुक मन कब निर्मोही हो जाता है पता भी नहीं चलता । इससे सवाल करो तो बेबस हो कर आसमान की तरफ इशारा करते हुए सारा दोष उन बादलों के सर मढ़ देती है ।” अपनी ही आवाज़ की कंपन से बिसंभर का मन थरथर करने लगा था  । सरिता के आँखों पर से हिम्मत का बांध पूरी तरह टूट गया था । वो बस बिसंभर को हुने जा रही थी । 
“तू भी तो इसी की तरह निर्मोही हो गयी सरिता । हमारी खुशी में।हमसे जादा खुस हुई, हमारे हर दर्द को हमसे ज़्यादा महसूस किया, हमारी आँख का आँसू सबसे पहिले तुम्हारी आँख से बहा, हमारे चेहरे की खुशी सबसे पहिले तुम्हारे चेहरे पर झलकी । और आज देख लो तुमको कोई फरक ही नहीं पड़ता, ई भी नहीं सोची कि साला तुम्हारे बाद हम जीयेंगे कईसे । रे कम से कम एक ठो कोसिस तो करती मगर तुम तो किस्मत का लिखा कह कर उसे ही दोसी ठहराते हुए निर्मोही हो गयी रे ।” बिसंभर की आवाज़ कांपते कांपते कब चिल्लाहट में।बदल गयी पता ही नहीं लगा । उसकी चीख़ में इतना दर्द था कि पेड़ पौधे चिड़ई चुनमुन सब दहल गये । 
“कास तुमको समझा पाते हम कि हम कितना तड़प और दर्द महसूस कर रहे हैं । औरत से सब अधिकार छीन कर मर्द सोचता है कि उसके सीने में दिल ही नहीं । जबकि औरत अपना दिल में अपना छोटा बड़ा केतना इच्छा के कतल कर देती है काहै कि उसको बोलने का अधिकार ही नहीं । किसी जनम बेटी बन के आना बिसंभर सारा गलत फहमी दूर हो जाएगा । बाख़ी ई तन तुम्हारा था तुम्हारा रहेगा और ई मन तो हमेशा हे ही तुम्हारे नाम है ।” इतना कह कर सरिता उठ कर अपने रास्ते चली गयी । आज पहली बार था जब बिसंभर ने ना उसे जाने से रोका और ना ही उसे जाते हुए तब तक निहारा जब तक वो मोड़ पर जा कर आँखों से ओझल ना हो गयी । 
बस मन ही मन कह रहा था कि तुम क्या हो और कितना प्यार हमसे करती हो ये तुमसे बेहतर हम जानते हैं मगर फिर भी बार बार तुम्हें कोसते हैं ये सोच कर कि शायद यह कोसना ही तुम में वो हिम्मत जगा दे जो सारी बेड़ियों को तोड़ तुम्हें हमेशा के लिए मेरा होने पर मजबूर कर दे । 
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बिसंभर की पीड़ा शायद आसमान तक को महसूस हुई थी इसलिए वो उसी दिन से बरसने लगा और ऐसा बरसा कि थमने का नाम ही नहीं ले रहा था । इधर बिसंभर के कहे अनुसार नदी जो दो चार दिन पहले तक शांत थी उसने आज अपना विकराल रूप लेना शुरू कर दिया था । बिसंभर की पीड़ा असहनीय थी मगर वो किसी के सामने कमज़ोर नहीं दिखना चाहता था । इधर गाँव को नदी अपने में समाहित करती चली जा रही थी । लोगों के घरों तक गंगा मईया अपना पैर पसार चुकी थीं ।
“रे कोनो लईका डू बरहा है । कोनो बचाओ रे ।” किसी की चीख़ ने बिसंभर को उसकी काली सोच के फंदे से बाहर ला फेंका । बिसंभर दौड़ता हुआ अपने दुआर पर पहुंचा जो अब नदी का घाट बन चुका था । आधे से ज़्यादा गाँव तैरना जानता था मगर इस वक्त नदी के प्रकोप का सामना करने की हिम्मत किसी में ना थी । बिसंभर को अब पीड़ा महसूस नहीं हो रही थी, उसके दिमाग में घर कर बैठी वो काली सोच का भी कहीं अता पता नहीं था, उसे इस समय सिर्फ वो बच्चा दिख रहा था । बिसंभर बिना देर किये कमर में रस्सी बाँध नदी में कूद पड़ा । वो नदी जिसका कोई अंत नहीं दिख रहा था उसके बीचों बीच वो बच्चा बहता हुआ चला आ रहा था ।  
बिना रुके बिसंभर तैरता हुआ बच्चे तक पहुंच गया । बच्चा साहसी था, लड़ना जानता था ज़िंदगी के लिए । बिसंभर ने रस्सी बच्चे की कमर में लपेट लीऔर घाट की तरफ बढ़ने लगा । बिसंभर की देखा देखी लो चार और लोग भी कूद पड़े थे नदी में । वो बच्चे तक पहुंचे बच्चे की कमर में रस्सी बंधी थी, वो ठीक था मगर बिसंभर कहाँ गया ? अभी तो बच्चे के साथ था अभी कहाँ गायब हो गया ?
“बिसंभरा डूब गया ।” 
“सरितवा को पंडुब्बी पकड़ लिया ।” 
पूरे गाँव में दो आवाज़ें एक साथ उठीं । ना एक मिनट आगे ना एक मिनट पीछे । एकदम साथ साथ ही । नदी के एक घाट से एक आवाज़ नदी के दूसरे घाट से दूसरी आवाज़ । एक पल में ये क्या हो गया कोई समझ नहीं पाया ।
वो दर्द, वो पीड़ा, वो प्रेम जो गाँव नहीं समझ पाया उसे गंगा माई ने समझ लिया शायद । बहा ले गयी दोनों के दुःख दर्द को । इधर भिसंभर पहिलहीं अनाथ था । एक दो दोस्तों को छोड़ कोई रोने वाला नहीं था । उधर सरिता बेटी थी । 
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“ऐ सरिता, ऐ उठो । देखो हम हैं । उठ जाओ ।” सरिता का पेट दबाते हुए बिसंभर बेचैन सा हो उठा । 
मुँह से पानी उगलते हुए सरिता की भक्क से आँख खुली ।
“पगलिया, डरा दी थी हमको ।” डर को हटाते हुए खुशी ने बिसंभर के चेहरे पर कब्ज़ा कर लिया । 
“ऐतना जोखिम मरने के लिए उठाये क्या ।” सरिता मुस्कुराते हुए बोली ।
“पागल जईसे काहे कूद गयी ? अगर हम नहीं पहुंचते तो ?” सरिता के कांपते शरीर को बाहों में समेटते हुए बिसंभर बोला ।
“भरोसा अपार था । रास्ता कोई दूसरा था नहीं । वो बच्चा भगवान था, उसके पीछे तुमको कूदते देख हम समझ गये कि हमको क्या करना है । हम जानते थे तुम हमको देख लोगे और चाहे पानी में रहें चाहे आग में मगर जब तक तुमारी बाहों में रहेंगे हमारा आग चाहे पानी कोनो कुछो नहीं बिगाड़ सकता ।” विश्वास उसके चेहरे पर झलक रहा था । 
“पागल हो पूरी । अब जाएंगे कहाँ ?” 
“गाँव छोटा था प्यारे मगर दुनिया बहुते बड़ी है । अब तो तुम्हारे हैं तुम चाहे जहाँ ले चलो ।” बिसंभर ने अपनी बाहों को और ज़ोर से कस लिया ।
दोनों एक लूसरे का हाथ थामे हुए आगे एक अंजान सफर की तरफ़ निकल पड़े । बिसंभर हंस रहा।था यह सोच कर कि इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ होगा कि मंज़िल को साथ ले कर कोई अंजान सफर पर निकल रहा होगा । बिसंभर ने पीछे मुड़ कर देखा गंगा माई अपनी लहरों को उछालती हुई दोनों को आशीर्वाद दे रही थी । बिहंभर ने मन ही मन उन्हें प्रणाम किया और विनती की कि अब अपना प्रकोप कम कर लेना । 
धीरज झा 

वो मरने के बाद भी उठा सिर्फ हमारे लिए

#वो_मरने_के_बाद_जी_उठा_सिर्फ_हमारे_लिए (स्वतंत्रता दिवस विशेष)
कहानी नहीं प्रणाम है मेरा उस सभी जवानों को जो हमारे असल नायक हैं 
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“की गल्ल बलजिंदरा, बड़ा उदास जेहा लग रेहाँ ?” तौलिए से हाथ मुंह पोंछते हुए जगदीप ने बलजिंदर का उदास चेहरा देख कर उससे पूछा ।
“ना पाजी, कोई गल नहीं । बस उद्दां ही मन बड़ा उदास जेहा हो रेहा सी ।” बलजिंदर ने बात टालने की कोशिश की मगर टली नहीं ।
“ओ जा ओए, छुट्टी नई मिली तां कर के दिल ही हार गेयां तू तां ।” 
“उड़ी बाबा, केतना बार तुम लोगों को सोमझाया कि हिंदी में बात करो । परोंतु तूम लोग सोमझता ही नहीं ।” राॅयल स्टैग की बोतल कंधे पर रखे हुए कमरे में घुसते विसबास बाबू हमेशा की तरह चिढ़ाते हुए बोले । 
“ओ कहीं नहीं तुम्हारी बात कार रहे बिसबास बाबू । बेचारे को छुट्टी नहीं मिली इस लिये उदास है और तुम हो कि इस बख़त भी मजाक कर रहे हो ।” बोतल बिसबास के हाथ से लेते हुए जसपाल ने बोतल की सील तोड़ी । 
“अब होमको क्या पोता कि बोलजिंदर बाबू को भाभी का याद आ रहा है । तोभी तो कहते हूँ हिंदी में बोआत किया करो ।” बिसबास बाबू की शुद्ध हिंदी मुर्दे को भी हंसा दे, बलजिंदर तो सिर्फ उदास ही था । 
“ओ बिसबास बाबू आप ना हमको टामी बिक्की रामू शामू कुछ भी बोल लिया करो, जो आपकी ज़बान को सही लगे पर मेरे नाम की ऐसी तैसी ना किया करो ।” पहले पैग के साथ ही माहौल में मस्तियाँ छाने लगी थीं । कमरा तीनों के ठहाकों से गूंज उठा ।
“अच्छा बलज़िंदर सच्ची तेनू….” जसपाल ने बात आधे में तब छोड़ दी जब उसने अपनी पंजाबी पर बिसबास बाबू को घूरते पाया ।
“साॅरी साॅरी, बिसबास बाबू मैं भूल गया था कि नो पंजाबी, ओनली हिंदी । माई मिस्टेक जी, आई एम सौरी ।” शराब अपना कमाल दिखा रही थी क्योंकि जसपाल की भाषा अब वायाॅ इंग्लैड हो कर निकल रही थी । 
“सोमझदार है, चोलो ओब हिंदी में बोलो, किया बोल रहा तूम ईसको ।” बिसबास बाबू ने क्षमादान देने के बाद जसपाल को बात आगे बढ़ाने का हुकुम दिया और पैग का आखरी घूंट भरने के बाद अपने विचित्र मुंह को कड़वाहट के कारण और विचित्रता से फैला लिया । 
“मै पूछ रहा था इससे कि क्या सच में इसे भाबी की इतनी याद आ रही है ?” 
“ओह नहीं पाजी ।” बलजिंदर ने अगला पैग बनाने के लिए नज़रें गिलास पर टिकाये हुए कहा । या शायद वो शर्मा गया था ! पता नहीं क्या था मगर उसकी नज़रें ना उठीं । 
“तो फिर क्यों उदास है, अपने बड़े भाई को बता । योर ब्रादर इज स्टील एलाईव यार ।” जसपाल के अंतिम शब्दों के साथ ही एक आवाज़ आई जिसे किसी ने नहीं सुना । यह अवाज़ शायद क्वीन ऐलीज़ाबेथ के रोने की थी ।
“पाजी पता है, पिछली जब पिछली बार मैं घर गया था ना तब निहाल (बलजिंदर का बेटा ) मुझ से बोला “पापा जी, आप क्या करते हो ?” मैं पहले तो हँसा फिर मैने उसे बताया “बेटा मैं फौजी हूँ ।” वो थोड़ी देर कुछ सोचता रहा और फिर बोला “पापा मतलब आप करते क्या हो ?” 
“बेटा हम देश की सेवा करते हैं ।” 
“पापा टोनू के पापा डाॅक्टर हैं । वो हमेशा बताता है कि कैसे उसके पापा ने एक मरते हुए बंदे को बचा लिया । और कुलवंत के पापा ना गेम बनाते हैं, मुंबई रहते हैं और जब आते हैं तो कुलवंत के लिए खूब सारी गेम लाते हैं । और भी दोस्त हैं उनके पापा भी इंजीनियर, मैनेजर और पता नु क्या क्या हैं, वो सब हमेशा अपने पापा के काम की बड़ाई करते हैं और मैं जब कहता हूँ मेरे पापा फौजी हैं तो सब कहते हैं  ‘वहाँ कौन सी रोज लड़ाई होती है और तेरा पापा कौन सा कभी लड़ा है ।’ पापा आप कुछ ऐसे क्यों नई बने जिससे मैं भी अपने दोस्तों को बताता कि आपने ये सब बड़े काम किये हैं ।” 
“वीर जी, आर्मी में आना मेरा जुनून था । मेरे पापा जी जिद्द पर बैठ गये थे कि तू हमारी खानदानी कपड़े की दुकान ही संभालेगा । कहते थे इकलौता बेटा है मैं नहीं भेजना मौत के मुँह में । पाजी जिसे वो मौत का मुँह कहते थे ना इस मौत के मुँह में आने के लिए एक साल तक घर छोड़ा है मैने, इस मौत के मुँह में आने के लिए मैने अपनों के साथ ही लड़ाईयाँ लड़ी हैं । पाजी ये नौकरी नहीं सनक है मेरी, मेरा जुनून है । मगर उस दिन बड़ा अफ़सोस हुआ कि मैं अपने बच्चे के लिए ही आदर्श नहीं बन पाया । मैने उसे कहा था कि इस बार दिल्ली के लाल किले पर ले जाऊंगा तुझे आज़ादी का जश्न दिखाने और वहाँ तुझे दिखाऊंगा कि तेरे पापा उस सेना का हिस्सा है जिसने 70 सालों तक उस आज़ादी को संभाले रखा है जिसे पाने के लिए ना जाने कितनी माँओं के लाल किताबें छोड़ कर फांसी के तख्ते पर झूल गये । मुझे इसीलिए इस बार घर जाना था पाजी कि मैं अपनी और अपनी सेना की अहमीयत अपने बेटे को समझा सकूँ ।” बलजिंदर की बातों ने तीनों का नशा उतार दिया । जो शराब उन्होंने पी थी वो आँखों से बहने लगी । बिसबास बाबू और जसपाल ने बलजिंदर को गले लगा लिया ।
“ओह तूम उदास काहे होता है बली दादा, होम कोल सोवतोंत्रता दिवोस मनाएगा और उसका भिडियो निहाल को भेजेगा और बतायेगा कि होम लोग देस का सेबा के लिए होमेसा तईयार रहता है और देस का असल हीरो ऊसका पापा ही और उ

ऊसके पापा के साथी ही हैं ।” बलजिंदर और जसपाल मुस्कुरा दिये ।
अगली सुबह 
“ओ बिसबास बाबू आ जाओ अब, कमांडर साहब पहुंचने वाले हैं झंडा फहराने के लिए और तुम हो कि दुल्हन की तरह श्रृंगार पिटार में व्यस्त हो ।” अपना हथियार संभालते हुए जसपाल ने बिसबास बाबू को चिढ़ाया । 
“आ गिया आ गिया, तून होड़बोड़ी बहूत कोरता है । चलो ओब । अरे बोलजिंदोर कोहां हे ?” बंकर की तरफ बढ़ते हुए बिसबास बाबू ने जसपाल से पीछा । 
जसपाल कोई जवाब देता उससे पहले एक धमाके के साथ भगदड़ मच गयी । वायरलैस मैसेज आया कि सीमा पर पाँच से सात हथियारबंद आतंकियों की हलचल नोट की गयी है । जवान अलर्ट हो जाएं । 

कुछ देर बाद सभी न्यूज़ चैनल्स पर 
“कृष्णा घाटी सेक्टर में हुआ आतंकवादी हमला । जवान बलज़िंदर सिंह ने अपनी जान पर खेल कर आतंकियों को रोका और गोली लगने के बावजूद भी चार आतंकियों को ढेर कर के उनके भारत में घुसने के मनसूबे को किया नाकाम । खुफिया एजैंसियों से खबर मिली है कि ये आतंकी भारत में किसी बड़े आतंकी हमले को अंजाम देने के मक़सद से आए थे मगर भारतीय जवानों खास कर बलजिंदर सिंह की बहादुरी की वजह से वे नाकाम रहे । मगर दुर्भाग्यवश बलजिंदर सिंह इस वक्त ज़िंदगी और मौत से लड़ रहे हैं ।” 
“बलजिंदर को होश आगया है मगर खतरा नहीं टला कुछ कहा नहीं जा सकता । वो जसपाल और बिसबास को अंदर बुला रहा है ।” जसपाल और बिसबास बाबू खुद के आँसुओं को रोकते हुए, चेहरे पर झूठी मुस्कुराहट सजाए कमरे में दाखिल हुए ।
“बलजिंदर !” जसपाल ने थरथराती ज़ुबान से उसे पुकारा 
“पाजी, तुसी आ….”

“साॅरी बिसबास बाबू, फिर पंजाबी में बोलने वाला था ।” बिसबास ने मुँह घुमा लिया, शायद वो खुद रोक नहीं पा रहा था ।
“पाजी, मुझे पता है, मैने अब नहीं बचना । गोली साली दिल को छू गयी  । पाजी आप मेरा एक काम करोगे ?” बलजिंदर ने उस असहनीय दर्द में भी मजबूती से जसपाल का हाथ दबाते हुए कहा । 
“बोल ना वीरे ।” जसपाल खुद को संभालते हुए बोला ।
“फोन निकाल के कैमरा ऑन करो ।” बलजिंदर पीड़ा से भरी मुस्कुराहट के साथ बोला । जसपाल ने भी वैसा ही किया । उसके बाद बलजिंदर बोलने लगा । 
“निहाल, बेटा मैनू पता है, जब तक ये विडियो तेरे पास पहुंचना तब तक तेरा पापा भारत माँ की गोद में चैन से सो गया होगा । बेटा बात बस मेरी होती ना तो मैं कभी तेरे को ये विडियो ना भेजता । मगर बात यहाँ उन सभी जवानों की है जो रात दिन मौत के सामने सीना तान कर खड़े रहते हैं सिर्फ इसलिये की भारत की जनता आज़ाद घूम सके, आज़ादी से रह सके । पुत्तर, जब मेरे को गोली लगी ना तो मैं गिर पड़ा, शायद मर ही गया था । आँखों के आगे अंधेरा छा गया था । ऊंगली हिलाने की भी हिमत नहीं थी । फिर मेरे ख़याल में तू आया और बोला “पापा, तुसी कुछ नहीं कित्ता ? तुसी पहली गोली के साथ ही ढेर हो गये ।” मैने सोचा कि अगर आज मैं ऐसे ही मर गया तो तू कभी जान ही नहीं पाएगा कि एक जवान कैसे एक सच्चा हीरो होता है । मुझ में तभी अचानक से अथाह हिम्मत और ताक़त आगयी । और मैने गोली लगने के बाद भी चार आतंकवादियों को ढेर कर दिया पुत्तर । अब तुम लोग आज़ादी मना सकते हो । पुत्तर अपने दोस्तों से कहना कि तेरा पापा फौजी था और फौजी वो होता है।जो लगभग साँस की डोर छूट जाने के बाद भी लड़ने और दुश्मन को मार गिराने की हिम्मत……..।” बलजिंदर खामोश हो गया । कमरे में सन्नाटे ने कोना कोना घेर लिया ।  बिसबास और जसपाल की सिसकियों ने उस सन्नाटे को तोड़ा और देखते ही देखते दोनों की सिसकियाँ भयानक रुदन में बदल गयीं । 
बलजिंदर जा चुका था । इधर देश आज़ादी का जश्न मना रहा था और उधर बलजिंदर विजय रथ पर सवार साँसों की गुलामी से आज़ाद हो कर मुस्कुराता हुआ जा रहा था । 
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कहानी भले ही काल्पनिक थी मगर सच के उतने ही करीब भी थी । बेश्क हमें सरदार भगत सिंह जैसे देशभक्तों के प्राणों के बलिदान की वजह से आज़ादी मिली मगर उस आज़ादी की सुरक्षा तो बलजिंदर सिंह जैसे जवान ही करते हैं जो दिन रात मौत के सामने सीना ताने खड़े रहते हैं । जनाब, पैसे तो मज़दूरी कर के भी कमाए जा सकते हैं मगर देश के लिए जान देने का जज़्बा कुछ एक सनकियों के दिमाग में ही उपजता।है और उन्हीं सनकियों की वजह से आज हम शान से कहते हैं कि हम आज़ाद भारत के आज़ाद नागरिक हैं । ये जो आए दिन देश में दंगे, हत्याएं, बलात्कार जैसे अपराध करते हैं उन जानवरों को ख़याल नहीं कि देश में आतंक मचाना आसान है मगर देश की सुरक्षा करना कितना कठिन । 
आज स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर बधाई के पात्र सिर्फ और सिर्फ जवान हैं जो हमारे द्वारा आज़ादी की कीमत ना समझे जाने पर भी हमारी आज़ादी की रक्षा करते हैं । एक सलाम उन सभी जवानों को जिन्होंने हमारे लिए हमारी सुरक्षा के लिए अपने प्राण गंवाए या अभी भी अपनी जान की बाज़ी लगाए हुए हैं । मैं दिल से नमन करता हूँ भारत के उन महान सपूतों की जिन्होंने अपनी माँओं के आँसुओं तक की परवाह ना करते हुए भारत माता को बचाए रखने का ज़िम्मा उठाया और उसे पूरी निष्ठा से निभा रहे हैं । 
आप सबको 71वें स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं और मेरी लिस्ट या जान पहचान में जितने भी फौजी भाई हैं उन सब को मेरा बारंबार प्रणाम । 
धीरज झा

चाय वाला

#चाय_वाला (काल्पनिक कहानी)
“घंटा होगा देश का, नहीं यार कहीं गया था, नहीं आज भी नहीं मिली नौकरी, हाँ चिट्ठी तो दे दी थी पता नहीं जवाब क्या आता है, यहाँ से मंदिर जाना है, मैं दारू ले कर आता हूँ तुम सब चलो ।” परेशानियों की आँच पर उबल रही ज़िंदगी की तरह ही रामसेवक की चाय उबल रही थी । वैसे तो वो चाय में चायछन्नी घुमाने में मस्त था मगर ये सब बातें जो वहाँ बैठे लोग कर रहे थे ना चाहते हुए भी उसके कानों में पड़ रही थीं । 
बाईपास पर रामसेवक का टी स्टाॅल शहर का सबसे चर्चित टी स्टाॅल था । अब किस्मत कहें या रमसेवका का दिमाग मगर जो भी हो उसका स्टाॅल था बड़ा ठिकाने पर । पास ही सी एम एच काॅलेज था वहाँ के सारे स्टूडेंट कैन्टीन की फीकी चाय पीने हे बढ़िया यहीं की चाय पीना सही समझते थे । इधर जम्मू को जाने वाली आधी खाली बसें यहीं से भरती थीं इसीलिए यात्रियों के इंतज़ार का भी यही ठिकाना था । कुछ शरीफ़ सुट्टेबाज़ सबसे नज़रें बचा कर सुट्टा लगाने शहर से बाहर रामसेवक की दुकान  पर ही आते और सुट्टे संग चाय का वो आनंद उन्हें मिलता जो भरी सभा में श्री कृष्ण का विराट रूप देख अकेले घृतराष्ट्र और विदुर को मिला था । ऊपर से पास के गज़ल ढाबे वाले स्टाॅफ भी यहीं चाय पीते । ट्रक ड्राईवरों का यही अड्डा था । मिला जुला कर रामसेवक की दुकान दुकान नहीं सोने के अंडों का पोल्ट्रीफारम था । 
सिर्फ चाय और सिगरेट बेच कर शाम तक हज़ार पंद्रह सौ से ज़्यादा का गल्ला पुरा लेता था । अफवाह थी कि वो अपनी चाय में हफ़ीम का पानी मिलाता था इसीलिए क्योंकि जिसने एक बार उसकी चाय पी वो फिर और किसी के हाथ की चाय छूना भी पसंद नहीं करता था । वैसे यह मात्र अफ़वाह ही थी क्योंकि रामसेवक के पास इतनी हफ़ीम होती तो वो भला चाय ही बेचता ?
 रोज़ सैंकड़ों लोग उसके यहाँ आते और रोज़ वो हज़ारों बातों को अपने इस कान से उस कान के बीच से गुज़रता महसूस करता मगर उन सब में से कुछ एक बातें ही उसका ध्यान अपनी तरफ़ खींच पातीं बाकि सब तो बस बकचोदियाँ होती थीं । रामसेवक खुद बहुत कम बोलता था, उसे बस सुनने में रुचि थी । सैंकड़ों में से कुछ कुछ ग्राहक उसके पक्के थे जो हर हाल में उसके स्टाॅल पर चाय पीने आते ही आते । 
एक खोखा सा डाल रखा था उसने और आगे बड़ी सी शैड लगा कर कुछ एक मेज लगा रखे थे । हेल्पर के नाम पर एक गूंगे को रख रखा था जो पहले बसों में भीख मांगा करता था पर एक दिन रामसेवक के समझाने पर भीख़ मांगना छोड़ कर उसकी दुकान में नौकरी करने लगा । 
“रामू भाई, एक बटा दो ।” चाय के उबाल को ग़ौर से देखते हुए रामसेवक का ध्यान इस आवाज़ ने तोड़ा। रामसेवक ने सर उठाया और मुस्कुरा कर सर हिला दिया । 
बड़ी अजीब और रहस्यमई ज़िंदगी थी रामसेवक की । कौन था, कहाँ से आया था, जो कमाता था उसका क्या करता था किसी को नहीं पता था । दो साल पहले ही अचानक से ढाबे वाले की ज़मीन पर चाय का ये स्टाॅल लोगों ने देखा और धीरे धीरे भीड़ जुटने लगी । स्टाॅल लगाने के बदले किराया दिया करता था वो ढाबे वाले को । 
उसके पास सारा दिन दो ही काम थे चाय बनाना और लोगों की बातें सुनना । उसे देख कर ऐसा लगता था कि वो चाय के उबाल और लोगों की बातों कुछ तलाश रहा है । अजीब शौख़ था बंदे का  । सारा दिन चाय बेच कर रात को वहीं ढाबे पर सो जाता था । 
“माँ बिमार है यार, उसी परेशानी में आज कल सो नहीं पाता । डाॅक्टर बता रहा है लाखों का खर्चा है । मैं भला इतने कहाँ से लाऊँ ? बहन को कहा तो वो यह कह कर साफ़ मुकर गयी कि वो लोग घर बना रहे सारे पैसे उसी में लग गये हैं । बड़े भाई से मदद माँगी तो वो साफ इन्कार कर गये । सोच रहा हूँ घर बेच दूँ क्योंकि घर फिर ले लूंगा पर माँ फिर नहीं मिलेगी । मैं कोशिश कर सकता हूँ वो कर रहा हूँ  बाक़ी आगे भगवान पर है जो उनकी इच्छा जैसा चाहें करें ।” चाय देते हुए रामसेवक ने बातों की पहली बोहनी इस दुःखद समाचार से की । 
“अरे सुना कल तेरे पिता जी को शेयर बाज़ार में भारी नुक्सान उठाना पड़ा ?” बीस इक्कीस साल के उस दुबले से लड़के ने अपने ही उम्र के लड़के से सिगरेट का दम मारते हुए कहा ।
“घंटा भारी, उनको चार पाँच करोड़ से कोई फर्क नहीं पड़ता । बंदे के पास इतना पैसा है कि दोनों हाथों से लुटाए तब भी कम है । अब देख मैं ट्वैल्थ में फेल हो गया था फिर भी इतने टाॅप काॅलेज में ऐडमीश्न कैसे मिल गया बता । यार सब पैसे का खेल है और मेरा बाप पैसे छापने की मशीन । इसीलिए तो अपन इतना सोचते नहीं । ये ले इसके पैसे कटा देना और एक मोर का पैकेट ले ले ।” चार पाँच करोड़ के नुक्सान को अपने आखरी कश के साथ धुएं में उड़ाते हुए लड़के ने दो हज़ार का नोट सामने वाले लड़के को दिया और मोर का पैकेट जेब में डाल कर अपनी चमचमाती गाड़ी में हवा के संग जा मिला । 
रामसेवक रोज़ इसी जहान में दो तरह की दुनिया देखता था । एक वो जो तंगी  के कारण अपना लहू तक बेच रही है फिर भी कोई हाथ फैला दे तो बेचे हुए खून की रक़म में से भी उसे कुछ ना कुछ दे दें  और दूसरी वो जिसके पास दोनों हाथों से लुटाने पर भी कोई कमी नहीं आने वाली फिर भी किसी की एक कौड़ी की मदद नहीं करना चाहते ।

रामसेवक का टी स्टाॅल मानो जैसे संसार था और यहाँ आने वाले सब लोग अलग अलग तरह की ज़िंदगियाँ । कोई रोती ज़िंदगी, कोई मुस्कुराती ज़िंदगी, चोट खाई ज़िंदगी तो कबीं बेफिक्र ज़िंदगी और राम सेवक मानों भगवान हो जो इन सब ज़िंदगियों को देख कर बस मुस्कुराता था । जैसे कि ये सब नियती का खेल हो और वो बस तमाशा देखने वाला । वो बस इंतज़ार करता था इस बात का कि कौन उसे पहचान ले और उससे मार्ग दर्शन करने को कहे । मगर वो तो सबके लिए एक चायवाला था कोई भला उससे मदद क्यों माँगता ।
रात के साढ़े दस बजे 
“टिंग टाॅग ।” दरवाज़े की घंटी बजती है ।
“आ रहा हूँ ।” अंदर से आवाज़ आती है । 

दरवाज़ा खुलता है । सामने  एक थैला बगल में दबाए रामसेवक हाथ जोड़ कर मुस्कुराता हुआ खड़ा है । 
“रामू भईया ! आप यहाँ ? कैसे आना हुआ ।” सामने वाले ने आश्चर्य से पूछा और उन्हें अंदर ले गया 
“अरे यहाँ बगल में काम था तो सोचे माँ जी का हाल पूछते चलें । कैसी हैं वो ?” कुर्सी पर बैठते हुए रामसेवक ने सामने वाले से पूछा ।  सामने वाला वही था जिसकी बातें रामसेवक ने सुनी थीं । 
“ठीक नहीं हैं भईया । बड़ा परेशान हूँ उन्हीं की वजह से । पिता जी बच्चपन में ही गुज़र गये उसके बाद माँ ने ही बड़ी मेहनत से हम सब को पाला । भाई और बहन तो अच्छी जगह सैट हो गये मगर मैं रह गया । मैं इतना कमा लेता हूँ कि माँ और बीवी बच्चों का पालन अच्छे से कर लूँ इसीलिए कभी अफ़सोस नहीं हुआ कि मैं किसी अच्छी जगह क्यों नहीं हूँ । मगर आज जब माँ को ले कर असहाय सा हो गया हूँ तब अफ़सोस होता है । भाई बहन भी शायद मजबूर हैं इसीलिए पीछे हट गये । मगर मैं तो हर संभव कोशिश करूंगा ।” उसकी आँख में माँ के लिए दर्द छलक पड़ा । 
“डाॅक्टर क्या बोले ?”
“डाॅक्टर ऑप्रेशन का बोल रहे । बीस पच्चीस लाख का खर्चा है ।” 
“माता जी कहाँ हैं ?” 
“अंदर कमरे में ।” 
दो कमरों और एक छोटे से हाॅल वाले उस घर की हालत बता रही थी कि ये किराये का मकान है । किराय के मकान उन सबकी आवाज़ें निकालते हैं जो यहाँ रह कर गये हैं । अपने मकान में बस एक अपनी यादों की आवाज़ गूंजती है । 
हाल के दाहिने तरफ वाले कमरे में एक चौकी लगी थी जिस पर माँ जी लेटी थीं । एक टेबल फैन लगा हुआ था । कमरे की दुर्गंध उनकी बारी का हाल कह रही थी । माँ जी को प्रणाम कर राम सेवक ने वो थैला सामने वाले के हाथ णें पकड़ा दिया । 
“ये क्या है भईया ?” 
“आपने कहा था ना भगवान ही करेंगे जो करेंगे तो समझ लीजिए हमको भी भगवान ही भेजे हैं । अच्छा अब चलते हैं ।” सामने वाला कुछ कहता उससे पहले रामसेवक निकल चुका था । थैला खोला तो उसमें पाँच पाँच सौ के नोट थे । जिसे गिनने पर पता चला पूरे तीस लाख थे । साथ ही एक पर्ची थी जिस पर लिखा था । 
“भगवान ने भेजे हैं, जब कभी जितने भी सक्षम रहो उतनी मदद आगे किसी की कर के भगवान का कर्ज उन्हें लौटा देना ।” सामने वाले को कुछ समझ नहीं आरहा था कि वो हंसे या आश्चर्य करता रहे। बाहर दौड़ा कि जा कर रामसेवक के पैर पकड़ ले मगर रामसेवक तो हवा हो लिये थे । 
अगली सुबह 
“अरे सुना तुमारे घर चोरी हो गयी ?” बी एम डब्लयू बाईक के पीछे बैठे लड़के ने आगे वाले से पूछा ।
“अरे यार उस दिन भी समझाया था तुझे । अपन इतने इतनों की टेंशन नहीं लेते । तीस लाख का चिल्लर था । उससे अपन को क्या फर्क पड़ता है ।” बाईक की रफ़्तार के साथ तीस लाख की फिक्र भी लड़के ने हवा में उड़ा दी । 
जब लड़के सिगरेट और चाय का अलम मारने रामसेवक की दुकान पर पहुंचे तो देखा वहाँ दुकान बंद है और उन्हीं के जैसे रामसेवक की चाय के पाँच दस दिवाने वहाँ बैठे हैं ।
“दुकान क्यों बंद है भाई ?” लड़के ने वहाँ खड़े आदमी से पूछा 
“रामसेवक चला गया इसी लिये ।” 
“चला गया मगर कहाँ ?”
“अब मुझे बता कर थोड़े ना गया है ।”
इन सबकी बातें सुन कर सामने वाला जो रामसेवक का शुक्रिया अदा करने आया था वो मन ही मन मुस्कुराते हुए खुद से ही बोला “शायद मुझ जैसे किसी की बातें सुनने किसी और शहर भेज दिया भगवान ने उसे ।” 
धीरज झा 

मुझे यकीन था वो आयेगा

#मुझे_यकीन_था_वो_आयेगा (रक्षबंधन स्पैश्ल कहानी)
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 मेरी ये कहानी मेरी उन सभी बहनों को समर्पित है जो फेसबुक से जुड़ कर मेरे दिल में अपनी जगह और सम्मान बना गयीं 
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“सारा दिन घर के काम करो और फिर इन लोगों की बातें भी सुनों । अपना सामान खुद नहीं संभालना होता और जब गुम हो जाए तो मुझ पर आ कर रौब जमाओ । पता नहीं मेरी किस्मत में ही गुलामी लिखी है, शादी हुई तो सास ससुर की गुलामी, बाहर आ गये तो इनके पिता की गुलामी और अब इन बच्चों की गुलामी । ऐसे ही एक दिन मर जाओ ।” सरिता आज सुबह से ही झुंझलाई हुई थी । बेटे आशीष ने एक बार ही कहा माँ मेरी साईंस की बुक नहीं मिल रही और तब से सरिता घर के कोने कोने में ढूंढ रही है और साथ में यही सब बड़बड़ा रही है । गीतिका और आशीष एक दूसरे का चेहरा देख रहे कि आखिर माँ को हो क्या गया । 
“माँ, ये रही बुक, ड्राईंग रूम में टेबल पर ही पड़ी थी ।” आठ साल की गीतिका ने माँ के मूड को भांप कर डरते हुए कहा । 
“हम्म, ठीक है, भईया को दे दो ।” गीतिका का सहमा चेहरा देख सरिता को अहसास हुआ कि वो बच्चों पर बेफिज़ूल में ही गुस्सा कर रही है ।
फेसबुक पर अपने मन की हर छोटी बड़ी बात लिखने वाली सरिता ने आज एक बार भी फोन को हाथ नहीं लगाया था । आफिस जाते हुए गोपाल भी अच्छे से नहीं बुलाया बस नाशता और टिफिन दे कर अपने काम में लग गयी । गोपाल सब समझता था इसीलिए चुपचाप ऑफिस के लिए निकल गया । 
अब सरिता खुद को थोड़ा शांत करने की कोशिश कर रही थी मगर ना जाने क्यों आज वो हवा के आसरे लहराती हुई कटी पतंग बन गयी थी जिसका खुद पर कोई ज़ोर नहीं चल रहा था । अभी अभी उसने सोचा कि आज उसने सबका मन खराब किया है इसलिए वो रात के खाने में सबके पसंद की डिशिज़ बनाएगी जिससे सब खुश हो जाएं । बच्चे अपने कमरे में बैठे पढ़ रहे थे । सरिता अपने मन को शांत करने की कोशिश करते हुए खाना बना रही थी । कुछ पुराने ख़याल उसके ज़हन को इस तरह खरोंच रहे थे कि उसकी आँखों में ना चाहते हुए भी दर्द भर आया था । 
वो बुरी तरह चिल्ला कर रो देती उससे पहले ही दरवाज़े की घंटी बजी । आशीष ने दरवाज़ा खोला तो कोई अंजान सा चेहरा हाथ में चमचमाता बाॅक्स लिए खड़ा था ।
“तुम आशू हो ना ?” उस अंजान चेहरे पर सजे खुबसूरत होंठों ने मुस्कुराते हुए पूछा ।
“जी हाँ, पर आप कौन ?”
“मैं कौन ये तो अब आपकी मम्मी ही बताएंगी । कहाँ हैं वो ?”
“किचन में हैं । मैं बुलाता हूँ ।” इतना कह कर आशीष सरिता को बुलाने चला गया ।
“माँ, बाहर कोई अंकल आए हैं ।” 
“ये कौन अंकल आगये इस वक्त ।” ये सोचते हुए सरिता बाहर निकली ।
दरवाज़े पर देखा तो एक छब्बीस सत्ताईस साल का लड़का हाथ में कुछ गिफ्टस् पैक जैसा लिये खड़ा था । दो मिनट उसके चेहरे को ग़ौर से देखने पर सरिता उसे पहचान गयी । 
“अरे समीर, तुम ! व्हाॅट ए प्लैज़ेंट सरप्राईज़ ।” सरिता ने हैरानी से उसकी तरफ देखते हुए कहा ।
“कैसी हैं दी ?” समीर ने मुस्कुरा कर सरिता का हाल पूछा ।
“मैं तो ठीक हूँ । पर तुम अचानक यहाँ कैसे ? तुम्हें तो घर का पता भी ठीक से नहीं मालूम था, फिर कैसे पहुंच गये । ना कोई मैसेज ना फोन ?” सरिता की आँखों में हैरानी और खुशी दोनों के मिले जुले भाव झलक रहे थे । 
“दी एक सलाह दूं ?” अचानक से ऐसा बोलने पर सरिता और हैरान हो गयी ।
“हाँ भोलो ना ।” अपनी हैरानी को दबाते हुए बोली 
“अगर आप मेहमानों से ऐसे ही दरवाज़े पर खड़ा रख कर बात करती हैं तो अच्छा होगा यहाँ एक कुर्सी लगवा दें । मेरे जैसे।कुछ आलसी खड़े खड़े थक भी जाते हैं ।” समीर के इस व्यंग से सरिता को ख़याल आया कि अभी तक समीर बाहर ही खड़ा है । अपनी गलती का ध्यान आते सरिता शर्मा गयी और फिर समीर की बात पर हंसने लगी ।
“हाहाहाहा नहीं नहीं, वो तुमें अचानक देख कर इतनी हैरान हो गयी कि ध्यान ही नहीं रहा । आओ ना तुम्हारा अपना घर है ।” इतना कह कर सरिता समीर को अंदर बुला लाई । बच्चे अभी तक इस दुविधा में फंसे थे कि वो बस कभी अपनी माँ तो कभी समीर की सूरत निहार रहे थे । 
“माँ ये कौन हैं ?” छोटी सी गीतिका ने अपनी माँ के कान में फुसफुसाते।हुए सवाल किया ।
“बेटा ये वही समीर मामू हैं जिनसे फोन पर बात होती है । नमस्ते करो ।” बच्चों ने समीर को पहचान लिया क्योंकि उससे बच्चों की हमेशा बात कराया करती थी सरिता । बच्चों से समीर को नमस्ते की तो समीर ने अपने बैग से बड़ी बड़ी दो चाॅक्लेट्स निकार कर दोनों के हाथ में थमा दी । 
“दी अचानक से आगया, इससे कोई परेशानी तो नहीं हुई ना ।”
“अरे पगलू हो क्या ? तुम और मैं पिछले तीन साल से भाई बहन का रिश्ता निभा रहे हैं । ऐसा लगता है जैसे बच्चपन से जानती हूँ तुम्हें । हर खास दिन पर तुम्हारा घंटो फोन आता है । हाँ बस थोड़ा अच्छा इसलिए नहीं लग रहा।कि पहले बता दिये होते आने के बारे में तो सारा इंतज़ाम कर के रखती ।” 
“पहले बता दिया होता तो आपके चेहरे पर सजी ये खुशी और हैरानी के मिले जुले भाव कैसे देख पाता ।” इस पर सरिता मुस्कुरा दी 
“अच्छा मैं पहले ही बहुत लेट हूँ तो आप जल्दी से मुझे राखी बांध दीजिए ।” समीर की बात सुन कर सरिता की आँखों में ना जाने क्यों आँसू मुस्कुरा उठे । 
जल्दी जल्दी सरिता पूजा के कमरे में से सजी सजाई राखी की थाल उठा लाई । उसने समीर को राखी बांधी और उस दौरान वो समीर के चेहरे में कुछ तलाशती रही, शायद वो किसी अपने का चेहरा तलाश रही थी जो उसे समीर के चेहरे में साफ दिख रहा था । समीर ने वो गिफ्ट पैक जो वो अपने साथ लाया था वो सरिता को दिया । पहले तो सरिता ने साफ मना किया पर फिर समीर के कई बार आग्रह पर उसे लेना पड़ा । 
इसके बाद समीर बच्चों के साथ बातें करने लगा इतने में सरिता ने खाना लगा दिया । समीर ने भी बड़े चाव से खाना शुरू किया । 
“अच्छा समीर ये सब कैसे प्लाॅन किया तुमने । अभी परसो हमारी बात हुई पर तुमने आने का कोई ज़िक्र नहीं किया ।” 
“दी तीन साल से हम फेसबुक पर सा हैं । इस दौरान आपकी सभी पोस्ट जिन्हें आप दिल की बातों के हैश टैग में लिखती हैं वो सब दिल से महसूस की हैं मैने । मेरी हर चिंता फिक्र को आपने बड़ी बहन बन कर बांटा है हमेशा । हमेशा मेरी सहायता के लिए तैयार रही हैं आप । कल जब अपनी छोटी बहन के पास बैठा था और फिर ऐसे ही बातें होने लगीं तो मैने आपकी पिछले साल की पोस्ट का ज़िक्र किया।जिसने आपने कहा था कि “कोई भी खास दिन या त्यौहार किसी खास से जुड़ा होता है और उसके रूठ जाते ही उस खास दिन के मायने भी बदल जाते हैं । फिर वो खास दिन जो कभी बेशुमार खुशियाँ दिया करते थे बाद में शूलों की तरह चुभते हैं ।” मैने कभी आपने नहीं पूछा कि आखिर क्या है ऐसा जो आपको इतना दुःखी करता है मगर आपका दर्द हमेशा महसूस किया है । मैं फेसबुक से जुड़ा था इसी लिए पर्सनल होना मुझे कभी सही नहीं लगा । यही सब भातें मैने जब बहन से बताईं तो उसने मुझसे कहा कि भईया हो सरिता दी हम सब से भले ना मिली हों मगर जब फोन आता है तो लगता ही नहीं कि वो हम सब से अलग हैं । आप कल उनके यहाँ जाईए और राखी बंधवाईए, उन्हें खुशी होगी और उनकी यही खुशी मेरे लिए आपका गिफ्ट होगा ।” मैं मुस्कुरा दिया उसकी बात सुन कर क्योंकि मैने पहले से ये सोच रखा था । पता मैने जीजू से ले लिया था और उन्हें कहा कि आपको ना बताएं । वो कुछ देर में आते ही होंगे ।” 
ये सब सुन कर सरिता की आँखें ना चाहते हुए भी छलक पड़ीं । आज सुबह से वो जितना दुःखी थी उससे कहीं ज़्यादा वो इस वक्त खुश थी । उसके मन में इतनी खुशी भर गयी थी कि उसकी आँखों से छलकने लगी थी अब । 
“समीर, तुम नहीं जानते आज तुमने मुझे क्या कितना कीमती तोहफा दिया है । तुमने मेरे अंदर की वो कमी पूरी कर दी जिसने मुझे हमेशा अधूरा रखा । मेरा भाई रमन जो मुझे दुनिया की हर चीज़ से बढ़ कर प्यार करता था वो मुझसे ऐसे मुँह मोड़ गया जैसे मैं कभी थी ही नहीं । मैं पूरा साल अपने आप को बांधे रखती थी मगर इस दिन आकर टूट जाती थी । हर साल राखी की थाली इसी आस में तैयार रखती थी कि वो इस बार पक्का आयेगा मगर हर बार भूल जाती थी कि वो अब कभी नहीं आ सकता । ये राखी का दिन मुझे कचोटता है समीर पागल कर देता है ।” सरिता रो पड़ी 
“वो दूर था मुझसे, मैने ही उसे ज़िद में आकर कहा था कि हर हाल में राखी पर आना है । मेरी ज़िद्द पूरी करने के लिए ही वो आरहा था मगर रास्ते में ही ना जाने कहाँ खो गया कि फिर दोबारा घर नहीं लौटा । मैं सोचती हूँ तो खुद से चिढ़ लगती है मुझे, मैं ज़िद्द ना करती तो वो ज़िंदा होता आज । मेरा प्यार ही उसके लिए काल बन गया । मगर मैने कभी नहीं माना कि वो चला गया है, मुझे हमेशा लगता था वो आयेगा । सब मुझे पागल समझते थे मगर देख समीर आज रमन आगया । आज इतनी तपस्या के बाद मुझे मेरा रमन मेरे समीर के रूप में मिल गया । आज मेरी राखी की थाली यूं ही पड़ी नहीं रही ।” समीर का राखी वाले हाथ पर सर रख के सरिता फूट फूट कर रो पड़ी और बच्चे उससे लिपट गये । 
“साॅरी दी, मैने आने में बहुत वक्त लगा दिया । मुझे बहुत पहले आजाना चाहिए था । मगर अब वादा करता हूँ मैं कभी आपको छोड़ कर नहीं जाऊंगा ।” समीर भी खुद को भावनाओं की इस लहर में बहने से ना रोक पाया और फूट फूट कर रो पड़ा । 
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 कई बार भगवान आपके हिस्से से कोई चीज़ आपको नहीं देता जिससे आपको कई बार उसकी कमी बहुत महसूस होती है । मगर असल बात ये है कि अगर आपके पास वो एक चीज़ नहीं तब ही आप उसका असल महत्व जान पाते हैं और उस चीज़ के प्रति आपका सम्मान बढ़ता जाता है । फिर आपको बाहर बाहर से ही वो चीज़ इतनी ज़्यादा मिल जाती है कि आपको अहसास ही नहीं होता कि आपके खुद के पास वो नहीं है । 
अब मुझे ही देख लीजिए । हम तीन भाई, सगी बहन का खाता निल मगर इस बात का जब तक हमको अफ़सोस होता तब तक हमारे पास दो बहने थीं । और उन दो बहनों ने कभी ऐसा महसूस ही नहीं होने दिया कि मेरी कोई बहन नहीं । मुझ बिना बहन वाले भाई को स्नेह मिलने का सिलसिला यहीं नहीं थमा । आज फेसबुक बेहतरीन से लेकर बेकार तक हर तरह की सामग्री का बाज़ार है, बिल्कुल इस दुनिया की तरह । अब आप पर है आप यहाँ क्या चुनते हैं । मैने यहाँ रिश्ते कमाए हैं, हर तरह का रिश्ता और हर रिश्ते को दिल में जगह दी।  बिना पाने की उम्मीद किये हर रिश्ता निभाया । आज के दिन जब मुझे रोना चाहिए कि मेरी कोई बहन नहीं तब मैं फूला नहीं समा रहा क्योंकि मेरे हाथ में पाँच राखियाँ और ढेरों दुआएं हैं उन सभी बहनों कीं जिन्होंने इस मंच से मुझ कांच खे टुकड़े को भाई नाम का हीरा बना कर अपने रिश्तों की माला में जोड़ लिया । शालिनी दी कहती हैं कि बात हो ना हो मगर स्नेह बना रहना चाहिए । सच में भले ही मैं इन सभी बहनों से बात नहीं कर पाता मगर सबका स्नेह मेरे साथ हमेशा बना रहा और हमेशा बना रहेगा । Shalini दी, इंदर दी, आशू दी, राधिका बहिनी, पूनम दी इन सबसे बात हो गयी । और जो बहनें बच गयीं उन सबको यहीं सेरक्षाबंधन की शुभकनाएं । सभी बहनें हमेशा खुश रहें, उनकी हर मनोकना पूरी हो । साथ ही साथ सबको ढेर सारा स्नेह ।

आप सबका भाई 
धीरज झा

अंग्रेज का नाती

#अंग्रेज_का_नाती (फ्रेंडशिप डे स्पैश्ल कहानी)
पाईप से निकलती पानी की धार सीधे स्कूटर के हेडलाईट के बीचों बीच पड़ रही थी । ना इधर ना उधर, बिल्कुल बीच में । ऐसे जैसे पाईप ब्रजमोहन के हाथ में ना होकर हेडलाईट का निशाना बना कर किसी चीज़ पर टिका दी हो । 
“ऐ ससुर लाईट फोड़ेगा का ? तुम हो ही घर फूकन । एक काम ढंग से नहीं होता तुमसे । एस्कूटर धोने को कहे तो तुम ससुरा खड़े खड़े भारा टारने (किसी काम को जैसे तैसे निपटा देना) लगे । साईकिल का तुम ऊ हाल किये कि उसका स्राध कर दिए अब ई नया एस्कूटर पर एगो चेन्हा (लकीर) लऊका गया तो जान ले लेंगे तुम्हारा । लाओ हमको दो ।” हमेशा की तरह बड़के भईया अपनी आदत के अनुसार फोकट का रौब झाड़ दिये । अब बताओ पानी से भी कोई स्कूटर पर खंरोच पड़ता है ? मगर वो तो बड़के भईया हैं जब तक रौब नहीं झाड़ेंगे तब तक कैसे पता लगेगा कि वो बड़के भईया हैं । 
लेकिन फर्क किस्को पड़ता है । एक तो बिरजू (ब्रजमोहन) बड़के भईया की बात का लोड भी नहीं लेता ऊपर से आज तो वो कहीं और ही उलझा हुआ था । अब सुबह ही माँ सौ रुपईया दी तरकारी लाने को और जनाब अपनी उलझन सुलझाते सुलजाते सौ के नोट को सौ टुकड़ों में भांट दिये । वैसे तो बिरजू माँ की आँख का तारा है मगर लक्ष्मी की बर्बादी का ग्रहन ही ऐसा होता।है कि सब तारे सितारे क्रोध के अंधकार में छुप छुपा जाते हैं और फिर एक माँ नहीं बल्कि एक गृहणी जिसने घर खर्च को पांच हज़ार मांगे तो मिले दो हज़ार और कुछ इधर उधर कर के थोड़े रूपये इकट्ठा किये  का चप्पलास्त्र चलता है जिसका निशाना बनते हैं मासूम बेचारे बेटे ।
मगर आज तो इस चपलास्त्र से भी बिरजू को फर्क कोई ना पड़ा । उलझन तो हमारी आपकी नज़र में छोटी थी मगर उसकी नज़र में उसकी पंद्रह साल की उम्र की सबसे बड़ी उलझन थी । बीस साल के बिरजू ने ऐसी उलझन का सामना पहले कभी ना किया था । 
कुछ समय पहले तक तो सब ठीक था मगर जब से चार दिन आमरण अनशन और हज़ार लात और गाली खाने के बाद नया फोन हाथ में आया तब से लौंडा कुछ कुछ बदलने लगा । हर रोज़ नये मुद्दों के बाद नयी नयी पोस्ट से उस विषय में अलग अलग जानकारियाँ पाने लगा, पहले गोबर जैसा मुंह था मगर अब सेल्फी पोस्ट करने के लिए दिन में चार बार फेयर एंड लभली लगाता है, ऐसे ही बहुत बदलाव आए हैं लौंडे में मगर इस भयानक उलझन की वजह इनमें से कुछ नहीं थी । इस उलझन की वजह थी फेसबुक और व्हाट्स ऐप से मिल रहे मित्रों के फ्रेंडशिप डे के मैसेज । 
पहिले तो लौंडा ये सोच कर खुश हुआ कि किलर बोआए रघुआ, डैडीज प्रिंसेस, विधाऊट क्राऊन प्रिस जैसी चार हजार छः सौ अंठावन हस्तियां उसकी मित्र सूचि में शामिल थीं । जो लाईक के बदले लाईक का धंधा करके अच्छे खासे लाईक और भेरी नाई, जबर, छा गये, एंडलेस जैसे बहुमुल्य कमेंट कमा रही थीं । मगर इन सबके बीच उसे याद आया कि “ससुर हमको तो ई फ्रेंडशिप डे के बारे में पता लगे अभी दो दिन हुआ है और ये सोनुआ तो हमारा तब का यार है।जब हम लंगोट भी नहीं पहनते थे और हम आज तक उसको कभी हैपी फ्रेडसिप डे नही बोले । ऐसे तो ससुर हमारा दोस्ती अभी तक पक्का ही नहीं हुआ ।”
खोआ बनाने के लिए जैसे दूध अऊंटा जाता है उसी तरह ये सारा ख़याल बिरजु के दिमाग में नाॅइस्टाॅप अऊंटता जा रहा था । वो एक भांत और उलझता इससे पहले उसकी पीठ पर किसी ने ज़ोर से धौल जमाई । बिरजु इस अकस्मात हमले से दहल गया और घबरा कर पीछे देखा । पीछे देखने पर उसने पाया कि ये तो सोनुआ है, जो उसे मार कर दांत चिआर रहा है ।
“का ससुर इहाँ काहे बैठे हो बे, बाप तुम्हारा फिर लतियाया क्या तुमको या ऊ रावन की औलाद तुम पर रौब जमाया ?” सोनुआ जानता था कि इन्हीं दो कारणों की वजह से वो इतना मौन होता है ।
“ऊ सब छोड़ो, ई तो ससुर हमरे करम के साथ ही जुड़ा है । तुम सुनो हमारे मन पर बोझ है एक ठो उसको हलका करना है हमको ।” 
“साला पेट हलका करने का बात होता तो हम तुमको अईसा चूरन देते की हड़हड़ा के पैखाना हो जाता तुमको, सारा पेट मिनट में साफ । लेकिन ई मन हलका करने का जुगाड़ तो हम नहीं रखे बाॅस ।” 
“अरे, तुम ससुर मजाक छोड़ो, बस इतना जान लो कि हमको तुमसे कुछो कहना है । ऊ कह देंगे तो मन अपने आप हल्का हो जाएगा ।” सोनुआ के मजाक पर बिरजु ने उसे डांटते हुए कहा और उसकी हथेली अपने हाथों में ले ली । 
“ऐ ऐ बिरजुआ, ऐ सुनो ससुर । हमको काहे लग रहा है कि एके दिन में तुम्हारा कायापलट हो गया है । कल तक तुम साला सिलिया को परपोजियाने का प्लान बनाते थे और अब अचानक हमसे ई मऊगा की तरह बतिया रहे । काहे से तुम्हारा लछन हमको नहीं सही लग रहा ।” सोनुआ बिरजु से अपना हाथ छुड़ा कर ऐसे दो कदम पीछे हुआ जैसे देखते ही देखते बिरजुआ की मुंडी दूसरी तरफ घूम गई हो 
“बड़ी बुरपराछुत हो यार । हम का कहने की कोसिस कर रहे और तुम साला हमको का समझ रहे हो । सुनो हमको तुमसे “हैपी फ्रेंडसिप डे कहना है ।” 
“ई का होता है बे ? हम पूरा जिला घूमे हैं पर इसका नाम नहीं सुने ।” 
“अरे तुम अनपढ़ गंवार कहीं का क्या समझेगा । ई दोस्ती का दिन होता है बकलोल । इस दिन दोस्त को सुभकामना देते हैं । अब हम लोग साला तब से दोस्त है जब एक दूसरा के नुनुआ पकड़ के पेसाप करते थे और हमने कभी तुमने हैपी फ्रेंडसिप डे नहीं बोला । अभी तक हमारा दोस्ती अधूरा था पगलेट । मगर जब तुमको ई बोल देंगे तब पूरा हो जाएगा ।”
“अच्छा, तो तुमको ई परम ज्ञान दिया कौन ? 
“फेसबुक पर पढ़े हैं ।”
“तुमको बोले थे तुम पगला जाओगे फेसबुक चला चला के । हमरी फूआ का बेटा निमेसबा इतना फेसबुक चलाया कि ससुर के दिमागे सुन हो गया । अब सारा दिन खुद से बड़बड़ाता है ।”
“तुम नहीं समझोगे बेटा । तुम्हारे पास न दिमाग है ना ही दिल । हम कल से उलझे हैं अपना दोस्ती को ले के और तुम हमको ही चरा रहा है ।” अभी तक सोनुआ बिरजु की हर बात को मजाक में ले रहा था मगर बिरजु की ये बात उसके दिल पर चोट कर गयी । 
सोनू उस चोट से उठे दर्द को मुस्कुराहट में बदलते हुए बोला “सच कह रहे भाई, हमारे पास दिल कहाँ से । तुम साला अब पढ़ा लिखा हो गया है तुमको पता है कि किसके लिए कोन दिन होता किसके लिए नहीं । पर भाई हम तो इहे जानते।हैं कि हमारे लिए हर दिन दोस्ती का है ।हुबह उठते हैं तो सबसे पहिले तुमको फोन घुमाते हैं । तुम साला जो कह देते हो उहे करने में जुट जाते हैं । तुम हमको हम तुमको भर दिन में केतना गरियाते हैं लेकिन कोनो दूसरा ससुर एक बात भी कह दे एक दूसरा के बारे में तो उसको थूर देते हैं । साला आज तक जब भी बाहर निकले कभी ई कहे हम लोग कि तुम्हारा खर्चा तुम।करो हम अपना हम खुद करेंगे ? नहीं भाई हम दुनो के जेब का पईसा हम दुनो का होता है । तुमको याद है एक बार हम अपना पिता जी के साईकिल का एस्पाॅक तोड़ दिये थे । पहिले तुम हमको बहुत खऊंझाया, खूब हंसा ई कह कर कि “अब लात पड़ेगा जुआन को ।” लेकिन जब हम डर गये बुरी तरह और रोने लगे तो तुम ससुर अपना गोलक तोड़ कर हमको पईसा दिया था । भाई हमारे लिए तो रोजे दोस्ती का दिन, रात भोर दुपहर सब है, दोस्ती हर पल हमारे सीना में धड़कती है, साला ई काट के देखो हमको बरह्म बबा कसम कहते हैं खून की जगह दोस्तिये टपकेगी । जानता है तुम, हमको अपनी दोस्ती को लेकर सबसे जादा डर अभी लगा जब तुम ई फ्रेंडसिप डे चिल्ला रहे थे । तुम हमको गरियाते ही सच्चे लगते हो, हम तुमको चिढ़ा कर ही खुश रहते हैं । हमको साला ई देखाऊस में दम घुटता है । हम अईसहीं ठीक हैं बिना दिल आ दिमाग के ।” 
सोनुआ अपने दर्द को अपने शब्दों में लपेट कर बोलता चला गया और बिरजु उसको चुपचाप एकटक देखता रहा । सोनू बोलते बोलते रो पड़ा और सुनते सुनते सोनू की आँखों का आँसू बिरजू की आँख से भी बहने लगा । बिरजु और सोनू ने कभी एक दूसरे के प्रति अपने प्रेम को उजागर नहीं किया था, करते भी क्यों कभी ज़रूरत ही नहीं पड़ी । पर्दा हो तब ना किसी खास दिन उठाया जाए, जहाँ ससुर थे ही दोनो नंगे तो पर्दा क्या उठाना । 
“तुम साला इमोसनल कर दिये । हमको नहीं पता था कि तुम इतना अच्छा भौंक लेते हो । आओ अब गले लगा लो यार ।” इतना कहते हुए बिरजू सोनू के सीने से जा लगा । 
“अबे छोड़ो यार कोनो देखेगा तो हल्ला हो जाएगा, कहेगा सहरी बिमारी गओंवो में आगया ।” सीने से लग कर सुकून पा लेने के बाद सोनूआ ने एक दम से बिरजू को खुद से अलग करते हुए कहा और फिर दोनो हंस पड़े ।
“चलो रजनीगंधा खिलाओ यार ।” 
“चलो रे खिलाते हैं । पर एक बात बताओ बाकि सब तो ठीक है पर का ई सच में तुमको काटेंगे तो दोस्ती टपकेगा ।” 
“का यार तुम्हों पकड़ कर बईठ जाते हो । इमोसन में निकल गया ।” इस बात पर दोनो ज़ोर झ़ोर से हंसने लगे ।
“अच्छा सुनो !” सोनू बोला 
“का है बे ?”
“हैपी फ्रेडसिप डे ।”सोनुआ ने  मुस्कुरा कर कहा
“इहे कहना था तो भासन काहे पेले इतना । हैपी टू ये आलसो ।” 
“सार अंग्रेज के नाती ।” इसके बाद दोनों के ठहाकों के साथ सुरुज बाबा मुस्कियाते हुए पाताल की गोद में हौले से समागये ।
धीरज झा 

​नज़र साफ होगी तो नज़रिया अपने आप बदल जाएगा

नज़र साफ होगी तो नज़रिया अपने आप बदल जाएगा (काल्पनिक कहानी)
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“सुनिये, ये क्या कर रही हैं आप ? कुछ तो लिहाज कीजिए ये पब्लिक प्लेस है ।” अपने छः महीने के बेटे की मासूम और संतोष से लबालब भरे चेहरे को एकटक देखने में मग्न स्मिता को किसी अंजान आवाज़ ने एक दम से टोका । 
“क्या बात होगयी सर ? मैं तो यहाँ से हिली भी नहीं फिर मैने ऐसा क्या कर दिया जो आप इतना भड़क रहे हैं ?” स्मिता अपनी अंजान गलती को जानने के लिए उस अंजान व्यक्ति से सवाल करती है, जिसकी उम्र यही कोई पैंतालिस पचास के आसपास की होगी । 
“आपको पता ही नहीं कि आप क्या कर रही हैं ? आप जैसी महिलाओं की वजह से ही गलत असर पड़ रहा है समाज पर ।” उस व्यक्ति की नज़रें आवारा हो रही हैं । वो जिधर नहीं देखना चाहता बार बार उसकी नज़र वहीं जा रही है । 
“आप साफ साफ कहिए कहना क्या चाहते हैं ।” स्मिता का रूख भी कड़ा हो गया । 
“ये आप घर में भी कर सकती हैं । यहाँ पार्क में सबके सामने ऐसा करना सही है क्या ? बच्चों से लेकर बूढ़ों तक सब यहाँ मौजूद हैं और आपको घूर भी रहे हैं, इधर आप हैं कि आपको कुछ ।” अब उस व्यक्ति की निगाहें कुछ देर स्मिता की कुर्ती के खुले बटनों में से झांकते आधे स्तन पर टिक जाती है और वो अपनी बात अधूरी छोड़ कर चुप हो जाता है ।
“ओह तो आपको इसलिए दिक्कत है क्योंकि मैं अपने बच्चे को स्तनपान करा रही हूँ ?” स्मिता के होंठों पर गुस्से और दुःख से भरी एक तीखी मुस्कुराहट तैर गयी । 
“मुझ अकेले को नहीं यहाँ हर किसी को दिक्कत है, बस कोई बोलने की हिम्मत नहीं करता । मैं कई दिनों से देख रहा हूँ आप ऐसा ही करती हैं, आज मैं बर्दाश्त नहीं कर पाया इसीलिए आपको टोक दिया ।” व्यक्ति के आवाज़ में ऐसी बुलंदी झलकने लगी जैसी एक वकील की बातों में झलकती है कोर्ट में गुनेहगार का गुनाह साबित कर देने के बाद । 
“आपका घर शायद दो ब्लाॅक छोड़ कर है ? स्मिता ने उस व्यक्ति से सवाल किया जो उनके बातचीत के विषय से एक दम अलग था । 
“हाँ, मगर उससे आपको क्या ? आप बात घुमाईए मत । या तो ये करना बंद कीजिए या फिर यहाँ से…..।” स्मिता ने सवाल से बुरी तरह बौखला गये उस व्यक्ति की बात को बीच में रोक दिया ।
“आपके घर के रास्ते में एक खाली प्लाॅट है ?” 
“हाँ है, मगर….। फिर से बात बीच से कट गयी 
“रोज़ का आना जाना होगा आपका ?” फिर एक सवाल 
“कमाल की औरत हैं आप जब रास्ता ही वही है तो आना जाना होगा….।” फिर से 
“वहीं कुछ दुकाने हैं और एक कबाड़ का गोदाम भी ?” 
“हाँ ।” व्यक्ति इस बार बात कटने के डर से इतना ही बोला 
“वहाँ से गुज़रते हुए आप रोज़ देखते होंगे कि वहाँ के दुकानदार या उस कबाड़ गोदाम में काम करने वाले उस खावी प्लाॅट की दिवार पर पेशाब करते हैं । एकदम खुले में । आपने उन्हें कितनी बार रोका है ?” स्मिता का ये सवाल जो उस व्यक्ति के सामने खड़ा था ये पहले के सवालों के मुकाबले कहीं ज्य़ादा हट्टा कट्टा और मजबूत था । जिसके आगे व्यक्ति के पसीने छूट गये । 
“वो तो…।” उनकी ज़ुबान ने अचानक से कंपकंपी पकड़ ली । 
“वो तो जायज़ है ? है ना ? मगर मैं एक माँ हो कर अपने रोते बच्चे को दूध पिला रही हूँ ये गलत है ? है ना ? यहाँ सब मुझे देखते हैं ? पर क्या जो सब मुझे देखते हैं आपको भी लेकर उन्होंने कभी स्तनपान नहीं किया ? या फिर इसका महत्व नहीं जानते ? मेरी ये छः महीने की बच्ची बड़ी ज़िद्दी है और साथ में समझदार भी । सारा दिन मैं काम में लगी रहती हूँ ये चुप रहती है, दोपहर को मैं सोने लगती हूँ ये भी माँ को आराम मिले ये सोच कर सो जाती है मगर शाम होते ये लगती है क्योंकि इसे बाहर खुली हवा में घूमना होता है । मगर है तो बच्ची ही, नादान सी इसे नहीं पता कि इसकी माँ को सब देख रहे हैं और इसे अभी भूख के कारण चिल्लाना नहीं चाहिए । शायद इसे खुली हवा में दूध पीना अच्छा लगत है । और मैं पागल इसकी भूख और रोने के आगे ये भूल जाती हूँ कि ये पार्क है यहाँ आने जाने वाले लोगों की नज़र उस नये नये लगे खूबसूरत झरने या उन खिले हुए रंगीन फूलों या फिर जिन बच्चों के साथ वो आये हैं उनकी मुस्कुराहटों पर नहीं बल्कि मेरे आधे खुले स्तन जा कर टिक जाती हैं । मुझे ख़याल करना चाहिए उनकी बेकाबू नज़रों का । मुझे ख़याल करना चाहिए उस सभ्यता का जो बच्चे को दूध पिलाती माँ के स्तन को देख कर हिलने लगती है ।” व्यक्ति की ज़ुबान में अब कंपकंपी नहीं, वो अब जम चुकी है ।
” सर, लोग कहते हैं शहर आगे बढ़ गये मगर गाँव अभी भी पिछड़े हैं जबकि मैं गाँवों को ही आगे मानती हूँ । मेरी बाई जो अभी साल भर पहले ही किसी गाँव से आई है, कभी कभी अपने साल भर के बच्चे को अपने साथ ले आती है जब घर में कोई उसे संभालने वाला नहीं होता । जब उसके काम करने के बीच उसका बच्चा रोता है तो वो बिना ये देखे कि कौन वहाँ है कौन नहीं झट से अपने बच्चे को दूध पिलाने लगती है । उसके बच्चे की चिखें शायद उसके लिहाज़ पर भारी पड़ जाती हैं । ये गंवारपना मैने उसी गाँव की देहाती औरत से सीखा है । जानते हैं मैं ये सब आपको क्यों बता रही हूँ क्योंकि मुझे लगता हैं शायद आप इसे समझें और आइंदा किसी और को इसके लिए कभी ना टोकें ।” स्मिता की बात ख़त्म होते ही उसकी बच्ची खिलखिला कर हंस देती है । शायद वो अपनी माँ को शाबाशी दे रही है । और उस व्यक्ति की ज़ुबान इतनी जम चुकी है कि वो चाह कर भी साॅरी नहीं बोल पाता और वहाँ से चला जाता है । इधर स्मिता भी अपनी कुर्ती का बटन बंद करती है और अपनी बच्ची को देख मुस्कुराते हुए अपने घर की तरफ चल देती है । 
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बंदिशें हैं क्योंकि उन्हें आपने लगाया है, अपनी कमज़ोरी छुपाने के लिए । झांकने वालों के लिए पर्दा लगा क्या और हटा क्या, वे तो झांक ही लेंगे और जिनका मन साफ़ है उनके सामने नंगा बदन भी मात्र एक पराई देह है । 
नज़रें साफ़ होंगी तो साहब, नज़रिया अपने आप साफ हो जाएगा । 

आप बदल कर तो देखिए बदलाव तो चल कर आपके घर तक आएगा ।
आईए विश्व स्तनपान सप्ताह मनाएं, कुछ डरी सहमीं नयीं नयीं माँओं का हौंसला बढ़ाएं 
धीरज झा