दशग्रीवा रावण और मैं

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#दशग्रीवा_रावण_और_मैं (विजयदशमी विशेष)sunny-nair-raavan-v02-webpic via- https://www.artstation.com/artwork/obkaW

 

 

कल रात मैं अपना ज़रा सा स्वस्थ बिगड़ने के कारण थोड़ा बेचैन सा था । ऊपर से ये भी सोच मेरे दिमाग को आराम नहीं करने दे रही थी कि कल विजयदशमी है और मुझे उस दुराचारी रावण के लिए कुछ बहुत बुरा लिखना है जिससे मैं असत्य पर सत्य की जीत के प्रमाण को और प्रबल कर सकूँ । परन्तु मेरे सामने दुविधा ये थी कि रावण के बारे में और कितना बुरा लिखूं । यहाँ तो किताबें भरी पड़ी होंगी उसकी बुराई से फिर मैं उसके बारे में क्या ऐसा बुरा खोजूं जो किसी को ना दिखा हो । इसी दुविधा में मेरे मन से अचानक ही निकल गया कि “हे लंकेश अब तुम ही बता दो कि तुम में ऐसा बुरा क्या है जिसे किसी ने आज तक नहीं खोजा ।”

 

उसके बाद जो हुआ उससे मेरी ऑंखें चौंधिया गयीं । बड़ी तेज़ रौशनी के साथ एक अधजला सा इंसान जैसा ही कोई मेरे सामने खड़ा था । पहले मुझे लगा जैसे मेरा ज्वर मेरे मष्तिष्क तक भ्रमण करने चला गया है इसी कारण मुझे ये भ्रम हो रहा है । मगर मैंने जब दो तीन बार अपनी आँखों को मला तो पाया कि वो सच में मेरे सामने था ।

 

बड़े कांपते हुए मन से मैंने उस कुरूप से प्रश्न किया “कौन हो भाई और यहाँ अचानक से कैसे आ धमके ?”

 

 

उसने अपने कुरूप चेहरे पर मुस्कान बनाए रखते हुए मेरी तरफ विस्मय से देखा और बोला “मैं कौन हूँ ? तुम मुझे नहीं जानते ? मैं हूँ दशग्रीवा ?

 

मैं और हैरान रह गया “दशग्रिवा कौन ? मैंने तो ये नाम ही पहली बार सुना है ।”

 

मेरी बात शायद उसे कुछ ज्यादा ही बचकानी लगी इसी लिए कमरे में उसका भयानक अटहास गूंजा जो शायद मेरे सिवा किसी ने नहीं सुना क्योंकि सुनता तो शायद आधा शहर मेरे घर के बहार खड़ा होता “हहहहहहहाहा, ओह तुम तो मेरे दशग्रीव नाम से परिचित ही नहीं हो । अच्छा लंकापति रावण से तो परिचित हो न ।”

 

मैं उसकी तरफ ध्यानपूर्वक देखते हुए कहा “हाँ उन्हें कौन नहीं जानता । वो भी जब दशहरे का दिन हो तब तो बच्चा बच्चा उन जैसे क्रूर राक्षस को जनता है । अपितु मैं तो अभी सोच भी उन्हीं के बारे में रहा था ।”

 

एक हंसी जो अटहास से कम थी क्योंकि इसमें एक तरह की पीड़ा थी, अपने मुख पर सजाते हुए उसने कहा “मैं वही क्रूर रावण हूँ जिसके दहन का आज के दिन तुम सब लोग आनंद लेते हुए मन ही मन प्रसन्न हो जाओगे ये सोच कर कि तुमने बुराई पर जीत पा ली ।

 

“हहहहाहा, तुम और रावण ? चलो मानने का प्रयत्न भी करूँ तब भी कैसे मानूं ? तुम्हारे पास तो दस सर ही नहीं ।”

 

शायद मेरी बात उसे मजाक लगी वो फीर से हँसा “बड़ी भ्रांतियां पाले बैठे हो तुम सब इंसान अपने मन में । क्या तुम आम तौर पर उसी तरह से सजे धजे रहते हो जैसा तुम बाहर या किसी खास जगह जाने के लिए सजते हो । अरे बंधू, दस सिरों और बीस हाथों के साथ तो मेरा जीना दुर्लभ हो जाए, ना चैन से खा सकूँ ना चैन से सो सकूँ । वो सब सर और भुजाएं मायावी हैं, अपनी इच्छानुसार मैं उन्हें सजा लेता हूँ ।”

 

 

अब मेरे बदन में सच में कंपकपी दौड़ गयी, मैंने हाथ जोड़ कर उन्हें प्रणाम किया (जो बस भयवश अपने आप हुआ था) और कहा “क्या सच में आप रावण हैं ? अगर हाँ तो यहाँ क्यों आये हैं । मैंने तो बस ऐसे ही आपका नाम लिया था, आप तो सच में प्रकट होगये ।

 

 

मेरी बात से शायद उन्हें पीड़ा पहुंची मगर फिर भी उनके चेहरे की वो मुस्कान गयी नहीं । वो सामने पड़ी कुर्सी पर बैठते हुए बोले “हाँ बंधू मैं सच में रावण ही हूँ । अब तुमने यूँ ही याद किया या मन से ये पता नहीं मगर तुम्हारी आवाज़ मुझ तक पहुंची और मैं आगया । आज मैं दुखी था मुझे मेरी कुछ बातें किसी को बतानी थी मगर किसी की इच्छा के बिना मैं उसके समक्ष प्रकट नहीं हो सकता और भला मुझ राक्षस को कौन याद करता । मगर तुमने किया तो मैं विलम्ब किये बिना आ पहुंचा ।”

 

मैं अब थोडा शांत होगया था और थोडा लज्जित भी “क्षमा करें लंकेश मैं आपको पहचान नहीं पाया और अच्छा ही हुआ कि आपको एक दम से नहीं पहचाना, अगर पहचान लेता तो शायद मेरी हृदयगति ही रुक जाती ।”

 

 

“हहहहहाहा, नहीं बंधू अब मुझसे भयभीत होने जैसा कुछ बचा नहीं । अहंकार ही मनुष्य के स्वरूप को भयानक बनता है और मैं अपने अहंकार तो उसी दिन हार गया था जिस दिन प्रभू राम के हाथों पराजित हुआ । अब तो केवल दुःख है जो हर वर्ष अपने इस खोखले दहन और तुम सब के खोखले आनंद को देख कर बढ़ता रहता है ।”

 

 

मैं नहीं जनता मुझमे उसकी बात काट कर पुनः उनसे सवाल करने की शक्ति कहाँ से आई मगर मैंने किया “आपको दुःख है आपके दहन का ? आपको लगता है आपने जो किया वो सब सही था ? आपको लगता है कि हमें आपका नाहन नहीं अपितु पूजा करनी चाहिए ।”

 

कुछ क्षण के लिए उन्होंने मुझे अपनी बड़ी बड़ी लाल आँखों से घूर परन्तु फिर से अपनी उसी मुस्काती मुद्रा में आते हुए बोले “बंधू, पूजा और दहन के बीच भी बहुत कुछ आता है । जैसे कि शिक्षा लेना मेरे कर्मों से, सम्मान करना उन सद्गुणों का जिसने मुझे प्रभू राम से महापंडित जैसा उपनाम दिलवाया । मैं अपने मुख से अपनी बुराइयों के नीचे दबे गुणों का बखान नहीं करना चाहता परन्तु मैं विवष हूँ । अगर ऐसा नहीं करूँगा तो तुम जानोगे कैसे ? और तुम दहन पर दुखी होने का सवाल पूछते हो तो तुम्हे बता दूँ मैं आज  इसी विषय में बताने आया हूँ कि मैं अपनी पराजय से दुखी नहीं हुआ क्योंकि उसका मुझे संज्ञान था, मुझे परमानंद कि अनुभूति हुई थी जब मैं प्रभू राम के हाथों पराजित हो कर मारा गया क्योंकि वो मेरे मोक्ष का द्वार था । मैं अपनी वो संपदा खोने से भी दुखी नहीं हुआ क्योंकि धन वैभव, राज्य और प्रजा पर किसी का सदैव एकाधिकार नहीं हो सकता । परिवर्तन संसार का नियम है । लंका मेरे नाना सुमाली और उनके भाइयों को मिली परन्तु प्रभू हरी के हाथों परास्त होने पर रसातल में जा बसे और फिर लंका मेरे बड़े भाई देवताओं के लोकपाल और धर्मात्मा कुबेर के अधिकार में आगयी और कुबेर को सत्ता से हटा कर मैंने लंका पर अपना अधिपत्य जमा लिया । तो इसमें भी दुखी होने जैसा कुछ नहीं था । मगर हाँ मुझे हर साल बिन कारण जलाये जाना दुखी करता है ।”

 

“दुखी क्यों भूदेव, ये तो कर्मों का फल है आपके, फिर इस पर कैसा दुःख ?”

 

लंकेश ने मेरी ओर देखते हुए कहा “सच्चा अपराधी वही होता है जो अपने अपराध का दंड ये सोच कर ख़ुशी ख़ुशी भुगते कि उसे जो सजा मिल रही है वो आने वाली पीढ़ी और उसके वंशजों के लिए एक सीख हो । एक भय होगा उस अपराध को सोचने मात्र प्रति जिसके बदले अपराधी दंड का भुक्तभोगी बना । और अगर लोग उसे मिले दंड से भी भयभीत ना हों, अपराध करने से डरें नहीं तो अपराधी जिसे दंड मिला वो दुखी होता है ये सोच कर कि वो प्राणदंड को सहर्ष अपना कर भी सबको उस अपराध के कुप्रभाव से अवगत ना करा पाया । मेरा दुःख भी ऐसा ही है ।” लंकेश का दुःख उसके मुख पर तांडव करने लगा । शायद ये वही तांडव था जिसने दशग्रीवा को रावण (सबसे ऊँची ध्वनि निकलने वाला) बना दिया ।

 

कुछ पलों तक मौन पसरने के बाद अधजले दशानन ने अपनी बात फिर से शुरू कि “ मैं लंकापति रावण हर वर्ष तुम लोगों के हाथों जलाया जाता हूँ और तुम सब मेरा दहन करते हुए ये सोच कर खुश होते हो कि तुमने बस एक पुतला जला लेने से ही असत्य पर सत्य की जीत को प्रमाणित कर दिया । मगर सत्य तो ये है कि तुम सब मेरा दहन कर के कभी बुराई को पराजित ही नहीं कर पाए । तुम सब के लिए मैं दशानन रावण हमेशा से एक राक्षस रहा जिसे प्रभू श्रीराम ने मार कर बुराई पर विजय पाई थी । परन्तु कौन सी बुराई ऐसी तुम सब ने देख ली मुझमे जिसके लिए तुम युगों युगों से मेरा दहन करते आरहे हो ? ऐसा क्या भिन्न पाया तुमने मुझमे जिसके कारण तुम्हारे मन में मेरे प्रति इतना द्वेष है ? क्या तुम्हारे लिए प्रभू राम यही सन्देश छोड़ कर गए थे कि केवल रावण का पुतला जलने मात्र से तुम सब बुराई पर जीत पा लोगे ? मुझे दुःख अपने दहन का नहीं होता बंधू, मुझे दुःख है मेरे अकारण दहन का । प्रभू राम के हाथों मरना सौभाग्य था मेरा मगर मुझे दुःख होता है हर वर्ष उनके ही हाथों जलाये जाने का जिनमे मेरे उस अहंकारी और दुराचारी स्वरूप का अंश आज भी है ।” दशानन की बातों ने मेरे मन को भीतर तक झंझोर दिया था । मैं कुछ भी कह सकने की अवस्था में नहीं था ।

 

कुछ देर तक वो अपने इस भयानक दुःख के नीचे दबे होने के कारण कुछ बोल ना पाए मगर कुछ ही पलों में उन्होंने पुनः बोलना आरंभ किया “तुम इंसान, ईश्वर की बनायी सबसे सुंदर कृति हो परन्तु तुमने अपना मन और बुद्धि इतनी मलीन कर ली है कि अब तुमसे बेहतर मैं पशुओं को पाता हूँ । तुम्हे अपने अन्दर का वो रावण कभी नहीं दिखता जो हर दिन तुमसे चिल्ला चिल्ला कर कहता है कि तुम गलत हो ,तुम्हारे लिए दूसरों की बुराई इतनी बड़ी हो जाती है कि तुम उसकी अच्छाईयों से कुछ सीखना भी अपना अपमान समझते हो । मैं दशग्रीवा, चारों वेदों और छहों उपनिषदों का ज्ञाता, रावण संहिता जैसे महां ग्रंथ का रचयिता, ऐसा वीणा वादक जिसके वीणा का स्वर देवताओं को अन्तरिक्ष से धरा पर उतर आने को विवष कर देता था, उस शिवतांडव का रचयिता जिसे पढ़ कर तुम आज भी ये सोच कर गौरवांवित होते हो कि तुमने परम पिता शिव को प्रसन्न कर दिया, वो महांपंडित जिसने अपनी ही पराजय हेतु प्रभू राम द्वारा लंका तक पहुँचने के लिए बनाए जा रहे राम सेतु का यज्ञं पूर्ण करवा कर प्रभु राम को खुद की पराजय सुनिश्चित करने के लिए “विजयी भवः” का आशीर्वाद दिया, जिसकी प्रजा को उससे कोई भी शिकायत नहीं थी, जो नौ ग्रहों को अपनी इच्छानुसार गति दे और छीन सकता था, तुम उस दशग्रीवा को केवल इस लिए जला देते हो कि कहीं तुम्हारे अन्दर समाहित मेरे बुराई का अंश उजागर ना हो जाये ? बंधू कभी तुम मेरे बारे में सोचो और फिर सोचो कि तुम सब में ऐसा क्या नहीं जो तुम्हें रावण ना बनाता हो । मैं तो अपनी गति को पा चूका हूँ बंधू मुझे जलने से तुम्हे मनोरंजन और झूठे मोद से शेष और कुछ भी नहीं मिलेगा । यदि सच में तुम सत्य की जीत को प्रमाणित करना चाहते हो तो अपने अन्दर के रावण को मारो । कब तक मुझे जला कर सिर्फ मुझे ही घाव दोगे ? अब तो मेरी बुराइयों का प्रतीक मेरा आधा शरीर जल गया । अब तो बस वही अच्छाईयां बची हैं जिन्हें तुमने कभी देखा ही नहीं ।”

 

 

मैं अब और देर तक लज्जित नहीं हो सकता था मुझे अब क्षमा मंगनी ही थी “मैं सच में इस समय खुद को उतने ही बड़े पाप का भागी मान रहा हूँ जितने बड़े कभी आप थे । मैं आपसे क्षमा चाहता हूँ समूची मानवजाति की ओर से । मगर मैं आपके दहन को कैसे रोक सकता हूँ, उसके बिना विजयदशमी कैसी ?”

 

“बंधू मैंने कब ऐसा कहा कि तुम मेरे दहन को रोको, परन्तु केवल रावण के पूतले का ही नहीं अपने अंदर के रावण का भी दाह करो । जिस दिन आधी मानवजाति भी अपने अन्दर के रावण का दाह कर लेगी उस दिन मैं मोक्ष को पा जाऊंगा ।”

 

“मैं यही करूँगा लंकेश । बहुत कुछ जाना आज आपसे अब बस एक आखरी विनती है अगर आप उसे मान सकें तो ?” मैंने उनसे क्षमा मानते हुए कहा

 

“बोलो, मेरे वश में होगा तो मैं ज़रूर मानूंगा ।”

 

“मेरे मन में बड़ी इच्छा है कि आपसे आपकी सर्वश्रेष्ट कृति शिवतांडव स्तोत्र सुनूँ ।”

 

मेरी इस बात पर तो पहले वो हँसे फिर उन्होंने कहा “बंधू इसी कृति ने तो दशग्रीवा को रावण बना दिया, और अब रावण मर चूका है, क्यों मुझे फिर से रावण का उपनाम दिलवाना चाहते हो ।”

 

मैंने भी हठ ठान दी मगर वो भी दशानन थे हठ हो या युद्ध भगवान राम के आलावा उन्हें किसी और से पराजित होना स्वीकार कहाँ था । इसीलिए मेरी बात मानते हुए हाँ तो कर दी मगर जैसे ही उन्होंने उच्चारण शुरू किया उसी के साथ मेरी ऑंखें खुल गयीं । कुछ देर तक तो मैं उनकी ध्वनि अपने कानों तक पहुँचने की प्रतीक्षा करता रहा परन्तु जैसे ही मेरी आंख खुली मैं बहुत गहरे से मुस्कुराया ।

 

 

अब लंकापति रावण के लिए बुरा लिखने की इच्छा नहीं थी, और  अब था तो मन में प्रण था तो बस ये कि मुझे रावण के पुतले का दहन करते हुए अपने अन्दर छुपे रावण के हर प्रकार के अवगुण का भी दाह कर देना है । रावण तो अवश्य जलेंगे हाँ केवल पुतले ही नहीं वो भी जिन्होंने दशग्रीवा को तो मार दिया मगर खुद में रावण को अभी तक जीवित रखा है । यही सब सोच कर इस बार मैंने उन्हें भयवश नहीं अपितु पूरे मन और सम्मान से प्रणाम किया ।

 

दशग्रीवा और मेरी ओर से इस सोच के साथ विजयदशमी की शुभकामनाएं की रावण के पुतले और दूसरों के अन्दर रावण ढूंढने से पहले आप अपने अन्दर के रावण का दहन करेंगे ।

 

 

धीरज झा

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