यह रूप भी माता का ही है

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#यह_रूप_भी_माता_का_ही_है 
“बोंदू , जा बेटा कंजकों को बुला ला । रूनझुन बहन यहाँ गयी हैं सब, वहाँ से सबको बुला लाना ।” पूरियों की आखरी घानी निकालते हुए सुमित्रा ने बोंदू से कहा । 
“जा रहे हैं अम्मा ।” टी वी पर नजरें गड़ाए बोंदू ने कहा ।
“जल्दी जा रे । सब चली गयीं तो शाम से पहले ना मिलेंगी । हमको कंजक पूजन कर के व्रत का समापन्न करना है ।” 
“हाँ हाँ जा रहे हैं ।” चौथी बार टोकने पर माँ के तेवर कड़े होते देख भोंदू कंजकों को बुलाने चला गया । 
लगभग दस मिनट बाद भोंदू कंजकों को अपने साथ ले आया । लाल चुनरी में सजी हुई बच्चियाँ सच में देवी का बालरूप लग रही थीं । कुछ देर तक तो सुमित्रा सबको देख मन ही मन आनंदित ही होती रही । उसे लग रहा था जैसे मातारानी के सभी रूप उसके आंगन में उतर आए हों । 
वो मन ही मन खुश हो ही रही थी कि इतने में उसकी उड़ती नज़र अत्तो बूआ की पोती पर पड़ गयी । उसके चेहरे पर नज़र पड़ते ही सुमित्रा ऐसे चौंक पड़ी जैसे गुलाबों को मुदित मन से सहलाता हुआ इंसान अचानक से उसके साथ जुड़े कांटों की चुभन से चौंक जाता है । 
सुमित्रा का सारा आनंद अब एक तरह की चिढ़ में बदल कर उसके चेहरे पर मंडराने लगा । उसने अनमने मन से सभी बच्चियों को बैठाया और रसोई में सबके लिए कंजक निकालने चली गयी ।
“ई अत्तो बुआ की कन्हीं पोती को लाने के लिए कौन कहा था तुमको ?” 
“हमको ये भी तो नहीं कही थी कि उसको नहीं लाना है ।”
“अपना दिमाग कहाँ रहता है तुम्हारा । किसी तरह से तुमको वो देवी लगती है क्या । उसका तो मुंह देखते ही हमारा दिन खराब हो जाता है ।” सुमित्रा भनभनाती हुई सभी कन्याओं का पैर धोने चली गयी तब बोंदू सबके लिए हलवा पूरी की प्लेट बाहर ले आया । 
पैर धोते हुए वो जब अत्तो बुआ की पोती के पैरों के पास पहुंची तो उसने उसके पैरों पर बस पानी उड़ेल दिया । मगर इसके बाद भी वो बच्ची अन्य बच्चियों से ज़्यादा खुश थी । क्योंकि इतना सम्मान (भले ही झूठा ही सही) उसे आज के दिन ही मिलता था । 
सभी बच्चियों को हलवा पूरी चने और काॅपी पेंसिल से सजी प्लेट दे कर उन्हें विदा करते हुए सुमित्रा ने सबको ज़ोर से माताओं के भिन्न रूपों जयकारा लगाने के लिए । दुर्गा रानी की जय, शेरों वाली की जय, काली मईया की जय । सुमित्रा के साथ साथ सभी बच्चियों ने भी खिलखिला कर जय कारे लगाये । कन्याओं को मुस्कुरा कर विदा करती सुमित्रा की नज़र फिर से जब अत्तो बुआ की पोती पर पड़ी तो उसने अपनी नज़र फेर ली ।
“ऐ बोंदू, पप्पा आएं तो उनको नाश्ता दे देना । हम तब तक माँ काली को भोग लगा आते हैं ।” इतना कह कर सुमित्रा अपने गुसाईं घर में अपनी ईउल देवी माँ काली की पूजा के लिए जा बैठी ।
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ये किसी तरह की लघुकथा नहीं थी । अधिकांश लोगों का कड़वा सच था । बड़ों बुजुर्गों ने समय से ये बात चली आ रही है कि बच्चे भगवान और देवियों के रूप होते हैं मगर बहुत से लोगों ने ये धारणा बना ली है कि जो बच्चे सुंदर होते हैं वही भगवान का स्वरूप होते हैं । बात चाहें नवरात्रों में कन्या पूजन की हो या फिर जन्माष्टमी में बालरूप कन्हैया की लोग हमेशा उन्हीं बच्चों में देवी और कृष्ण को खोजते हैं जो सुंदर हैं, अपनी नियती के हाथों मजबूर हो कर किसी शारीरिक कमी अथवा सुंदरता के अभाव से जूझ रहे बच्चों में तो जैसे भगवान का वास हो ही नहीं सकता । 
मगर लोग ये भूल जाते हैं कि सामने से किसी ने इनका स्वरूप नहीं देखा श्यामवर्ण कन्हैया सच में सुंदरते या उनका पवित्र मन सबको अपनी ओर आकर्षित करता था यह कोई नहीं जानता । छोटी छोटी सुंदर कन्याओं में हम देवी माँ को ढूंढते हैं मगर काली माँ के स्वरूप को ना जाने क्यों भूल जाते हैं । 
खैर ज़्यादा भाषणबाज़ी ठीक नहीं मन में आया तो लिख दिए । बाक़ी माँ दुर्गा आप सबके घरों को खुशियों से भर दें । माँ से यह भी प्रार्थना है कि उनके रूप को दर्शाने वाली इन छोटी छोटी कन्याओं को एक उज्वल भविष्य दें, उतनी क्षमता दें कि इन्हें किसी के सहारे ना बैठना पड़े । 
जय माता दी 
धीरज झा 

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