बड़े झा साहब, कष्ट से मुक्त हुए दो साल होगये आज

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बड़े झा साहब, कष्ट से मुक्त हुए दो साल होगये आज

 

 

“भईया कोनो उपाए बताऊ, पप्पा के मियाज खास क के मंगले के ख़राब होई अ ।”

“भाई हम मौसा के जन्मपत्री देखले रहली अ, हुनकर मंगल नीच है ।”

“त  एकर कोनो उपाय होए त कहू ?”

“मौसा से त हम सिखले अछि, उनका लेल हम कोण उपाय बताऊ ।”

“लेकिन आजुक समय में ऊ सक्षम कहाँ छथ, अब त अहिं के करके होएत । आहां के छोड़ के अओरो केकरो पर भरोसा न है हमरा के ।”

“ठीक है जे आहां कहि अछि त एक काम करू बिहान मंगलो है आ संजोग से दुर्गोअष्टमी भी है । बड़ा उत्तम संजोग बन रहल है । कल मंगल बीज मन्त्र के पाठ क के साथै हवन क लेब सब गोटा मिल के । ई हुनका कष्ट से मुक्ति दिला देत ।”

“जी उत्तम है । कल समय से आजयेब अहाँ ।”

 

हर तरह के इलाज के बात जब इंसान थक जाता है तब उसे भगवान दीखते हैं । मगर इधर तो रोज़ भगवान का ही सहारा था । लेकिन ये पाठ और हवन पिता जी के स्वस्थ के लिए भगवान से अंतिम गुहार थी । अगले दिन भईया आये । उस से पहले पापा को अपने हाथों से खिचड़ी खिलाई थी । दो महीने से जगी आँखें पिछली रात तो हद से ज्यादा बेचैन भी थीं । वो छटपटाहट देख कर तीन बजे रात को दिवार में सर पटक पटक कर रोया था, भगवान को ये कहते हुए कि पापा को अब इस दर्द से मुक्ति दिला दो (दर्द से मुक्त करने से मेरा अभिप्राय उन्हें ठीक कर देने से था) । खिचड़ी खाने के बाद ऑंखें बंद होने लगी मानों बहुत नींद आ रही हो । माँ मुंह साफ़ की उनका, हम लोग करवट बदलवा दिए । लगा जैसे कई रातों की नींद आज अचानक से पाकों पर स्वर हो गयी हो । मुंह से निकलने वाली हर बात आधी मुंह में ही रह जा रही थी उनकी । हम संतुष्ट थे कि आज खाना भी खाए हैं और अब नींद भी आरही है ।

 

आज नवरात्री व्रत का आखरी दिन भी था । बिना नमक और एक समय फलोहार के साथ आठ दिनों के ये व्रत अन्दर से कितना तोड़ देते हैं आप सब जानते ही हैं । ऊपर से पापा के स्वस्थ की चिंता जो हम चारों में बंटने के बाद भी सबके लिए अन्य परेशानियों के भार से कहीं ज़्यादा थी । इन सबके साथ आज पैर उठाये नहीं उठ रहे थे मगर करना था, पिता थे मेरे, वो इंसान जिसने कभी चेहरे पर मायूसी नहीं आने दी उसके लिए आज पूरी ताक़त लगा कर भगवान से गुहार लगा देनी थी । भईया आगये थे तब तक, संकल्प दिला कर सबने पाठ  शुरू किया, लगातार घंटों बैठने के बाद बड़े मन से पाठ और हवन किया । मन से प्रार्थना की ईश्वर के आगे । माँ ने पापा को प्रशाद खिलाया । नशे जैसी नींद की हालत में भी प्रशाद माथे से लगा कर बड़े प्यार से मुंह में रख लिए ।

 

 

मेरा शरीर अब जवाब दे चूका था । मैं चुप चाप जा कर अपने कमरे में लेट गया । दो  मिनट भी शायद ही लगे हों मुझे गहरी नींद में जाने में । वो आखरी नींद थी जो पूरी थी । ऐसा लग रहा था पापा सर के पास बैठे सर सहला रहे हैं । वो अक्सर अपना प्यार तभी बरसाया करते थे जब मैं सोया होता था । पापा का सर पर हाथ फेरना जैसे सारे बदन की थकान को चूस रहा था । भले ही अहसास ही था मगर बहुत अच्छा था । तभी तो तीन घंटे सोया रह गया ।

 

मगर किसे पता था कि वो तीन घंटे तक सोते रह जाना मेरे मन का वो नासूर बन जाएगी जो तब तब टीस मारेगी जब जब पापा पापा याद आयेंगे । पांच पंद्रह पर छोटा भाई मुझे अपनी बची खुची ताक़त से उठा रहा था । जब आँख खुली तो पहली नज़र उसके सहमे हुए चेहरे पर गयी । उसके चेहरे पर साफ़ लिखा था कि कोई अनहोनी हो गयी है ।

 

“पापा वो पापा, पता नहीं क्या होगया ।” आवाज़ निकल ही नहीं रही थी उसके गले से, बहुत मुश्किल था एक बेटे का दुसरे बेटे को ये बताना कि अब हम बिना पिता के हो गए हैं, अब उनका हाथ जो हमारे सर पर बना रहता था वो बेजान होगया है ।

 

वो डॉक्टर को बुलाने के लिए भगा और मैं पापा को देखने । कमरे के बाहर भीड़ लगी हुई थी अन्दर माँ पापा के सिरहाने बैठी उन्हें पुकार रही थीं । देखते ही मालूम चल रहा था कि पापा अपनी पीड़ा से मुक्त हो गए हैं । शरीर पीला पड़ चूका था । मगर उम्मीद कहाँ मरी थी हमारी, पैर सहलाते रहे, रो रो कर बुलाते रहे लेकिन वो चले गए थे । अपने शरीर से, अपनी पीड़ा से, हमसे, सबसे नाता तोड़ कर ।

 

 

ये अकस्मात नहीं था, शायद सोचा समझा था । आज उन्होंने अपने संकल्प को पूरा किया था । वो संकल्प जो शायद हर वो पिता जो अपनी संतान से प्रेम करता है, उसकी हर तरह से रक्षा के लिए हमेशा तैयार रहता है, तब लेता है जब वो अपनी संतान को बचा पाने का कोई और रास्ता नहीं ढूंढ पाता । तब वो ना किसी के आगे हाथ फ़ैलाने में संकोच करता है, ना रोने चिलाने ने में, और ना अपनी जान के बदले अपनी औलाद की जान बचने में । पापा ने भी कहाँ संकोच किया था जब भाई बीमार था तब, भगवान के सामने अंजुली में जल ले कर बिना सोचे समझे कह गए थे “हे कृष्ण, 35 वर्षों से तेरी सेवा में हूँ । तूने जो दिया उसे अपना भाग्य मान कर माथे से लगाया मगर आज मुंह खोलूँगा । आज मुझे मेरा बेटा वापिस दे दे, और मैं इसका मूल्य चूका रहा हूँ, मेरे बेटे की जान के बदले मेरा सारा धर्म मेरी बची हुई आयु सब ले ले ।” इतना कह कर अंजुली का जल संकल्पित कर दिया था ।

 

खुद से देखा है, भाई वेंटिलेटर भेजा जाने वाला था और अचानक से उसकी हालत में एकाएक सुधर आगया । हम सब भगवान को धन्यवाद देते नहीं थक रहे थे मगर किसे पता था वो भगवान से की प्रार्थना का नहीं अपितु एक पिता के आजीवन कमाए धर्म का फल है । महीने दो महीने में भाई मौत के मुह से हँसता खेलता बाहर आगया और इधर वो खड़ा हुआ इधर पापा ने बिस्तर पकड़ लिया । आरंभिक जीवन से ही अपनी परेशानियों से बिना हारे लड़ते चले आरहे उस इंसान ने आज संतान के लिए ज़िन्दगी के आगे घुटने टेक दिए थे ।

 

मुझे बहुत समझाया गया कि मैं ना रोऊँ, क्योंकि मैं बड़ा हूँ, झूठा ही सही मगर मुस्कुराते रहने की सलाह दी गयी, जिससे सबको हौंसला मिले । मानी ये भी सलाह मानी सबकी मगर वो जो उनके चले जाने की पीड़ा है ना वो हर समय निचोड़ती है दिल को, मैं उस निचुड़न में से गरने वाले आंसुओं को जमा करता रहता हूँ और जब मैं इस तरह भर आता हूँ कि साँस भी ना ले पाऊं तब किसी दिन सारा दर्द इन शब्दों में पिरो देता हूँ ।

 

आज अष्टमी है, दो साल से व्रत नहीं कर पापा क्योंकि पापा की बरसी इसी बीच आती है, कर्म करना होता है । आज दो साल होगये उन्हें गए हुए । इन दो महीनों के बीच मैं ऑन दिस डे वाला फंक्शन भी डरते डरते खोलता हूँ कि कहीं उन मनहूस दिनों कि कोई झलक ना दिख जाये । मगर कहाँ तक भागेंगे इस सच से कि वो अब नहीं हैं, हर साल वो रुलाने आयेंगे, किसी के लाख समझाने के बाद भी हम सब रोयेंगे छुप छुप कर, बहाने से उनकी बातें करेंगे, झूठ मूठ का कहेंगे कि अब फर्क नहीं, मगर सच यही है कि पड़ता है पापा हमेशा पड़ता है और हमेशा पड़ता रहेगा । छोटी छोटी यादों के बहाने से, आपकी हाथों को अपने सर पर ना महसूस कर पाने पर, आपकी मुस्कराहट, आपके गुस्से आपके रौब को सामने से ना देख पाने पर फर्क पड़ेगा और पड़ता रहना चाहिए ।

 

‘बड़े झा साहब’ आप कोई ऐसे वैसे नहीं थे जो गए और आपको भुला दिया । आपका वो रुतबा है जो तब तक झलकेगा जब तक हम सलामत हैं । आज आपकी दूसरी पुण्यतिथि पर कुछ यादों और गीले शब्दों के माध्यम से हम सबका प्रणाम आप तक पहुंचा रहा हूँ । स्वीकार करियेगा और हो सके तो समय निकल कर सपने बता जियेगा प्रणाम पहुंचा या नहीं । जहाँ रहें खुश रहें स्वस्थ रहें मुस्कुराते रहें ।

 

 

 

धीरज झा

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