फ़ासला सुकून भर का (कहानी बातों बातों में)

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” खाना भी नही खानो दोगी तुम ? तरस खाओ मुझ पर | सारा दिन बिज़नस की टेंशन लो, तुम लोगों के लिए कोल्हू का बैल बने रहो और जब कुछ पल चैन के जीने घर आओ तो तुम्हारी किचकिच सुनो । आदमी ही हूँ यार मशीन नहीं |”
 
” हाँ हाँ मै ही सब करती हूं, तुम दूध के धुले हो | पैसा जीने के लिए कमाया जाता है, पैसा कमाने के लिए नहीं जिया जाता राघव । हम सब ही नहीं रहेंगे तो इस पैसे को ले कर चाटना तुम । याद भी है तुम्हें कि आखरी बार बच्चों और मेरे साथ कब तुमने अच्छा समय बिताया था ? ऐसा ही रहा तो मै बता देती हूं….” बात पूरी भी नही हुई थी शिवानी की तब तक राघव ने कार की चाबी उठाई और बाहर आ गया | मगर वो कार में ना बैठ कर पैदल ही निकल गया । कहाँ ये उसे भी नहीं मालूम था ।
 
कॉलोनी के आखिर मे चौकीदार का क्वाटर था । अन्दर से आरहीं कुछ कुछ आवाज़ें सुन कर राघव के कदम अपने आप रुक गए | शायद चौंकीदार और उसकी बीवी की थीं आवाज़ें |
 
” खाना नही खाई तुम ?”
 
” आपके बिना पहले कब खाए जो आज खाते |”
 
” तुम ना पागली हो | इतना नही किया करो बिमार हो जाओगी |”
 
” आप हैं ना आपको देखते सब ठीक हो जाता है |”
 
फिर कुछ देर आवाज़ नही आई । शायद चौकीदार नो अपनी बीवी को गले लगा लिया था । राघव सोच रहा था” शायद मेरी अमीरी और इनकी गरीबी को बीच सुकून भर का ही फासला है |”
 
राघव ने फ़ोन निकला और शिवानी का नंबर दयाल किया ।
 
उधर से शिवानी ने फ़ोन उठाया मगर कुछ बोली नहीं, शायद अपनी सिसकियों को दबाने की कोशिश कर रही थी । कुछ पल में खुद को सम्भालते हुए शिवानी ने भर्राए हुए गले से कहा “हाँ ।”
 
“आई एम सॉरी शिवानी, आई एम रियली सॉरी । तुम सही कहती हो मैं तुम सबके ही कमाता हूँ और तुम सबको ही भूल जाता हूँ । अब ऐसा नहीं होगा । प्लीज़ मुझे लास्ट टाईम माफ़ कर दो ।” शिवानी के आँखों की नमी अब राघव के शब्दों में झलक रही थी ।
 
“तुम पागल हो एक दम । ऐसे कोई रोता है बच्चों जैसे । अब घर आ जाओ खाना खाते हैं ।”
 
“नहीं मैं यहाँ कॉलोनी के मेन गेट पर खड़ा हूँ तुम बच्चों को ले कर आजाओ आज कहीं बहार खाने चलते हैं । जो घर में खाना बना है वो गौरी को दे देना ।”
 
उधर से शिवानी ने फ़ोन उठाया मगर कुछ बोली नहीं, शायद अपनी सिसकियों को दबाने की कोशिश कर रही थी । कुछ पल में खुद को सम्भालते हुए शिवानी ने भर्राए हुए गले से कहा “हाँ ।”रानी हुई जब राघव किसी बड़े होटल की बजाए उन्हें एक पंजाबी ढाबे में ले गया । शिवानी राघव को देख कर मुस्कुराई क्यों कि शिवानी को ढाबे का खाना बहुत पसंद था और इसी लिए राघव आज सालों बाद उसे यहाँ ले कर आया था । सबने खाना खाया, खूब मस्ती की और देर रात को घर पहुंचे ।
 
आज कितने दिनों बाद शिवानी राघव से वैसे ही लिपट कर सोई थी जैसे अपने प्यार के दिनों में थक जाने पर राघव से लिपट जाया करती थी । राघव उसके सर को सहला रहा था । उसके चेहरे पर आज सालों बाद इतनी सुकून भरी मुस्कराहट थी । आज जब उसने शिवानी को खिलखिलाते देखा तब उसे ऐसा महसूस हुआ था जैसे किसी बच्चे को कई दिनों बाद अचानक से उसका खोया हुआ सबसे प्यारा खिलौना मिल गया हो । राघव मन ही मन सोच रहा था कि वो कितना बेवकूफ़ था जो इतने कीमती पलों को खुद की ज़िन्दगी से दूर करता जा रहा था । यही सब सोचते सोचते उसे कब नींद आगयी पता ही नहीं चला । आज अरसे बाद वो इतनी सुकून भरी नींद सोया था ।
 
 
अगले दिन ऑफिस जाते हुए
 
चौकीदार ने गेट खोलते हुए राघव को गुड मार्निंग विश की । राघव ने भी मुस्कुरा कर जवाब दिया और गाड़ी आगे बाधा ली मगर कुछ सोच कर उसने गाड़ी बैक की ।
 
“घनश्याम इधर सुनो ज़रा ।” राघव ने गाड़ी का कांच नीचे कर के चौकीदार को आवाज़ दी ।
 
“जी साहब ।” चौकीदार जल्दी से राघव के पास पहुंचा
 
“आज तुम्हारा और तुम्हारे परिवार का खाना हमारे यहाँ है । शायद नौ बजे तुम लोग खाना खाते हो तो मैं साढ़े आठ तुम लोगों को लेने आजाऊंगा । ठीक है ।” घनश्याम को कुछ समझ ही नहीं आरहा था कि ये सब अचानक से क्यों ? क्योंकि बहुत बार हुआ है कि कालोनी के किसी साहब ने उसे कुछ बचा खुचा दिया, कोई ज़्यादा खुश हुआ तो कुछ टिप दे दी मगर ऐसे किसी ने अपने घर खाने पर नहीं बुलाया । इसीलिए राघव से ये सुन कर घनश्याम विश्वास ही नहीं कर पा रहा था कि ये सच है ।
 
“अरे भाई कहाँ खो गए ? तैयार रहना मैं साढ़े आठ आऊंगा । अब बहाना मत बनाना कि तुम भूल गए । अच्छा अब मैं चलता हूँ ।”
 
घनश्याम बस अपने आंसुओं को रोक कर हल्का सा मुस्कुरा पाया था । घनश्याम को क्या पता था कि उसने अंजाने में राघव के परिवार की खुशियाँ लौटा दी हैं ।
 
धीरज झा…
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