हम गलत थे बिटिया (कहानी)

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#हम_गलत_थे_बिटिया (कहानी)

 

 

“बाऊ जी हमको और पढ़ना है । हमको बाहार जा लेने दीजिए ।” दस दिन से मुंह फुलाओं के बाद आज आखिर नेहा अपने पिता रघुनाथ जी के आगे बोल ही पड़ी ।

 

रघुनाथ जी अपनी इकलौती बिटिया से प्रेम तो बहुत करते थे मगर आज कल के माहौल को देखते हुए डरते थे उसे बाहर भेजने से । मगर आज बेटी के इस तरह आग्रह करने पर पांच गाँव के सरपंचों पर अपना दबदबा रखने वाले रघुनाथ जी पिघल गए । बड़े द्रवित स्वर में बोले “बिटिया तुम्हारा कौन सा फरमाईस रहा है जवन हम पूरा नहीं किये ? तुम जो मांगी वो हम तुमको दिए । तुमको इंटर भी जिला के सबसे टॉप इस्कूल से कराये काहे कि बात अपने जिला तक का था । हमको इसके लिए भी लोग सब का बात सुनना पड़ा मगर हम नया बदलाव चाहते हैं इसीलिए अपना घर से ही पहली बार कौनो बेटी को जिला तक पढने भेजे परन्तु अब बात जिला का नहीं है बिटिया ।”

 

“बाऊ जी  हम जानते हैं आप अपने रिस्क पर हमको इंटर तक पढाये हैं मगर जो आप बदलाव लाने का पहल छेड़े हैं उसे रुकने मत दीजिए । आपके ही दिए हुए हिम्मत का तो नतीजा है कि हम और आगे पढने का कुछ अच्छा बनने  का हिम्मत जुटा पाए हैं ।” नेहा ने पिता को भावुक देख एक बार फिर से गुहार लगायी ।

 

“बिटिया बात ऊ नहीं है, हमको दिक्कत तुम्हारे पढ़ने से नहीं है । हमको डर है तो तुम्हारे अकेले इतनी दूर जाने से है । आज कल माहौल बहुत ख़राब है । बात जिला का हो तो सरे जिले में कोई ऐसा पैदा नहीं हुआ जो तुमको कुछ कह जाए मगर बात दूर शहर का है अगर भगवन ना करे…..।” इससे आगे बोलने की रघुनाथ जी की हिम्मत ना हुई  ।

 

“बाऊ जी  आप व्यर्थ चिंता करते हैं ऐसा कुछ नहीं होगा । और इसी डर से अगर सब जीने लगे तो फिर पढ़ लीं गाँव देहात की बेटियां । मान जाइये ना बाऊ जी  ।”

 

बेटी के बार बार कहने पर रघुनाथ जी मन ही मन सोचे अब इतना किये हो तो आगे के लिए भी तैयार करो खुद को । इतना सोच कर रघुनाथ जी बेटी से बोले “ठीक है….।”

 

“बाऊ जी बाऊ जी हम जानते थे आप मान जायेंगे ।” रघुनाथ जी के ठीक है बोलने की देर थी की नेहा उनसे ख़ुशी के मरे लिपट गयी ।

 

“अरे ठहरो ठहरो, हमारा बात पूरा होने दो । तुमको अगर पढना है तो तुम बनारस विश्वविद्यालय में ही पढ़ोगी । मंजूर हो तो बोलो ।”

 

“मगर वहीं क्यों बाऊ जी ? और भी तो बहुत जगह है ।” नेहा थोडा मायूस होती हुई बोली ।

 

“काहे की बनारस हिंदू वि वि हम सबका दूसरा घर है । तुम्हारे परबाबा मदनमोहन मालवीय और दरभंगा महाराज रामेश्वर सिंह के नेतृत्व में उस कॉलेज को बनवाने के लिए शुरू हुए आन्दोलन में हिस्सा लिए थे । तुम्हारे बाबा ने जिला में सबसे पहले सनातक की पढ़ाई यहीं से पूरी की और उसके बाद हम भी तो वहीं से पढ़े हैं । अब तुम भी वहीँ से पढ़ोगी । हमारे परिवार में जब भी बदलाव का शुरुआत हुआ है तो वहीँ से हुआ है ।” रघुनाथ जी बेटी को अपने परिवार का इतिहास सुनते हुए गर्व से दो सेर ज़्यादा फूल गए ।

 

 

“बाऊ जी , ये भला क्या बात हुई कि सब वहां से पढ़े तो हमको भी वहीँ से पढ़ना होगा । पढाई भी तो अच्छी होनी चाहिए ना ।” नेहा ने रघुनाथ जी की बात से असहमति जताते हुए कहा ।

 

“बिटिया तुम आज के बच्चे भला क्या जानों बनारस विश्विद्यालय की महानता । अच्छा क्या तुम आइंस्टाईन को जानती हो ?”

 

“बाऊ जी उन्हें भला कौन नहीं जानता । उनका दिमाग दुनिया में सबसे तेज़ माना जाता है ।” नेहा ने उत्सुकता से जवाब दिया और नेहा का जवाब सुन कर पिता जी मुस्कुराए ।

 

“बिटिया, वही सबसे तेज़ दिमाग वाला मालवीय जी को पात्र लिखा कर इच्छा जताया था कि वो वहां पढ़ाने के इच्छुक हैं । मगर जब उनका पत्र आया उन दिनों मालवीय जी कहीं बाहर गए हुए थे इसलिए उनको ये पत्र मिला ही नहीं और जब मिला तब तक आइंस्टाईन बाबू अमरीका में बस चुके थे ।” रघुनाथ जी ने ऐसी ही म्हणता की कई बातें नेहा को बतायीं जिन्हें सुन कर नेहा को बड़ा आश्चर्य हुआ और साथ ही साथ उसका मन भी बदलने लगा । वो अब बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में पढ़ने का मन बनाने लगी ।

 

नेहा ने प्रवेश परीक्षा पास कर ली और उसने हिंदी से सनातक कर के लेखन क्षेत्र में जाने का मन बना लिया । नेहा को कॉलेज में प्रवेश मिल गया था, वो बहुत खुश थी । रघुनाथ बाबू भी अब बेफ़िक्र थे क्योंकि अब उनकी बेटी बनारस हिंदू  विश्वविद्यालय की छात्रा थी, वही जगह जो रघुनाथ जी के लिए घर जैसी हुआ करती थी । अब भी तो उनका दोस्त रामपबितर वहां के एक एम एल ए का पी ए है । सरकार अपनी है तो डर काहे का है भला अब । कुछ साल की बात है, बिटिया अपनी पढ़ाई पूरी पर लेगी । यही सब सोच कर रघुनाथ जी अपना मन बहला लेते । मगर एक भय तो हमेशा उनके मन में बना ही रहता जिसे वो उजागर ना होने देते ।

 

छः महीने इसी तरह बीत गए । नेहा रोज़ दिन में दो बार फोन कर के दिन भर का सारा हाल समाचार रघुनाथ जी को सुना दिया करती । आज खाने में क्या बना था, आलू की सब्जी में नमक ज़्यादा था, आज मेस में खाने का मन नहीं था तो बहार खाए ये सब वो रघुनाथ जी को बताती । माँ के बाद नेहा का रघुनाथ जी से बहुत लगाव बढ़ गया था और रघुनाथ जी भी तो अपनी ज़मीनदारी और नेतागिरी से वक्त निकल कर नेहा का कितना ख्याल रखते थे ।

 

बीतते दिनों के साथ रघुनाथ जी को यकीन होने लगा कि ऐसी डरने वाली कोई बात नहीं है, सब सही चल रहा है । मगर कहते हैं न कभी कभी खुद से ही खुद को नज़र लग जाती है । रघुनाथ जी के साथ भी ऐसा ही हुआ । एक तो सुबह सुबह देबुआ ने भरी बाल्टी दूध की गलती से पलट दी जो अभी अभी वो दूह कर लाया था । भरी बाल्टी दूध का यूँ उलट जाना एक बड़ा अपशगुन माना जाता है और यही सोच कर रघुनाथ बाबू परेशां होगये । हुआ भी ऐसा ही, सारा दिन नेहा का कोई फोन ना आया । रघुनाथ बाबू घर से दुआर के चक्कर लगाते रहे, कभी कुर्सी पर बैठते कभी चारपाई पर लेट जाते, और तो और आज तो दुआर पर लगी मजलिस में भी उनका मन न लगा । हर कर जब शाम को नेहा को फोन लगाये तो फोन बंद बताने लगा ।

 

अब तो रघुनाथ बाबू को जैसे बुरे ख्यालों ने आ घेरा हो । कभी ये ख्याल वर करता उनके दिमाग पर तो कभी वो ख्याल । मन एक दम बेचैन होगया । आठ बजे शाम को नेहा का फोन आया ।

 

“ए बिटिया कहाँ थी ? कोई फोन नहीं की ऊपर से तुम्हारा फोन बंद बता रहा था । सब ठीक तो है न ?” रघुनाथ जी ने सरे सवाल एक बार में ही पूछ डाले । उनकी आवाज़ में बेचैनी झलक रही थी ।

 

नेहा की तरफ से उसकी आवाज़ को छोड़ कर बाक़ी बहुत सी आवाजें आरही थीं । थोड़ी देर खामोश रहने के बाद नेहा बोली “हमारे क्लास की लड़की को कुछ दिन से लड़के तंग कर रहे थे । जब उनके खिलाफ़ शिकायत की तो उल्टा लड़कियों को ही डांट दिया गया । उसी के लिए सब लड़की लोग धरना दी हैं ।” अपनी घबराहट को सँभालते हुए नेहा ने उनसे सारी बात बताई ।

 

 

इतना सुनते ही एक पिता की फ़िक्र गुस्से में बदल गयी, और रघुनाथ जी चिल्लाते हुए बोले “किसी के साथ कुछो होता है तुमको उससे क्या लेना है, तुम वहां से निकलो, अपने होस्टल में जाओ तुम । जादा नेतागिरी झाड़ी तो वापिस ला कर घर पर बैठा देंगे ।” हालांकि यह एक पिता की फ़िक्र थी मगर फिर भी रघुनाथ जी का लहजा कुछ ज़्यादा  उग्र होगया था ।

 

“बाऊ जी हमको लगा आप समझेंगे, मगर आप भी सबकी तरह ही बात कर रहे हैं । सारा कॉलेज यहाँ जमा है और हम यहाँ से चले जाएँ ? कहाँ जायेंगे बाऊ जी ? हमारी दोस्त को नहीं हमको तंग कर रहा था लड़का सब, ये सारा भीड़ हमारे लिए इकट्ठा है बाऊ जी और हम ही भाग जाएँ ।” नेहा की बात सुन कर रघुनाथ जी की चिंता और घुस्सा और तेज़ होगया ।

 

“तुमको तंग कर रहे थे लड़के और तुम हमको बताई भी नहीं । सुनो तुम सामान बंधो हम आरहे हैं, नहीं पढ़ना और तुमको । इसी लिए नहीं भेज रहे थे तुम……।”

 

 

“हम भी इसी लिए ही नहीं बता रहे थे आपको बाऊ जी । हमको पता था कि हम अगर तंग करने की बात बतायेंगे तो आप उल्टा हमको ही वापिस आने को कहोगे । बाऊ जी हम क्या गलती किये हैं समझ नहीं आता । पढने का कुछ बनने का सोचे ये गलती है हमारा कि हम लड़की हैं ये गलती है हमारा कि हम ऐसे देश में जन्मे हैं जहाँ बेटियों के साथ होने वाले दुर्व्यवहार का कारण भी खुद लड़कियों को ही बताया जाता है ? आज सुबह से बिना कुछ खाए पिए यहाँ बैठे हैं केवल अपना एक छोटा सा अधिकार मांगने के लिए मगर वो भी किसी को नहीं मंज़ूर हो रहा बाऊ जी और इसके लिए भी हम ही……” नेहा बोलते बोलते फूट फूट कर रो पड़ी और इसी के साथ उसने फोन काट दिया ।

 

 

उसके बाद रघुनाथ जी फोन लगते रह गए मगर फोन नहीं लगा । अब उनको दुःख हो रहा था नेहा के प्रति अपने रवैये पर ।

 

कुछ मदद का सोच कर वो अपने दोस्त रामपबितर को फोन किये । थोडा हल चल पूछने के बाद रघुनाथ जी अपने दोस्त से पूछे “यार ये बनारस विद्यालय का क्या हाल है ।”

 

आगे से जवाब मिला “हाल का होगा दोस्त, राजनीति गरमाई है । सरकार को बदनाम करने के लिए ई साले सब नया शगूफा खोज निकले हैं । कल से लौंडिया सब का तांडव चल रहा है । उनकी एक मुखिया है साली कहती है की लड़का सब छेड़ा है हम पूछते हैं कि तुमको पता है लड़का सब छेड़ता है तो करने क्या जाती हो उनके पास । सब साला सब का नौटंकी है । ऐसे हाथ में हाथ दल कर घूमेंगी आ कोई कुछ कह देगा तो तुनक जाएँगी ।” रघुनाथ जी उसकी बात सुन कर गुस्से से लाल होगये ।

 

“तोहरा $%^# साला हरामी के औलाद वो हमारी बेटी है । और हम जानते हैं वो कैसी है । हम तुमसे मदद मांगने वाले थे पर तुम साला हरामी निकला रे । अब जब नज़र पड़ गया तब तुम्हारा तंग काट लेंगे । रख साला फोन ।” उधर से रामपबितर जैसे गूंगा ही होगया ।

 

 

अगली दोपहर रघुनाथ जी नेहा के पास थे । उनको देखते ही नेहा उनसे लिपट गयी । रघुनाथ जी नेहा के आगे हाथ बांधे खड़े थे । भर्रायी आवाज़ में बोले “हमको माफ़ कर दो बिटिया । हम दूसरा के गलती की सजा तुमको नहीं दे सकते । तुम लड़ो हम यहीं बैठेंगे तुम्हारे साथ जबतक तुम जीत नहीं जाती ।” नेहा को नया बल मिल गया था । उसे अब किसी की परवाह नहीं थी ।

 

रघुनाथ जी की देखा देखी बाक़ी विद्यार्थियों के अभिभावक भी जुटने लगे और देखते ही देखते बेटियों द्वारा उनके ही सम्मान के लिए छेड़ा आन्दोलन इतना बड़ा बन गया कि प्रशासन को उनके आगे झुकना पड़ा । दोषियों पर कार्यवाही हुई और लड़कियों के लिए सुरक्षा व्यवस्था को बेहतर किया गया ।

 

 

 

धीरज झा

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