बड़ी मुश्किल से साहस जुटा पाई हैं इन्हें अपने तरीके से लड़ने दीजिए

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सुनो, कसम है तुम्हे अपनी मर्दानगी की जो इन लड़कियों के साथ खड़े हुए, कसम है तुम्हे अपनी उस गदरायी जवानी कि जो तब तब तुम्हारे अन्दर ऐंठती है जब जब तुम किसी लड़की को टाईट कपड़ों में देखते हो, तुम उन लड़कियों की भीड़ का हिस्सा नहीं बनोगे । छोड़ दो उन्हें अपने हाल पर, बड़ी मुश्किल से इन छोटे शहरों और गाँव जबार की बच्चियों में इतना साहस आया है । अब तुम इनका साहस अपनी झूठी सहानुभूति से तोड़ना मत ।
 
 
आज तुम उनके साथ खड़े हो जाओगे और कल को तुम्हीं उन्हें देख कर जुलाब लगे आदमी की तरह शक्ल बना कर गले का गमछा ऐंठते हुए “हाय रे करेजा” कह कर उनका मानसिक बलात्कार करोगे । फिर क्या फायदा इस झूठे समर्थन का । वो अपने स्तर पर जितना कर सकती हैं करने दो । तुम सुट्टा और चाय का आनंद लो । अगर तुम्हे जाना ही है तो कसम खा कर जाओ कि तुम आज के बाद कभी उस कोढ़ का हिस्सा नहीं बनोगे जिसने ना जाने कितनी लड़कियों की हिम्मत को अपने ताड़ने भर से तोड़ दिया ।
 
 
बड़ा अफ़सोस होता है ये देख कर कि जब हमें ज़रुरत है देश के सुधार के लिए एक होकर आवाज़ बुलंद करने कि, जब हमें ज़रुरत है देश हित में कुछ नया और अनोखा करने कि, जब इन बच्चों और बच्चियों को ज़रुरत है पूरी मेहनत के साथ देश के भविष्य को उज्वल बनाने के लिए शिक्षा की मशाल की लौ को तेज़ करने की, तब हम उलझे हुए हैं ऐसे मुद्दों के इर्द गिर्द जिन पर लिखते, बोलते हुए शर्म से सर ये सोच कर झुक जाता है कि क्या यही हमारा देश है जिसके सर्वसंपन्न होने के सपने तो देखते हैं मगर यहीं लड़कियों को उनके प्रति होने वाली अभद्रता के लिए इतनी बड़ी मुहीम छेड़ने की पड़ती है ।
 
कई महानुभावों की पोस्ट और कामेंट पढ़े हैं मैंने इस मुद्दे पर, जिन्होंने खुले तौर पर कहा है कि ये महज़ एक साजिश है सरकार और प्रधानमंत्री जी को बदनाम करने की, कॉलेज प्रशाषण पर कीचड़ उछलने की । मैं इस पर बहस नहीं करूँगा क्योंकि मुझे पता है मैं उतना नीचे उतर नहीं पाउँगा और इसी कारण मैं हार जाऊंगा । लेकिन मैं अगर बी एच यू में चल रहे लड़कियों के प्रदर्शन की बात ना भी करूँ तब भी ये मान ही नहीं पाऊंगा कि बाक़ी सब जगह सब सही है । कैसे कह दूँ कि बी एच यू को छोड़ कर हर जगह लड़कियां सुरक्षित हैं । उन्हें ऐसी छेडखानियों या हवस भरी नज़रों का सामना नहीं करना पड़ता ।
 
 
चलिए मैं तो ससुर बकलोल हूँ बकवास करूँगा बेतुका बोलूँगा । मगर अपने एक बेहतरीन उपन्यास के लिए पुरस्कृत हो चुके निलोत्पाल मृणाल सर तो सच्चे है ना, ये सारा प्रकरण दिमाग में आते ही उनकी तकरीबन सप्ताह भर पहले की पोस्ट दिमाग में आगयी जब उन्होंने मुखर्जी नगर दिल्ली में कुछ मनचलों द्वारा एक लड़की को तंग किये जाने के सम्बन्ध में पोस्ट डाली थी और बताया था कि उनके विरोध जताने पर वो उल्टा इन्ही पर तन गए थे । हालाँकि निलोत्पाल सर ने मौका संभल लिया था मगर इससे क्या होता है ? निलोत्पाल सर जैसे लोग कितनों से लड़ेंगे भिड़ेंगे, वो कहाँ कहाँ पहुंचेंगे ? यहाँ तो हर गली चौराहे, हाट बाज़ार, स्कूल कॉलेज का यही हाल है ।
 
 
ये मानसिकता का दोष है, ये उस माहौल का दोष है जहाँ लड़की के साथ छेड़छाड़ को मर्दानगी का नाम दिया जाता है । एक तरह का भ्रम है ये, वो भ्रम जिसमे ऐसी मानसिकता वाला इन्सान यह सोच कर भ्रमित है कि उसके घर तक ये आग नहीं पहुंच सकती । लेकिन उन्हें कौन समझाए कि भाई ज़हरीली गैस जैसी है ऐसी मानसिकता, इसका दायरा बस आपके घर के बाहर तक ही सीमित नहीं है । कौन जाने आप किसी को ताड़ने में व्यस्त रहें और कोई आप जैसा ही आपके घर की इज्ज़त के परखच्चे उड़ने को तैयार हो ।
 
 
विरोध हो ज़रूर हो अपने चरम पर पहुँच कर हो मगर उससे पहले उनका इलाज हो जिनकी जवानी की एंठन वहशियत बन कर उनकी आँखों से बरसती है । जो हंसी मज़ाक या मंचलई के लिए ऐसा करते हैं वो संभल जाएँ कहीं ये मज़ाक कल को आपके पूरे परिवार का मज़ाक ना बना दे ।
 
 
नवरात्रे चल रहे हैं, देवियों ने चंडी रूप धरा है, नमन करिए उन्हें, उनके साथ खड़े रहिए । कुछ ज़्यादा नहीं मांग रहीं वो उल्टा आपकी बहन बेटियों के लिए हिम्मत ही जुटा रही हैं रात दिन लड़ कर । अगर आप साथ तक ना दे पाए तो कल को किसी के साथ की उम्मीद करते हुए भी खुद से ही शर्मिंदा हो जायेंगे ।
 
 
धीरज झा
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