​सड़क किनारे हिंदी माँ (हिंदी दिवस विशेष)

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#सड़क_किनारे_हिंदी_माँ (हिंदी दिवस विशेष)
इतवार का दिन मनाने के लिए हम बाज़ार टहलने (अपनी फटफटिया पर चलने को भी हम टहलना ही कहेंगे क्योंकि यह पैदल चलने वालों से थोड़ा ही धीमा चलती है) निकल पड़े । राशन बिजली पानी यहाँ तक की विसर्जन इत्यादि का बिल भुगतान करने के बाद जेब में जितना बचता है उतने में से चार गीले और एक सूखा गोलप्पा खा कर खुश हो जाने वाले हम आम आदमी बाज़ार कुछ लेने नहीं बस टहलने जाते हैं । हम भी यही सोच कर गुदरी बाजार तरफ निकल पड़े, सोचा कोई अच्छी किताब अगर मिल जाएगी तो अपना गुर्दा गिरवी रख कर खरीद ही लेंगे । भई पढ़ने का शौख़ है हमें और शोख़ के चक्कर में तो बड़े बड़ों की सल्तनतें बिक गयीं तो फिर किडनी भला क्या चीज़ थी । 
हम जैसे लोग बाज़ार सपने खरीदने जाते हैं । साड़ी की दुकान से सबसे महंगी साड़ी को देख उसका माँ के लिए हुबहु उसी साड़ी जैसा सपना खरीद लेते हैं, इसी तरह हर दुकान से गुज़रते हुए कोई ना कोई सपना खरीद ही लेते हैं और इसकी कीमत भी बस दो बूंद सूखे आँसू होते हैं जो आँखों में ही कहीं गुम हो जाते हैं । पहले सपनों को खरीद कर थक जाने के बाद थोड़ी सब्जी तरकारी खरीद कर बाज़ार आने का मक़सद पूरा कर लिया करते थे मगर पिछले दिनों तो टमाटर का सपना भी बीस रूपये किल्लो बिक रहा था । एक दिन तो किसी ठेले पर खड़े यह सोट कर टमाटर को निहार रहे थे कि घर जा कर तरकारी में हू ब हू यही सपना डाल कर सोच लेंगे कि टमाटर डाले हैं । मगर ससुरा ठेले वाला हमारी नियत पहले ही जान गया और टमाटर को काले कपड़े से ढकते हुए बोला “बाबू जी पाँच रूपया लगेगा दो मिनट देखने का ।” हम तो सनसनाते हुए भागे वहाँ से । 
ख़ैर हर बार की तरह इस बार भी हम इतवार मनाने ये सोच कर निकले कि  हिंदी दिवस आने वाला है तो क्यों ना हिंदी की एक दो किताबें खरीद ही ली जाए, फिर चाहे हमारे खज़ाने ही खाली क्यों ना हो जाएं । यही सोच कर हमने अपने साहस को एकत्रित किया और गुदरी बाज़ार की तरफ़ हो लिए । बाज़ार में तरह तरह की मनमोक वस्तुएं जो हमारे देखने के प्रयास मात्र से ही मुंह बना कर इशारों में कह देतीं “आगे निकलो लेखक जी, तुमसे ना हो पाएगा ।” हम भी भुक्षु की तरह डांट फटकार से ही पेट भर कर आगे निल जाते । 
आगे बढ़ते बढ़ते अचानक से हमारी नज़र सड़क के किनारे लगी फेरी पर गयी । जहाँ बोर्ड टंगा था, ‘अपने हिंदुस्तानी होने का कर्तव्य निभाएं, 20 रूपये मात्र में हिंदी को साथ ले जाएं’ हमारे कदम वहीं के वहीं ठिठक गये । कुछ देर उस विज्ञापन को पढ़ने के बाद हमने एक नज़र उन किताबों के बीच दौड़ायी । बड़े ध्यान से देखने के बाद हमें उस ढेर में से दो बूढ़ी आँखें दिखीं जिसका नीचला भाग लंबी प्रतीक्षा के कारण लटक सा गया था । उन आँखों को देखते ही अनुमान लगाया जा सकता था कि ये आँखें एक बहुत लंबे अंतराल से झपकी ही नहीं । 
थोड़ा साहस कर के हम उन आँखों के करीब गये । ज्यों ज्यों हम उसके करीब जा रहे थे त्यों त्यों उन आँखों की चमक बढ़ती जा रही थी । मानों जैसे उन आँखों को जिसका इंतज़ार था वह में ही था । मैं अब उन आँखों के ठीक सामने था, और अब उन आँखों को एक देह मिल गयी थी जो मैने अभी अभी देखी उनके पास जा कर । बूढ़ी सी देह, अनेकों आभूषणों से लदी हुई मगर कपड़े जगह जगह से फटे हुए । चेहरे पर वो उदासीनता जो शायद किसी अपने की मृत्यु से शोकग्रस्त हुए परिवार के मुख भी ना देखने को मिले । कुछ देर एक दूसरे को निहारते रहने के बाद मैने कुछ बोलने का साहस किया ।
“कौन हो अम्मा आप ? यहाँ क्यों बैठी हो ?”
“बेटा बिकने के लिए बैठी हूँ ।” उस बूढ़ी औरत की बात ने मुझे सोच में डाल दिया । 
“अम्मा, ऐसी बात क्यों करती हो, वैसे भी इज़्जतदार लोग फ्रेश पीस खरीदते हैं, वो भी चोरी से । तुम ठहरी बुढ़िया ऊपर से खुली सड़क पर बिकने की बात करती हो । तुम जैसी बुढ़िया के लिए भला कौन अपने सफ़ेद कुर्ते पर दाग़ लगवाएगा ।” हमें कुछ सूझा ही नहीं तो हमने इधर उधर से शब्द इकट्ठे कर के बुढ़िया के फायदे की बात बता दी ।
“मैं खुद से कहाँ आई हूँ बेटा, मुझे तो ये ग़रीब फेरी वाला रद्दी से उठा कर लाया है ।” 
“दिखने में तो तुम भले घर की लगती हो, अपना परिचय तो दो ।” 
“बेटा मैं संस्कृत और संस्कृति की बड़ी बेटी हिंदी हूँ । कहने वाले मुझे मातृभाषा और राजभाषा भी कहते हैं ।” वर्षों से उदासियों के नीचे दबी मुस्कान को अपने अधरों पर सजाते हुए बुढ़िया ने उत्तर दिया । 
“माँ, तुम्हें देख कर धन्य हुआ मैं । तुम मेरे साथ चलो, तुम्हारी जगह यहाँ नहीं है ।” यह जानने के बाद कि वह’ माँ हिंदी’ हैं मैं तुरंत उनके पैरों में गिर कर बोला ।
“नहीं बेटा, मेरी यह दशा बदलने वाली नहीं । तुम हर तरफ मुझे इसी तरह बिकते देखोगे, मैं तो बर एक रूप हूँ मुझ जैसी कितनी हिंदियाँ इसी दशा में जी रही हैं । हमारे नाम का इस्तेमाल कर के लोग अपने घर भर लेते हैं मगर हमें सम्मान से हमेशा वंचित रखा जाता है । मैं इस देश के लोगों के आपस में जुड़े रहने का, एक दूसरे को समझने का माध्यम बनी और फिर मुझे ही नकार दिया गया । विदेश में भले ही कोई बिहारी हो, तमिल,  मलयाली या कोई भी अन्य भाषा बोलने वाला हो मगर वो एक भारतीय और हिंदीभाषी के रूप में ही जाने जाते हैं । मैने ना जाने कितनी भाषाओं को जन्म दिया और आज मैं ही सबसे पीछे की कतार में खड़ी कर दी गयी ।” हिंदी माँ का दर्द उनके शब्दों से लिपट कर मेरा ह्रदय चीर रहा था । 
“नहीं माँ ऐसा ना बोलो, आज भी तुम्हें कितने लोग पढ़ते हैं, सिनेमा की भाषा हिंदी ही है, तुम्हें नया आवरण दे कर नई हिंदी का रूप दिया गया है जो लोगों के बीच बहुत प्रचलित हो रहा है । तुम क्यों अपना मन छोटा करती हो ।” मैने उन्हें हिम्मत देने की बहुत कोशिश की मगर वो बस मुस्कुरा कर रह गयी, ऐसी मुस्कान जो रुदन से भयानक थी । 
“बेटा, कोई बच्ची थोड़े ना हूँ, सदियों लंबा जीवन जिया है और यही सब देखती आ रही हूँ । मुझे पढ़ने वालों की संख्या ज़्यादा है मगर तुम जैसे मेरे कितने पुत्र पुत्रियाँ जो अपने भविष्य को एक तरफ रख कर मेरी सेवा में लगे हो, उनका क्या ? मुझे पढ़ने वालों को आज भी हिंदी की किताब लेने के लिए दस बार सोचना पड़ता है, मेरे कई पुत्र पैसे के अभाव में मृत्यु को प्रिय हो गये, उन्हें मैं क्या जवाब दूँ ? हज़ारों रूपये पार्टियों के नाम पर उड़ा दिये जाते हैं मगर जो बच्चे मेरी सेवा में लगे हैं उनकी किताबों को खरीदना सभी को व्यर्थ लगता है । हर कोई यहाँ निःशुल्क सेवा चाहता है, क्या इससे उनका परिवार चल सकेगा जो मेरी सेवा में दिन रात एक किये जा रहे हैं ? और तुम सिनेमा की बात करते हो तो वो हिंदी में बनाई जाती है क्योंकि बनाने वाले जानते हैं कि यहाँ 60% की आबादी बस अंग्रेजी का चोगा पहने हुए है, अंदर से आत्मा तक उनकी हिंदी है, वो अंग्रेजी के कुछ शब्द बोल कर खुद को पढ़ा लिखा तो बता सकते हैं मगर सिनेमा को अंग्रेजी में पचा नहीं पाएंगे । और नई वाली हिंदी के नाम से बनाए गये मेरे नये आवरण के लिए मैं आभारी हूँ मगर क्या मेरी महत्वता इतनी कम हो गयी कि मुझे अंग्रेजी की झलक देते नये आवरण की ज़रूरत पड़ गयी ? ये सब विचलित करता है बेटा । मेरे चेहरे की झुर्रियाँ चिंता की वो लकीरें हैं जो भविष्य में अपनी परिकल्पना को देख और सोच कर उभर आई हैं ।” अब मैं कुछ कह पाने की हालत में बिल्कुल नहीं था । 
“माँ मैं किस प्रकार से आपकी सहायता कर सकता हूँ ?” हिंदी माँ की बातों में मैं इतना खो गया कि मुझे आभास ही नहीं हुआ कब मैं ‘हम’ से ‘मैं’ पर चला आया । 
हिंदी माँ मुस्कुरा कर मेरे सर पे अपना हाथ रखते हुए बोली “तुम सब कर ही तो रहे हो, अपने भविष्य को दांव पर लगा कर मेरे लिए लड़ रहे हो । मुझे किसी भी तथाकथित सम्मान या किसी पदवी की कोई आवाश्यक्ता नहीं । मुझे नहीं चाहिए कोई मौखिक दर्जा । मुझे बस मेरे बच्चे अपने मन में बसाए रखें इतना ही बहुत है । मुझे अपना वो शुद्ध रूप भी नहीं चाहिए, जिससे जैसा हो पाए वैसे ही मेरा प्रयोग करे, बस मुझे पर वह स्नेह लुटाते रहें जिसकी अभिलाषा हर माँ को अपने बच्चों से होती है । माँ को माँ कहो मम्मी कहो माॅम कहो या अम्मी कहो माँ को कोई फर्क नहीं पड़ता उसे तो अपने बच्चों से स्नेह चाहिए बस । मृत्यु से मुझे डर नहीं लगता मगर इस बात का भय अवश्य है कि मैं अगर मृत्यु को प्राप्त हुई तो मेरे साथ देश की वो सुंदरता भी नाश हो जाएगी जिसकी कल्पना में हम आज तक जीते आए हैं । जिस दिन मैं यहाँ रद्दी के भाव बिकना बंद हो जाऊंगी या फिर मुझे पसंद करने वालों को मेरी सेवा में थोड़ा बहुत व्यय करना व्यर्थ ना लगेगा मैं उस दिन खुद ही इस चिंता और उदासीनता से मुक्त हो जाऊंगी ।” हिंदी माँ की आँखें जिनमें अभी तक उदासियों के काले बादल घिरे थे वो एकदम से बरसने लगीं । मेरी आँखों में इतना पानी जमा हो गया की अब उनकी सूरत धुंधली नज़र आने लगी । 
“ऐ भाई साहब, कुछ लेना है या ऐसे ही खड़े रहोगे ? अब तो फेरी हटाने का टाईम हो गया ।” मैने आँखें पोंछी तो सामने से हिंदी माँ जा चुकी थीं । शायद फेरी वाले ने उन्हें समेट कर बोरों में कस लिया था । 
“ये सभी किताबों का क्या मुल्य लोगे ?” मैने फेरी वाले से पूछा ।
“क्या साहब, मज़ाक करता है क्या ? पाँच हज़ार से कम की ना होंगी सारी किताबें ।” मैने मन में चार बार कहा ‘पाँच हज़ार, पाँच हज़ार, पाँच हज़ार हम्म पाँच हज़ार ।”
“ठीक है मैं कल आऊंगा और सारी किताबें ले जाऊंगा ।”  इतना सुनने के साथ ही फेरी वाला मुझे घोर तपस्या के बाद प्रकट हुए ब्रह्मा जी की तरह आँखें फाड़ कर हैरानी से देखता रहा और  मैं वहाँ से अपनी फटफटिया पर घर की तरफ हो लिया । 

अगले दिन मैं वाकई टहलते हुए ही फेरी वाले के पास पहुंचा । मुझे देख उसकी आँखों ने फिर से फैलना शुरू कर दिया । मैने उसे पाँच हज़ार रुपये दे दिये । 
“साहब मैं बांध देता हेँ सभी किताबें ।” नोट गिनते हुए फेरी वाला बोला । 
“नहीं बांधो मत बस वो तख्ती जहाँ पर तुमने किताबों का दाम लिखा है वहाँ उल्टा कर लिख दो कि ‘हिंदी दिवस पर माँ हिंदी के सम्मान में हिंदी की सभी किताबें आप सब के लिए  निःशुल्क उपलब्ध हैं ।’ और चुपचाप यहाँ बैठ जाओ ।” उसने ऐसा ही किया और देखते ही देखते वो भीड़ जो अभी तक इन किताबों को नज़रअंदाज़ कर के चली जा रही थीं वो अब फेरी वाले के पास जुट गयी । कुछ ही समय में वहाँ एक किताब जो मैने सबसे पहले उठा ली थी उसे छोड़ कर कोई किताब ना बची । 
“इससे आपको क्या फायदा हुआ साहब ।” फेरीवाले ने आश्चर्य से पूछा ।
मैने नम आँखों से मुस्कुराती हिंदी माँ की ओर देखा और खुद भी मुस्कुराते हुए बोला “कुछ नहीं बस यह अनुमान लगाया कि हम अपने स्तर से कितने नीचे खड़े हैं और हमें अभी कितना ऊपर बढ़ना है ।” इतना कह कर मैं माँ हिंदी को अपने हाथों में उठाए वहाँ से चला गया । 
पीछे से फेरीवाले ने पाँच हज़ार को देखते।हुए मन में लेकिन थोड़ा ऊंचा कहा “पागल साला, रद्दी के पाँच हज़ार दे गया ।” 
नोट – यहाँ ‘मैं’ मैं नहीं हूँ, मगर मुझे ये मैं बनना है मुझे ही क्यों हम सबको ये मैं बनना चाहिए । जब हम सब इस मैं की तरह हो गये तब होगा हिंदी का सम्मान और किसी मैं को अपना स्तर जानने के लिए अपनी फटफटिया नहीं बेचनी पड़ेगी ।
हिंदी के सभी सुपुत्र और सुपुत्रियों को हिंदी की हार्दिक शुभकामनाएं और शेष को हैपी हिंदी डे ।
धीरज झा 

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