डर कर चुप मत बैठिए सवाल करिए 

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#डर_कर_चुप_मत_बैठिए_सवाल_करिए 
आज रविवार है, मने फन डे, मज़े करने का दिन । “मम्मी ये बना दो, मम्मी पापा को बोलो ना मूवी ले जाएंगे, मम्मी खेलने जाने दो ना प्लीज़ शाम को होम वर्क कर लूंगा” जैसी फरमाईशों का दिन । और मम्मियाँ पूरा भी करेंगी लेकिन सिर्फ वो मम्मियाँ जिन्होंने उस मासूम की अधकटी लाश नहीं देखी होगी या उसके परिजनों, खास कर उसकी माँ की वो दर्द चीखें नहीं सुनी होंगी । वो सभी माएं जिन्हें इस घटना क्रम की जानकारी मिली होगी वो सब आज अपने बच्चे के किसी सवाल का जवाब नहीं देंगी और बस यही सोच रही होंगी कि मैं अपने बच्चे को स्कूल भेजूं या ना भेजूं । और जब सोमवार आएगा परसो और जब वो अपने बच्चों को स्कूल छोड़ने या स्कूल बस में छोड़ने जाएंगी तो उस बस के ड्राईवर खलासी, स्कूल के अध्यापकों, वहाँ के काम करने वाले लोगों तक में वो एक हत्यारे देख कर सहम जाएंगी । 
 यह वही हत्यारा है जिसके बारे में मैं कहता आरहा हूँ । जिसने मज़ाक समझ लिया है सिस्टम को या उसकी नज़र में ये कोई जुर्म है ही नहीं । बच्चा किसी का भी हो, अगर सामने रोता हुआ दिख जाए तो कोई भी इंसान उससे पूछ लेता है कि “क्यों रो रहे हो ?” मगर ये कैसा हैवान रहा होगा जिसने बच्चे की इतनी निर्ममता से हत्या करते वक्त एक बार भी उसका मासूम सा चेहरा नहीं देखा होगा । ऐसा नहीं कि अपराधी या हत्यारे आज ही पैदा हुए हैं, ऐसा नहीं कि आज से पहले इनका वजूद नहीं था, मगर कुछ वर्षों से इनकी बची खुची संवेदना जो रत्ती बराबर ही थी वो भी मर चुकी है । 
ये अब पहले से ज़्यादा खतरनाक होने के साथ साथ इतने निर्दयी भी हो चुके हैं कि इन्हें अब मासूम बच्चे भी नहीं दिखते । दूसरी तरफ हमें आदत है दुर्घटना के बाद सावधानी बरतने की । उससे पहले जो जैसा है चलने दो । और यही ‘चलने दो’ की आदत ही हमें दुर्घटना के पास पहुंचा देती है । रयान इंटर्नेशनल जैसे स्कूल जहाँ ना जाने कितने प्रद्युम्न पढ़ते हैं वो अभिभावकों से बच्चों को पढ़ाने और जब तक बच्चे जब तक स्कूल में हैं तब तक उनकी सुरक्षा के लिए ना जाने कितने पैसे ठगते होंगे मगर सुरक्षा कैसी है ये इस बात से अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि स्कूल के सी सी टी वी कैमरे खराब हैं इसका ख़याल उन्हें तब आया जब कातिल ने इतनी निर्मम हत्या को अंजाम दे दिया । 
हमारे स्कूल के चपरासी को मुंशी कहते थे सब । कई बार छोटी क्लास का कोई बच्चा बिमार पड़ जाता तो उस क्लास की टीचर मुंशी को ही उसे घर छोड़ आने को कहती । वो मज़े से बच्चे को साईकिल की काठी पर बैठा कर खुद साईकिल को टहलाते हुए चल पड़ते । बच्चे की आधी तबीयत तो उनके साथ घर पहुंते पहुंचते ठीक हो जाती थी । कोई बच्चा छुट्टी के बाद भी स्कूल में छूट गया या किसी के घर वाले लेने नहीं आये तो वो उसे अपने कमरे में बैठा कर कहानियाँ सुनाते । ऐसे बहुत से मुंशी ये अकेले नहीं हैं बहुत से ऐसे मुंशी आज भी हैं जो स्कूल के बच्चों को अपने बच्चों की तरह देखते हैं, उनका ख़याल रखते हैं । मगर कल इनके जैसे सभी मुंशियों का दिल रोया होगा ।
ये भी हत्या ही है वैसी ही हत्या जिसकी चिंता इन दिनों बढ़ती जा रही है मगर इसके प्रति लोग सचेत तब तक नहीं होंगे जब तक ये मैसेज वायरल नहीं होगा कि हत्यारा छोटी पार्टी  और बच्चे के माता पिता बड़ी पार्टी के समर्थक थे इसीलिए उसकी हत्या कर दी गयी । ऐसा होते ही प्रद्युम्न के पक्ष में समर्थन के लिए आवाज़ें उठनी शुरू हो जाएंगी और कहीं हत्यारा पकड़े जाने पर कहीं बड़ी पार्टी का निकला तो फिर कुतर्क आने शुरू हो जाएंगे कि बच्चे के अभिभावकों की ही गलती थी । कहीं ऐसा हुआ तो राजनीति भी रोएगी ये सोच कर कि उसे और ना जाने कहाँ तक गिराया जाएगा । 
मगर आपको इस पर बोलना होगा, अपने बच्चों के स्कूल वालों से पूछना होगा कि उन्होंने आपके बच्चे की सुरक्षा के लिए क्या इंतज़ाम किये हैं । आपको इस डर का सामना करना होगा । अगर अब आप उलझ कर चुप रहे ना तो फिर आपका बच्चा डर से कभी उबर नहीं पाएगा । ऐसा ना हो कि हवा में इतना डर फैल जाए कि बच्चे सहमे हुए ही पैदा हों । 
धीरज झा 

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