विभू सीख चुका था 

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#विभू_सीख_चुका_था (कहानी)
चिड़ीयों की चहचआहट के साथ ही प्रकृति किसी नवयौवना के समान एक मादक अंगड़ाई के साथ अपने सजल नयन खोलती है जिससे पेड़ों की पत्तियाँ और हरी घास ओस की बूंदों से सज जाती है । ठंडी ठंडी बह रही हवा ऐसी प्रतीत होती है मानों जैसे दासियाँ किसी राजकुमारी के सिरहाने उसके उठने से पहले चंवर डुला रही हों और राज कुमारी के केशों की तरह प्रकृति के पेड़ पौधे भी हौले हौले डोल रहे हों । 
इतने सुंदर दृश्य में अगर सुगंध ना हो तो श्रृंगार अधूरा सा लगता है । मगर विभू की दादी के रहते भला प्रकृति का श्रृंगार कैसे अधूरा रह सकता है ? विभू की दादी सारे परिवार की आँख खुलने से पहले ही सारे घर और आँगन को अपनी धूप अगरबत्तीयों से सुगंधित कर देती थीं । 
सुबह सुबह उठ कर वो बड़ी धीरे धीरे अपना सारा काम निपटा कर पूजा पर बैठ जातीं । इधर दादी की पूजा खत्म होते होते विभू भी उठ जाता । उसे पता होता था कि दादी ने उसके लिए माखन मिश्री का प्रशाद रखा होगा । इधर दादी आरती के लिए घंटी उठातीं और उधर विभू की आँख अपने आप खुल जाती । चार साल का नन्हा सा विभू आँख मलते हुए बड़े प्यार से दादी की बगल में दोनो हाथ जोड़ कर बैठ जाता और दादी को पूजा करते हुए चुपचाप देखता रहता । 
आज भी ऐसा ही हुआ था । इधर दादी ने घंटी उठाई और उधर विभू बाबू आँख मलते हुए दादी के पास आ बैठे । मगर आज विभू के चेहरे के भाव बदले हुए थे । ऐसा लग रहा था जैसे कुछ पूछना चाहता हो । बच्चों की सबसे खास बात यही होती है कि वो किसी भी चीज़ को बड़ी ग़ौर से देखते हैं, सीखते हैं और फिर उस काम से संबन्धित ढेर सारे सवाल आपके आगे पटक देते हैं । विभू भी बहुत दिनों से दादी को पूजा करते हुए देख रहा था, हो सकता है उसी से संबन्धित कोई सवाल उसके दिमाग में उपजा हो । 
दादी इस समय वहाँ पड़ी सभी मूर्तियों और भगवान की तस्वीरों पर फल के टुकड़ों और माखन मिश्री का भोग लगा रही थीं । वो फल का एक छोटा सा टुकड़ा उठातीं साथ में थोड़ा माखन मिश्री मिलातीं और छोटी छोटी मूर्तियों के मुख पर सटा कर नीचे रख देतीं । नन्हें विभू की बड़ी बड़ी आँखों के पूरी तरह फैल कर बड़ी हो जाने के कारण उसका मुँह भी खुल गया था । वैसे तो जब से उसकी मम्मी ने उसे यह कह कर डराया है कि “दादी को पूजा करते हुए तंग करने पर भगवान जी उससे गुस्सा हो जाएंगे और फिर उसे फिर कभी माखन मिश्री नहीं मिलेगी” तब से वो कभी दादी को पूजा करते हुए नहीं टोकता मगर आज जो उसके मन में सवाल था उसके आगे उसे शायद माखन मिश्री ना मिलने का डर भी छोटा पड़ गया था । 
“दादी ।” दादी का आँचल खींचते हुए विभू ने दादी को टोका ।
“क्या बात है बेटू ?” अपनी नज़रें मूर्तियों पर टिकाए हुए दादी ने पूछा ।
“दादी भदवान जी तो भोग लगा लही हो पल वो तो खा ही नहीं लहे ?” ना जाने नन्हें से मन में ये प्रश्न कब से दबा हुआ था जो आज बड़ी हिम्मत के बाद बाहर आया । विभू के प्रश्न ने दादी को उसकी तरफ देखने पर मजबूर कर दिया ।
दादी मुस्कुराईं और बोलीं “बेटू, खाते हैं ना । नहीं खाते तो भला हम क्यों भोग लगाते ?” 
“पल दादी वो खाते हुए तो दखते ही नई । उनोने मुं तो खोला ही नईं ।” बड़ी सच्चाई और मासूमियत छुपी हुई थी नन्हें विभू के इस प्रश्न में ।
दादी की मुस्कान और गहरी हो गयी और वो इसी मुस्कान के साथ बोलीं “भगवान जी खाते हैं थोड़ा इंतज़ार करो देखना वो खायेंगे ।” 
“नई दादी मैं लोज देखता हूँ पल मुझे वो पलशाद खाते नई दिखते ।” दादी भोग लगा चुकी थीं और अब वो मुस्कुराते हुए विभू की बातें सुन रही थीं । जितना सुकून उन्हें पूजा में नहीं मिला उससे ज़्यादा सुकून उन्हें विभू के सवालों को सुन कर आ रहा था । कुछ देर तक दादी चुप रहीं और फिर थोड़ी ही देर में एक चूहा कहीं ना कहीं से निकल कर आया और फल का एक टुकड़ा ले भागा उसके कुछ पल बाद ही कुछ चींटियाँ आईं और माखन मिश्री के प्रशाद पर लिपट गयीं । 
“देखा तुमने वो भगवान प्रशाद खा रहे हैं ।” दादी ने चुहे और चींटियों की तरफ इशारा करते हुए विभू से कहा । 
दादी की बात सुन कर विभू हैरान हो कर बोला “दादी वो तो चींटी औल चूहा है, वो कोई भदवान थोले ना है ?” 
दादी ने विभू को गोद में बैठाते हुए कहा “बेटू, भगवान उन सब चीज़ों मे हैं जो उन्होंने बनाई हैं । हम में भी हैं, इन चिंटियों में भी और उस चूहे में भी । हम जो भी अच्छा बुरा करते हैं वो सब भगवान देखते रहते हैं । हम जो खाते हैं उससे भगवान जी संतुष्ट होते हैं । अब हम तो इंसान हैं, हम अपने भोजन के लिए पैसे कमाते हैं मेहनत करते हैं । मगर ये जीव जन्तु किड़े मकौड़े इनमें भी तो भगवान हैं ना तो इनका पेट कैसे भरे इसी लिए हम प्रशाद चढ़ाते हैं, चिड़ियों को दाना डालते हैं, जो इंसान अपाहिज हैं खुद से कमा नहीं सकते उन्हें भोजन देते हैं । जिससे उनका पेट भरे और उनके द्वारा वो भोजन भगवान तक पहुंच सके ।” दादी ने बड़ी सहजता से विभू को समझाया । 
दादी को अब उसके सवालों का जवाब देने में मज़ा आ रहा था । दादी ने विभू के हाथ में माखन मिश्री वाली कटोरी थमाई और उसे खड़ा कर के खुद भी उठ खड़ी हुईं । अब दोनों बाहर बाहर आ गये जहाँ दादी ने तुलसी को जल चढ़ाया और फिर घर के सामने बड़े से पीपल में जल चढ़ाने लगीं ।

“ओह, ऐशी बात है । मगल दादी अब यहाँ पेल में पानी क्यों डाल लही हैं आप ?” ऐसा लग रहा था जैसे विभू दादी की बात समझ रहा हो मगर साथ ही साथ उसके दिमाग में और भी सवाल आ रहे थे । 
“क्योंकि मैं पीपल में पानी डालूंगी तो उनको भी उनका भोजन मिलेगा । गार्डन के पौधों में तो लो पानी डालते हैं क्योंकि उनसे घर की सुंदरता बनी रहेगी मगर पीपल के पेड़ में ऐसे कोई पानी नहीं डालता इसलिए हम लोग उन्हें देवता मान कर जल डालते हैं जिससे उन्हें भी उनका भोजन मिले ।” 
“मगल दादी इशशे भदवान जी को क्या फायदा ?” ये भी पते का सवाल था । 
दादी अब बाहर बरामदे में आगयी थीं जहाँ उन्होंने अपना जल चढ़ाने वाला लोटा एक तरफ रखा और वहीं बाहर छोटे से चबूतरे पर विभू को गोद में ले कर बैठ गयीं । किचन से आवाज़ें आने लगी थीं । मतलब विभू की मम्मी को पता चल गया था कि माजी की पूजा खत्म हो गयी है इसीलिए वो चाय बनाने लगी थीं । 
दादी ने विभू को माखन खिलाते हुए कहा “जब तुम खुश होते हो तो पापा मम्मी और मैं खुश होते हैं ना ?” दाली ने विभू से पूछा ।
मक्खन को दादी की ऊंगलियों से चाटते हुए विभू ने हूं में सर हिलाया ।
“और जब कभी बाबू बिमार हो जाता है तो हम सब परेशान हो जाते हैं ना ? बस इसी तरह हम सबको भगवान जी ने बनाया है और जब उनके बच्चे खुश होते हैं तो वो भी खुश होते हैं । और जब उनका कोई बच्चा यानी हम उनके किसी दूसरे बच्चे को किसी तरह खुश करता है, जैसे कि किसी की मदद कर के तब भगवान जी अपने उस बच्चे पर बहुत सारा प्यार लुटाते हैं । जैसे हम सब तुम पर ।” इतना कह कर दादी ने विभू के पेट में गुदगुदी कर दी और विभू खिलखिला कर हंसने लगा । 
उसके बाद विभू हमेशा कुछ ना कुछ ले जा कर बाहर गली के कुत्तों के आगे डालता, जब कभी धूप तेज़ होती तो वो घर के सामने पीपल में एक गिलास पानी डाल आता, जब कोई कुछ माँगने आता तो वो दादी को कहता दादी उसे खाने को दोगी ना तब दादी मुस्कुरा कर उसके ही हाथों से उन्हें खाना दिलवाती । छोटी सी घटना ने विभू में आस्था या भगवान के प्रति नेह जगाया या नहीं जगाया मगर उसे एक बात समझा दी कि किसी को कुछ देने में सुख मिलता है । 
धीरज झा 

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