​#अमृता_की_सबसे_बेहतरीन_रचना_थे_इमरोज़ 

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#अमृता_की_सबसे_बेहतरीन_रचना_थे_इमरोज़ 

“इश्क फले तो फले ऐसा 

कि सदियों तक फलता जाए

इश्क जले तो जले ऐसा

ज़िदगी के बाद भी ज़िंदगियाँ महकाए”

 लोग ज़िंदगी जीते हैं और फिर उस बीती ज़िंदगी में से किस्से छांटते हैं मगर अमृता जी को पढ़ कर उन्हें महसूस कर के ऐसा लगता है जैसे उन्होंने किस्से लिखने के लिए ही ज़िंदगी को जिया । सब जानते हैं कि जब साहिर अमृता से मिलने आते थे तब उनकी लगातार सुलगने वाली सिगरटों की ज़िंदगी आधी हुआ करती थी और इधर अमृता उन अधजली सिगरेटों को समेट कर अपने पास संभाल लेती थीं, जिन्हें वो अकेले में सुलगा कर अपनी ऊंगलियों के बीच फंसाती और ये महसूस करतीं कि जैसे वो साहिर के हाथों को छू रही हैं । ये किस्सा उनके लिए लिखे हर लेख में आपको मिल जाएगा क्योंकि ऐसे किस्सों के सिवा और अमृता के जीवन में था ही क्या ? मगर इस किस्से ने एक ऐसे किस्से को जन्म दिया जिसे जानते तो सब हैं मगर उस पर ज़्यादा ग़ौर कभी किया नहीं गया ।
जानते हैं जब अमृता साहिर द्वारा फेंकी गयीं उन अधजली सिगरेटों को संभाल कर रखती थीं ना तब उन सिगरेटों में चिंगारी ज़िंदा रह जाती थी । वो एक ऐसी चिंगारी होती जो दिखने में तो बुझी हुई लगती मगर उसके अंदर इतनी आग होती कि चाहे उससे आप दुनिया जला लो । मगर इतनी आग समेट कर भी वो शांत रहतीं सिर्फ ऐसे दिन के इंतज़ार में जब उन्हें अमृता द्वारा सुलगाया जाये और वो अपने अंदर की आग समेटे धुआँ बन कर अमृता के दिल में अपनी जगह बना सकें । 
बंटवारे के बाद अमृता जब दिल्ली की हो गयीं और साहिर साहब को बंबई ने अपने होनहार बेटे के रूप में गोद ले लिया तब इन सिगरेटों के भीतर की उस चिंगारी ने अमृता के भीतर खुद को जलाना शुरू किया और देखते ही देखते ये चिंगारियाँ अमृता के मन में धधकती वो मीठी आँच बन गयीं जिस पर साहिर का प्रेम धीरे धीरे पकने लगा और लज़ीज़ होने लगा । प्रेम लज़ीज़ होता जा रहा था और साथ ही साथ उसकी खुशबू भी हर जगह फैल रही थी । सब इस खुशबू से बेखबर थे और धीरे धीरे इस पक रहे प्रेम की खुशबू ने जन्म दिया उसे जिसने अमृता के साथ साथ प्रेम को भी अमर कर दिया । 
“इमरोज़” अपने नाम के मुताबिक़ ही थे, आज को जीने वाले । ना बीते कल की फिक्र थी ना आने वाले कल का डर बस हर दिन आज के दिन को, खुद को, प्रेम को जीते थे । अमृता को नियती की तरफ़ से मिले चंद तोहफ़ों में सबसे नायाब तोहफ़ा थे इमरोज़ । वह शख़्स जिसने अमृता से मिलने के दिन से अपनी उनके ज़िंगी को अलविदा कह जाने के दिन तक एक बार भी साथ नहीं छोड़ा, पूरे 41 साल साथ साथ बिता दिये बिना किसी वाद विवाद बिना किसी मतभेद या मनमुठाव के, उस शख़्स को तोहफ़ा ही कहा जा सकता है । 
आज के दौर में नारिवाद का झूठा झंडा फहराने वाली कुछ महिलाएं और युवतियाँ अपने प्रेम और प्रेम के अधिकार की बात आते ही मुँह छुपा कर रो लेती हैं और फिर मजबूरियों का बहाना बना कर सामने वाले से हर रिश्ता तोड़ अपने रास्ते निकल जाती हैं मगर उस दौर में जब मोहब्बत आज से भी ज़्यादा संगीन जुर्म था, जब औरत को बोलने तक का अधिकार नहीं दिया जाता था उस दौर में अमृता जी ने विरोध किया हर तरह की जातिय, धार्मिक, सामाजिक हर तरह की कुरितियों का और सिर्फ मौखिक विरोध ही नहीं बल्कि उन कुरितियों से लड़ी भीं और उन पर जीत हासिल की । और यही वो वक्त था जब अमृता और इमरोज़ ने एक ही घर में एक ही छत के नीचे बिना विवाह के रहने का फैसला किया । यह फैसला लेने के लिए अमृता को मजबूती दी इमरोज़ के चरित्रवान व्यक्तित्व ने । 
अमृता तपस्या समान थीं और इमरोज़ वह तपस्वी जो सारी उम्र अमृता का ध्यान करते रहे बिना किसी फल की लालसा में । अमृता ने एक ऐसे पाक इश्क की रचना कर डाली थी जिसने अमृता को अमर बना दिया । इमरोज़ अच्छे से जानते थे कि साहिर का ख़्याल अमृता के मन से मरते दम तक नहीं जाएगा, जैसे वो अमृता को चाहते हैं शायद उससे कहीं ज़्यादा अमृता साहिर को चाहती हैं । मगर फिर भी वह हमेशा अमृता के साथ रहे एक ही घर में बिना शादी के बिना हवस के सिर्फ और सिर्फ अमृता की खुश्बू के सहारे सिर्फ अमृता के साथ के सहारे । हर रात एक बजे नींद से उठ कर अपने लिखने में मग्न अमृता को चाय देनी हो या उनके बिमार होने पर उनकी नित्य कृया से उन्हें भोजन कराने तक का हर काम इमरोज़ ने किया सिर्फ और सिर्फ अपने उस प्रेम के लिए जो हामने रहते हुए भी एक सपने जैसा था । 
इमरोज़ इंसान ही थे, उनके मन में भी इच्छाएं उठती होंगी, अपने प्रेम की पा लेने की उसे अपना बना लेने की मगर वो अपनी सभी इच्छाओं को मुस्कुराते हुए मार कर अपने दिल के किसी कोने में दफ़ना देते होंगे । क्या आप महसूस कर सकते हैं उस तड़प को ? क्या आप महसूस कर सकते हैं उस जलन को जो इमरोज़ सहते होंगे तब तब जब जब अमृता की आँखों ने साहिर के नाम का पैग़ाम आँसुओं के रूप में बहाया होगा, जब जब अमृता ने अपना और साहिर का कोई किस्सा सुनाया होगा ? नहीं हममें से कोई महसूस नहीं कर सकता क्योंकि उन्होंने अपनी उस तड़प और उस जलन को अपनी मुस्कुराहटों से बाहर आने ही नहीं दिया । 
अमृता कहती थीं साहिर उसकी दीवारें हैं और इमरोज़ उसकी छत मगर इमरोज़ ने कैसे छत होते हुए उन्हें और उनकी दीवारों को 41 सालों तक बचाया होगा ? क्या कुछ ना सहा होगा उस छत ने मगर हमेशा खड़ा रहा सिर्फ इसी सहारे कि जब अमृता बिस्तर पर लेटेंगी तो मुझे एक बार ज़रूर निहारेंगी । एक ही घर में दो अलग अलग कमरों में रहे । कभी एक दूसरे का वो स्पर्श ना जाना जिस स्पर्श को हम संपूर्ण प्रेम मानते हैं और इसके बावजूद भी वे वह प्रेम कर गये जो शायद ही कोई कर पाये । 
ये सच है कि अमृता शुरू से लड़ती आई हैं, कुरितियों से, समाज से, अपने ही घर में फैली असमानता से, अपनी आज़ादी के लिए वह अनवरत लड़ती रहीं मगर यह भी सच है कि अगर इमरोज़ ना आते तो वह लड़ते ड़ते थक कर कब का टूट चुकी होतीं । सच में अमृता होना बहुत मुश्किल है मगर इमरोज़ हो जाना शायद असंभव जैसा है । 
आज अमृता प्रीतम के जन्मदिन पर इमरोज़ के बारे में लिखना शायद उनके लिए सबसे बड़ा उपहार होगा । उस कलम की देवी को मेरा कोटि कोटि नमन जिसने अनेकों शाब्दिक रचनाओं के साथ साथ एक जीवित प्रेम और अद्भुत प्रेमी को भी रचा । साहिर के लिए जो प्रेम अमृता के मन में चिंगारी बन कर जलता रहा उसी के धुएं की खुशबू ने इमरोज़ जैसे सच्चे साथी, सच्चे प्रेमी, एक पिता, एक सलाहकार को जन्म दिया । एक प्रणाम उस इमरोज़ को भी जो  प्रेम को सबसे बेहतरीन तरीके से समझ और जी पाया । 
नोट – जिन्होंने अमृता को पढ़ा हो इमरोज़ को समझा हो वो ही पोस्ट पर पधारें क्योंकि अल्पज्ञानियों ने ही सीता माँ को रावण के द्वारा अपहरण किये जाने पर तरह तरह के लांछन लगा कर अग्नि परिक्षा से धरती में समा जाने तक की वेदनाएं सहने पर विवष किया था और एसे ही अल्पज्ञानी द्रौपदी की विवषता को समझे बिना उनके चरित्र पर तरह तरह के सवाल खड़े करते हैं । इसलिए बिना जाने बिना समझे पोस्ट पर ना कूदा जाए, इससे प्रेम दब जाएगा । 
धीरज झा 

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