ठेले पर भगवान 

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#ठेले_पर_भगवान 
“कौन हो भाई ? और ऐसे रो काहे रहे हो ?” गमछा में मुँह लपेटे एक बुजुर्ग को बिलखता देख हम उनसे पूछ बैठे ।
“अरे हम ईश्वर हैं मूर्ख ।” आगे से बुजुर्ग झुंझला कर बोला ।
“ईश्वर हो चाहे भगवान अईसे रोब काहे झाड़ रहे बे ? तुम्हारे नाम रखने भर से कौनो ईश्वर नहीं बन जाओगे तुम ।” हम भी तैश में आगये जी । 
“अरे मुर्ख हम सच में ईश्वर ही हैं नहीं यकीन तो ये देखो ।” बुढ़ऊ ने इतना कहते हुए मुँह खोल दिया और मुँह खोलते ही उनके मुख में पूरा ब्रह्माण्ड नाचता दिखने लगा ।
“अईसा चव्वनी छाप जादू बहुत देखे हैं हम । तुम कौनो ड्रामाबाज हो । ईश्वर होते तो पाँच करोड़ चेला चपाटा तुम्हारे आगे पीछे करता रहता जी । हम भारत देश का जनता हूँ हमको फुद्दू ना बनाओ तुम ।” हम कौनो मुर्ख थे कि ऐरे गैरे सबको ईश्वर मान लेते । 
“हाँ तुम तो भारत देश की जनता हो तुमको मुर्ख बनाने का अधिकार हमें भी कहाँ है वो अधिकार तो बाबा और नेता लोग पहिलहीं ले लिए हैं ।” ईश्वर थोड़ो मायूस हो कर बोले ? 
“अच्छा सुनो, अईसे मुंह मत लटकाओ । ई बताओ कोनो रेप वेप किये हो ?” भई हम तो उनकी ही भलाई के लिए पूछे थे मगर ऊ भड़क गये और बोले 
“मूर्ख, क्या बेतुका सा सवाल करता है । हम तुमें श्राप दे देंगे । 
“अरे सराब ! देओ प्रभू देओ । तुम सराब हफीम गाँजा सुलफ़ा कुछो दो । अरे सराब देना था तो पहिले बोलते । हम तुमको भगवान का मोदी जी भी मान लेते ।” हम चहक गये, साला चार दिन से गले से नहीं उतरा था, शराब का नाम सुनते ही मन महो महो हो गया । 
“मूर्ख, शराब नहीं श्राप बोल रहे हैं । ख़ैर जाने दो तुम लोग नहीं समझोगे । तुमको शराब ही सुनेगा ।” किसी खंचड़े बच्चे को समझा समझा कर जैसे मास्टर हार जाता है वैसे ही भगवान हार कर हमें बोले । 
“अच्छा बुढ़ऊ, तुम भगवान हो तो बो कईसे रहे।हो ? यहाँ तो भगवान मंदिर में रहता है । एक दम चुपचाप । चाहे जो मन बोलो चाहे जो मन करो । सब सुनता है सब देखता है चुपचाप ।” हमारे मन में सवाल आया सो हम पूछ दिये । 
“हाहाहाहाहाहा, सही में तुम्हारी कोई गलती नहीं बच्चा, तुमने तो हमको जब देखा है तब या तो मंदिर में देखा है या ठेले या दुकान पर बिकता हुआ देखा है । सामने से तो जो भगवान तुमने बनाया उसे तो सीधा जेल में ही पाया ।” प्रभू की इस बात का मेरे पास कोई जवाब ही नहीं था । 
“अब हमको क्या पता कौन भगवान है कौन नहीं । जो आ कर करतब दिखलाता है उसे हम भगवान मान लेते हैं । कहने को तो आप भी कह ही रहे हो कि हम ईश्वर हैं ।” 
“ससुर ईश्वर तलाश रहे हो कि मदारी, जो करतब दिखलाता है उसे भगवान मान लेते हो । अगर हमें पाना है तो लोगों की मुस्कुराहटों में पाओ, शांत और प्रेम भरे वातावरण में पाओ । हमारा वास प्रेम में है बच्चा किसी तरह के द्वेष में नहीं ।” 
“का बुढ़ऊ ऐसे ही फेंक रहे हो । अभी चार दिन पहिले का तो बात है, हम पड़ोसन माधुरी से प्रेम का इजहार किये और बदले में ईश्वर तो नहीं पर मन भर लात जुत्ता जरूर मिला ।”
“अरे भोले प्रेम मतलब ऐसा छिछोरा प्रेम नहीं, प्रेम का मतलब है सबके प्रति प्रेम का भाव रखना, किसी को कष्ट ना पहुंचाना, सबकी सहायता करना । तुम सब दुःखी हो क्योंकि तुम लोगों का अपने घर में ही प्रेम नहीं बना । मेहनत कम करते।हो पाने की आस ज़्यादा रखते भो और तुम्हारी इसी कमज़ोरी को ये बाबा लोग जान गये।हैं इसीलिए तुमको कुछ दिनों में ही लखपति करोड़पति बनाने का लालच दे कर ठग लेते हैं । जबकि प्रेम तो यहाँ पैसे रूपये में नहीं अपितु दूसरों कि खुशी में मिलता है ।” प्रभू तो बहुते गूढ़ ज्ञान दिये मगर हम ससुर कुछ समझ ही नहीं पाए । 
“अरे बुढ़ऊ तुम्हारा कौनो बात हमारी समझ में नहीं आया । तुम जाओ अपना रास्ता नापो हम चले बाबा जी का परवचन सुनने ।” हमको अब जिसका बात समझ आएगा उसका।ही ना सुनेंगे जी 
“जैसी तुम्हारी इच्छा बच्चा । तुमको देख अंदाज़ा लग गया कि हम मनुष्य को बना कर जो भूल किये वो अब कभी नहीं सुधरने वाला ।” प्रभु मुस्कुराते हुए वहाँ से अंतरध्यान हो गये और हम अपने रास्ते हो लिए । 
बाबा के आश्रम आ कर पता लगा कि बाबा तो हफीम का एस्मग्लिंग में पकड़ा गया । हम भी सोचें कि साला बाबा के आश्रम का चाय इतना कड़ू काहे।होता था । 
ऊधर से एक ठेलावाला जा रहा है, आवाज़ लगाते 
“भगवान लेलो, हर साईज़ का, हर डिज़ाईन का भगवान ।”
मूर्ती सब यंग है मगर चेहरे ईआ मुस्कुराहट वही है, बुढ़ऊ के चेहरे वाला । अब समझे कि वो बुढ़ऊ भगवान ही थे । हम ससुर कहाँ कहाँ नहीं ढूंढे । 
भगवान मन में हंसते हुए बोले, “ससुर तुम ठेला पर भी सिर्फ मुर्तिये देखे हो । हम तो ईहाँ हैं तुमारे मन में, सबके मन में । सबका आदर करो सबको सम्मान दो हम अपने आप सम्मानित हो जाएंगे ।”
मगर हमको तो मन का बात सुना ही नहीं तो हम ठेला पर से एक ठो भगवान ले लिए । मोल भाव कर के ।
भगवान भी मुस्कुरा कर बोले “तुम जैसे जबतक भक्त रहेंगे तब तक या तो ढोंगी बाबा लोख के आश्रम में हमारा नाम बिकेगा या ठेले पर हम । 

धीरज झा 

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