कुछ_बातें_कल्पनाओं_से_उधार_ले_कर

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“एक नया रिश्ता ढूँढा है पापा ने ।” 
“हम्म्म्म्म ।” 
“बस हम्म्म्म्म ?” 
“तो और क्या कहूँ ।” 
“कुछ मत कहो । चुपचाप बैठे रहो ।”
“मेरे कहने से होने भी क्या वाला है । तुमे डर लगता है तो तुम बोलोगी नहीं, मैं बोल भी लूँ तो मेरी कोई सुनेगा नहीं । बताओ क्या करूँ ?”
धड़कनों को छोड़ बाक़ी सब खामोश 
“अच्छा लड़का कैसा है ?” 
“लड़के जैसा है और कैसा होगा ।”
“अरे मतलब करता क्या है ? दिखता कैसा है ?”
“मुंबई में किसी मल्टीनेश्नल कंपनी में अच्छी पोस्ट पर है, देखने तुम्हारे मुकाबले आधे का भी आधा नहीं है । माथा ऊंचा है, दांत बाहर हैं थोड़े, रंग सांवला है ।” 
“तो फिर पापा अपनी लाडली बेटी का रिश्ता ऐसे लड़के से क्यों कर रहे हैं ?” 
“क्योंकि लाखों का पैकेज है, एक घर लखनऊ में है, दो फ्लैट मुंबई में हैं । अच्छी खासी संपत्ती है । दो ही भाई हैं, माँ नहीं है तो सास का भी झंझट खत्म । यही सब वजहें हैं उसे पसंद करने की ।”
“और उसका स्वभाव ?”
“वो मायने नहीं रखता । उनके हिसाब से उनकी लड़की को उन्होंने इतने अच्छे संस्कार दिये हैं कि वो यानी मैं हर तरह एडजेस्ट कर लूंगी, चाहे लड़के का स्वभाव जैसा मर्ज़ी हो ।” 
“वाह रे नारीवादी लड़की । बेसबुक पर पोस्ट करती नहीं थकती और यहाँ समझौता कर रही हो वो भी अपनी ज़िंदगी से ।” 
“फेसबुक से बहुत अलग है असल दुनिया, पापा का दिल नहीं दुःखा सकती ।” 
“और मेरे दिल का क्या ?” 
फिर से सन्नाटा 
“खैर मुझे तो आदत है सहने की मगर तुमें एक नसीहत देना चाहूँगा । मेरे बारे में भले घर में कुछ मत बताओ, मगर अपनी खुशियों और आज़ादी से समझौता मत करना । पापा के कहे मुताबिक ही शादी करनी है तो उनसे कहना कि तुम खुद लड़के से मिलना चाहती हो जांच परख के शादी करना । वरना क्या फायदा होगा इस प्रेम को बलि चढ़ाने का । इससे तो आगे चल कर वो पिता भी खुश नहीं रह पाएंगे जिनके लिए तुम इतना बड़ा बलिदान कर रही हो ।”
“पता नहीं कहाँ से इतनी हिम्मत लाते हो । ये सब बोलते हुए अंदर से टूट रहे हो मगर चेहरे पर वो टूटने का दर्द ज़रा भी नहीं झलकने दे रहे ।”
“दर्द झलका के फायदा भी क्या । मैं कुछ और कर भी तो नहीं सकता तुम्हारी मर्ज़ी के बिना ।”
“कर सकते हो ना ।”
“क्या ?” 
“पापा को कनविंस कर सकते हो ।” 
“हुंह, यहीं हे दिल से दिल की तार जोड़ कर ना ।”
“नहीं कल शाम चाय पर ।”
“क्या ?”
“हम्म्म्म पापा को बता दिया कल बुलाये हैं ।”
“तो पागल इतना ड्रामा क्यों ?”
“अच्छा लगता है देख कर ना कि किसी की आँखों में तो मुझे खोने का डर झलकता है । मेरे कुछ तो मायने हैं ।”
शाम की गोद में सूरज ढल रहा था, नमिता ने अभय को अपनी बाहों में समेट लिया । सूरज कल फिर से अपने नये सवेरे के बारे में सोचने लगा, अभय कल की शाम जो उसके जीवन का नया सवेरा लेकर आएगी उसके बारे में सोच कर मुस्कुरा उठा । 
धीरज झा  

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