डूबेगा_बिहार_तभी_तो_धन_आयेगा_अपार

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कल भारत की आज़ादी की 71वीं वर्षगाँठ मनाई गयी । 70 साल पूरे हुये हमें आज़ाद हुये । पूरे देश में इसे ले कर जश्न कि माहौल था । देश के हर कोने से लोगों ने इस जश्न को मनाते हुए अपनी रंग बिरंगी तस्वीरें सोशल मीडिया पर शेयर कीं । सभी तस्वीरें अपने गौरव का गान सुना रही थीं मगर इन सभी तस्वीरों में एक तरह की कुछ तस्वीरों ने लोगों को बहुत प्रभावित किया । एक स्कूल की वो तस्वीर जिसमें एक मास्टर जी और तीन बच्चे तिरंगे को सलामी दे रहे हैं । लोगों को प्रभावित उनकी सलामी नहीं बल्कि उस हालत ने किया जिस हालत में वो तिरंगे को सलामी दे रहे थे । 
तीनों बच्चों की छाती तक और मास्टर जी की कमर तक पानी भरा हुआ था और वो सब इस आपदा को ठेंगा दिखाते हुए अपने देश की आज़ादी के जश्न को मनाने में लगे थे । एक तरफ मैने उस सलामी को लाल किले पर माननीय प्रधानमंत्री जी द्वारा दी गयी सलामी से ज़्यादा महत्वपूर्ण माना तो दूसरी तरफ उनकी इस दशा पर मन रो भी पड़ा । 
इस वक्त असम, बिहार, यू पी के कुछ क्षेत्रों में बाढ़ ने अपना कहर बरसा रखा है । इस बाढ़ से केवल बिहार के 13 जिलों में लगभग 70 लाख लोग प्रभावित हैं जिनमें 72 लोग अपनी जान गंवा चुके हैं । यह स्थिति कोई नयी नहीं है, हाँ इस बार इसका रूप पिछले कुछ सालों के मुकाबले ज़्यादा विकराल है और आप सब तक मिडिया द्वारा यह खबर पहुंचाई जा रही है तब आपको इसका पता लगा मगर मैं इसे बच्चपन से जानता हूँ और अपने पिता और बाबा के माध्यम से तो तब से जब बाबा ही बहुत छोटे थे । 
बिहार के सीतामढ़ी जिले के मेजरगंज थाना में स्थित मेरा गाँव बिसनपुर जो बिहार के बाक़ी गाँवों की तरह बाढ़ से हर साल प्रभावित होता है । यहाँ की बांघमति धार से बनी मनुसमारा नदी हर साल अपने रूप का विस्तार कर लेती है और हर साल यहाँ बना बम्मा पुल टूट जाता है । गाँव का इसके इकलौते बाज़ार मेजरगंज से लगभग संबंध टूट जाता है क्योंकि वहाँ तक पहुंचने का यह इकलौता रास्ता है । बाक़ी रास्ते दस कि.मी घुमा कर आपको बाज़ार वाली सड़क से जोड़ते हैं और वो भी कितनी मशक़तों के बाद । 
यह मेरा एक गाँव है और पूरे बिहार में ऐसे अनगिनत गाँव हैं जो हर साल बाढ़ की मार के कारण दुल्हन से विधवा बन जाते हैं । गाँव वाले जब तक अपने गाँव को पहले की तरह संवारते हैं तब तक दोबारा बाढ़ आ जाती है इन्हें उजाड़ने । 
मैं मानता हूँ बरसात, बाढ़ ये सब प्राकृतिक आपदाएं हैं मगर ऐसा भी नहीं की इनकी रोकथाम नहीं की जा सकती और ऐसा भी नहीं कि इनकी रोकथाम के लिए कोई कदम उठाने की मंजूरी नहीं दी जाती मगर हाँ मंज़ूरी तो दी जाती है मगर कदम उठता नहीं । उस कदम को उठाने के लिए मिलने वाली राशी ना जाने कौन से बस्ते में रखी जाती है।जो फिर दोबारा दिखाई ही नहीं देता । केवल बिहार क्यों पूरा देश ही समय समय पर इस बाढ़ नामक आपदा से प्रभावित होता है मगर इन्हें हर साल अपने मंत्रियों के उड़ रहे हैलीकाॅपटरों के दर्शन के सिवा और कुछ हाथ नहीं लगता । 

ऐसा नहीं कि केंद्र सरकारें इन आपदाओं की रोकथाम के लिए कोई राशि नहीं देती । हाँ मगर वह राशि पूरी तरह से यहाँ तक पहुंचती ही नहीं । जैसा कि गृह मंत्रालय की एक रिपोर्ट का कहना है कि बाढ़ प्रबंधन कार्यक्रम के तहत 2007 से 2017 के बीच 12,243 करोड़ रुपये की 517 परियोजनाओं को मंजूरी दी गई थी मगर इनमें से अब तक केवल 297 परियोजनाएं ही अपनी मंजिल तक पहुंच पाई है और बाकिओं को अगर अब भी पूरा किया जाए तो 13 साल तक का समय लगेगा । समय लग कर भी कुछ बेहतर हो जाए तो भी कोई बात नहीं मगर यहाँ तो राशि ही गायब हो जाती है । 

सीएजी की रिपोर्ट में परियोजनाओं के पूरा होने में लेट-लतीफी की वजह केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा पैसे जारी में देरी करने के साथ-साथ जमीन का अधिग्रहण न होना बताया गया है । 2007 से मार्च, 2016 के बीच केंद्र ने एफएमपी परियोजनाओं के लिए प्रस्तावित 18 हजार करोड़ रु में से केवल 4,723 करोड़ रुपये ही जारी किए हैं । असम में 141 परियोजनाओं के लिए कुल 2,043 करोड़ रु देने की बात कही गई थी लेकिन अभी तक 812 करोड़ रु (करीब 40 फीसदी) ही दिए गए हैं । 
बाढ़ प्रबंधन कार्यक्रम के प्रावधानों के मुताबिक राज्यों द्वारा परियोजनाओं पर खर्च की गई रकम की ऑडिट स्टेटमेंट रिपोर्ट सौंपने पर ही केंद्र द्वारा फंड जारी किया जा सकता है  लेकिन सीएजी के ऑडिट में पाया गया है कि 2007 से मार्च, 2016 के बीच स्टेटमेंट रिपोर्ट न सौंपने के बावजूद छह राज्यों (असम, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, झारखंड, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश) को 2161.79 करोड़ रु जारी कर दिए गए । इनमें से असम को सबसे ज्यादा 814 करोड़ और उत्तर प्रदेश को 402 करोड़ रु जारी किए गए । इसके अलावा पांच राज्यों (असम, बिहार, ओडिशा, उत्तराखंड और पश्चिम बंगाल) ने अब तक कुल मिलाकर 183 करोड़ रुपये के यूटिलाइजेशन सर्टिफिकेट जमा नहीं किए हैं ।
ये रकम जिसका कोई ब्यौरा नहीं बना आखिर वह गयी कहाँ  ? ये सब देखने और इस पर सोचने के बाद एक ही बात आती है दिमाग में कि शायद यह जो गाँव के फूस के छप्परों में रहने वाले अमीर लोग हैं इनका मरना ही सही है क्योंकि यह बाढ़ के नाम से बलि नहीं चढ़ेंगे तो फिर उन गरीबों के घर खुशहाली कैसे आएगी जो, कितनी मेहनत से झूठ बोल बोल कर मंत्री बने हैं, जो कुदरत के बरस रहे कहर का मुआईना कोक पीते हुए हैलीकाॅप्टर में बैठ कर करते हैं, जो दर्द से कराह रहे लोगों की आहों को नज़र अंदाज़ कर सेल्फियों के लिए पोज़ देते नहीं थकते, जिनके लिए आपदाएं सिर्फ एक मुद्दा होती हैं जिसको वो चुनाव के वक्त खूब अच्छे से भुना कर जनता को ठगते हैं । 
अगर देश में कोई आपदा ही ना हो, सब ठीक हो जाए तो भला कौन चुनाव जीतने में करोड़ों खर्च करेगा । तो इन गरीबों के बने रहने के लिए गाँव के अमीरों का डूबते  रहना ज़रूरी है । 
धीरज झा

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