गंगा माई उसके साथ उसके सारे दुःख बहा कर ले गयी 

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#गंगा_माई_उसके_साथ_उसके_सारे_दुःख_बहा_कर_ले_गयी (काल्पनिक कहानी)

नदी के समानांतर चल रही पगडंडियों का पड़ाव उस छोटे से जंगल में थोड़ा ठहर जाता था सुस्ताने के लिए । उसी पड़ाव पर सबसे छुपछुपा कर बैठी सरिता से बिसंभर ने बड़े भारी मन से कहा “ए सरिता, तू तो गंगियां माई हो गयी रे ।” 
“ऐसा काहे कहते हो ?” अपनी मजबूरियों का बांध बना कर सरिता ने आँखों में उमड़ रहे सैलाब को रोकने की कोशिश करते हुए बिसंभर की ओर देख कर पूछा । 
बिसंभर को पता था अगर अब वो कुछ बोला तो उसकी थरथराती ज़ुबान में सरिता उसकी टूटती हुई हिम्मत की गुमसुम आवाज़ को पहचान लेगी । इसीलिए चुपचाप बस सामने धोबी घाट को देखते हुए सरिता के सवाल दोहराने से पहले खुद को मजबूत करने लगा । 
“बोलोगे भी नहीं अब ?” हिम्मत की बांध में छोटा सा छेद बना कर एक आँसू चुपके से पलकों पर से लुढ़कता हुआ उसके उन सूखे होंठों पर फैल गया जो कुछ दिन पहले तक कश्मीर की वादियों से खूबसूरत थे मगर अब रेगिस्तान से बंजर हो गये थे । 
“तुम से ना बोलेंगे तो जाएंगे कहाँ ।” आवाज़ में थरथराहट अभी भी कायम थी । 
“बताओ काहे अईसा कहे ।” 
“नदी को गौर से देखो सरिता, कितनी शांत है ना ? मगर ये शांति बस ऐसे ही नहीं है, ये चिंतन है उस विकराल स्वरूप का जो कुछ दिनों में ये धारन करने वाली है ।  का का नहीं देखी ई, छठ घाट की रौनक से में झलकती खुशी देखी है, गाँव के बच्चों को अपनी गोद में तैरना सिखा कर उनकी आँखों में उमड़ आए उत्तसाह को देखा है इसने, गरीब किसानों को अपना आँचल निचोड़ कर उनके खेतों को जल रूपी जीवन देने के बाद उनकी चेहरे पर उम्मीद भरी मुस्कान देखी है इसने । मगर जब ई बौराती है ना तो इसका मन एक दम से बदल जाता है । फिर ये अपने बगल के खेतों में जलती लाशों को देख कर उठते मातम को भी चुपचाप सुनती है, जब ये बौराती है तो उन खेतों को जिन्हें इसने अपने आँचल को निचोड़ पानी दिया उन्हें पूरी तरह बर्बाद कर देती है, वो बच्चे जो इसकी गोद में तैरना सीखे वो सब इसी की गोद में समा।जाते हैं हमेशा के लिए और ये उफ्फ़ तक नहीं करती । इसका भावुक मन कब निर्मोही हो जाता है पता भी नहीं चलता । इससे सवाल करो तो बेबस हो कर आसमान की तरफ इशारा करते हुए सारा दोष उन बादलों के सर मढ़ देती है ।” अपनी ही आवाज़ की कंपन से बिसंभर का मन थरथर करने लगा था  । सरिता के आँखों पर से हिम्मत का बांध पूरी तरह टूट गया था । वो बस बिसंभर को हुने जा रही थी । 
“तू भी तो इसी की तरह निर्मोही हो गयी सरिता । हमारी खुशी में।हमसे जादा खुस हुई, हमारे हर दर्द को हमसे ज़्यादा महसूस किया, हमारी आँख का आँसू सबसे पहिले तुम्हारी आँख से बहा, हमारे चेहरे की खुशी सबसे पहिले तुम्हारे चेहरे पर झलकी । और आज देख लो तुमको कोई फरक ही नहीं पड़ता, ई भी नहीं सोची कि साला तुम्हारे बाद हम जीयेंगे कईसे । रे कम से कम एक ठो कोसिस तो करती मगर तुम तो किस्मत का लिखा कह कर उसे ही दोसी ठहराते हुए निर्मोही हो गयी रे ।” बिसंभर की आवाज़ कांपते कांपते कब चिल्लाहट में।बदल गयी पता ही नहीं लगा । उसकी चीख़ में इतना दर्द था कि पेड़ पौधे चिड़ई चुनमुन सब दहल गये । 
“कास तुमको समझा पाते हम कि हम कितना तड़प और दर्द महसूस कर रहे हैं । औरत से सब अधिकार छीन कर मर्द सोचता है कि उसके सीने में दिल ही नहीं । जबकि औरत अपना दिल में अपना छोटा बड़ा केतना इच्छा के कतल कर देती है काहै कि उसको बोलने का अधिकार ही नहीं । किसी जनम बेटी बन के आना बिसंभर सारा गलत फहमी दूर हो जाएगा । बाख़ी ई तन तुम्हारा था तुम्हारा रहेगा और ई मन तो हमेशा हे ही तुम्हारे नाम है ।” इतना कह कर सरिता उठ कर अपने रास्ते चली गयी । आज पहली बार था जब बिसंभर ने ना उसे जाने से रोका और ना ही उसे जाते हुए तब तक निहारा जब तक वो मोड़ पर जा कर आँखों से ओझल ना हो गयी । 
बस मन ही मन कह रहा था कि तुम क्या हो और कितना प्यार हमसे करती हो ये तुमसे बेहतर हम जानते हैं मगर फिर भी बार बार तुम्हें कोसते हैं ये सोच कर कि शायद यह कोसना ही तुम में वो हिम्मत जगा दे जो सारी बेड़ियों को तोड़ तुम्हें हमेशा के लिए मेरा होने पर मजबूर कर दे । 
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बिसंभर की पीड़ा शायद आसमान तक को महसूस हुई थी इसलिए वो उसी दिन से बरसने लगा और ऐसा बरसा कि थमने का नाम ही नहीं ले रहा था । इधर बिसंभर के कहे अनुसार नदी जो दो चार दिन पहले तक शांत थी उसने आज अपना विकराल रूप लेना शुरू कर दिया था । बिसंभर की पीड़ा असहनीय थी मगर वो किसी के सामने कमज़ोर नहीं दिखना चाहता था । इधर गाँव को नदी अपने में समाहित करती चली जा रही थी । लोगों के घरों तक गंगा मईया अपना पैर पसार चुकी थीं ।
“रे कोनो लईका डू बरहा है । कोनो बचाओ रे ।” किसी की चीख़ ने बिसंभर को उसकी काली सोच के फंदे से बाहर ला फेंका । बिसंभर दौड़ता हुआ अपने दुआर पर पहुंचा जो अब नदी का घाट बन चुका था । आधे से ज़्यादा गाँव तैरना जानता था मगर इस वक्त नदी के प्रकोप का सामना करने की हिम्मत किसी में ना थी । बिसंभर को अब पीड़ा महसूस नहीं हो रही थी, उसके दिमाग में घर कर बैठी वो काली सोच का भी कहीं अता पता नहीं था, उसे इस समय सिर्फ वो बच्चा दिख रहा था । बिसंभर बिना देर किये कमर में रस्सी बाँध नदी में कूद पड़ा । वो नदी जिसका कोई अंत नहीं दिख रहा था उसके बीचों बीच वो बच्चा बहता हुआ चला आ रहा था ।  
बिना रुके बिसंभर तैरता हुआ बच्चे तक पहुंच गया । बच्चा साहसी था, लड़ना जानता था ज़िंदगी के लिए । बिसंभर ने रस्सी बच्चे की कमर में लपेट लीऔर घाट की तरफ बढ़ने लगा । बिसंभर की देखा देखी लो चार और लोग भी कूद पड़े थे नदी में । वो बच्चे तक पहुंचे बच्चे की कमर में रस्सी बंधी थी, वो ठीक था मगर बिसंभर कहाँ गया ? अभी तो बच्चे के साथ था अभी कहाँ गायब हो गया ?
“बिसंभरा डूब गया ।” 
“सरितवा को पंडुब्बी पकड़ लिया ।” 
पूरे गाँव में दो आवाज़ें एक साथ उठीं । ना एक मिनट आगे ना एक मिनट पीछे । एकदम साथ साथ ही । नदी के एक घाट से एक आवाज़ नदी के दूसरे घाट से दूसरी आवाज़ । एक पल में ये क्या हो गया कोई समझ नहीं पाया ।
वो दर्द, वो पीड़ा, वो प्रेम जो गाँव नहीं समझ पाया उसे गंगा माई ने समझ लिया शायद । बहा ले गयी दोनों के दुःख दर्द को । इधर भिसंभर पहिलहीं अनाथ था । एक दो दोस्तों को छोड़ कोई रोने वाला नहीं था । उधर सरिता बेटी थी । 
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“ऐ सरिता, ऐ उठो । देखो हम हैं । उठ जाओ ।” सरिता का पेट दबाते हुए बिसंभर बेचैन सा हो उठा । 
मुँह से पानी उगलते हुए सरिता की भक्क से आँख खुली ।
“पगलिया, डरा दी थी हमको ।” डर को हटाते हुए खुशी ने बिसंभर के चेहरे पर कब्ज़ा कर लिया । 
“ऐतना जोखिम मरने के लिए उठाये क्या ।” सरिता मुस्कुराते हुए बोली ।
“पागल जईसे काहे कूद गयी ? अगर हम नहीं पहुंचते तो ?” सरिता के कांपते शरीर को बाहों में समेटते हुए बिसंभर बोला ।
“भरोसा अपार था । रास्ता कोई दूसरा था नहीं । वो बच्चा भगवान था, उसके पीछे तुमको कूदते देख हम समझ गये कि हमको क्या करना है । हम जानते थे तुम हमको देख लोगे और चाहे पानी में रहें चाहे आग में मगर जब तक तुमारी बाहों में रहेंगे हमारा आग चाहे पानी कोनो कुछो नहीं बिगाड़ सकता ।” विश्वास उसके चेहरे पर झलक रहा था । 
“पागल हो पूरी । अब जाएंगे कहाँ ?” 
“गाँव छोटा था प्यारे मगर दुनिया बहुते बड़ी है । अब तो तुम्हारे हैं तुम चाहे जहाँ ले चलो ।” बिसंभर ने अपनी बाहों को और ज़ोर से कस लिया ।
दोनों एक लूसरे का हाथ थामे हुए आगे एक अंजान सफर की तरफ़ निकल पड़े । बिसंभर हंस रहा।था यह सोच कर कि इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ होगा कि मंज़िल को साथ ले कर कोई अंजान सफर पर निकल रहा होगा । बिसंभर ने पीछे मुड़ कर देखा गंगा माई अपनी लहरों को उछालती हुई दोनों को आशीर्वाद दे रही थी । बिहंभर ने मन ही मन उन्हें प्रणाम किया और विनती की कि अब अपना प्रकोप कम कर लेना । 
धीरज झा 

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