चाय वाला

#चाय_वाला (काल्पनिक कहानी)
“घंटा होगा देश का, नहीं यार कहीं गया था, नहीं आज भी नहीं मिली नौकरी, हाँ चिट्ठी तो दे दी थी पता नहीं जवाब क्या आता है, यहाँ से मंदिर जाना है, मैं दारू ले कर आता हूँ तुम सब चलो ।” परेशानियों की आँच पर उबल रही ज़िंदगी की तरह ही रामसेवक की चाय उबल रही थी । वैसे तो वो चाय में चायछन्नी घुमाने में मस्त था मगर ये सब बातें जो वहाँ बैठे लोग कर रहे थे ना चाहते हुए भी उसके कानों में पड़ रही थीं । 
बाईपास पर रामसेवक का टी स्टाॅल शहर का सबसे चर्चित टी स्टाॅल था । अब किस्मत कहें या रमसेवका का दिमाग मगर जो भी हो उसका स्टाॅल था बड़ा ठिकाने पर । पास ही सी एम एच काॅलेज था वहाँ के सारे स्टूडेंट कैन्टीन की फीकी चाय पीने हे बढ़िया यहीं की चाय पीना सही समझते थे । इधर जम्मू को जाने वाली आधी खाली बसें यहीं से भरती थीं इसीलिए यात्रियों के इंतज़ार का भी यही ठिकाना था । कुछ शरीफ़ सुट्टेबाज़ सबसे नज़रें बचा कर सुट्टा लगाने शहर से बाहर रामसेवक की दुकान  पर ही आते और सुट्टे संग चाय का वो आनंद उन्हें मिलता जो भरी सभा में श्री कृष्ण का विराट रूप देख अकेले घृतराष्ट्र और विदुर को मिला था । ऊपर से पास के गज़ल ढाबे वाले स्टाॅफ भी यहीं चाय पीते । ट्रक ड्राईवरों का यही अड्डा था । मिला जुला कर रामसेवक की दुकान दुकान नहीं सोने के अंडों का पोल्ट्रीफारम था । 
सिर्फ चाय और सिगरेट बेच कर शाम तक हज़ार पंद्रह सौ से ज़्यादा का गल्ला पुरा लेता था । अफवाह थी कि वो अपनी चाय में हफ़ीम का पानी मिलाता था इसीलिए क्योंकि जिसने एक बार उसकी चाय पी वो फिर और किसी के हाथ की चाय छूना भी पसंद नहीं करता था । वैसे यह मात्र अफ़वाह ही थी क्योंकि रामसेवक के पास इतनी हफ़ीम होती तो वो भला चाय ही बेचता ?
 रोज़ सैंकड़ों लोग उसके यहाँ आते और रोज़ वो हज़ारों बातों को अपने इस कान से उस कान के बीच से गुज़रता महसूस करता मगर उन सब में से कुछ एक बातें ही उसका ध्यान अपनी तरफ़ खींच पातीं बाकि सब तो बस बकचोदियाँ होती थीं । रामसेवक खुद बहुत कम बोलता था, उसे बस सुनने में रुचि थी । सैंकड़ों में से कुछ कुछ ग्राहक उसके पक्के थे जो हर हाल में उसके स्टाॅल पर चाय पीने आते ही आते । 
एक खोखा सा डाल रखा था उसने और आगे बड़ी सी शैड लगा कर कुछ एक मेज लगा रखे थे । हेल्पर के नाम पर एक गूंगे को रख रखा था जो पहले बसों में भीख मांगा करता था पर एक दिन रामसेवक के समझाने पर भीख़ मांगना छोड़ कर उसकी दुकान में नौकरी करने लगा । 
“रामू भाई, एक बटा दो ।” चाय के उबाल को ग़ौर से देखते हुए रामसेवक का ध्यान इस आवाज़ ने तोड़ा। रामसेवक ने सर उठाया और मुस्कुरा कर सर हिला दिया । 
बड़ी अजीब और रहस्यमई ज़िंदगी थी रामसेवक की । कौन था, कहाँ से आया था, जो कमाता था उसका क्या करता था किसी को नहीं पता था । दो साल पहले ही अचानक से ढाबे वाले की ज़मीन पर चाय का ये स्टाॅल लोगों ने देखा और धीरे धीरे भीड़ जुटने लगी । स्टाॅल लगाने के बदले किराया दिया करता था वो ढाबे वाले को । 
उसके पास सारा दिन दो ही काम थे चाय बनाना और लोगों की बातें सुनना । उसे देख कर ऐसा लगता था कि वो चाय के उबाल और लोगों की बातों कुछ तलाश रहा है । अजीब शौख़ था बंदे का  । सारा दिन चाय बेच कर रात को वहीं ढाबे पर सो जाता था । 
“माँ बिमार है यार, उसी परेशानी में आज कल सो नहीं पाता । डाॅक्टर बता रहा है लाखों का खर्चा है । मैं भला इतने कहाँ से लाऊँ ? बहन को कहा तो वो यह कह कर साफ़ मुकर गयी कि वो लोग घर बना रहे सारे पैसे उसी में लग गये हैं । बड़े भाई से मदद माँगी तो वो साफ इन्कार कर गये । सोच रहा हूँ घर बेच दूँ क्योंकि घर फिर ले लूंगा पर माँ फिर नहीं मिलेगी । मैं कोशिश कर सकता हूँ वो कर रहा हूँ  बाक़ी आगे भगवान पर है जो उनकी इच्छा जैसा चाहें करें ।” चाय देते हुए रामसेवक ने बातों की पहली बोहनी इस दुःखद समाचार से की । 
“अरे सुना कल तेरे पिता जी को शेयर बाज़ार में भारी नुक्सान उठाना पड़ा ?” बीस इक्कीस साल के उस दुबले से लड़के ने अपने ही उम्र के लड़के से सिगरेट का दम मारते हुए कहा ।
“घंटा भारी, उनको चार पाँच करोड़ से कोई फर्क नहीं पड़ता । बंदे के पास इतना पैसा है कि दोनों हाथों से लुटाए तब भी कम है । अब देख मैं ट्वैल्थ में फेल हो गया था फिर भी इतने टाॅप काॅलेज में ऐडमीश्न कैसे मिल गया बता । यार सब पैसे का खेल है और मेरा बाप पैसे छापने की मशीन । इसीलिए तो अपन इतना सोचते नहीं । ये ले इसके पैसे कटा देना और एक मोर का पैकेट ले ले ।” चार पाँच करोड़ के नुक्सान को अपने आखरी कश के साथ धुएं में उड़ाते हुए लड़के ने दो हज़ार का नोट सामने वाले लड़के को दिया और मोर का पैकेट जेब में डाल कर अपनी चमचमाती गाड़ी में हवा के संग जा मिला । 
रामसेवक रोज़ इसी जहान में दो तरह की दुनिया देखता था । एक वो जो तंगी  के कारण अपना लहू तक बेच रही है फिर भी कोई हाथ फैला दे तो बेचे हुए खून की रक़म में से भी उसे कुछ ना कुछ दे दें  और दूसरी वो जिसके पास दोनों हाथों से लुटाने पर भी कोई कमी नहीं आने वाली फिर भी किसी की एक कौड़ी की मदद नहीं करना चाहते ।

रामसेवक का टी स्टाॅल मानो जैसे संसार था और यहाँ आने वाले सब लोग अलग अलग तरह की ज़िंदगियाँ । कोई रोती ज़िंदगी, कोई मुस्कुराती ज़िंदगी, चोट खाई ज़िंदगी तो कबीं बेफिक्र ज़िंदगी और राम सेवक मानों भगवान हो जो इन सब ज़िंदगियों को देख कर बस मुस्कुराता था । जैसे कि ये सब नियती का खेल हो और वो बस तमाशा देखने वाला । वो बस इंतज़ार करता था इस बात का कि कौन उसे पहचान ले और उससे मार्ग दर्शन करने को कहे । मगर वो तो सबके लिए एक चायवाला था कोई भला उससे मदद क्यों माँगता ।
रात के साढ़े दस बजे 
“टिंग टाॅग ।” दरवाज़े की घंटी बजती है ।
“आ रहा हूँ ।” अंदर से आवाज़ आती है । 

दरवाज़ा खुलता है । सामने  एक थैला बगल में दबाए रामसेवक हाथ जोड़ कर मुस्कुराता हुआ खड़ा है । 
“रामू भईया ! आप यहाँ ? कैसे आना हुआ ।” सामने वाले ने आश्चर्य से पूछा और उन्हें अंदर ले गया 
“अरे यहाँ बगल में काम था तो सोचे माँ जी का हाल पूछते चलें । कैसी हैं वो ?” कुर्सी पर बैठते हुए रामसेवक ने सामने वाले से पूछा ।  सामने वाला वही था जिसकी बातें रामसेवक ने सुनी थीं । 
“ठीक नहीं हैं भईया । बड़ा परेशान हूँ उन्हीं की वजह से । पिता जी बच्चपन में ही गुज़र गये उसके बाद माँ ने ही बड़ी मेहनत से हम सब को पाला । भाई और बहन तो अच्छी जगह सैट हो गये मगर मैं रह गया । मैं इतना कमा लेता हूँ कि माँ और बीवी बच्चों का पालन अच्छे से कर लूँ इसीलिए कभी अफ़सोस नहीं हुआ कि मैं किसी अच्छी जगह क्यों नहीं हूँ । मगर आज जब माँ को ले कर असहाय सा हो गया हूँ तब अफ़सोस होता है । भाई बहन भी शायद मजबूर हैं इसीलिए पीछे हट गये । मगर मैं तो हर संभव कोशिश करूंगा ।” उसकी आँख में माँ के लिए दर्द छलक पड़ा । 
“डाॅक्टर क्या बोले ?”
“डाॅक्टर ऑप्रेशन का बोल रहे । बीस पच्चीस लाख का खर्चा है ।” 
“माता जी कहाँ हैं ?” 
“अंदर कमरे में ।” 
दो कमरों और एक छोटे से हाॅल वाले उस घर की हालत बता रही थी कि ये किराये का मकान है । किराय के मकान उन सबकी आवाज़ें निकालते हैं जो यहाँ रह कर गये हैं । अपने मकान में बस एक अपनी यादों की आवाज़ गूंजती है । 
हाल के दाहिने तरफ वाले कमरे में एक चौकी लगी थी जिस पर माँ जी लेटी थीं । एक टेबल फैन लगा हुआ था । कमरे की दुर्गंध उनकी बारी का हाल कह रही थी । माँ जी को प्रणाम कर राम सेवक ने वो थैला सामने वाले के हाथ णें पकड़ा दिया । 
“ये क्या है भईया ?” 
“आपने कहा था ना भगवान ही करेंगे जो करेंगे तो समझ लीजिए हमको भी भगवान ही भेजे हैं । अच्छा अब चलते हैं ।” सामने वाला कुछ कहता उससे पहले रामसेवक निकल चुका था । थैला खोला तो उसमें पाँच पाँच सौ के नोट थे । जिसे गिनने पर पता चला पूरे तीस लाख थे । साथ ही एक पर्ची थी जिस पर लिखा था । 
“भगवान ने भेजे हैं, जब कभी जितने भी सक्षम रहो उतनी मदद आगे किसी की कर के भगवान का कर्ज उन्हें लौटा देना ।” सामने वाले को कुछ समझ नहीं आरहा था कि वो हंसे या आश्चर्य करता रहे। बाहर दौड़ा कि जा कर रामसेवक के पैर पकड़ ले मगर रामसेवक तो हवा हो लिये थे । 
अगली सुबह 
“अरे सुना तुमारे घर चोरी हो गयी ?” बी एम डब्लयू बाईक के पीछे बैठे लड़के ने आगे वाले से पूछा ।
“अरे यार उस दिन भी समझाया था तुझे । अपन इतने इतनों की टेंशन नहीं लेते । तीस लाख का चिल्लर था । उससे अपन को क्या फर्क पड़ता है ।” बाईक की रफ़्तार के साथ तीस लाख की फिक्र भी लड़के ने हवा में उड़ा दी । 
जब लड़के सिगरेट और चाय का अलम मारने रामसेवक की दुकान पर पहुंचे तो देखा वहाँ दुकान बंद है और उन्हीं के जैसे रामसेवक की चाय के पाँच दस दिवाने वहाँ बैठे हैं ।
“दुकान क्यों बंद है भाई ?” लड़के ने वहाँ खड़े आदमी से पूछा 
“रामसेवक चला गया इसी लिये ।” 
“चला गया मगर कहाँ ?”
“अब मुझे बता कर थोड़े ना गया है ।”
इन सबकी बातें सुन कर सामने वाला जो रामसेवक का शुक्रिया अदा करने आया था वो मन ही मन मुस्कुराते हुए खुद से ही बोला “शायद मुझ जैसे किसी की बातें सुनने किसी और शहर भेज दिया भगवान ने उसे ।” 
धीरज झा 

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