तीन लाशें 

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#तीन_लाशें (पढ़ना ज़रूरी नहीं पढ़ कर महसूस करना ज़रूरी है )
छः साल हो गये लगभग घर छोड़े हुए ( घर छोड़ने का मतलब लगातार घर पर ना रहने से है) । कभी गाँव कभी पटना के होस्टल में तो कभी जाॅब के लिए बाहर । इस दौरान हर रोज़ घर से फोन आ जाता था और किसी कारण ना आए तो मैं कर लेता था । और अगर कभी ना बात हो पाये (हालांकि ऐसा बहुत कम बार हुआ है ) तो अगले दिन या तो घर से आये फोन की वजह से आँख खुलती थी या मैं आँख खुलते ही घर फोन कर लेता था । पापा जब तक थे तब भी ऐसा ही था पापा के बाद माँ का भी ऐसा ही है । 
याद है मुझे दो साल पहले इन्हीं दिनों की बात है जब मैं गाँव था और बाकि लोग यहाँ पंजाब में थे । बहन की नई नई शादी हुई थी तो ससुराल में पहली राखी थी तो मैं अपने चचेरे भाईयों के साथ गया था । आने जाने के चक्कर में मैं एक दिन बोन नहीं कर पाया । सब अच्छा चल रहा था, बहन को खुश देख कर मैं भी बहुत खुश था मगर अंदर से एक भय एक डर सा महसूस हो रहा था जिसे मैं बार बार दबा रहा था क्योंकि तब ऐसी डरने वाली कोई बात तो थी नहीं । 
बहन के घर से वापिस आया, इधर मन की घबराहट बढ़ती चली जा रही थी । समझ नहीं आ रहा था कि आखिर ऐसा हो क्यों रहा है । तब सोचा कि पापा को फोन लगाया जाए, उनसे बात कर के हमेशा मन शांत हो जाया करता है । 
यही सोच कर पापा का नंबर मिलाया तो काफी देर रिंग होने के बाद भी किसी ने नहीं उठाया जबकि पापा अपना फोन हर समय साथ ही रखते थे कभी दूसरी से तीसरी रिंग नहीं होपे देते थे । मैने फिर फोन मिलाया तो फोन भाई ने उठाया । उसकी हैलो ने मन की घबराहट और तेज़ कर दी । एकदम बुझी सी डरी सहमी हैलो थी उसकी । हाल समाचार पूछने पर पता लगा कि पापा को कल चक्कर आगया था और वो गिर पड़े । 
इतना सुनते ही जो चक्कर उन्हें उस वक्त आया होगा मैं तब महसूस किया और छत की सीढ़ियों पर निढाल सा हो कर बैठ गया । भाई पर भड़कने लगा कि उसने मुझे बताया क्यों नहीं, मैं आ रहा हूँ । तब उसने समझाया कि अब ठीक हैं पापा घबराने वाली बात नहीं । सारी बात जान कर मैने फोन रख दिया । मन स्थिर नहीं हो रहा था, ना जाने बुरे ख़यालों के उस भयावह जंगल में मेरा मन कहाँ तक घूम आया । अगले दिन फोन किया तो भाई बोला कि पापा को बहुत घबराहट हुई और हम यहाँ लोकल हाॅस्पिटल ले आये मगर ये लोग आगे रैफर कर रहे हैं । इतना सुनते ही मैने फोन फैंक दिया, अजीब सा डर गुस्सा घबराहट सबका मिला जुला असर मेरी आँखों और चहरे में साफ दिखने लगा । बिना देरी किये मैं अगले दिन ही पंजाब के लिए निकल गया । 
वो समय जो मैने उस सफर के दौरान काटा वो मेरी ज़िंदगी के सबसे बेचैन पलों में से एक है । उस दिन से ही हमारे परिवार के सबसे भयानक दिनों की शुरुआत हो गयी थी । जालन्धर पहुंचा तो सबसे पहले हास्पिटल गया । वार्ड ब्वाॅय से मिनन्तें कर के पापा को दो मिनट देखने की मंज़ूरी ली । वो रौबदार चेहरे वाला इंसान जिसकी एक झाड़ से हमारी रूह तक कांप जाती थी ये सोच कर कि आज तो शामत आयेगी, वो निसहाय सा उस आई सी यू के बेड पर सुईयों से गुंथा हुआ पड़ा था । एक क्षण के लिए लगा कि अंदर से आत्मा पर कोई तेज़ धार से वार कर रहा है और आत्मा का अंग अंग कट कर शरीर के भीतर ही गिर रहा है । पैर कांपने लगे एक दम आँखें आँसुओं की भीड़ के कारण धुंधली गयीं । 
उस दिन हमने अपने पिता को खो दिया था क्योंकि उसके बाद जो दो महीने के लिए घर आए थे वो पापा नहीं बस एक बुझी हुई उम्मीद थी उनके ठीक हो जाने की । मगर हमने उनकी आखरी सांस तक उस उम्मीद को मरने नहीं दिया । ऐसा लगता था जैसे वो जा रहे हों और हम उन्हें खींच रहे हों अपनी तरफ । हर कोशिश की, हर दरवाज़ा खटखटाया । हम क्या, हर वो औलाद ऐसा करती जिसे अपने माँ बाप से थोड़ा भी लगाव है । 
मैं नहीं कहता कि अपने पिता या अपनी माँ के प्रति समर्पित सिर्फ हम ही थे । बहुत से ऐसे बच्चे हैं जो अपने माता पिता के लिए हर तरह से समर्पित हैं मगर दुःख ये देख कर होता है कि हमारे ही बीच कुछ ऐसी भी औलादें हैं जिनकी संवेदनाओं को लालच के बोछ ने कुचल दिया है । 
आज आशा केदार सहनी नामक एक वृद्ध महिला के बारे में जब अखबार में पढ़ा तो मन का दुःख आँखों तक आते आते गर्म खून सा हो गया । वो बेटा जिसके जन्म पर ढोल बजे होंगे, बधाईयाँ गाई गयी होंगी, मिठाईया बंटी होंगी, जिसको हर दिन बढ़ता देख आशा ताई और उनके पति की उम्मीदें भी बढ़ती रही होंगी, जिसके भविष्य को सुनहरे रंग से पोतने के लिए ना जाने माँ बाप ने अपना क्या कुछ नहीं दांव पर लगाया होगा, ना जाने उसके खूबसूरत सपनों को पूरा करने के लिए कैसे अपने इकलौते बेटे को अमेरिका भेजा होगा, उस बेटे की संवेदनाएं इतनी आसानी से मर गयीं ?कैसे एक साल से कोई फोन नहीं किया होगा उस बेटे  ने अपनी उस अकेली माँ को जिसने आखरी बार बात होने पर यह इच्छा जताई थी कि “उसका अकेले मन नहीं लगता उसे किसी वृद्धाश्रम में भेज दिया जाए ।” 


क्या ज़िमेदारियाँ या काम का बोझ किसी को इतना अपाहिज बना सकता है कि उसके हाथ अपनी बूढ़ी माँ का नंबर तक ना मिला सके, क्या उसकी ज़ुबान इतनी कमज़ोर हो सकती है कि अकेली माँ को झूठा दिलासा ही दे सके, क्या दिमाग इतना सुस्त हो सकता है कि उसे याद ही ना आये कि उसकी माँ ने कितने समय से फोन नहीं किया, वो अकेली थी, घबराई थी, कहीं कुछ हो ही ना गया हो ? 
जब वो किसी काम से मुंबई आता है और यह सोच कर घर की तरफ निकल जाता है कि चलो उन दो फ्लैटस की हालत ही देख लें जो बूढ़ी माँ के ज़िम्मे छोड़े हैं (हाँ ऐसा ही सोचा होगा क्योंकि माँ को मिलने का सोच कर जाता तो माँ को फोन करता ) तब घंटे भर बैल बजाने पर उसे अंदर से खोई जवाब नहीं मिलता । वो पुलिस बुलाता है दरवाज़े की डुप्लीकेट चाबी बनवा कर दरवाज़ा खोलता है तो पाता है कि अंदर तीन लाशें पड़ी हैं जो कई महीनों से पड़े पड़े  कंकाल हो गयी हैं । एक लाश उसकी माँ आशा सहनी की है और बाकी दो लाशें उस बेटे की खुदकी  और आस पड़ोस के लोगों की संवेदनाओं की है जो आशा ताई के साथ ही दम तोड़ कर आठ दस महीने से वहीं सड़ रही हैं । उन लाशों की बू तक किसी के नाक में नहीं पड़ती । 
महसूस कीजिए उस साठ साल से ऊपर की औरत की वो पीड़ा जो उसने अपने आखरी समय में झेली होगी । ना जाने वो कितने दिन से बीमार रही होगी, शायद उसने एक टक दरवाज़े को कई घंटों तक ये सोच कर निहारा होगा कि शायद उसका बेटा या कोई आस पड़ोस वाला ये देखने आजाए कि उस बूढ़ी औरत को कई दिनों से नहीं देखा चलो पता तो करें वो है कैसी । शायद वो इतनी कमज़ोर या बीमार हो गयी होगी कि उससे कुछ खाया तक ना गया जिस कारण पुलिस  कह रही कि इनकी मौत भूख और कमज़ोरी की वजह से हुई होगी । 
आज उनके पाँच करोड़ के दो फ्लैट, उनके बेटे के अकाऊंट में पड़े लाखों डाॅलर सब अपनी बेबसी पर आँसू बहा रहे होंगे । मुंबई महानगर जो हर रोज़ किसी ना किसी कि दुर्दशा पर रोता है वो आज शर्मिंदगी से ज़मीन में गड़ने का सोच रहा होगा । आज मुंबई अपने महानगर होने पर शर्मिंदा होगा उसे छोटे शहर या वो गाँव देहात अपने आगे बड़े लग रहे होंगे । जहाँ दोपहर तक आस पड़ोस वाले किसी कि सूरत ना दिखे तो लोग उनके घर पता लेने चले जाते हैं । मगर यहाँ हर किसी ज़िंदगी इतनी व्यस्त है कि दूसरा मरा या ज़िंदा है इस बात से किसी को फर्क नहीं । यहाँ की धूल और गंदगी की बू ने लोगों के नाक को इतना सुन्न कर दिया है कि किसी लाश की गंध तक इन नाकों को महसूस नहीं हो पाती । 
आज मुझ जैसे कितने ऐसे बच्चे तड़पे होंगे ज़िन्होंने हर संभव कोशिश के बाद भी किसी अपने को खो दिया । आज मातृत्व फिर से किसी कोने में बैठी आँसू बहा रही होगी । वे जिनके मन कठोर हैं उन्हें हाथ जोड़ प्रार्थना है कि ज़्यादा ना सही मगर इतना ज़रूर पिघला लें अपने मन को कि आप किसी अपने की आखरी आवाज़ तो कम से कम सुन पाएं । 
आशा साहनी, ईश्वर से प्रार्थना है कि वो आपकी आत्मा को शांति दें और आपको अगले जन्म में भले ही बांझ रहना पड़े मगर आपकी कोख ऐसी औलाद को फिर से जन्म ना दे । 
धीरज झा

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