अंग्रेज का नाती

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#अंग्रेज_का_नाती (फ्रेंडशिप डे स्पैश्ल कहानी)
पाईप से निकलती पानी की धार सीधे स्कूटर के हेडलाईट के बीचों बीच पड़ रही थी । ना इधर ना उधर, बिल्कुल बीच में । ऐसे जैसे पाईप ब्रजमोहन के हाथ में ना होकर हेडलाईट का निशाना बना कर किसी चीज़ पर टिका दी हो । 
“ऐ ससुर लाईट फोड़ेगा का ? तुम हो ही घर फूकन । एक काम ढंग से नहीं होता तुमसे । एस्कूटर धोने को कहे तो तुम ससुरा खड़े खड़े भारा टारने (किसी काम को जैसे तैसे निपटा देना) लगे । साईकिल का तुम ऊ हाल किये कि उसका स्राध कर दिए अब ई नया एस्कूटर पर एगो चेन्हा (लकीर) लऊका गया तो जान ले लेंगे तुम्हारा । लाओ हमको दो ।” हमेशा की तरह बड़के भईया अपनी आदत के अनुसार फोकट का रौब झाड़ दिये । अब बताओ पानी से भी कोई स्कूटर पर खंरोच पड़ता है ? मगर वो तो बड़के भईया हैं जब तक रौब नहीं झाड़ेंगे तब तक कैसे पता लगेगा कि वो बड़के भईया हैं । 
लेकिन फर्क किस्को पड़ता है । एक तो बिरजू (ब्रजमोहन) बड़के भईया की बात का लोड भी नहीं लेता ऊपर से आज तो वो कहीं और ही उलझा हुआ था । अब सुबह ही माँ सौ रुपईया दी तरकारी लाने को और जनाब अपनी उलझन सुलझाते सुलजाते सौ के नोट को सौ टुकड़ों में भांट दिये । वैसे तो बिरजू माँ की आँख का तारा है मगर लक्ष्मी की बर्बादी का ग्रहन ही ऐसा होता।है कि सब तारे सितारे क्रोध के अंधकार में छुप छुपा जाते हैं और फिर एक माँ नहीं बल्कि एक गृहणी जिसने घर खर्च को पांच हज़ार मांगे तो मिले दो हज़ार और कुछ इधर उधर कर के थोड़े रूपये इकट्ठा किये  का चप्पलास्त्र चलता है जिसका निशाना बनते हैं मासूम बेचारे बेटे ।
मगर आज तो इस चपलास्त्र से भी बिरजू को फर्क कोई ना पड़ा । उलझन तो हमारी आपकी नज़र में छोटी थी मगर उसकी नज़र में उसकी पंद्रह साल की उम्र की सबसे बड़ी उलझन थी । बीस साल के बिरजू ने ऐसी उलझन का सामना पहले कभी ना किया था । 
कुछ समय पहले तक तो सब ठीक था मगर जब से चार दिन आमरण अनशन और हज़ार लात और गाली खाने के बाद नया फोन हाथ में आया तब से लौंडा कुछ कुछ बदलने लगा । हर रोज़ नये मुद्दों के बाद नयी नयी पोस्ट से उस विषय में अलग अलग जानकारियाँ पाने लगा, पहले गोबर जैसा मुंह था मगर अब सेल्फी पोस्ट करने के लिए दिन में चार बार फेयर एंड लभली लगाता है, ऐसे ही बहुत बदलाव आए हैं लौंडे में मगर इस भयानक उलझन की वजह इनमें से कुछ नहीं थी । इस उलझन की वजह थी फेसबुक और व्हाट्स ऐप से मिल रहे मित्रों के फ्रेंडशिप डे के मैसेज । 
पहिले तो लौंडा ये सोच कर खुश हुआ कि किलर बोआए रघुआ, डैडीज प्रिंसेस, विधाऊट क्राऊन प्रिस जैसी चार हजार छः सौ अंठावन हस्तियां उसकी मित्र सूचि में शामिल थीं । जो लाईक के बदले लाईक का धंधा करके अच्छे खासे लाईक और भेरी नाई, जबर, छा गये, एंडलेस जैसे बहुमुल्य कमेंट कमा रही थीं । मगर इन सबके बीच उसे याद आया कि “ससुर हमको तो ई फ्रेंडशिप डे के बारे में पता लगे अभी दो दिन हुआ है और ये सोनुआ तो हमारा तब का यार है।जब हम लंगोट भी नहीं पहनते थे और हम आज तक उसको कभी हैपी फ्रेडसिप डे नही बोले । ऐसे तो ससुर हमारा दोस्ती अभी तक पक्का ही नहीं हुआ ।”
खोआ बनाने के लिए जैसे दूध अऊंटा जाता है उसी तरह ये सारा ख़याल बिरजु के दिमाग में नाॅइस्टाॅप अऊंटता जा रहा था । वो एक भांत और उलझता इससे पहले उसकी पीठ पर किसी ने ज़ोर से धौल जमाई । बिरजु इस अकस्मात हमले से दहल गया और घबरा कर पीछे देखा । पीछे देखने पर उसने पाया कि ये तो सोनुआ है, जो उसे मार कर दांत चिआर रहा है ।
“का ससुर इहाँ काहे बैठे हो बे, बाप तुम्हारा फिर लतियाया क्या तुमको या ऊ रावन की औलाद तुम पर रौब जमाया ?” सोनुआ जानता था कि इन्हीं दो कारणों की वजह से वो इतना मौन होता है ।
“ऊ सब छोड़ो, ई तो ससुर हमरे करम के साथ ही जुड़ा है । तुम सुनो हमारे मन पर बोझ है एक ठो उसको हलका करना है हमको ।” 
“साला पेट हलका करने का बात होता तो हम तुमको अईसा चूरन देते की हड़हड़ा के पैखाना हो जाता तुमको, सारा पेट मिनट में साफ । लेकिन ई मन हलका करने का जुगाड़ तो हम नहीं रखे बाॅस ।” 
“अरे, तुम ससुर मजाक छोड़ो, बस इतना जान लो कि हमको तुमसे कुछो कहना है । ऊ कह देंगे तो मन अपने आप हल्का हो जाएगा ।” सोनुआ के मजाक पर बिरजु ने उसे डांटते हुए कहा और उसकी हथेली अपने हाथों में ले ली । 
“ऐ ऐ बिरजुआ, ऐ सुनो ससुर । हमको काहे लग रहा है कि एके दिन में तुम्हारा कायापलट हो गया है । कल तक तुम साला सिलिया को परपोजियाने का प्लान बनाते थे और अब अचानक हमसे ई मऊगा की तरह बतिया रहे । काहे से तुम्हारा लछन हमको नहीं सही लग रहा ।” सोनुआ बिरजु से अपना हाथ छुड़ा कर ऐसे दो कदम पीछे हुआ जैसे देखते ही देखते बिरजुआ की मुंडी दूसरी तरफ घूम गई हो 
“बड़ी बुरपराछुत हो यार । हम का कहने की कोसिस कर रहे और तुम साला हमको का समझ रहे हो । सुनो हमको तुमसे “हैपी फ्रेंडसिप डे कहना है ।” 
“ई का होता है बे ? हम पूरा जिला घूमे हैं पर इसका नाम नहीं सुने ।” 
“अरे तुम अनपढ़ गंवार कहीं का क्या समझेगा । ई दोस्ती का दिन होता है बकलोल । इस दिन दोस्त को सुभकामना देते हैं । अब हम लोग साला तब से दोस्त है जब एक दूसरा के नुनुआ पकड़ के पेसाप करते थे और हमने कभी तुमने हैपी फ्रेंडसिप डे नहीं बोला । अभी तक हमारा दोस्ती अधूरा था पगलेट । मगर जब तुमको ई बोल देंगे तब पूरा हो जाएगा ।”
“अच्छा, तो तुमको ई परम ज्ञान दिया कौन ? 
“फेसबुक पर पढ़े हैं ।”
“तुमको बोले थे तुम पगला जाओगे फेसबुक चला चला के । हमरी फूआ का बेटा निमेसबा इतना फेसबुक चलाया कि ससुर के दिमागे सुन हो गया । अब सारा दिन खुद से बड़बड़ाता है ।”
“तुम नहीं समझोगे बेटा । तुम्हारे पास न दिमाग है ना ही दिल । हम कल से उलझे हैं अपना दोस्ती को ले के और तुम हमको ही चरा रहा है ।” अभी तक सोनुआ बिरजु की हर बात को मजाक में ले रहा था मगर बिरजु की ये बात उसके दिल पर चोट कर गयी । 
सोनू उस चोट से उठे दर्द को मुस्कुराहट में बदलते हुए बोला “सच कह रहे भाई, हमारे पास दिल कहाँ से । तुम साला अब पढ़ा लिखा हो गया है तुमको पता है कि किसके लिए कोन दिन होता किसके लिए नहीं । पर भाई हम तो इहे जानते।हैं कि हमारे लिए हर दिन दोस्ती का है ।हुबह उठते हैं तो सबसे पहिले तुमको फोन घुमाते हैं । तुम साला जो कह देते हो उहे करने में जुट जाते हैं । तुम हमको हम तुमको भर दिन में केतना गरियाते हैं लेकिन कोनो दूसरा ससुर एक बात भी कह दे एक दूसरा के बारे में तो उसको थूर देते हैं । साला आज तक जब भी बाहर निकले कभी ई कहे हम लोग कि तुम्हारा खर्चा तुम।करो हम अपना हम खुद करेंगे ? नहीं भाई हम दुनो के जेब का पईसा हम दुनो का होता है । तुमको याद है एक बार हम अपना पिता जी के साईकिल का एस्पाॅक तोड़ दिये थे । पहिले तुम हमको बहुत खऊंझाया, खूब हंसा ई कह कर कि “अब लात पड़ेगा जुआन को ।” लेकिन जब हम डर गये बुरी तरह और रोने लगे तो तुम ससुर अपना गोलक तोड़ कर हमको पईसा दिया था । भाई हमारे लिए तो रोजे दोस्ती का दिन, रात भोर दुपहर सब है, दोस्ती हर पल हमारे सीना में धड़कती है, साला ई काट के देखो हमको बरह्म बबा कसम कहते हैं खून की जगह दोस्तिये टपकेगी । जानता है तुम, हमको अपनी दोस्ती को लेकर सबसे जादा डर अभी लगा जब तुम ई फ्रेंडसिप डे चिल्ला रहे थे । तुम हमको गरियाते ही सच्चे लगते हो, हम तुमको चिढ़ा कर ही खुश रहते हैं । हमको साला ई देखाऊस में दम घुटता है । हम अईसहीं ठीक हैं बिना दिल आ दिमाग के ।” 
सोनुआ अपने दर्द को अपने शब्दों में लपेट कर बोलता चला गया और बिरजु उसको चुपचाप एकटक देखता रहा । सोनू बोलते बोलते रो पड़ा और सुनते सुनते सोनू की आँखों का आँसू बिरजू की आँख से भी बहने लगा । बिरजु और सोनू ने कभी एक दूसरे के प्रति अपने प्रेम को उजागर नहीं किया था, करते भी क्यों कभी ज़रूरत ही नहीं पड़ी । पर्दा हो तब ना किसी खास दिन उठाया जाए, जहाँ ससुर थे ही दोनो नंगे तो पर्दा क्या उठाना । 
“तुम साला इमोसनल कर दिये । हमको नहीं पता था कि तुम इतना अच्छा भौंक लेते हो । आओ अब गले लगा लो यार ।” इतना कहते हुए बिरजू सोनू के सीने से जा लगा । 
“अबे छोड़ो यार कोनो देखेगा तो हल्ला हो जाएगा, कहेगा सहरी बिमारी गओंवो में आगया ।” सीने से लग कर सुकून पा लेने के बाद सोनूआ ने एक दम से बिरजू को खुद से अलग करते हुए कहा और फिर दोनो हंस पड़े ।
“चलो रजनीगंधा खिलाओ यार ।” 
“चलो रे खिलाते हैं । पर एक बात बताओ बाकि सब तो ठीक है पर का ई सच में तुमको काटेंगे तो दोस्ती टपकेगा ।” 
“का यार तुम्हों पकड़ कर बईठ जाते हो । इमोसन में निकल गया ।” इस बात पर दोनो ज़ोर झ़ोर से हंसने लगे ।
“अच्छा सुनो !” सोनू बोला 
“का है बे ?”
“हैपी फ्रेडसिप डे ।”सोनुआ ने  मुस्कुरा कर कहा
“इहे कहना था तो भासन काहे पेले इतना । हैपी टू ये आलसो ।” 
“सार अंग्रेज के नाती ।” इसके बाद दोनों के ठहाकों के साथ सुरुज बाबा मुस्कियाते हुए पाताल की गोद में हौले से समागये ।
धीरज झा 

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