​नज़र साफ होगी तो नज़रिया अपने आप बदल जाएगा

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नज़र साफ होगी तो नज़रिया अपने आप बदल जाएगा (काल्पनिक कहानी)
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“सुनिये, ये क्या कर रही हैं आप ? कुछ तो लिहाज कीजिए ये पब्लिक प्लेस है ।” अपने छः महीने के बेटे की मासूम और संतोष से लबालब भरे चेहरे को एकटक देखने में मग्न स्मिता को किसी अंजान आवाज़ ने एक दम से टोका । 
“क्या बात होगयी सर ? मैं तो यहाँ से हिली भी नहीं फिर मैने ऐसा क्या कर दिया जो आप इतना भड़क रहे हैं ?” स्मिता अपनी अंजान गलती को जानने के लिए उस अंजान व्यक्ति से सवाल करती है, जिसकी उम्र यही कोई पैंतालिस पचास के आसपास की होगी । 
“आपको पता ही नहीं कि आप क्या कर रही हैं ? आप जैसी महिलाओं की वजह से ही गलत असर पड़ रहा है समाज पर ।” उस व्यक्ति की नज़रें आवारा हो रही हैं । वो जिधर नहीं देखना चाहता बार बार उसकी नज़र वहीं जा रही है । 
“आप साफ साफ कहिए कहना क्या चाहते हैं ।” स्मिता का रूख भी कड़ा हो गया । 
“ये आप घर में भी कर सकती हैं । यहाँ पार्क में सबके सामने ऐसा करना सही है क्या ? बच्चों से लेकर बूढ़ों तक सब यहाँ मौजूद हैं और आपको घूर भी रहे हैं, इधर आप हैं कि आपको कुछ ।” अब उस व्यक्ति की निगाहें कुछ देर स्मिता की कुर्ती के खुले बटनों में से झांकते आधे स्तन पर टिक जाती है और वो अपनी बात अधूरी छोड़ कर चुप हो जाता है ।
“ओह तो आपको इसलिए दिक्कत है क्योंकि मैं अपने बच्चे को स्तनपान करा रही हूँ ?” स्मिता के होंठों पर गुस्से और दुःख से भरी एक तीखी मुस्कुराहट तैर गयी । 
“मुझ अकेले को नहीं यहाँ हर किसी को दिक्कत है, बस कोई बोलने की हिम्मत नहीं करता । मैं कई दिनों से देख रहा हूँ आप ऐसा ही करती हैं, आज मैं बर्दाश्त नहीं कर पाया इसीलिए आपको टोक दिया ।” व्यक्ति के आवाज़ में ऐसी बुलंदी झलकने लगी जैसी एक वकील की बातों में झलकती है कोर्ट में गुनेहगार का गुनाह साबित कर देने के बाद । 
“आपका घर शायद दो ब्लाॅक छोड़ कर है ? स्मिता ने उस व्यक्ति से सवाल किया जो उनके बातचीत के विषय से एक दम अलग था । 
“हाँ, मगर उससे आपको क्या ? आप बात घुमाईए मत । या तो ये करना बंद कीजिए या फिर यहाँ से…..।” स्मिता ने सवाल से बुरी तरह बौखला गये उस व्यक्ति की बात को बीच में रोक दिया ।
“आपके घर के रास्ते में एक खाली प्लाॅट है ?” 
“हाँ है, मगर….। फिर से बात बीच से कट गयी 
“रोज़ का आना जाना होगा आपका ?” फिर एक सवाल 
“कमाल की औरत हैं आप जब रास्ता ही वही है तो आना जाना होगा….।” फिर से 
“वहीं कुछ दुकाने हैं और एक कबाड़ का गोदाम भी ?” 
“हाँ ।” व्यक्ति इस बार बात कटने के डर से इतना ही बोला 
“वहाँ से गुज़रते हुए आप रोज़ देखते होंगे कि वहाँ के दुकानदार या उस कबाड़ गोदाम में काम करने वाले उस खावी प्लाॅट की दिवार पर पेशाब करते हैं । एकदम खुले में । आपने उन्हें कितनी बार रोका है ?” स्मिता का ये सवाल जो उस व्यक्ति के सामने खड़ा था ये पहले के सवालों के मुकाबले कहीं ज्य़ादा हट्टा कट्टा और मजबूत था । जिसके आगे व्यक्ति के पसीने छूट गये । 
“वो तो…।” उनकी ज़ुबान ने अचानक से कंपकंपी पकड़ ली । 
“वो तो जायज़ है ? है ना ? मगर मैं एक माँ हो कर अपने रोते बच्चे को दूध पिला रही हूँ ये गलत है ? है ना ? यहाँ सब मुझे देखते हैं ? पर क्या जो सब मुझे देखते हैं आपको भी लेकर उन्होंने कभी स्तनपान नहीं किया ? या फिर इसका महत्व नहीं जानते ? मेरी ये छः महीने की बच्ची बड़ी ज़िद्दी है और साथ में समझदार भी । सारा दिन मैं काम में लगी रहती हूँ ये चुप रहती है, दोपहर को मैं सोने लगती हूँ ये भी माँ को आराम मिले ये सोच कर सो जाती है मगर शाम होते ये लगती है क्योंकि इसे बाहर खुली हवा में घूमना होता है । मगर है तो बच्ची ही, नादान सी इसे नहीं पता कि इसकी माँ को सब देख रहे हैं और इसे अभी भूख के कारण चिल्लाना नहीं चाहिए । शायद इसे खुली हवा में दूध पीना अच्छा लगत है । और मैं पागल इसकी भूख और रोने के आगे ये भूल जाती हूँ कि ये पार्क है यहाँ आने जाने वाले लोगों की नज़र उस नये नये लगे खूबसूरत झरने या उन खिले हुए रंगीन फूलों या फिर जिन बच्चों के साथ वो आये हैं उनकी मुस्कुराहटों पर नहीं बल्कि मेरे आधे खुले स्तन जा कर टिक जाती हैं । मुझे ख़याल करना चाहिए उनकी बेकाबू नज़रों का । मुझे ख़याल करना चाहिए उस सभ्यता का जो बच्चे को दूध पिलाती माँ के स्तन को देख कर हिलने लगती है ।” व्यक्ति की ज़ुबान में अब कंपकंपी नहीं, वो अब जम चुकी है ।
” सर, लोग कहते हैं शहर आगे बढ़ गये मगर गाँव अभी भी पिछड़े हैं जबकि मैं गाँवों को ही आगे मानती हूँ । मेरी बाई जो अभी साल भर पहले ही किसी गाँव से आई है, कभी कभी अपने साल भर के बच्चे को अपने साथ ले आती है जब घर में कोई उसे संभालने वाला नहीं होता । जब उसके काम करने के बीच उसका बच्चा रोता है तो वो बिना ये देखे कि कौन वहाँ है कौन नहीं झट से अपने बच्चे को दूध पिलाने लगती है । उसके बच्चे की चिखें शायद उसके लिहाज़ पर भारी पड़ जाती हैं । ये गंवारपना मैने उसी गाँव की देहाती औरत से सीखा है । जानते हैं मैं ये सब आपको क्यों बता रही हूँ क्योंकि मुझे लगता हैं शायद आप इसे समझें और आइंदा किसी और को इसके लिए कभी ना टोकें ।” स्मिता की बात ख़त्म होते ही उसकी बच्ची खिलखिला कर हंस देती है । शायद वो अपनी माँ को शाबाशी दे रही है । और उस व्यक्ति की ज़ुबान इतनी जम चुकी है कि वो चाह कर भी साॅरी नहीं बोल पाता और वहाँ से चला जाता है । इधर स्मिता भी अपनी कुर्ती का बटन बंद करती है और अपनी बच्ची को देख मुस्कुराते हुए अपने घर की तरफ चल देती है । 
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बंदिशें हैं क्योंकि उन्हें आपने लगाया है, अपनी कमज़ोरी छुपाने के लिए । झांकने वालों के लिए पर्दा लगा क्या और हटा क्या, वे तो झांक ही लेंगे और जिनका मन साफ़ है उनके सामने नंगा बदन भी मात्र एक पराई देह है । 
नज़रें साफ़ होंगी तो साहब, नज़रिया अपने आप साफ हो जाएगा । 

आप बदल कर तो देखिए बदलाव तो चल कर आपके घर तक आएगा ।
आईए विश्व स्तनपान सप्ताह मनाएं, कुछ डरी सहमीं नयीं नयीं माँओं का हौंसला बढ़ाएं 
धीरज झा

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