तुम्हें संभलना होगा 

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#तुम्हे_संभलना_होगा (कहानी)
“श्रेयांश तुम समझते क्यों नहीं । मेरी ना का मतलब सिर्फ़ ना ही है ये हाँ में अब कभी नहीं बदलेगा ।” हमेशा की तरह ही इस बार भी इशिका ने बिना दरवाज़ा खोले रोने और चिल्लाने के भाव को एक करते हुए ना चाहते हुए भी ये जवाद दिया था । 
बाहर की तरफ़ से दरवाज़े पर सर पटकता छः फुट का लंबे और गठीले शरीर के साथ काली गहरी आँखों वाला युवक श्रेयांश हमेशा की तरह एक ही बात दोहरा रहा था “इशी ऐसा मत बोलो, हमने एक दूसरे से सारी उम्र एक साथ रहने का वादा किया था ना । प्लीज़ इशी प्लीज़ ।” श्रेयांश के सिसक के रोने की आवाज़ चिल्लाने में बदल गई । 
इशिका हज़ार ग़म सह सकती थी मगर श्रेयांश को रोता नहीं देख सकती थी मगर अब उसने खुद को रोकना सीख लिया था । खुश का दिल पत्थर करते हुए इशिका फिर बोली “हाँ श्रेयांश कहा था मगर मैने नहीं वो तुम्हारी इशिका ने कहा था । तुम्हारी इशिका तो मर गई श्रेयांश, उसे तो चार दरिंदों ने दो महीने पहले ही मार दिया । यह तो बस उसका शरीर है । हमने हमेशा से सुना था कि शरीर मरता है आत्मा हमेशा जीवित रहती है मगर श्रेयांश मेरी तो आत्मा को ही मार दिया गया ना जाने ये शरीर क्यों ज़िदा बचा मेरा । मुझे अब दया की भीख नहीं चाहिए श्रेयांश तुम चले जाओ अपनी ज़िंदगी जीओ ।” 
“मेरी ज़िंदगी तो तुम हो इशी तुम्हारे बिना कैसे जिऊं मैं । मेरा क्या कसूर है इशी बताओ मुझे । मुझे खुद से दूर होने की सज़ा क्यों दे रही हो तुम ।” ढड़ाम से अपना सर दरवाज़े पर मारा था श्रेयांश ने 
एक पल के लिए इशिका ने बेचैनी से कदम बढ़ाया था ये सोच कर कि वो जा कर श्रेयांश को गले लगा ले उसके सर को गोद में ले कर सहलाए मगर अगले ही पल उसे अपने जिस्म पर रेंगते हुए वो सारे हाथ महसूस होने लगे जिनकी छुअन का अहसास उसे खुद को मिटाने के लिए उकसाने लगता । ये भयानक अहसास उसे फिर से दो महीने पहले कि उस भयानक रात के उन पलों में ले जाता जो नर्क से भी बुरा था । फरवरी की वो रात जब श्रेयांश एक मिटिंग के लिए बेंगलोर गया था और इशिका को रिधिमा की इंगेजमेंट पार्टी में जाना था । घर पर पापा भी नहीं थे । मम्मी ने भी जाने से मना किया था उधर श्रेयांश ने भी कहा था कि रात की बात है वो ना जाए अकेले । अगले महीने उसकी शादी है उसी में चलेंगे हम दोनो । मगर इशिका ने ठान लिया था कि उसे किसी हाल में जाना ही है । श्रेयांश को भी उसकी ज़िद्द के आगे घुटने टेकने पड़े । 
इशिका रिधिमा की इंगेजमेंट पार्टी में गई वहाँ पुरानी सहेलियों के साथ मस्ती करते कब ग्यारह बज गए उसे पता भी ना चला । रिधिमा ने उसे रोका कि वो ना जाए मगर इशिका ने जाने की ज़िद्द पकड़ ली । कल श्रेयांश आने वाला था और परसों उसका जन्मदिन था । इशिका को उसके लिए सरप्राईज़ प्लाॅन करना था । ज़िद्द कर के वह निकल पड़ी अपने घर के लिए इस बात से अंजान की उसकी ज़िंदगी का सबसे भयानक सरप्राईज़ उसे मिलने वाला है । 
अगले दिन सुलक्षना अपार्टमैंट के सुनसान पड़े कमरों में से एक कमरे में इशिका बिना शरीर पर कई ज़ख्म लिए बेहोश पाई गई । उस रात क्या हुआ, वो कितने लोग थे, कौन थे ये सब बातें इशिका ने लाख पूछने पर भी किसी को नहीं बताईं यहाँ तक की पुलिस को भी नहीं । उसके पास अब आंसुओं के सिवा कुछ बचा ही नहीं था । महंगी वाली वो सुंदर सी गुड़िया जो गाती है उछलती कूदती है और फिर बैटरी निकाल दो तो एक दम शांत पड़ जाती है ना बस वैसे ही उछलती कूदती चुलबुली सी इशिका अब शांत पड़ गई थी । 
असल मायनों में बलात्कार हत्या से भी बुरा है बेहद बुरा । हत्या में तो शरीर खत्म साथ ही दर्द खत्म मगर बालातकार या शोषण से तो आत्मा मर जाती है और शरीर सारी उम्र यातनाएं सहता रहता है । इशिका भी वही कर रही थी । इस दुर्घटना का उस पर इतना गहरा असर पड़ा था कि उसने अपने सात साल के प्रेम और होने वाले पति श्रेयांश से भी नाता तोड़ने का मन बना लिया था । बह श्रेयांश को कह चुकि थी कि वह अब उसके लायक नहीं रह गई और कोई उस पर तरस खाए ये उसे मंज़ूर नहीं । इसलिए वो अब उसे भूल जाए । मगर इशिका ये ना समझ पाई कि प्रेम में किसी तरह का तरस नसीं खाया जाता । प्रेम सिर्फ और सिर्फ हर कदम साथ चलने का नाम है हर खुशी हर ग़म को एक साथ सहने का नाम है, आखरी सांस के बाद भी उस अनदेखे जहाँ तक साथ निभाने का नाम है । 

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अगले दिन 
 दुनिया के लिए एक खूबसूरत सा नया सवेरा था मगर इशिका के लिए तो उस रात के बाद कभी सवेरा ही नहीं हुआ । धीरे से इशिका ने अपने कमरे का दरवाज़ा खोला और देखा तो चौंक गई सामने ज़मीन पर श्रेयांश सोया था, एकदम मासूम से बच्चे की तरह । इशिका को श्रेयांश का इस तरह से चैन की नींद में सोते देखना बहुत सुकून देता था । इशिका कितने दिनों बाद कुछ पल के लिए अपना वो दर्द भूल पाई थी, खो सी गई थी श्रेयांश को ऐसे सोया देख । फिर उसके पास बैठ कर इशिका ने जैसे ही उसका सर सहलाया श्रेयांश ने आँखें खोल दीं । 
“तुम गए नहीं ?”
“नहीं गया तो अच्छा किया । नहीं तो महीनों से तुम्हारी जिस छुअन और सहलाहट को तरस रहा था वो भला कैसे नसीब होती मुझे ।”
“तुम समझ नहीं रहे श्रेयांश । अब तुम्हें मुझे भूल जाना चाहिए । अब मैं वो नहीं रही ।”
“मेरे साथ कोई हादसा हो जाता तो छोड़ देती मुझे ?”
“श्रेयांश तुम्हें कैसे समझाऊं । ये वैसा हादसा नहीं है । मुझे चार चार जानवरों……” इससे आगे श्रेयांश ने उसके मुंह पर हथेलियां जमा कर उसे बोलने से रोक दिया ।
“जो भी हुआ उसमें तुमने कुछ गलत नहीं किया । मैं कोई ज़ोर नहीं डाल रहा तुम पर । प्रेम का मतलब हर हाल साथ देना होता है । और अगर मैं अभी तुम्हें छोघ कर चला गया तो तुम कभी भी संभल नहीं पाओगी इशी । मुझे तुम्हें अपने दम पर खड़े होते देखना है । तुम्हारी आर्ट गैलरी का सपना पूरा करना है, तुम्हे बढ़ते देखना है । ये सब तुम अकेले नहीं कर सकती । तुम्हें शादी नहीं करनी कोई दिक्कत नहीं, तुम्हें किसी से बात नहीं करनी कोई दिक्कत नहीं मगर तुम्हें संभलना तो पड़ेगा, तुम्हें आगे तो बढ़ना पड़ेगा । चाहे इसे मेरी ज़िद्द ही मानों और तुम तो जानती हो ये ज़िद्द करना मैने तुमसे ही सीखा है इसलिए अब तुमसे बघा ज़िद्दी हूं मैं ।” और श्रेयांश के इन शब्दों के बाद वो खोई चीज़ मिल गई जो महीनों से गुम थी । इशिका की खुबसूरत सी मुस्कुराहट । भीगी आँखों के साथ मुस्कुरा कर इशिका ने इतना कुछ होने के बाद भी भगवान का इस बात के लिए शुक्रिया किया कि उन्होंने उसे श्रेयांश जैसा अनमोल तोहफा भेंट किया था । छुप कर ये सब देख रहे इशिका के माता पिता के आंसू संभाले नहीं जा रहे थे मगर आज इन आंसुओं का रंग दुख भरा नहीं बल्कि खुशनुमा था ।
उस दिन से श्रेयांश ने हर दिन इशिका में नया जोश जगाना शुरू कर दिया और पूरे दो साल बाद इशिका फिर से वही इशिका बन गई थी जो हमेशा खुश रह कर औरों को खुश करती थी । आज उसकी आर्ट गैलरी की ओपनिंग थी । इन दो सालों में श्रेयांश ने सब कुछ भूल कर बस उसको फिर से उसके वुजूद में वापिस लाने पर ध्यान दिया था । कभी भी शादी की बात नहीं की ना उसे फिक्र थी इस बात की । वो किसी तरह भी खुश था इशिका को खुश देख कर । श्रेयांश ने अपनी पूरी ताक़त लगा दी थी गैलरी की ग्रैंड ओपनिंग करने में और ओपनिंग सच में बहुत कामयाब रही ।  
रात को सब काम निपटाने के बाद जब श्रेयांश  इशिका को घर छोड़ कर जाने लगा तो इशिका ने कहा “श्रेयांश बाहर आना ज़रा ।”
“क्या हुआ ?” गाड़ी से बाहर आते हुए श्रेयांश ने पूछा ।
बिना श्रेयांश का के “क्या हुआ” का जवाब दिए इशिका ने पर्स से एक अंगूठी निकाली और घुटनों पर बैठ कर बोली “मिस्टर श्रेयांश गौतम क्या आप मुझसे शादी कर के मुझे मिसेज इशिका गौतम होने का सुनहरा मौका देंगे ।” कुछ पल अपलक इशिका को देखने के बाद इशिका के बराबर घुटनों पर बैठते हुए भरे हुए गले के साथ श्रेयांश ज़ोर से चिल्लाया “यह मेरा सौभाग्य होगा मिसेज इशिका गौतम ।” और दोनो एक दूसरे के गले लग गए । वो भी एक रात थी जब इशिका की ज़िंदगी में अंधेरा छा गया था । यह भी एक रात है जब उसकी ज़िंदगी में एक खुसूरत से सवेरे ने पैर रखा है । 
खुले आसमान में चाँद तारों में हवा में श्रेयांश का चिल्लाना सुन घरों से निकल आए लोगों की आँखों में हर तरफ़ सिर्फ प्रेम मुस्कुरा रहा था । यह जीत थी प्रेम की, बहुत दिनों बाद, बहुत बड़ी जीत ।
धीरज झा

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