लव यू माँ 

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#लव_यू_माँ (काल्पनिक कहानी) 
“ठहरो, आ रही हूँ ।” हाथ में पकड़ी मटर की छिम्मी से मटर निकाल कर, मटर के दानों वाला बर्तन सामने मेज पर रख कर, हुए सुषमा उठ कर दरवाजे की तरफ बढ़ी । दरवाजे की तरफ बढ़ने से पहले ही सुषमा ने घड़ी पर नज़र मार जी थी और बड़े कांटे को ‘तीस’ और छोटे को ‘चार’ पर देख कर एक व्यंगात्मक मुस्कान ने उसके होंठों को कान की तरफ खींच लिया था । 
इतनी देर में दोबारा घंटी बजी तो सुषमा ने थोड़ा गुस्सा दिखाते हुए कहा “अरे आग नहीं लगी यहाँ, इतनी हड़बड़ी मत कर । आ रही हूँ ।” 
सुषमा जानती थी ये विभा होगी । चार बजे उसका सो कर उठने का समय होता है और साढ़े चार तक उसे मेरे पास पहुंच जाना होता है । दो सालों का पक्का नियम है । 
“आग यहाँ नहीं लगी, आग मेरी साँसों को लगी है, मुई सीढ़ियाँ चढ़ते ही धधकने लगती हैं ।” दरवाज़ा खुलते ही विभा बिना किसी हैलो नमस्कार के सीधे सोफे की तरफ बढ़ी और अपने शरीर का सारा बोझ मासूम से सोफे पर पटकते हुए लंबी लंबी सांसों के साथ बोली ।
“तो थोड़ा काम वाम कर लिया कर, कौन कहता है सारा दिन पड़े रहने को ।” सुषमा ने भी अपनी जगह पर आते हुए मटर वाले बर्तन से मटर उठाते हुए कहा । 
“हुंह, सारी उम्र काम ही करती रहूंगी क्या ? बेटे की शादी किस लिए की भला ? अब बहू करेगी, मैं तो बस आराम करूंगी ।” विभा की बात सुन कर सुषमा अपने मटरों को कैद से आज़ाद कराते हुए मुस्कुराई । 
“शीतल भी आने वाली होगी ना ?” सुषमा की तरफ से कोई जवाब ना पा कर विभा ने एक सवाल दाग दिया जो सवाल कम व्यंग ज़्यादा लग रहा था । 
“नहीं आज तो वो दोपहर में ही आ गयी । तबीयत नहीं सही थी उसकी, अभी सो रही है ।” 
“एक बात कहूँ सुषमा ? बुरा मत मानना ।” विभा ने अपनी भारी आवाज़ को थोड़ा दबा कर कहा । 
“हूं ।” सुषमा ने बिना होंठों को हिलाये ऐसे जवाब दिया जैसे उसे विभा की तरफ से आने वाली बात की पहले से खबर हो । 
“तू ने ना अपनी बहू को बिगाड़ कर रखा है । एक तो उसका बाहर काम करना ही सही नहीं फिर भी अगर वो करती है तो कम से कम घर का काम तो करे । तू गाँव में रही है शुरू से इसीलिए तुझे इन शहरी लड़कियों से भय लगता होगा । मगर एक बात बता दूं, इन्हें जितना दबा कर रखा जाए ना उतनी सीधी रहती हैं । मेरी कमीनी (कामीनी) को देख ले, मजाल है जो मेरी मर्ज़ी के खिलाफ़ एक शब्द बोल जाए ।” बाकि बातें तो किसी तरह सुषमा ने सुन ली थीं क्योंकि ये तो उसकी ज़ुबान पर लिपट गयी थीं मगर अंतिम बात पर सुषमा का मन हुआ कि विभा से पूछ दे कि “पिछले इतवार को कामीनी के माता पिता किस बात का समझौता करवाने आये थे ?” मगर सुषमा शांत थी और विभा के स्वभाव से अच्छी तरह परिचित थी, इसलिए विभा को सही शब्दों में समझाना ही उसे सही लगा । 
“हाँ विभा मै गाँव से हूँ, और अपनी सासू माँ का खूब शासन भी झेला है मैने तो क्या उसका बदला अब मैं अपनी बहू से लूं ? जितने दिन मुझ से हो पायेगा मैं उसे कुछ कहने नहीं जाऊंगी । ग्रेजुएशन के बाद डिंपी (सुषमा की बेटी) दो साज जाॅब की । वो इतना थक जाती थी कि जाॅब से आते ही सो जाती फिर मैं उसे खाने के टाॅईम उठाती । जब कभी मन होता उसका तो मेरी मदद कर देती थी, मुझे उतने में ही उस पर तरस आ जाता था कि कैसे सारा दिन ऑफिस में काम करती है और फिर अब घर पर भी मेरी मदद कर रही है । मुझे पता था कि वो शादी के बाद भी जाॅब करेगी फिर भी मैने उसे घर का हर काम बहुत अच्छे से सिखा दिया था ये सोच कर कि कहीं ज़रूरत के वक्त उसे शर्मिंदा ना होना पड़े । उसे काम मैने उसके लिए सिखाया था अपने आराम के लिए नहीं । आज शीतल अपना घर छोड़ कर मेरे घर आई है । एकदम डिंपी की काॅपी है । जाॅब करती है, वक्त पर मदद भी कर देती है, जब कभी बीमार हो जाऊं तो अपनी जाॅब से टाईम निकाल कर मेरी देखभाल से ले कर घर का हर काम करती है वो । अमित हमेशा अकेले में पूछता है कि ‘माँ, शीतल से कोई परेशानी तो नहीं ?’ मैं हंस कर डांट देती हूँ उसे कि इतनी प्यारी है वो भला उससे मुझे क्या परेशानी होगी । मैं क्यों अपने बेटे से कहने जाऊं कि उसकी बीवी मेरी जी हज़ूरी नहीं करती ? क्यों मैं अपने घर में अशांति को प्रवेश करने दूं ? जब तक मुझ में  क्षमता है मैं करूंगी उसके बाद उसका घर है वो खुद संभाल लेगी ।” बर्तन का आखरी मटर छीलते हुए सुषमा ने अपनी बात कह दी । सुषमा की बातों में से झांक रहे प्यारे प्यारे व्यंगों ने विभा की आँखें झुका दीं । 
“हाँ ये भी सही है, वैसे भी सबकी अपनी अपनी सोच और तरीका है । चलो ठीक है अब मैं चलती हूँ, शाम घिर आई है, बहू अकेली है ।” विभा को लगा कि अब उसकी शर्मिंदा नज़रें ज़्यादा देर सुषमा की मुस्कुराती आँखों का सामना नहीं कर पाएंगी, इसलिए वो सुषमा की तरफ से चाय की पेशकश के बावजूद भी वहाँ से उठ कर चली गयी । 
सुषमा सोचने लगी कि उसे इतना नहीं बोलना चाहिए था, विभा को बुरा लगा होगा । सुषमा इतना सोच ही रही थी कि पीछे से आवाज़ आई 
“गुड ईवनिंग माँ ।” शीतल जाग गयी थी ।
“तबियत कैसी है बच्चे ?” किचन की तरफ बढ़ते हुए सुषमा ने शीतल से पूछा ।
“अब एकदम ठीक है माँ । अच्छा आप यहाँ बैठिये, आज मैं आपको अपनी फेवरेट रैसिपी बना कर खिलाती हूँ ।” सुषमा के हाथों से मटर वाला बर्तन लेते हुए शीतल ने कहा ।
“अरे नहीं बेटा, मैं बना देती हूँ ना, तू आराम कर तेरी तबीयत नहीं सही है ।” 
“अरे माँ मुझे क्या हुआ ? बस थोड़ी थकान थी, एक मीठी नींद ने सारी थकान मिटा दी । अब मैं बनाती हूँ ।” सुषमा ने बहुत मना किया मगर शीतल नहीं मानी । 
शीतल नये ज़माने की वर्किंग गर्ल थी । घर कैसे संभाला जाता है उसे बिल्कुल मालूम नहीं था । अपने घर से जिस चंचलता और मासूमियत  को वो साथ लेकर आई थी सुषमा की वजह से आज भी वो बरकरार थी उसमें  । उसे कभी अहसास बी नहीं हुआ कि वो अपनी मम्मू को छोड़ कर अपनी सास के पास आई है । कभी सुषमा ने भी उसे किसी बात के लिए नहीं टोका था । मगर आज जब उठते ही शीतल ने अपनी सासू माँ की बातें सुन कर ये जाना कि वो कितनी सुलझी हैं तो शीतल ने तय किया कि वो अब जितना हो सके माँ की हेल्प करेगी । 
शाम को डिनर करते हुए 
“सब्जी शीतल ने बनाई है क्या ?” अमित ने पहला निवाला खाते ही पूछा 
“रोज़ वही बनाती है । घर टाईम से आएगा तब पता चलेगा कुछ ।” सुषमा ने कहा और इस बात पर शीतल मुस्कुरा कर उसे देखने लगी ।
“अच्छा ! ऐसा है क्या ? खैर सब्जी बढ़िया बनी है बस आपके हाथ की सब्जी से थोड़ी कम स्वाद है ।” अमित ने शीतल को चिढ़ाते हुए कहा । 
“हाँ बच्चू सब जानती हूँ । अभी मेरे सामने मेरी तारीफ़ अकेले मे बीवी की तारीफ़ ।” शीतल की बात पर सब हंस दिये । 
अमित खाना खा कर स्टडी रूम की तरफ चल दिया । बर्तन उठाते हुए शीतल ने मुस्कुराते हुए धीरे से कहा “माँ ।”
“हाँ बच्चे ।” 
“आई लव यू ।” सुषमा ने शीतल की तरफ देखा और प्यार से  उसका माथा चूम लिया । 
धीरज झा

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