समान के इंतज़ार में 

on

#सम्मान_के_इंतज़ार_में 
मुझे लिखना है 

लिखते जाना है 

लिख लिख कर 

कर देने हैं ज़िंदगी के सारे काग़ज़ 

काले नीले और लाल 
जीवन के मरन तक 

आँसुओं की मुस्कुराहटों तक

रुदन के अटहासों तक

लाशों के अहसासों तक
मुझे सब कुछ लिखना है

और तब तक लिखना है

जब तक मैं पा ना लूँ कई सम्मान 

पीठ से गर्दन तक सभी सम्मान 
और तब मैं इंतज़ार करूं 

किसी अमानवीय घटना का 

जिसमें लाशों को देख 

सिर्फ लाशें आँसू बहाएं 

कटी गर्दनों को कोई हाथ ना लगाए

औरतों का सिंदूर भू पर हो पटा हुआ 

कलेजा निकल कर हो मुंह से सटा हुआ
तब कड़ी निंदाओं के बीच 

मैं अपने अनेक सम्मानों में से

एक सम्मान लौटा कर करूं रोष

खुद को बनाकर देशभक्त सच्चा 

बाकि सभी पर मढ़ दूं सारा दोष 

हाँ मगर यह सम्मान सिर्फ लौटाया जाएगा 

सिर्फ मेरे धर्म और जाति पर हुए 

अन्याय के लिए 

मेरे रोष में कोई जगह ना होगी

किसी बेसहारा और असहाय के लिए
तब तक सम्मान के इंतज़ार में 

विराम पर रहेगा मेरा विरोध 

नाम के बिना भला क्या रंग दिखा सकता है

मेरा बेईमानी से भरा झूठा क्रोध 
धीरज झा

Advertisements

एक टिप्पणी अपनी जोड़ें

  1. बहुत ही अच्छा लिखा है आपने।

    Like

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s