सरोज ताई 

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#सरोज_ताई (कहानी)
“ई गुबारा बड़े जिद से मंगवाई थी मनटुनिया । उस दिन तो रोएत रोएत जान देने पे उतारू हो गए रही । कहे जात गुब्बाला लेंगे तभे खाएंगे । एक तो इस गाँव में कछु मिलता भी तो नाहीं । रजना को कितना कहे तब बाजार से ला कर दिया था ई गुबारा ।” सरोज ताई खिड़की के पास खड़ी उस लाल गुबारे को एकटक देखते हुए होंठों पर मुस्कान और आँखों में सावन का सारा रस समेटे भुटना को सारी बात बता रही थीं । 
बहू आई थीं बनारस से दो चार दिन के लिए । खैर बहु के आने ना आने से ज़्यादा फर्क अब कहाँ बड़ता था उन्हें । वो आती भी तो सारा दिन “बिजली नहीं है, ठंडा पानी नहीं है, मच्छर बहुत हैं, यहाँ कि सड़कों ने तो कभर तोड़ दी जैसी हज़ारों शिकायतों के साथ मन बहला कर चार दिन काट लेती थी । कोई विलायत में पली बढ़ी हो तो मानें भी कि सच में दिक्कत होता है मगर ये तो तीन बरस पहले ये चार गाँव छोड़ कर सारा दिन माटी की लेपा पोती करती थी । शायद बनारस बहुते फास्ट था इसी लिए बहू को तीन बरस में ही शहरी बना दिया । बाकि बेटे को भी काम इतना रहता है कि भूल ही बैठा है गाँव में वो माँ भी है जिसकी गोद बिना नींद भी उसकी आँखों में समा नहीं पाती थी । 
ले दे कर सरोज ताई को इंतज़ार रहता था तो अपनी पोती मनटुन का । वही तो थी जिसने सरोज ताई के सुख कर पीले पड़ रहे पत्तों में हरा रंग भर कर उसे फिर से कोमल पत्तियों सा कर दिया था । बनारस से भी वो जब तक ताई से एक बार बात ना कर लेती तब तक उसकी पलकों पर नींद सवार ना होती । 
कल चली गई मनटुन और संजोग देखिए उसके जाने के बाद से ही सरोज ताई की पीड़ा को भांप कर आसमान एक पल के लिए चुप ना हुआ । इधर मंटुन को याद कर के ताई की आँखें बरसती हैं तो उधर ताई की पीड़ा से आसमान का रोना भी नहीं थमता । 
बहू को कहा था ताई ने कि दो दिन और रुक जाए मगर बहू ने साफ मना कर दिया ये कह कर कि पंद्रह दिन बाद वापिस जाना है, अब कुछ पल अपनी माँ के पास भी बिता लूं । सरोज ताई का मन एक बार रोने को हुआ एक बार ये सोच कर कि काश बहू एक बार ग़ौर से देखती तो उसे यहाँ भी पल पल तड़पती एक माँ दिख जाती मगर उसने तो हमेशा एक सास को ही ढूंढा यहाँ । फिर वो सोचती कि बहू का कहना भी जायज है, उसकी माँ भी तो आस लगाए बैठी होगी अपनी बेटी के आने की । मैं तो तड़प ही रही हूँ अपने बेटे के लिए तो भला वो क्यों अपनी बेटी को तड़पे । 
रात को सोते हुए भी सरोज ताई के कानों में मनटुन के वो आखरी शब्द गूंजते जब वो गाड़ी में बैठी चिल्लाती रही कि “मुझे दादी के पाश लहना है, मुझे नहीं जाना । दादी आप भी साथ तलो ना प्लीज ।” मगर उसकी सुनता कौन । जाते जाते वो सरोज ताई के जीवन में अभी अभी उभरे हरे रंगों को भी ले गई । 
चौबिस साल बीत गये आज के दिन को, पिछले साल मनटुन के हाथ भी पीले हो गये । वो अपने पिता की तरह नहीं बदली थी । शादी के दिन तक दादी दादी की रट उसकी ज़ुबान से नहीं जाती थी । अब भी हफ्ते में दो तीन बार फोन कर लेती है । सरोज ताई की उम्र भी अब अपने आखरी पड़ाव पर अपने आखरी दिन की राह देखती है मगर अकेले इंसान को मौत का साथ भी जल्दी नसीब नहीं होता ना । 
“ताई देख कौन आया है ।” भुटना ऐसे दौड़ता हुआ आया जैसे भूत पीछा कर रहा हो ।
“कौन आफत आगई, काहे चिल्ला रहा है ?” ज़मीन को अपनी छंड़ी से टोहते हुए ताई बाहर आई । 
सामने बहू खड़ी थी मुस्कुराते हुए । ताई की कमज़ोर आँखें अब खुद का चेहरा भी नहीं पहचान पाती थीं मगर बहू का चेहरा उसने झट से पहचान लिया । आज कितने वर्षों बाद बहू ने आंगन में पैर रखा था । ताई के पैर छूने के बाद जब दोनों खाट पर बैठे तो ताई ने बहू के चेहरे को गौर से देखा । कुछ बोली नहीं बस उसका सर सहला दिया । 
“अकेला घर काटने को दौड़ता है माई । मनटुन के जाने के बाद अब मन उचाट सा रहता है । इन्हें अपने काम से ही फुर्सत नहीं है । मैने सोचा कुछ दिन आपके पास हो आऊं ।” ये सारी बात कहते समय बहू की आँखें ताई के झुर्रियों भरे हाथों पर टिकी रहीं या शायद उसके मन की गलानी ने उसका सर ऊपर ना उठने दिया । 
“तोहर ही घर है मेरी बच्ची तू जबे मन करे तबे आव । हमार जिनगी के अब कौन पता कब है कब ना ।” ताई ने अपने अंदर के अकेलेपन के हमशक्ल को बहू की आँखों से झांकते हुए देख लिया था । 
“ना माई अभी बहुत दिन जीना है आपको । कुछ दिन यहाँ रहेंगे फिर सब साथ बनारस चलेंगे । अब वहीं रहा जाएगा । मैं भी तो अब अकेली ही हूँ वहाँ ।” बहू के मुंह से ‘अकेली’ शब्द सुन कर ताई के मन की पीड़ा दुगनी हो गई क्योंकि वो इस दर्द को बहुत अच्छे से समझती थी । ताई बस मुस्कुरा कर रह गई । 
देर रात तक दोनों सास बहू ने माँ बेटी की तरह खूब बातें कीं और फिर सोने चली गयीं । आज ताई अकेली नहीं थीं आज उसने अपने आखरी दिन की राह भी नहीं देखी मगर आखरी दिन को तो आना ही उस रात था जिस रात ताई अकेली ना हो । और आज वो आखरी रात चुपके से ताई के सिरहाने आकर बैठ गयी । 
कल रात सास और बहू दोनों ने अपने अपने अकेलापन कहीं दूर भगा दिया था मगर सुबह तक बहू का अकेलापन्न भटकता भटकता फिर से बहू के पास आ खड़ा हुआ । अगले दिन तक बेटा, पोती, दामाद, नाते रिश्तेदार सब ताई के सूने आंगन में आ विराजे थे मगर ताई ये सब देखने को अब बची कहाँ थी । वो सब जिन्होंने सालों से ताई के चेहरे की झुर्रियाँ नहीं गिनी थीं आज उसके संस्कार में उसके अच्छे कर्मों का लेखा जोखा लगा रहे थे ।  ताई की देह जल रही थी और साथ ही जल रहा था उसका अकेरापन्न भी । 
धीरज झा

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