हर ‘वो’ जिससे सीखा उन सबको नमन

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हर ‘वो’ जिससे सीखा उन सबको नमन  

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“गुरु” लिखने बोलने में छोटा सा शबाद मगर इस शब्द के मायने इतने बड़े हैं कि इसके बिना पूरा ब्रह्माण्ड ही अर्थहीन है । हर वो विशिष्ट व्यक्ति जिसका नाम हम बड़े अदब से लेते हैं उन सबने अपने गुरुओं से ही सीखा और उनके गुरुओं ने अपने गुरुओं से । ऐसे ही हर कोई किसी ना किसी से सीखता आया और हर सिखाने वाले ने अपनी पूरी क्षमता से अपने शिष्य को तराशा । 
आज गुरुपूर्णिमा के शुभ अवसर पर हर किसी ने अपने अपने गुरुओं के प्रति अपना आदर व प्रेम दर्शाया । मगर मैं सोच में पड़ा हूँ कि मैं किस गुरु को धन्यवाद कहूँ ? मेरी आज तक की ज़िंदगी में कौन ऐसा था जिसने मुझे कुछ अलग कुछ अनोखा सिखाया ? मगर मुझे ऐसा कोई एक चेहरा नज़र नहीं आता । लेने को मैं यहाँ किसी भी प्रतिष्ठित का नाम ले उन्हें अपना झूठ मूठ का गुरु बना कर, ढेर सारी तारीफ़ कर के उन्हें फुला दूँ मगर ये सही ना होगा । आज के दिन ही झूठ बोल दिया तो फिर गुरुपूर्णिमा का महत्व ही क्या रह गया । 
मेरे लिए किसी एक को गुरु कहना सही नहीं रहेगा क्योंकि शायद मैं इतना उलझा था कि किसी एक ने मुझे सुलझाने का ज़िम्मा ही नहीं लिया । मुझे ज़िंदगी के आज तक बिताए हर दिन कोई ना कोई नया गुरु मिला और हर मोड़ पर कोई ना कोई बिना मेरे कहे मुझे ज़िंदगी जीने का नया तरीका सिखा गया । 
सबसे पहले मैने अपने पिता से सीखा, अपनी धुन का पक्का होना, उन चार लोगों को जो हमेशा कुछ कहते हैं पूरी तरह नज़र अंदाज़ कर के जो मन सही माने वो करना आदि सब मुझे पापा से सीखने को मिला । 
हर परिस्थिती का डट कर सामना करना, हंसते हंसते त्याग करने की कला, हिम्मत ना हारना ये सब मैने माँ से सीखा और आज भी सीख रहा हूँ । 
हर हारे हुए इंसान से अपनी कमियों को स्विकार करना सीखा मैने, हर जीते हुए से सीखा कि यह जीत अंतिम नहीं । हर गिरये हुए से सीखा कि क्यों वो गिरा कहाँ उसे संभलना था । अपनी चोटों से सहने का हुनर सीखा । अपने दर्द से सीखा कि कैसे चुप रहा जाता है । 
वो जो मेरी ज़िंदगी की सबसे बड़ी ख्वाहिश है उससे मैने ये सीखा कि प्रेम कितना खूबसूरत है और उसे कैसे निभाया जाता है । उससे सीखा कि जो अपने अंदर है उसे निखार कर बाहर सबके सामने कैसे लाया जाता है ।
समस्याओं से घिर कर बेचैन हो जाने पर काली स्याह रात ने मुझे सिखाया कि शांत रहो सवेरा ज़रूर निकलेगा । बारिश में भीग रहे कुत्ते से सीखा कि इंसान बिना छत के भी ज़िंदा रहते हैं । अपने बच्चे की भूख की खातिर सबके आगे हाथ फैलाने वाली उस माँ से सीखा कि ज़िंदगी भले ही अपने शानदार कमरे से ही बेहतरीन सी लगती है मगर इसका असल रूप बड़ा।भयावह है पर सामना करना पड़ता है हर हाल में । 
कुछ लोगों के लिए मैने जी जान लगा कर काम किया, उनके प्रति पूरी 

ईमानदारी बरती मगर बदले में उन्होंने मेरा अच्छे से इस्तेमाल किया मगर मैं उनका भी शुक्रगुज़ार हूँ क्योंकि वो मुझे ये बता गये कि मुझ में भी ऐसा कुछ है जिसका इस्तेमाल किया जा सकता है, मैं तो बेकार में ही खुद को निकम्मा समझता रहा । 
लिखना मैने उनसे सीखा जिन्होंने मेरे अहसासों को सुन कर उनकी हंसी उड़ायी । मैने उन्हें सुनाने से बेहतर कागज़ को अपना सारा हाल कह देना बेहतर समझा । मेरे कुछ अपनों ने मुझे सिखाया कि वास्तव में यहाँ अपना कोई होता ही नहीं । बुरे वक्त ने सिखाया कि जो हो सो तुम हो, अगर परेशानियाँ तुम्हारी हैं तो लड़ना भी तुम्हें ही होगा, दूसरों से उम्मीद लगाना छोड़ दो । 
और भी बहुतों हैं जिन्होंने हर रोज़ मुझे कुछ ना कुछ नया सिखाया । कुछ एक नाम इस आभासी दुनिया के भी हैं जिनसे बहुत कुछ तो नहीं मगर कुछ कुछ ज़रूर सीखा । आज गुरुपुर्णिमा के शुभअवसर पर मैं उन सभी को नमन करता हूँ जिन्होंने जाने अंजाने में मुझे कुछ ना कुछ सिखाया, भले ही वो बुरा सबक ही क्यों ना हो 😊 
सबके अंत में मैं अपनी आत्मा को नमन करता हूँ जिसने हमेशा मेरा मार्गदर्शन किया और सही सही ये बताया कि मुझे किससे क्या सीखना चाहिए और किससे क्या नहीं 😊 
धीरज झा

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