कुछ मीठा ले आओ  (काल्पनिक कहानी)

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मिस्टर राॅय कुछ याद करिए, क्या आप दोनों के बीच कोई अनबन हुई या फिर कोई झगड़ा ?” इंस्पैक्टर दिक्षित ने चाय का कप ट्रे में उसी चाय के निशान पर रखते हुए कबीर से ये सवाल किया जहाँ से उन्होंने कप उठाया था ।

“मिस्टर दीक्षित मैं आपसे पहले भी कह चुका हूँ कि हम दोनों के बीच ऐसा कुछ भी नहीं हुआ था । एक महीना भी नहीं हुआ हमारी शादी को तो भला अनबन और झगड़ा कैसा !” कबीर ने सिगरेट के आखरी कश के बाद ऐश ट्रे में बुरी तरह बची हुई सिगरेट को मसलते हुए अपना जवाब दिया । 
“झगड़े और अनबन तो एक दो घंटे साथ रहने के बाद भी हो जाते हैं कबीर साहब आप तो महीना भर साथ रहे । खैर जहाँ तक यह किडनैपिंग का केस लग रहा है बाकि हम छान बीन में लगे हुए हैं, उम्मीद है मिसेज राॅय का जल्द ही पता लग जाएगा ।” मिस्टर दिक्षित ने घंटों में अनबन वाली बात अपने तजुर्बे से कही थी इसीलिए दो मिनट के लिए कहीं खो जाने के बाद लम्बी सांस ले कर अलवीदा कहा कबीर को । 
“पता नहीं किसकी नज़र लग गई मेरे बच्चे की ज़िंदगी को । उस बेचाररी से किसकी दुश्मनी हो सकती है । उसका सत्यानाश हो जाएगा जिसने ये सब किया होगा । ।” कबीर की माँ बहुत दुःखी थीं इन सबसे ।
“माँ किसी को कोसने से अपना बिगड़ा संवर नहीं जाएगा । नियती को टाला नहीं जा सकता । तुम अपनी तबियत खराब मत करो । खाना खा लेना मैं बाहर जा रहा हूँ लेट घर लौटूंगा ।” की हैंगर से कार चाबी की उतारते हुए कबीर ने माँ से कहा ।
“और तू नहीं खाएगा ? सुबह भी कुछ नहीं खाया । पता होता कि मेरे बेटे और बहू की खुशियों को किसी की ऐसे नज़र लगेगी तो मैं तुम दोनों को उस हनी फनी मूनी पर कभी ना जाने देती ।” ‘हनी फनी मून’ सुन कर बड़ी मुश्किल से कबीर ने अपनी हंसी रोकी । 
“माँ इंसान किसी दुःख से दुःखी हो कर भला कब तक भूखा रहेगा । अभी मन उचाट है कुछ दिनों में सही हो जाएगा । मैं आता हूँ तुम खाना खा लेना   ।” इतना कह कर कबीर बाहर निकल गया ।
“द व्यू” कबीर का फेवरेट रेस्टोरेंट है । अपनी हमेशा की जगह यानी कार्नर टेबल पर बैठा कबीर एक नए फोन में नई सिम लगाते हुए वेटर को ऑर्डर कर रहा है “चिकन मुगलई, एक शाही पनीर और चार बटर नान ले आ यार और हाँ सैलेड भी ले आना । जल्दी लाना, सुबह से कुछ नहीं खाया, भूख से जान जा रही है ।” वेटर को कबीर के देसी ढ़ंग का पता था । वो मुस्कुराते हुए “जी सर” कह कर आर्डर लेने चला गया ।
नई सिम डालते ही एक नया नंबर उस नये फोन की स्क्रीन पर फ्लैश हुआ । कबीर जानता था फोन किसका है इसलिए नंबर देखते ही मुस्कुराया और फिर फोन उठा कर बोला “हैलो, सब सही से हो गया ना कोई दिक्कत तो नहीं आई ?” 
उधर से एक लड़की की आवाज़ आई “नहीं कबीर आपके रहते भला कोई दिक्कत कैसे आ सकती है । आप सच में इंसान नहीं देवता हैं । विक्रम और मैं पूरी तरह से उम्मीद छोड़ चुके थे और ना जाने क्या कर बैठते इस नाउम्मीदी में, मगर आपने इतना बड़ा बलिदान दे कर हम दोनों को बचा लिया ।” 
“अरे दिव्या, मैं कोई देवता नहीं इंसान ही हूँ और ये सब तो मैने अपने लिए किया । अरे भई मैं ठहरा हंसने मुस्कुराने वाला आदमी, मैं सारी उम्र तुम्हारा ये सड़ा सा उतरा हुआ मायूस चेहरा देख कर अपनी और तुम्हारी ज़िंदगी नर्क नहीं करना चाहता था ।” उतरा और सड़ा सा चेहरा सुन कर दिव्या उधर से बड़ी ज़ोर से हंसी ।
“जानता हूँ कुछ लोग उदास होंगे, कुछ को सदमा लगेगा मगर फिर सब भूल जाएंगे । पर अगर तुम ऐसे ही चुप चाप रहती तो तीन लोगों की ज़िंदगी हमेशा के लिए बर्बाद हो जाती । यहाँ सबको लग रहा है कि तुम्हें किडनैप कर लिया गया है । कुछ दिनों तक थोड़ा सतर्क रहना तुम दोनों उसके बाद यहाँ सब नार्मल हो जाएगा । कोई दिक्कत आई तो मैं संभाल लूंगा । मैने विक्रम को अपने दोस्त विवान का नंबर दे दिया है वो हर तरह से तुम दोनों की मदद करेगा । सब कुछ शांत होते मैं भी आऊगा तुम दोनों से मिलने । अपने प्यार को यूं ही बरकरार रखना ।” 
उधर से दिव्या ने रोते हुए कहा “थैंक्यू सो मच कबीर । तुमने उस दिन खुद से ना पूछा होता तो शायद मैं कहने की हिम्मत भी ना जुटा पाती और बहुत बड़ी भूल कर जाती ।” इसके बाद फोन कट गया 
इधर कबीर का आर्डर भी आ चुका था । कबीर ने वेटर से कहा “यार ऐसा कर कुछ मीठा भी ले आ ।” वेटर के जाने के बाद कबीर मुस्कुराते हुए मन में बोला “अपनी ना हो सकी बीवी की शादी की खुशी में कुछ मीठा तो बनता है । 
कबीर जानता था बहुत कुछ गलत हुआ है इसमें, मगर जब दिव्या खुद को खत्म करने जा रही थी तो ये रास्ता कबीर को सबसे सही लगा । उसके लिए ज़रूरी था उन दो दिलों को मिलाना जो एक दूसरे के बिना खत्म हो जाते । कबीर ने दिव्या से सारी बात जानी फिर विक्रम के बारे में पता लगा कर पूरी तरह संतुष्ट हो गया तब उसने ये सारी प्लाॅनिंग की । कबीर अपने त्याग से खुश था और वो दोनों अपने प्रेम की जीत पर । सच में प्रेम त्याग मांगता है भले वो त्याग कोई तीसरा ही क्यों ना दे । 
धीरज झा

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