किस्मत में धक्के 

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​#किस्मत_में_हैं_धक्के 
सुन रहा था साजनी को साजन

उनके रुदन का गाजन बाजन 

बता रही थी क्या है मजबूरी 

सुना रही थी अपनी कमज़ोरी 

उनके पिता जी उनकी माता 

उनकी बहनें उनके भ्राता 

सब का जीवन छिन जाएगा 

परिवार कहाँ मुँह दिखलाएगा 
गर हमने दहलीज़ जो लाँघी

आ जायेगी सबके जीवन में आँधी

पिता जी हैं दिल के मरीज़ 

माता जी भी उनके ही करीब

इसीलिए प्रियतम मेरे 

ले ना पाएंगे संग तेरे फेरे

प्रेम हमें भी उतना ही तुमसे 

जितना तुम करते हो हमसे 

मगर समझो मेरी मजबूरी 

बना लो तुम अब हमसे दूरी 
साजन बेबसी में मुस्काए 

क्या बोलें ये समझ ना पाए

पलकों पर आँसू की बूंदें लटका कर

अपनी गर्दन को झटका कर

बा मुश्किल से रोक थे पाए 

बड़े प्यार से मुस्कुरा कर 

अपनी सजनी को दो बोल सुनाए

बहोत खूब तुमने सोचा है 

हौले से मन को नोचा है 

माँ पिता जी की फिक्र है अच्छी 

हो जो तुम एक अच्छी बच्ची 

वैसे भी हम तो खाता हैं दान का

हमें फर्क क्या मान अपमान का

मर भी रहे हों तो किसका आगे बढ़ेगा हाथ

हम तो बच्चपन से ही जैसे रहे अनाथ

हमारी है कौन सी माँ जिसका कलेगा फटेगा

कौन सा हमारा है बाप जो 

“क्या हुआ बेटा” बार बार रटेगा 

हम तो जैसे जन्मे हैं बस खोने के लिए

हमारी तो दो आँखें हैं बस रोने के लिए
कहते कहते अपनी बात

साजन हो गये एक दम आहात

दो आँसूओं से सजनी के चरणों को धो कर

हाथ जोड़ बोले थोड़ा मजबूत हो कर

मान लिए तुम्हारी मजबूरी

देते हैं तुमको मनजूरी 

जाओ बचाओ खानदान की इज्जत 

खुद को करो ना मेरे नाम से बेइज्जत

भगवान तुम्हें खुश हमेशा ही रखे

हमरा क्या है हमारी किस्मत में तो 

लिखे हैं यूँ ही हर मोड़ पे धक्के । 
धीरज झा

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