प्रेम का सती से पार्वती हो जाना 

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“हे महादेव, क्या दोष है मुझ में या मेरे प्रेम में । मैं आदिशक्ती आघा का रूप और आप आदि पुरुष, एक ऐसा मेल जो संसार में ना कभी हुआ ना कभी होगा । इसके बाद भी आपको मैं स्वीकार क्यों नहीं ?” आदिशक्ती स्वरूपा माता सती की आँखें अश्रुओं से भर गईं । प्रकृति इस समय एक दम मौन थी जैसे वह इन दोनों के बीच हो रहे संवाद के एक भी शब्द को अनसुना ना करना चाहती हो । 
महादेव के मुख पर वो मुस्कान जिसमें ना जाने कितने सूर्यों का चंद्र समान ठंडा प्रकाश विद्यमान हो सजी हुई थी । आज पहली बार माता सती को परम पिता महादेव की मुस्कान चुभ रही थी । माता सती का चित इस तरह बेचैन था जैसा वह शूलों की सेज पर लेटी हों । 
“महादेव आपका यह मौन और ह्रदयभेदनी मुस्कान कहीं मेरी असमय मृत्यु का कारण ना बन जाये ।” माता सती के इन शब्दों से वेदना उसी तरह टपक रही थी जैसे शरीर के किसी अंग पर तीर के घात के बाद रक्त टपकता है । 
महादेव का मौन टूटा । संपूर्ण श्रृष्टि ने अपने ध्यान को महादेव के मुख से निकलने वाली वाणी पर केंद्रित कर लिया “हे आदिशक्ती स्वरूपा सती, मैं आपका और आपके निश्चल प्रेम का उसी प्रकार आदर करता हूँ जिस प्रकार ब्रह्मा एवं विष्णु का । परंतु आपका और मेरा मिलन संभव नहीं । हम दोनों नदी के दो विपरीत तीरों के समान हैं । आप भोर का प्रकाश तो मैं रात्री के गहन अंधकार के समान हूँ । आप और मैं अगर एक हो भी जाएं फिर भी एक कभी नहीं हो सकते । हमारा संबन्ध नाममात्र रह जायेगा । आप से प्रेम करने के उपरांत भी मैं आपको वह प्रेम नहीं दे पाऊंगा जिसकी आप मुझ से अपेक्षा करती हैं । यही हमारी नियती है, जिसे आपको और मुझे स्वीकार करना ही होगा ।”
“परंतु ऐसा क्यों ? इसका क्या कारण है और इसका समाधान क्या है ?” महादेव के उत्तर से व्याकुल सती की  व्याकुलता और तीव्र हो गयी ।
“कारण” महादेव फिर से मुस्काये 
“देवी सती, आपका संसार का जहाँ अंत होता है उसी अंत के बाद मेरे संसार का आरम्भ है । आपकी देह जिस शमशान में अपनी जीवनलीला समाप्त करने के उपरांत पंचतत्वों में विलीन हो जाएगी वही शमशान मेरा जीवन है मेरा घर है । आपने कभी रात्री और दिन का मिलन देखा है ? नहीं ना तो फिर हमारा मिलन कैसे संभव हो सकता है ।” 
महादेव के मुख की मुस्कान अब कुछ क्षण पहले तक व्याकुल देवी सती के मुख पर सुशोभित हो गयी थी । अपनी मुस्कान को और गहरा करती हुई देवी सती ने महादेव से कहा “बस यही समस्या है ? ठीक है आप मुझ से विवाह हेतु अपनी स्वीकृती दें उसके उपरांत मैं हम दोनों के मध्य इस दूरी को भी समाप्त कर दूंगी । कोमल प्रतीत होने वाला प्रेम बहुत बलशाली होता महादेव और यही प्रेम आपके और मेरे मध्य के अंतर को समाप्त करेगा । मैं अपने प्रेम को इस नियती पर विजय दिला कर रहूँगी । यह मेरा प्रण है ।”
महादेव ने इससे आगे कुछ नहीं कहा । शायद उन्हें नियती का सज्ञान था । माता सती और महादेव का विवाह हुआ और फिर नियती को चुनौती देते हुए माता सती ने अपना जीवित शरीर अग्नी को अर्पण कर के जीवन और मृत्यु के बीच की सीमा को लांघ लिया तथा वही आदिशक्ती स्वरूपा माता सती का जन्म माता पार्वती के रूप में हुआ । 
पार्वती रूप में अपनी तपस्या से महादेव को प्रसन्न कर उनसे विवाह करने के उपरांत माता पार्वती ने मुस्कुराते हुए कहा “देखा महादेव, मैने आपके और मेरे मध्य के अंतर को समाप्त कर दिया । ये देखिए रात्री और भोर का मिलन हो रहा है । मैने अपनी जीवित देह अग्नी को समर्पित कर के अपने संसार से आपके संसार में प्रवेश पा लिया । प्रेम बहुत बलशाली होता है महादेव बस लगन और निष्ठा से किया जाना चाहिए ।” 
महादेव के मुख की मुस्कान अब दोनों मुखों पर बराबर बंट चुकी थी । प्रेम अपनी विजय पर मुस्कुरा रहा था । संपूर्ण श्रृष्टि माता सती के प्रेम और त्याग के आगे नतमस्तक थी । 
धीरज झा

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