सम्मान 

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​#सम्मान (काल्पनिक किस्सा 😉)
बस ठसाठस भरी हुई थी । हवा भी “भाई ज़रा साईड प्लीज़” कह कर ही आगे बढ़ पा रही थी । जो यात्री सीट पा गए थे वो उसे सीट नहीं मोक्ष का अंतिम द्वार मान कर मनषकी गहराईयों से खुश थे । और जो खड़े थे उनके लिए इस गर्मी में ये बस नर्क की उस यातना की तरह थी जिसका व्याख्यान गरुड़ जी जल्दबाज़ी में करना भूल गए थे । 
पीछे से तीसरी सीट पर एक मैडम बैठी हुई थीं । यही कोई 35 40 के बीच की । गर्मी ने उनके गोरे मुखड़े को सेक कर लाल कर दिया था । गर्मी से लड़ने के लिए उस साहसी महिला ने संगीत को हथियार बना लिया था । कानों के पर्दे से थोड़ा पीछे तक हेड फोन ठूंसने के बाद जैसे बस में होते हुए भी वो होनोलूलू की हसीं वादियों में चली गई हों । मगर बस की लगी अचानक ब्रेक के साथ किसी की कमर से उसके कंधे को रगड़ते हुए उसे होनोलूलू से सिर बस में ला पटका । 
महिला ने गुस्से से ऊपर देखा तो उसकी सीट की बगल में एक लड़का खड़ा था, जिसकी नींद के बोझ के कारण लटकी आँखें साफ साफ बता रही थीं कि बेचारा रात की दुनिया का मजदूर है । वो महिला जी के देखने से इतना डर गया कि जगह ना होते हुए भी भीड़ को धकेल कर थोड़ा पीछे खिसकने की नाकाम कोशिश की । महिला ने अपने गुस्से को जैसे तैसे रोका । मगर ये क्या दोबारा ब्रेक लगने पर फिर से उसके विदाऊट स्लीव बाजू पर वही सस्ती जींस की रगड़ । मगर महिला ने माफी का एक और मौका देते हुए फिर शांत हो गई ।
मगर जब तीसरी बार फिर से वक्त ने खुद को तिहराया तब महिला अपने तीसरे नेत्र को खुलने से खुद भी ना रोक सकी और लगी उस लड़के पर बरसने । महिला के बरसने की देर थी की आधे यात्रीगण आगए मैदान में महिला के सम्मान में । फिर क्या था उसे निर्लज, बलात्कारी, छिछोरा, हरामी ना जाने किन किन उपनामों से सम्मानित किया गया । उसे इतना सुनाया गया कि लड़के को खुद लगने लगा कि वह खुद ही लगने लगा वह अपराधी है । 

वो बस इतना ही कह सका “मैडम बस में भीड़…. ।” फिर आगे की बात मैडम ने पूरी कर दी “हाँ हाँ और उसी भीड़ का तुम लफंगे फायदा उठाते हो । तुम्हारे जैसों की वजह से औरतें सुरक्षित नही हैं ।” मिला जुला कर लड़के को इतना ज़लील कर दिया गया कि बेचारा दो स्टाॅप पहले ही उतरने पर मजबूर हो गया । 
महिला सहित मैदान में उतरे सभी यात्रियों ने यह सोच कर सबने गर्व से सीना चौड़ा किया कि आज हम महिला के सम्मान में अपना योगदान दे पाए । पूरी बस गर्व से फूल ही रही थी कि इतने में कंडक्टर साहब के मुख से कुछ मधुर गालियां फूल की खुशबू समान बस के गर्म वातावरण में फैल गईं । कंडक्टर साहेब समय से पहले ही   बुजुर्ग जान पड़ रहे एक मजदूर को गरियाते हुए बोले “साला गंदगी फैलाने चला आता है कहाँ कहाँ से । मुफ्त का खाने की तुम लोगों को आदत पड़ गयी है । मुफ्त ही चाहिए तो भीख मांगों ये झूठ क्यों बोलता है । टिकट लिया नहीं और कहता है पैसा कटा दिया है । पांडू दिखता है हम तुमको ? पैसा दिया होता तो मैं तेरे को टिकट नई देता क्या ?” 
“बाबू हम तुमको पईसा दिए और तुम पईसा ले के आगे बढ़ गए । ना बाकि का पईसा दिया और ना टिकट ।” मजदूर गिड़गिड़ाते हुए बोला ।
“साला मेरे को झूठा बोलता है ।  चल निकल यहाँ से ।” एक थप्पड़ मारते हुए कंडक्टर ने बस रोकने के लिए सीटी बजाई और बुढ़ऊ का हाथ पकड़ कर खींचते हुए उसे दरवाजे की तरफ ले जाने लगा । सारे यात्री अब किसी रोमांचक फिल्म के दर्शक बन गए थे । सब शांत बस एक टक तमाशा देख रहे थे । मीनल ये सब बड़ी देर से नोटिस कर रही थी । उससे अब रहा नहीं गया इसीलिए उठी और कंडक्टर का हाथ जिससे उसने बुढ़ऊ के बाजू को पकड़ रखा था को एक झटके में अलग कर दिया । पुलिस ट्रेनिंग ले रही मीनल का हाथ कंडक्टर से कहीं ज़्यादा सख्त था । 
“क्या धांधली मचा रखा है ये ? घर में बाप से भी अईसा ही बिहेव करते हो क्या ?” माहौल की गर्मी के कारण मीनल के गुस्से का पारा धीरे धीरे बढ़ने लगा था और उसके गुस्से का बखान तो वही अच्छे से कर पाएगा जिसने उसे झेला है । 
“ऐ मैडम बाप को बीच में नई लाने का ।” कंडक्टर ने ऊंगली को मीनल की दोनों आँखों के बीच दिखाते हुए कहा । 
“अच्छा बाप को कहा तो बुरा लगा । चल अपने को भी बुरा लगा । क्योंकि ये मेरा बाप है । अब पकड़ इसका हाथ । उतार इसको बस से बाहर । देखूं कितना दम तेरे में । ये तुमको सौ का नोट दिया और तुम नोट ले कर मैडम का मैटर षुलझाने निकल गया और उसके बाद बाकि लोग का टिकटषकाटा इसकी तरफ मुड़ा भी नहीं । इसको टिकट तो दूर तुम बकी का पईसा भी नहीं दिया और उलटा उस पर चढ़ता है ।” मीनल का चेहरा पूरी तरह लाल हो गया था । कंडक्टर जान गया कि उसकी चोरी पकड़ी गई इसीलिए एक दम चुप हो गया ।
“और तुम साला लोग, लानत है तुम पर । मैं साल भर से इस बस में सफर कर रही । और ये हमेशा से नोट कर रही कि जब कोई लेडी का मैटर होता तो तुम लोग मुंह उठा के घुस जाता बीच में बिना जाने समझे कि कौन सही कौन गलत । मान लिया तुम लोग औरत का इज्जत करता मगर इज्जत करना तो सबका करो ना अकेली औरत का काए को ? ये बूढ़ा को पईसा देते आस पास का सब देखा मगर जब ये कंडक्टर इसे मारा और बेज्जत किया तो कोई नहीं बोला सब चुप । क्यों भाई लोग इस बुढ़ऊ का इज्जत इज्जत नहीं ? अपना देश इसीलिए पीछे है इतना क्योंकि इधर बस ट्रेंड काम करता । जब औरत को जूती बनाने का ट्रेंड चला तो सब बनाया आज औरत के सम्मान का ट्रेंड चला तो सम्मान देने आगे आगए । अबे पहले देख तो लो कि सही क्या गलत क्या या बस ट्रेंड फाॅलो करना है । तुमको इज्जत करना है तो इंसान का करो चाहे वो कहीं का हो, चाहो वो किसी जेंडर का हो, चाहो वो कोई बोली बोलता हो । खैर तुम लोग को समझाने का कोई फायदा नहीं । तुमको समझाना अपना टाईम खोटी करने जैसा है ।” 
मीनल की बात ने सबको शर्मिंदा कर दिया । कंडक्टर ने साॅरी कहते हुए बूढ़े मजदूर को टिकट और बाकी के पैसे वापिस कर दिये । उस दिन के बाद मीनल के लिए उसके साथ रोज़ाना सफर करने वाले यात्रियों की आँखों में सम्मान नज़र आने लगा और साथ ही साथ यह सम्मान अब बराबर रूप से सब में बंटने लगा । 
धीरज झा

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