यहाँ सबकी सोच नंगी है 

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​#यहाँ_सबकी_सोच_नंगी_है (कहानी)
बाज़ार सजा हुआ है । “आजा राजा सौ कम दे देना, अरे ओ लंबू आजा जन्नत घुमाऊं इस तरह की आवाज़ों से बाज़ार का माहौल इतना गर्म हो रहा है कि दो घंटे पहले बनाई गई चाय अभी तक गर्म ही है । 
लाल पीले हरे नीले हर रंग के कपड़ों में सजी हुई महिलाएं अपने लिए ग्राहकों (हाँ इनके लिए हर मर्द ग्राहक ही है) को लुभा रही हैं । अजीब है ना इस तरह से पेट के लिए जिस्म उघाड़ देना जैसे ये महिलाएं कह रही हों कि “आओ ये देखो जिस्म मेरा । जो तुम छुप कर देखते हो उसे खुलेआम दिखा रही हूँ । आओ बहादुर बनो डर डर कर मत देखो, मन में चोर मत पालो आओ और खेल लो मुझसे । पैसे दो और वो सब कर लो जिसे करने के ख़याल तुम्हारे दिमाग में संड़ रहे हैं और उस संड़न में वासना के कीड़े बिजबिजा रहे हैं । आओ अपनी वासना का कीटनाशक ले जाओ ।”  
जैसे इंसान के अंदर के जानवर को  अपने आप पर झपटने का खुला आमंत्रण दे रही हों ये औरतें । जैसे नियमों को चुनौती दे रही हों अपनी कमज़ोरी को अपनी ताकत बना कर । जैसे समाज की एक्स रे मशीन हों ये महिलाएं । 
बाज़ार में खड़ी लीला चंपा जूली रेखा हेमा ऐश माधूरी सबकी सब थोड़ा सा मटक कर एक ना एक ग्राहक को लुभा कर ले जा रही हैं । सबको पता है कि मर्दों का नाड़ा कैसे ढीला करना है  इसीलिए किसी ने खुले गले का ब्लाऊज पहना है किसी की पूरी पीठ पर चोली की डोरयों के सावा कुछ भी नहीं, कोई शार्ट से भी शार्ट जैसी स्कर्ट पहन कर अपनी जांघों पर बने टैटू का प्रदर्शन कर के सब ग्राहकों को लुभा रही है । सस्ते पाऊडर और पाँच मिनट में गोरा करने वाली क्रीम का सही उपयोग इसी बाज़ार में दिखता है । ग्राहक भी छुपते छुपाते बाज़ार की दहलीज़ तक आते हैं और बाज़ार में घुसते ही शेर हो जाते हैं जैसे किसी कैद से निकल कर आए हों । 
दर्द से सने हुए दुखते मन की टीस को दबा कर झूठी मुस्कुराहटों से पुते चेहरों के बीच एक चेहरा सच्चा सा नज़र आता है । फुलिया बाई के कोठे की मीना का चेहरा जैसे इस झूठे बाज़ार में इकलौता सच्चा चेहरा हो । जिसका मन भी उदास है और सूरत भी । उसके पास नए ग्राहक आते हैं वो भी इक्का दुक्का और वो भी गालियाँ दे कर चले जाते हैं या फिर कोई नशे में धुत्त हुआ शराबी आता है जिसे बस हल्का होने के लिए शरीर चाहिए, जो भले ही मार ले गालियाँ दे ले मगर शिकायत ना करे । 
गाँव से कुछ महीने पहले आया पासपत जो पान का खोखा लगाता है वह अपने पड़ोस के चाय वाले नदीम भाई जो यहाँ बहुत पुराने हैं से पूछ बैठा “मीना सुंदर है, यहाँ की सभी महिलाओं में सबसे ज़्यादा जवान, सबसे ज़्यादा निखरा रंग, सबसे सही शरीर की बनावट फिर भी उसके कदरदान ना के बराबर हैं नहीं नहीं शायद हैं ही नहीं । मगर ऐसा क्यों यहाँ तो सबको चेहरे और जिस्म की खूबसूरती लुभाती है और वो सब मीना के पास है फिर भी कोई उसके पास नहीं आता । ऐसा क्यों नदीम भाई ? 
नदीम भाई मुस्कुराता (यह एक व्यंगात्मक मुस्कुराहट है जो शायद इस समाज के लिए है) और पासपत को बताता है  “क्योंकि मीना का वो जिस्म जो कपड़ों से ढका हुआ है वह बुरी तरह जला है । सुना है उसके स्तन ऐसे लगते हैं जैसे आम में कीड़े लग गए हों । उसका पेट जल कर सिकुड़ गया है । उसका चेहरा देख कर हर कोई मोहित हो जाता है मगर जब वो बिस्तर पर कपड़े उतारती है तो सबको उल्टी आने लगती है । फुलिया बाई जानती है वो अनाथ है यहाँ से निकाल दिया तो भूखी मर जाएगी इसीलिए उसे रखा हुआ है । बहुत ही अजीब स्वभाव है यहाँ आने वाले लोगों का, कहते हैं उन्हें बाहरी खूबसूरती से मतलब है तो फिर सूरत से इतनी सुंदर मीना से दूर क्यों भागते हैं । खैर तू अपने काम पर ध्यान दे ।” 
पासपत बेचैन हो जाता है । सारा दिन बेचैनी में गुज़ारने के बाद शादीशुदा पासपत जिसने इस बाज़ार का होने के बावजूद भी इसका स्वाद ना चखा था आज डरे सहमे मन और थरथराते कदमों के साथ मीना के दवाजे पर दस्तक दे दी । मीना हैरान थी कि जिसके दरवाज़े पर दिन में कोई नहीं आता था भला वहाँ आज रात में किसी ने कैसे दस्तक दे दी । 
अंदर क्या हुआ ये किसी ने नहीं देखा बस देर रात तक कमरे से हंसी की आवाज़ें ही सबके कानों को सुनाई पड़ी थीं और ये आवाज़ें अब हर रात वहाँ से आने लगी थीं । नदीम ने पासपत को समझाते हुए कहा भी “शादीशुदा है तू । गाँव में घर परिवार है तेरा । कमाई पर ध्यान दे । यह बाज़ार अच्छे अच्छों को निगल गया है फिर तू तो मामुली सा मज़दूर है ।” नदीम की बात सुन कर पासपत बस मुस्कुरा दिया करता था । 
महीनों तक ये सिलसिला चलता रहा । सब कुछ पहले जैसा ही था बस बदली थी तो मीना के चेहरे की रंगत । जो अब उदास नहीं बल्कि मुस्कुराहट भरी थी और सच्ची मुस्कुराहट बनावटी नहीं । वो मुस्कुराहट जो उसके खुश मन का हाल बयान कर रही थी । 
देर रात तक मीना के कमरे से आने वाली दोनों की हंसी भरी आवाज़ें, दोनों का एक दूसरे को देख कर चहक उठना, आँखों आँखों में ढेर सारी बातें कर लेना आदि वहाँ के लोगों की आँखों में खटकने लगा था । वक्त काटने के लिए लोगों को अच्छा विषय मिल गया था । अब पूरा बाज़ार समाज में और मीना का कमरा बाज़ार में तब्दील हो गया था । जिन्हें समाज बद्चलन कह कर बुलाता है आज वो मीना को बद्चलन कह रही थीं । 
नदीम का सब्र आज टूट गया उसने बीच बाज़ार पासपत का काॅलर पकड़ कर कहा “समझाया था तुझे, बाल बच्चे वाला है तू, काम धंधा कर दो पैसे कमा । इन रंडियों के चक्कर में मत पड़ । अरे इनका क्या है इनके रोज़ यार बदलते हैं । तेरे सामने ही तो मीना के कमरे में कितने ग्राहक घुसते हैं । ये साली तुझे भी खाती है और बाकियों को भी ।” पासपत हमेशा नदीम की बात मुस्कुरा कर टाल देता था । बड़ी इज्ज़त करता था पासपत नदीम की इसलिए आज भी खामोश था । शायद यह पासपत की शर्मिंदगी थी या कुछ और पता नहीं । 
पासपत तो चुपचाप बर्दाश्त करता रहा मगर आज मीना से बर्दाश्त ना हुआ । इसीलिए चिल्ला कर बोली “ऐ नदीम ज़ुबान संभाल के बोल । मैं रंडी है माना मेरी कोई इज्ज़त नहीं पर इसकी है । क्योंकि इंसान नहीं देवता है ये । और इस बदनाम गली में सब बदनाम हैं और आज साबित हो गया कि यहाँ भगवान भी चला आए तो वो भी बदनाम हो जाएगा ।” 
“सबको ये तो दिखा हम दोनों के बीच कुछ खिचड़ी पक रही है मगर हमेशा की तरह किसी को वो प्रेम नहीं दिख रहा जो निस्वार्थ है जिसका जिस्म से कोई नाता नहीं । किसी ने नहीं देखा कि पासपत मीना के पास गया तो ग्राहक बन कर था मगर उसकी मंशा उस टूट रही मीना का सहारा बनने की थी । किसी ने ये नहीं देखा कि वो मीना जो अंदर ही अंदर मर रही थी वो आज ज़िंदगी से कितनी खुश है, किसी ने पासपत को मीना के ज़ख्मों के लिए दवा ले जाते नहीं देखा, किसी ने पासपत की कलाई नहीं देखी जिस पर मीना ने एक डोरी बांध दी थी, किसी को नहीं पता कि पासपत ने मीना को वैसे ही बहन स्वीकारा जैसी वो है, किसी ने ये भी नहीं देखा कि मीना अब जीना सीख गई है । किसी ने मीना के लिए पासपत की नज़रों में वो इज़्ज नहीं देखी जिसके लिए मीना तरस कर रह गई थी । हम जिस्म बेचते हैं नदीम भाई आत्मा नहीं मगर पासपत भाई ने मेरा जिस्म नहीं आत्मा खरीदी है और बदले में दिया अपना अनमोल प्रेम । ऐसा प्रेम जो इस बाज़ार में तो किसी को नसीब नहीं हो सकता । अरे भला हो उस मजबूरी का जो पासपत जैसे देवता को इस बदनाम गली तक ले आई वरना यहाँ पैर रखने की हिम्मत तो भगवान नहीं करता तो नेक इंसान क्या करेगा । आज एक बात पर यकीन हो गया नदीम भाई बाज़ार हो या समाज सोच सबकी नंगी है ।” 
बाज़ार में सन्नाटा था । वहाँ शायद ही कोई दिल बचा हो जिसने मीना की बात ने झकझोर कर ना रख दिया हो और शायद ही कोई आँख बची हो जिसने आँसुओं से पासपत के पैरों को ना धोया हो । 
धीरज झा

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