पहली तस्वीर

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​#पहली_तस्वीर 
मेरी हज़ार ज़रूरते हैं, हज़ारों इच्छाएं हैं जिनको पूरा करने के प्रयास में ज़िंदगी कतरा कतरा हो कर हर दम बहती चली जा रही हैं मगर इन सब के बाद भी मेरी एक इच्छा जो सबसे ऊपर है । मैं ये भी जानता हूँ कि यह कभी पूरी नहीं हो सकती मगर फिर भी यह सबसे ऊपर है । ईश्वर अगर मुझसे पूछें कि तुम्हारी कोई एक इच्छा पूरी कर सकता हूँ तो मैं अपनी उस कभी ना पूरी होने वाली इच्छा के पूरा होने का वरदान माँगूंगा । मगर वह इच्छा आज मांगने से पहले ही पूरी हो गई । असल में रह तो गई अधूरी ही मगर इस अधूरेपन में भी खुश हूँ । 
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कल रात बड़े ही बेचैन मन के साथ करवटें बदल रहा था । एक तो गर्मी बहुत है गाँव में, ऊपर से चिंताएं अपने लिए कुछ वक्त खुद से निकाल ही लेती हैं और रात का यह वक्त उनके हिस्से का होता है जिसमें।वह सिर्फ अपनी कहती हैं । इस भयंकर गर्मी और बिना बिजली के इस गाँव में खिड़कियाँ और उन से आने वाली हवाएं जीवनदायनी साबित होती हैं । उसी खिड़की से एक जानी पहचानी आवाज़ में लिपटे हुए मेरे नाम को हवाओं ने मुझ तक पहुंचाया । मैने चौंक कर खिड़की से बाहर देखा, मेरे चौंकने की सबसे बड़ी वजह यह थी कि उस आवाज़ से मैं इस तरह वाकिफ़ था कि बेहोशी की हालत में भी वह आवाज़ मेरे कानों में पड़े तो मैं उठ कर कह दूं “जी पापा” । 
हाँ वो आवाज़ पापा की ही तो थी । मैने खिड़की से बाहर देखा तो पापा लूंगी और बनियाईन में खड़े थे । गाँव आने के बाद गर्मियों में हमेशा उनका यही पहनावा होता था । उनके आते ही सुबह भी आगई थी । मगर मेरी तरह सुबह भी आज स्तब्ध सी थी , उसकी महक और चहक गायब थी, हाँ नमी ज़रूर थी इसमें, शायद पापा को ऐसे अचानक देख कर उसे मेरी तरह हैरानी हुई और उसका मन भी भर  आया था । मैने चौंक कर कहा “पापा आप ? अंदर आईए ना बाहर क्यों खड़े हैं ?” मुझे यकीन नहीं हो रहा था कि पापा मेरे सामने खड़े हैं मगर इस हैरानी के साथ भी मैं शांत था एक दम शांत ।
“नहीं ! गर्मी बहुत है । तू बाहर आ तुझसे बात करनी है और अपना फोन लेते आना ।” मैं सोचने लगा कि इतनी रात को पापा को मुझसे भला क्या काम पड़ सकता है और वो भी फोन के साथ । यह सोचते सोचते मैं ग्रिल तक पहुंच गया था । पापा के पास पहुंचा तो पापा के पैर छूए और पापा बिना कुछ बोले सर पर हाथ फेरते हुए आगे बढ़ने लगे । हमारे नए घर (जिसे पापा ने बड़े उमंग से बनाया मगर उसमें रह नहीं पाए) के सामने से गुज़रते हुए पापा का हाथ उस घर की दीवारों को छूने की कोशिश कर रहा था मगर ना जाने क्यों उन्हें छू नहीं पा रहा था जैसे कि वह दीवार नाराज़ हो और पापा की छुअन से दूर जाते हुए कह रही हो कि “नाराज़ हूँ तुम से, तुमने इतनी खुशी इतने उत्साह से मुझे बनाया और फिर बिना बताये चले भी गए । कम से कम एक दिन तो खुद को मेरी गोद में सोने दिया होता ।” 
पापा खामोश थे, चेहरे का भाव शून्य था ना खुशी ना दुख जैसे पत्थर हो गए हों । इसी तरह दीवार के आखरी छोर को छूने की नाकाम कोशिशों के बाद हम बड़ी दादी की बैठक तक पहुंच गए थे । आगे रास्ता बंद था क्योंकि आगे ढलान है और फिर नदी । नदी पहले शोर कर रही थी मगर हमारे आते ही शांत हो गई थी मानो पापा को पहचान गई हो और हमारे बीच होने वाली बातों को सुनना चाह रही हो । आम तौर पर सुबह में सब जाग जाते थे मगर आज ऐसे लग रहा था जैसे सब गायब हो गए हों । मुझे पापा और प्रकृति को छोड़ कर वहाँ कोई नहीं था ।
मैं कुछ बोलता इससे पहले पापा बोल पड़े “सब ठीक है, अब उठने बैठने और चलनेएं कोई दिक्कत नहीं है । दर्द होता भी होगा तो अब महसूस नहीं होता । तुम सबकी याद बहुत आती है मगर दुःख महसूस नहीं होता । मैं पहले ही कहता था ना सब ज़िम्मेदारियों से मुक्त हो कर गाँव चला आऊंगा । भले ही खुद से ना सही मगर समय ने मुझे ज़िम्मेदारियों से मुक्त कर ही दिया इसीलिए गाँव चला आया । मुझे पता था तू ज़रूर आएगा ।” मैं शांत था । केवल मैं ही नहीं मेरे साथ सुबह, यह हवा, येह नदी, पंछी, पूरा गाँव सब कुछ शांत था । मानो जैसे सिर्फ पापा को सुनते रहना चाह रहे हों । मैं चाह रहा था पापा के गले लग जाऊं और उनके हिस्से के बचे कुछ आँसू उनके पैरों में बहा दूं । मगर ऐसा लग रहा था जैसे मुझे बांध दिया गया हो ना मैं हिल पा रहा हूँ ना मैं बोल पा रहा हूँ । 
पापा फिर बोलते हैं “जानता हूँ मैं अपने सारे फर्ज़ ना निभा पाया । अभी मुझे रहना था कम से कम तुम सब को संभालने के लिए कम से कम तुम सब को वक्त वक्त पर हिम्मत देने के लिए मुझे रहना था मगर मैं नहीं रह पाया । चाह कर भी रुका ना गया मुझ से । मैं अपने मन में कितने मलाल ले कर चला गया । मगर आज तू आया है मेरे सामने है तो बता कोई ऐसी इच्छा हो जो मैं अभी पूरी कर सकता हूँ । तू मेरे स्थिति जानता है मैं चाह कर भी कुछ नहीं कर सकता मगर फिर भी तू कुछ ऐसा माँग ले जो मेरे बस का हो और मैं पूरा कर दूँ तो मुझे बहुत शांति मिलेगी ।” 
मैं पापा से कहना चाह रहा था कि “आपने अपना हर फर्ज़ हर ज़िम्मेदारी बहुत अच्छे से निभाई । किसी भी कमीं के लिए आपसे हमें कोई शिकायत नहीं । हम तो बस इतना चाहते थे कि आप हमेशा हमारे साथ रहें ।” मगर मैं यह सब बोल नहीं पा रहा था बस मेरी आँखों के कोर पर कुछ कुछ आँसू लटक गए थे जो ज़मीन पर कूदने को बेचैन थे मगर कूद नहीं पा रहे थे । 
मैं बस इतना बोल पाया कि “पापा मुझे आपसे कुछ नहीं चाहिए । हाँ हो सके तो बस एक इच्छा पूरी कर दीजिए ।मैं जब भी खोजता हूँ तो मुझे आपके साथ अपनी एक भी तस्वीर नज़र नहीं आती । गलती मेरी ही है जो मैं कभी कह ही नहीं पाया कि पापा मुझे आपके साथ एक फोटो क्लिक करनी है । अगर हो सके तो आज मेरे साथ एक तस्वीर ले खिंचवा लीजिए ।” 
मेरी आँखों के कोर पर आँसुओं का एक भाग अब पापा की आँखों में नज़र आ रहा था जैसे मेरी आँखों से टपक कर उनकी आँखों में चला गया हो । मैं पापा के पास गया उनसे लिपटते हुए एक तस्वीर खींच ली । तस्वीर लेते ही हवाओं, सुबह, नदी और पंछियों ने अपनी चुप्पी तोड़ दी । मेरे चेहरे पर अपार खुशी थी मगर पापा मेरे बगल में नहीं थे । मुस्कुराहट मेरे चेहरे से चाह कर भी नहीं जा रही थी मैं पापा के जाने पर उदास होना चाहता था मगर हो नहीं पाया क्योंकि शायद पापा ये नहीं चाहते थे कि मैं उनके जाते उदास हो जाऊं । 
प्रकृति के मौन तोड़ते ही सारा गाँव भी जाग गया और गाँव के जागते ही मेरी नींद भी खुल गई । उदास मन के साथ चेहरे की मुस्कुराहट वैसे की वैसे ही बनी थी । फोन में पापा के साथ की वो तस्वीर गायब थी । मगर पापा के कंधे पर हाथ रखे कैमरे की तरफ देख मुस्कुराता हम दोनों का चेहरा मेरी आँखों के सामने अभी भी घूम रहा था । 
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आज पापा का जन्मदिन है और पापा ने अपने जन्मदिन पर मुझे यह बेहतरीन तोहफा दिया है । मगर अफसोस मैं आज फिर पापा को कुछ नहीं दे पाया सिवाए इस एडिट की हुई हम दोनों की तस्वीर और “जहाँ रहें सुकून से रहें” की दुआ के । 


जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं पापा । हमारे चेहरों से लेकर हमारे मन तक में हमेशा अपनी मौजूदगी बनाए रखिएगा  । जहाँ रहें खुश रहें सुकून में रहें । आशीर्वाद और स्नेह बनाए रखें हमेशा 😊
आपका नालायक बेटा 
धीरज झा

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