#आँसू_मत_बहाईए_एक_ठो_मोर_नो_मोर_हो_जाएगा

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मोर बाबा अपने पंखों को सिकोड़े हुए बड़े चिंतित मुद्रा में इधर से उधर टहल रहे थे । परेशानी बड़ी थी यह उनका चेहरा ही बता रहा था । कुछ तो था जो उनके मन को योगी से रोगी बना रहा था । कहाँ मोर बाबा का शांत मन और कहाँ ये उथल पुथल । उधर से गदहू परसाद हौले हौले डोलते हुए चले आ रहे थे । बेचारे गदहू को भार ढोने का इतना हैबिट हो गया था कि बिना भार के भी वह ऐसे चल रहा था जैसे कै सौ मन उसके ऊपर लदा हो । दूर से धीरे धीरे हेंगियाते चले आ रहे गदहू परसाद की आँखें बेचैनी में टहल रहे मोर बाबा के ऊपर ही जमी हुई थीं । 
पास आ कर गदहू से रहा नहीं गया इसीलिए पूछ ही लिया “काहे मोर बाबा, जवान बेटी के बाप जईसे परेसान लग रहे हैं, ऐसी क्या बात हो गई जिसने आपको अटल से आडवानी बना दिया ।”
“क्या बतावें गदहू ससुर तंग आगए हैं इन बड़बोले इंसानों से । कुकुर कहीं के, पहिले आपस में लड़ते थे फिर जानवरों को बीच में घसीटने लगे अब हमारी लव लाईफ़ में सेंध लगा रहे हैं । बताओ जो कभी हमारा नाम भी नहीं लेता था वो भी जूटूब पर मोर प्रजनन विधि तलाश रहा है । मने हद हो गई अब तो ।” परेशान मोर बाबा ने अपना दुःख गदहू के सामने रखते हुए दो आँसू आँखों के किनारों पर लटका लिए । 
“अरे महराज आँसू मत गिर्ईए, एक ठो मोर नो मोर हो जाएगा । पहिलही बड़ा कमी है मोर बिरादरी का । अऊर इन सब के बात का लोड नहीं लिया करिए ससुर इंसान हईऐ अईसा है ।”
इसी बहस के दौरान बूढ़ी गऊ माता अपने दुःखों का पहाड़ मूड़ी पर लादे चली आ रही थीं । दोनों को किसी विशेष मुद्दे पर गहन चिंतन करते देख थोड़ा ठहर कर माहौल को भांपने की कोशिश की तो सारा माजरा सामने आ गया । अब गऊ माता की आँगों से गंगा मौसी बहने लगीं । 
“का कहत हो मोर बिटवा पहिले अपने हाल में जईसे थे खुश थे । कोनो हमारा नाम नहीं लेता था तो जहाँ चारा दे कर दूध लेते थे वहाँ पड़े रहते थे जहाँ काट कर लटका देता था तो बच्चा सब का पेट भरने के लिए लटक जाते थे जहाँ नाथ पगहा खोल के बेलगा देता था वहीं भटकते रहते थे । जईसा भी था कम से कम कोने के जान जाने का कारण तो नहीं बनते थे । मगर जब से हमरे नाम पर राजनीति का मोहर लगा है तब से बहुत दुःखी होते हैं । हाल सुधरने की जगह अऊर बिगड़ गया है । पहिले कम से कम इज्जत तो थी मगर अब तऽ बीच सड़क पर हमको विरोध के नाम पर काट देता है । हमको कटने से डर नहीं लगता, हमको डर लगता है अपने कटने के कारण उठ रहे विरोध से हमको डर लगता है अपना बेज्जती से । हम ईस्वर से पराथना करेंगे कि अब तुमको कहीं बीच में सड़क अपना प्रजनन का असली किरिया दिखाने पर मजबूर ना कर दें ये लोग ।” गऊ माता का दर्द उस माँ की तरह छलक रहा था जिसके नाम पर बेटे लड़ते तो हैं मगर ये भूल जाते हैं कि उनकी लञाई में सबसे ज़्यादा चोट माँ को ही लगती है ।
“ना दाई आप नऽ कानिए । आपका लोर देख के कलेजा फटता है । आप सब को देख के भगवान का धनबाद करते हैं कि ऊ हमको नीच प्रानी बनाया । नऽ हम कटते हैं ना ससुर हमारा सूक्स लाईफ किसी से छुपा है न हमको पवित्रता का भार ढोना पड़ता है । बोझ ही ढोना है न तो ढोते रहेंगे एक दिन ढोते ढोते इंसान की तरह मर जाएंगे । इंसान हमरे नाम को गाली बना दिया मगर हम तो कुछ इंसानों को ही गाली समझते हैं । अपना मेहनत करते हैं जो मिलता है खा के पड़ जाते हैं । हम मूरख ही ठीक हैं काहे जाएं इन सब की तरह चलाक बनने जो अपना चलाकी से दूसरों का जीना दुरलभ कर देता है । अऊर मोर बाबा आप इनके बात का लोड मत लीजिए इनका काम ही है सबका नाम उछालना । इनको फेसबुक टवीटर ई सब के लिए रोज कोई ना कोई मुद्दा चाहिए । अब एतना फालतू का मुद्दा आए कहाँ से एही ला ई लोग जिसका मन उसका नाम उछालता है । अब देखिए अभिए कोनो बकलोल हम सबकी बात सुन कर फेसबुक के लिए पोस्ट तईयार कर रहा होगा । अभी सब तेजी दिखाएगा आ फिर दू चार दिन में सब भूल जाएगा । आप जाईए मोरनी दाई संघे नाचिए कुहुकिए ।” गदहू ने अपनी समझ छोटी मुताबिक बड़ी बात कहते हुए दोनों को समझाया ।
“ठीके कहते हो आप दूनू । हम काहे लोड लें । ई ससुर सब भगवान को नहीं बकसता तऽ हम कौन खेत का टमाटर हैं ।”
“खेत का मूली होता है मोर बाबा टमाटर नहीं ।”
“चुप बुड़बक जो हमरे मुंह में आएगा ऊहे बोलेंगे, सही हो चाहे गलत । हम कोनो इंसान से कम हैं का ।” मोर बाबा की बात सुन कर बाकी दोनों भी हँस पड़े और अपने अपने रास्ते चल दिए । मोर बाबा अब शांत थे और मोरनी दाई का याद भी आने लगा था तो नाचने का मूड बना लिए । 
धीरज झा

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