​अंदर जल रही आग से ही अब मशाल जलेगी 

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ट्रेन बस या कहीं शहर बाज़ार में किसी बच्ची पर नज़र पड़ जाए जो प्यारी हो (जैसे बच्चे हमेशा होते हैं) तो चाह कर भी दूसरे पल तक नज़र वहाँ टिकी नहीं रह पाती झुक जाती है अपने आप ही । पहले वक्त था जब बच्चियाँ ज़्यादातर आस पड़ोस के बाकी बच्चों के साथ खेलती रहती थीं, अगर आप कहीं बाहर जाते थे तो निसंकोच अपनी बच्चियों को पड़ोस में या परिचित के यहाँ छोड़ जाते थे । मगर अब डर लगता है और यही डर किसी और को हमें देख कर ना लग जाए जब उनकी बच्ची को हम स्नेह भरी नज़र से देख रहे हों, इसलिए नज़रें झुका लेते हैं  । 
समाज बेटियों को ले कर असुरक्षित महसूस करने लगा है । लोगों का एक दूसरे पर से विश्वास उठ रहा है । शायद ये इंसानों में मर रही इंसानियत का ही नतीजा है । अध्यापक को भगवान से ऊपर की उपमा दी गई है मगर आज उन्हीं में से कई जानवरों ने अध्यापकों के नाम को खरिब कर दिया है । पहले पता होता था कि रात में घर के बाहर जानवर घूमते हैं, मत जाओ दबोच लेंगे मगर अब तो जानवर कौन इंसान कौन यह पता ही नहीं लगता । 
सिर्फ दहेज ही कारण नहीं बच्चियों की कोख में ही हत्या किए जाने का दूसरा बड़ा कारण यह इंसान के रूप में घूम रहे भेड़िए भी हैं । बहुत बड़ी समस्या है जिसका कोई समाधान मिलता नज़र नहीं आ रहा सिवाए इसके कि ऐसे अपराधियों को ऐसी सजा हो जो बाकि के भेड़ियों की आत्मा तक को छील कर रख दे, उनकी रूह तक कांप जाए ऐसा सोचते हुए । 
नेता हो या कोई संगठन अपने लोभ लालच के लिए यहाँ पीड़ित बच्चियों को भी जाति और धर्म के आधार पर बांट देते हैं । मगर असल में बात दलित सवर्ण मुस्लिम या किसी भी जाति की नहीं बात है बेटियों की । अगर एक देश में रह रहे हैं तो ये सब हमारे देश की ही बेटियाँ हैं । बहुत असहाय महसूस करता हूँ ऐसी घटनाएं देख सुन कर । 
वैसे तो सोचने की परिस्थीति में बिलकुल नहीं हूँ मगर सोचता हूँ अभी नहीं तो कभी नहीं । बहुत जल्द एक कदम उठाने जा रहा हूँ इससे कुछ और हो या ना हो मगर यह मलाल नहीं रहेगा मरते वक्त कि मैं बस फेसबुक पर पोस्ट डाल कर रह गया । और जब आग लग ही रही है तो उसका इस्तेमाल मशाल जलाने में क्यों ना किया जाए । 
धीरज झा

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