बेटी बनाम देश की बेटी

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​बेटी बनाम देश की बेटी
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“माँ मैं घर आना चाहती हूँ । आपको और पिता जी को देखने का मेरा बड़ा मन करता है । बस एक बार अपनी नातिन को पिता जी गोद में ले कर दुलार लेंगे ना तो सारा गुस्सा ठंडा हो जाएगा ।” करुणा द्वारा बोला गया एक एक शब्द अपराधबोध एवं आत्मग्लानि में डूबा हुआ था । उसे आत्मग्लानि होती भी कैसे ना उसने प्रेम करने का बड़ा पाप जो किया था । उसने अपने पिता के खिलाफ़ जा कर एक ऐसा जीवनसाथी चुनने की गलती की थी, जिसने उससे शादी नहीं की बल्कि उसके नाम अपनी ज़िंदगी की हर खुशी लिख दी थी । 
प्रेम बस किताबों में ही तो पवित्र होता है व्यवहार में आते ही प्रेम से बड़ा पाप नहीं कोई । शादी के चार साल के भीतर करुणा का माँ को यह बत्तीसवाँ फोन था । माँ के बेबसी भरे आँसू उसकी हिम्मत हर बार तोड़ देते थे और वो हर बार कुछ महीनों में हिम्मत समेट कर फिर से माँ को फोन कर देती । 
“तू अपने पिता जी को जानती तो है । वो एक बार जो मन में ठान लेते हैं उस बात से फिर कभी पीछे नहीं हटते । मगर तू चिंता मत कर मैं इस बार फिर उनसे कहूंगी ।” इतना कह कर माँ ने पिता जी की आहट महसूस करते फोन काट दिया । माँ हमेशा औलाद और पति के बीच इस तरह पिस कर रह जाती है कि खुल कर रोना भी नसीब नहीं होता उसे । 
शाम की चाय के समय करूणा की माँ ने उसके पिता जी को समझाते हुए कहा “देखिए ना करुणा को गए हुए चार साल हो गए । एक ही तो बेटी है हमारी उससे भी मुँह मोड़ लेना कितना गलत है । माना उसने आपकी मर्ज़ी के खिलाफ़ जा कर अपना घर बसा लिया मगर ये भी तो सोचिए कि वो आज खुश है और माँ बाप अपने बच्चों की खुशी से ज़्यादा क्या चाहेंगे । जानते हैं हमारी नातिन दो साल की होने वाली है, बहुत सुंदर है । आप कह दें तो उन्हें एक दिन के लिए मिलने…..” माँ के शब्द पूरे भी नहीं हुए थे कि कप के टूटने की ज़ोरदार आवाज़ के साथ पिता जी की गर्जना ने माँ को अंदर तक हिला दिया । 
पिता की आँखें क्रोध से इतनी लाल हो गई थीं कि लग रहा था अभी आँखों से खून बरसने लगेगा “तुम्हें कितनी बार कहा है उसका नाम मेरे सामने मत लिया करो । मेरी इज्ज़त को पैरों तले रौंद कर उसने ग़ैर बिरादरी के लड़के से शादी कर ली । मेरे लिए वो उसी दिन मर गई थी । मैने उसे हर सुख सुविधा दी हर तरह का प्यार दिया मगर फिर भी उसने मेरे और एक पिता के विश्वास के साथ धोखा किया । मेरा भी मन करता है अपनी नातिन को गोद में उठाने का मगर इन दोनों के रहते मैं उसे भी इस दहलीज़ पर कदम नहीं रखने दूँगा । हाँ वो दोनों मर जाएं…..”
“बस करिए मुझे नहीं मिलना उन सबसे और ना ही मैं उनका नाम कभी लूंगी मगर ईश्वर के लिए आप ऐसी अशुभ बातें….. ।” माँ की बात बीच में ही रह गई क्योंकि इसी बीच शर्मा जी ने दरवाज़े पर दस्तक दी । दोनों ऐसे शांत हो गए जैसे दोनो के बीच कुछ हुआ ही नहीं । करुणा की माँ ने सर पर दुपट्टा ले कर शर्मा जी को नमस्कार  किया और उनके लिए एक प्याली चाय लेने रसोई की तरफ़ रुख कर लिया ।
“और ठाकुर कैसे हो ?”
“बस बढ़िया हूँ शर्मा यार । तू अपना बता, और क्या  नया हो रहा है  आज कल ?” करुणा के पिता जी ने अपने सबसे घनिष्ठ मित्र (जो उनके सुखदुख से ले कर राजनीति विमर्श तक के इकलौते साथी थे) के सामने अपनी क्रोधाग्नि को ज़बरदस्ती दबाते हुए बहुत शांत स्वर में उनका हाल चाल पूछा ।
“सबसे नया तो ये है कि सरकार का छाती को 56 इंच कर देने वाला नया कारनामा सामने आया है । साले विरोधी कहते थे कि सरकार बस हिंदुओं के हित में काम करती है । अब देख लो, सर्वधर्म समानता का इससे बड़ा उदाहरण और क्या होगा  ।” शर्मा जी ने अपनी सफेद मूंछों को ताव दे कर ठाकुर साहब के जाँघ पर थाप मारते हुए कहा ।
” भई हुआ क्या बताओ भी तो सही ?” ठाकुर साहेब ने उत्सुक्ता से पूछा ।
“अरे इतने सालों से पाकिस्तान में जुल्म सह रही भारत की बेटी उजमा वापिस आ गयी है भाई । और ये सब संभव हुआ है विदेश मंत्री जी की वजह से ।”
ये खबर सुनते ही ठाकुर साहब उछलने लगे “वाह क्या बात है । भारत बेटी को सही सलामत घर ला कर सरकार ने एक बड़ी कामयाबी हासिल की है । भारत की इस बेटी ने बहुत ज़ुल्म सहे हैं ।” इस खबर ने दोनों को खुशी से पागल सा कर दिए । 
हाथ में चाय का कप लिए खड़ी करुणा की माँ नम आँखों में तैरते कुछ सवालों के जवाब ढूंढती हुई सोच रही थी “शायद यही अंतर है किसी की बेटी और देश की बेटी में । काश मेरी बेटी भी देश की बेटी बन जाती तो उसे एक बार सीने से लगा सकती थी ।”
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धीरज झा

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