​’वाद’ गया भाड़ में चलो दारू संग मुर्गा भात खाएं

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नोट – जिनकी साफ सुथरी नजरें अभद्र भाषा की छाया से भी मैली हो जाती हैं वो कृप्या ना पढ़ें । लौंडापनी को दर्शाते हुए ऐसी भाषा का प्रयोग करना ज़रूरी था इसीलिए किए हैं । वैसे कुछ खोलमखोल है नहीं इसमें, चाहें तो पढ़ भी सकते हैं पर अपने रिस्क पर ।

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पंडित जी के रूम पर 
“का हो पांड़े जी बड़ा गदर मचा रहे हो आजकल । समूचा देस से हमारा दाना पानी उठवाओगे क्या ।” पासवान जी पांड़े जी के बगल में पड़ी गोल्ड फ्लैक बिना पूछे सुलगाते हुए व्यंगात्मक लहजे में बोले । 
“जब तुमको पता है कि ‘ऊपर आसमान और नीचे पासवान’ तब काहे का डर बे तुमको । और ये बपौऊती धन समझ के बिना पूछे जो ये इकलौता सिगरेट उठा लिए हो इसका पूर्ती कर के जाना नहीं तो रूम में टपने नहीं देंगे दुबारा ।” पांड़े जी ने अखबार का आखरी पन्ना चाटते हुए कहा ।
इसी बीच दरवाज़ा ऐसे खुला मानों बिहार प्रसासन ने किसी अवैध शराबखाने पर छापा मारा हो । मगर दोनों ऐसे शांति से बैठे रहे जैसे कुछ हुआ ही नहीं क्योंकि दोनों को पता है ये अहमदवा होगा ।
“आओ साले कटुए । झोंपड़ी के तुम्हारे कारण ही सारा बवाल मचा है ।” पासवान जी तीन चार कश खींची हुई सिगरेट को पांड़े की तरफ बढ़ाते हुए बोले ।
“चुप साला दुस्धा । मार मार के गर्दा उड़ा देंगे जादा हीरो बना तो । जानता नहीं है ब्राहम्णों का हमारे सर पर हाथ है ।” पांड़े की तरफ बढ़ रही सिगरेट को लपक कर अपने कब्जे में करता हुआ अहमद बोला । 
“साला हाथ तो नहीं लेकिन अंग विशेष की छत्रछाया तुम पर हमेशा बनी रहेगी । और ई कौन सा तरीका है बे हमारा सिगरेट और हम ही मुँह ताकें ।”
“ऐ बभना मुँह संभाल के बोलिए । अंग विशेष हमरो पास है कहीं उफना गया तो….” 
“हाँ है तो मगर आधा कटा हुआ ।” पासवान ने बीच में से ही बात काट कर चुटकी ली । जोर का ठहाका गूंजा । अहमद ने दो कश लगाई हुई आधे से ज़्यादा जल चुकी सिगरेट पासमन पर फेंकते हुए अपना बनावटी गुस्सा दिखाया । पांड़े जी ने लपक कर सिगरेट उठा ली जिसमें अभी चार पांच कश जितनी जान बांकि थी ।
“बकचोदी छोड़ो आ बताओ रात का क्या पिरोगराम है ।” पाँड़े जी अपने हक़ की सिगरेट को प्रेम से चूसते हुए बोले । 
“कंकड़बाग में एक ठो मुसहर है जिसके पास माल मिल जाएगा । सुना है सारा मुसबा सब सराब गायब कर के उसी को सपलाई करता था ।” अहमद की बात पर ठहाका एक बार और बुलंद हुआ । 
“हाँ तुम्हारे अब्बा वहीं से तो लाते हैं आ चिखना में दू ठो मूस का चर्बी भुजबा लेते हैं ।” पासवान की बात पर फिर हँसी फूटने वाली थी कि इतने में अहमद का गुस्सा फूट गया ।
“साला सौ बार समझाये हैं अब्बा को मत लाया करो बीच में । बेचारे पाँच टाईम के पाबंद नमाजी हैं । और तुम सुन लो बे दुस्धा साला सहारनपुर वाला जोर नहीं दिखाओ नहीं तो मुजफरनगर उखाड़ देंगे खड़े खड़े । फिर चिल्लाना बाप बाप ।” 
“दुत्तबुर, मारेंगे एक हाथ हग दोगे खड़े खड़े । बड़ा आए मुजफरनगर उखाड़ने वाले । रे जानता नहीं हम दलित हैं मारबो करेंगे आ कनबो करेंगे । तुम मुँह ताकते रह जाओगे ।” 
पाँड़े जी रोज़ की तरस की नौटंकी से उबते हुए बोले “साला चुप रहोगे तुम दोनों की हम गोधरा मचा दें यहीं । आज मुर्गा की जगह तुम दोनो को पका देंगे आ खाएगा कुत्ता सब । जब देखो साला हो हल्ला मचाता रहता है । जा रहे हैं मुर्गा पकाने । बियर का इंतजाम हो तो कर लो नहीं तो अपना मुँह नहीं दिखाना ।” 
मुर्गा के नाम से ही दोनों के मुँह में पानी बरस गया । टपक रही लार को संभालते हुए अहमद बोला “बियर तीन ठो हो जाएगा । हमारा एक आदमी है ऊ चोरा कर बेचता है । हम से जादा नहीं लेगा । अगर मुसबा सब उसका दारू न पी गया हो तो इंतजाम हो जाएगा ।” 
“चलो जाओ तो ले कर आओ इहाँ बईठे अहीन चोदने से दारू आएगा क्या । और एक बात बताओ, कहते हो हमारा एक ठो आदमी है, भोंपड़ी के तुम औरत हो जो आदमी रखे हो ।” पासवान इतना कह कर ठहाका मारता हुआ भागा और अहमद उसके पीछे पीछे । पाँड़े जी दोनो को मन ही मन प्यार से गलियाते हुए मुर्गा विसर्जन की तैयारी में जुट गए । 
शाम को अहमद तीन की बियर के साथ एक देसी का हाॅफ भी जुगाड़ लाया । शायद मूस बाबा ई उसके लिए छोड़ गए थे । सब ने बैठ कर मुर्गा खान और मदिरा पान किया । 
कोने में बैठा ब्राहम्णवाद मुस्लिम कट्टरपंथ से दलित चिंतन करता हुआ देश की बिगड़ती हालत पर आँसू बहा रहा था । ये बात अलग है कि तीनों अपने गाँव में दंगा उखड़ने पर कट्टर ब्राहम्ण कट्टर मुस्लिम और कट्टर दलित हो जाते थे थे मगर यहाँ अपने अपने ‘वाद’ का चोगा उतार कर दारू के लिए गिलास और मुर्गा भात के लिए थाली में बंटवारा नहीं करते थे । 
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धीरज झा

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