​#किसकी_ज़रूरत_बड़ी

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​#किसकी_ज़रूरत_बड़ी 
“ऐ बाबू लेडीज खड़ी है, आ तुम हट्टा कट्टा हो कर चौड़े हो कर बईठे हो । बहुत सरम का बात है ।” 40 की उम्र में 45 के दिखने वाले ( शारीरिक रूप से ठीक ठाक ) अंकल ने (सारा दिन धूप में भाग दौड़ करने के बाद थके टूटे) नौजवान लड़के को हू ब हू “आदेश” जैसा लग रहा “आग्रह” किया । 
मगर लड़का टस से मस नहीं हो रहा था । एक तो बहुत थका हुआ था दूसरा कुछ अंकल के ज्ञान को नज़रअंदाज़ भी कर रहा था । आखिर में अंकल ने (कानों में हेड फोन ठूंसे हुए) सामने खड़ी लड़की के हक़ के लिए लड़के को ज़ोर से हिलाया “सुनाई नहीं देता तुमको कह रहे हैं लेडिज है, बैईठने दो उनको ।”
एक तो थकान चिढ़ा रही थी ऊपर से अंकल की बकलोली, भला जवान खून इतना सहनशील थोड़े होता है, लड़के ने लगभग चिलाते हुए अपनी भड़ास निकाली “तुम वकील हो इसके ? तब से टें टें करे जा रहे हो । हम साला उम्र का लिहाज कर के बोल नहीं रहे कुछ तो तुम सर पर चढ़ के हगोगे । और काहे दें सीट अपना किसी को? पईसा खरचे हैं, कोनो तुम्हारी तरह एस्टाफ कह कर मुफत में नही चढ़े । ई लड़की अपाहिज है या उसको चक्कर आ रहा है जो सीट छोड़ दें ? साला रोज़ नारी सस्क्तिकरण का नया नारा ले कर जलूस पर जलूस निकलता जा रहा है और तुम हो कि कहते हो लड़की है, कमजोर है, सीट छोड़ दो । और इतना ही तुमको दिक्कत है तो साला तुम छोड़ दो सीट, ऐतना देह ले के अंचार डालोगे । आ हम सब बूझते हैं कि एतना नारीवादी काहे हुए जा रहे हो । अब हमको टोके तो साला सारा नारीबाद हम घुसा देंगे हेने होने ।” लड़के का रूद्र रूप देख अंकल एक कोने में दुबक कर बैठ गए । दोबारा एक जफ्ज़ ना उनके मुंह से निकला । 
दो स्टाॅप बाद बस रुकी । कुछ सवारियाँ उतर गईं कुछ नई चढ़ी । कंडक्टर के चिल्लाने की आवाज़ आई “ऐ बुढ़ी चढ़ना है तो चढ़ो जल्दी एतना टाईम नहीं है हमारे पास ।”  बस के पिछले गेट से एक बुढ़ी माई चढ़ी जिसकी देह पूरी तरह पसीने में भीगी थी । उम्र का असर उसके हाँफने में दिख रहा था । खुद का वजन संभालना मुश्किल था ऊपर से इतना बड़ा झोला उठाई थी । उसकी तरफ किसी का ध्यान नहीं था सिवाए उस लड़के के । 
बस के चलते ही झटका लगा जिसने बुढ़ी माई को लगभग गिरा ही दिया था अगर लड़का झट से खड़ा हो कर उसे संभालता नहीं । संभालने के साथ ही लड़के ने उसे अपनी सीट बूढ़ी माई को ये कह कर दे दी “ईहाँ अराम से बईठो माई । आ टिकट मत कटाना हम कटा लेंगे ।” शायद बुढ़ी माई यही दुआ कर रही थी की कोई उसकी टिकट कटा दे इसीलिए बिना दाँतों वाली प्यारी सी मुस्कुराहट बिखेरते हुए खूब आशीर्वाद दिया ।
सामने बैठा अंकल लड़के की तरफ गौर सी देख रहा था । मानों कह रहा हो “हम कहे तो नहीं दिए और अब सीट भी दे दिए और टिकट भी कटा लिए बुढ़ी का ।”
इधर से लड़का भी मुस्कुरा कर अंकल को देख ऐसे देख रहा था जैसे उत्तर दे रहा हो कि “उसे सीट की ज़रूरत नहीं थी लेकिन बूढ़ी माई को ज़रूरत थी, सीट की भी और टिकट की भी ।” 
दिखावे से ज़्यादा ज़रूरी है यह महसूस करना कि ज़रूरत किसकी बड़ी है । कई बार एक भिखारी जिस पर तरस खा कर हम पचास रुपए भी दे देते हैं वो पहले से जेब में हज़ार दो हज़ार दबाए बैठा होता है और कई बार कोई अच्छे कपड़े पहना हुआ आदमी खाली जेब लिए परेशान घूम रहा होता है । भेड़ चाल में चलते हुए नहीं बल्कि अपनी समझ से किसी की मदद करना ज़रूरी है । जिसको ज़रूरत होगी वो अपनी ज़रूरत आपको बिना बोले महसूस करा लेगा । 
धीरज झा

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