कुछ_बातें_कल्पनाओं_से_उधार_ले_कर

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“एक नया रिश्ता ढूँढा है पापा ने ।” 
“हम्म्म्म्म ।” 
“बस हम्म्म्म्म ?” 
“तो और क्या कहूँ ।” 
“कुछ मत कहो । चुपचाप बैठे रहो ।”
“मेरे कहने से होने भी क्या वाला है । तुमे डर लगता है तो तुम बोलोगी नहीं, मैं बोल भी लूँ तो मेरी कोई सुनेगा नहीं । बताओ क्या करूँ ?”
धड़कनों को छोड़ बाक़ी सब खामोश 
“अच्छा लड़का कैसा है ?” 
“लड़के जैसा है और कैसा होगा ।”
“अरे मतलब करता क्या है ? दिखता कैसा है ?”
“मुंबई में किसी मल्टीनेश्नल कंपनी में अच्छी पोस्ट पर है, देखने तुम्हारे मुकाबले आधे का भी आधा नहीं है । माथा ऊंचा है, दांत बाहर हैं थोड़े, रंग सांवला है ।” 
“तो फिर पापा अपनी लाडली बेटी का रिश्ता ऐसे लड़के से क्यों कर रहे हैं ?” 
“क्योंकि लाखों का पैकेज है, एक घर लखनऊ में है, दो फ्लैट मुंबई में हैं । अच्छी खासी संपत्ती है । दो ही भाई हैं, माँ नहीं है तो सास का भी झंझट खत्म । यही सब वजहें हैं उसे पसंद करने की ।”
“और उसका स्वभाव ?”
“वो मायने नहीं रखता । उनके हिसाब से उनकी लड़की को उन्होंने इतने अच्छे संस्कार दिये हैं कि वो यानी मैं हर तरह एडजेस्ट कर लूंगी, चाहे लड़के का स्वभाव जैसा मर्ज़ी हो ।” 
“वाह रे नारीवादी लड़की । बेसबुक पर पोस्ट करती नहीं थकती और यहाँ समझौता कर रही हो वो भी अपनी ज़िंदगी से ।” 
“फेसबुक से बहुत अलग है असल दुनिया, पापा का दिल नहीं दुःखा सकती ।” 
“और मेरे दिल का क्या ?” 
फिर से सन्नाटा 
“खैर मुझे तो आदत है सहने की मगर तुमें एक नसीहत देना चाहूँगा । मेरे बारे में भले घर में कुछ मत बताओ, मगर अपनी खुशियों और आज़ादी से समझौता मत करना । पापा के कहे मुताबिक ही शादी करनी है तो उनसे कहना कि तुम खुद लड़के से मिलना चाहती हो जांच परख के शादी करना । वरना क्या फायदा होगा इस प्रेम को बलि चढ़ाने का । इससे तो आगे चल कर वो पिता भी खुश नहीं रह पाएंगे जिनके लिए तुम इतना बड़ा बलिदान कर रही हो ।”
“पता नहीं कहाँ से इतनी हिम्मत लाते हो । ये सब बोलते हुए अंदर से टूट रहे हो मगर चेहरे पर वो टूटने का दर्द ज़रा भी नहीं झलकने दे रहे ।”
“दर्द झलका के फायदा भी क्या । मैं कुछ और कर भी तो नहीं सकता तुम्हारी मर्ज़ी के बिना ।”
“कर सकते हो ना ।”
“क्या ?” 
“पापा को कनविंस कर सकते हो ।” 
“हुंह, यहीं हे दिल से दिल की तार जोड़ कर ना ।”
“नहीं कल शाम चाय पर ।”
“क्या ?”
“हम्म्म्म पापा को बता दिया कल बुलाये हैं ।”
“तो पागल इतना ड्रामा क्यों ?”
“अच्छा लगता है देख कर ना कि किसी की आँखों में तो मुझे खोने का डर झलकता है । मेरे कुछ तो मायने हैं ।”
शाम की गोद में सूरज ढल रहा था, नमिता ने अभय को अपनी बाहों में समेट लिया । सूरज कल फिर से अपने नये सवेरे के बारे में सोचने लगा, अभय कल की शाम जो उसके जीवन का नया सवेरा लेकर आएगी उसके बारे में सोच कर मुस्कुरा उठा । 
धीरज झा  

गंगा माई उसके साथ उसके सारे दुःख बहा कर ले गयी 

#गंगा_माई_उसके_साथ_उसके_सारे_दुःख_बहा_कर_ले_गयी (काल्पनिक कहानी)

नदी के समानांतर चल रही पगडंडियों का पड़ाव उस छोटे से जंगल में थोड़ा ठहर जाता था सुस्ताने के लिए । उसी पड़ाव पर सबसे छुपछुपा कर बैठी सरिता से बिसंभर ने बड़े भारी मन से कहा “ए सरिता, तू तो गंगियां माई हो गयी रे ।” 
“ऐसा काहे कहते हो ?” अपनी मजबूरियों का बांध बना कर सरिता ने आँखों में उमड़ रहे सैलाब को रोकने की कोशिश करते हुए बिसंभर की ओर देख कर पूछा । 
बिसंभर को पता था अगर अब वो कुछ बोला तो उसकी थरथराती ज़ुबान में सरिता उसकी टूटती हुई हिम्मत की गुमसुम आवाज़ को पहचान लेगी । इसीलिए चुपचाप बस सामने धोबी घाट को देखते हुए सरिता के सवाल दोहराने से पहले खुद को मजबूत करने लगा । 
“बोलोगे भी नहीं अब ?” हिम्मत की बांध में छोटा सा छेद बना कर एक आँसू चुपके से पलकों पर से लुढ़कता हुआ उसके उन सूखे होंठों पर फैल गया जो कुछ दिन पहले तक कश्मीर की वादियों से खूबसूरत थे मगर अब रेगिस्तान से बंजर हो गये थे । 
“तुम से ना बोलेंगे तो जाएंगे कहाँ ।” आवाज़ में थरथराहट अभी भी कायम थी । 
“बताओ काहे अईसा कहे ।” 
“नदी को गौर से देखो सरिता, कितनी शांत है ना ? मगर ये शांति बस ऐसे ही नहीं है, ये चिंतन है उस विकराल स्वरूप का जो कुछ दिनों में ये धारन करने वाली है ।  का का नहीं देखी ई, छठ घाट की रौनक से में झलकती खुशी देखी है, गाँव के बच्चों को अपनी गोद में तैरना सिखा कर उनकी आँखों में उमड़ आए उत्तसाह को देखा है इसने, गरीब किसानों को अपना आँचल निचोड़ कर उनके खेतों को जल रूपी जीवन देने के बाद उनकी चेहरे पर उम्मीद भरी मुस्कान देखी है इसने । मगर जब ई बौराती है ना तो इसका मन एक दम से बदल जाता है । फिर ये अपने बगल के खेतों में जलती लाशों को देख कर उठते मातम को भी चुपचाप सुनती है, जब ये बौराती है तो उन खेतों को जिन्हें इसने अपने आँचल को निचोड़ पानी दिया उन्हें पूरी तरह बर्बाद कर देती है, वो बच्चे जो इसकी गोद में तैरना सीखे वो सब इसी की गोद में समा।जाते हैं हमेशा के लिए और ये उफ्फ़ तक नहीं करती । इसका भावुक मन कब निर्मोही हो जाता है पता भी नहीं चलता । इससे सवाल करो तो बेबस हो कर आसमान की तरफ इशारा करते हुए सारा दोष उन बादलों के सर मढ़ देती है ।” अपनी ही आवाज़ की कंपन से बिसंभर का मन थरथर करने लगा था  । सरिता के आँखों पर से हिम्मत का बांध पूरी तरह टूट गया था । वो बस बिसंभर को हुने जा रही थी । 
“तू भी तो इसी की तरह निर्मोही हो गयी सरिता । हमारी खुशी में।हमसे जादा खुस हुई, हमारे हर दर्द को हमसे ज़्यादा महसूस किया, हमारी आँख का आँसू सबसे पहिले तुम्हारी आँख से बहा, हमारे चेहरे की खुशी सबसे पहिले तुम्हारे चेहरे पर झलकी । और आज देख लो तुमको कोई फरक ही नहीं पड़ता, ई भी नहीं सोची कि साला तुम्हारे बाद हम जीयेंगे कईसे । रे कम से कम एक ठो कोसिस तो करती मगर तुम तो किस्मत का लिखा कह कर उसे ही दोसी ठहराते हुए निर्मोही हो गयी रे ।” बिसंभर की आवाज़ कांपते कांपते कब चिल्लाहट में।बदल गयी पता ही नहीं लगा । उसकी चीख़ में इतना दर्द था कि पेड़ पौधे चिड़ई चुनमुन सब दहल गये । 
“कास तुमको समझा पाते हम कि हम कितना तड़प और दर्द महसूस कर रहे हैं । औरत से सब अधिकार छीन कर मर्द सोचता है कि उसके सीने में दिल ही नहीं । जबकि औरत अपना दिल में अपना छोटा बड़ा केतना इच्छा के कतल कर देती है काहै कि उसको बोलने का अधिकार ही नहीं । किसी जनम बेटी बन के आना बिसंभर सारा गलत फहमी दूर हो जाएगा । बाख़ी ई तन तुम्हारा था तुम्हारा रहेगा और ई मन तो हमेशा हे ही तुम्हारे नाम है ।” इतना कह कर सरिता उठ कर अपने रास्ते चली गयी । आज पहली बार था जब बिसंभर ने ना उसे जाने से रोका और ना ही उसे जाते हुए तब तक निहारा जब तक वो मोड़ पर जा कर आँखों से ओझल ना हो गयी । 
बस मन ही मन कह रहा था कि तुम क्या हो और कितना प्यार हमसे करती हो ये तुमसे बेहतर हम जानते हैं मगर फिर भी बार बार तुम्हें कोसते हैं ये सोच कर कि शायद यह कोसना ही तुम में वो हिम्मत जगा दे जो सारी बेड़ियों को तोड़ तुम्हें हमेशा के लिए मेरा होने पर मजबूर कर दे । 
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बिसंभर की पीड़ा शायद आसमान तक को महसूस हुई थी इसलिए वो उसी दिन से बरसने लगा और ऐसा बरसा कि थमने का नाम ही नहीं ले रहा था । इधर बिसंभर के कहे अनुसार नदी जो दो चार दिन पहले तक शांत थी उसने आज अपना विकराल रूप लेना शुरू कर दिया था । बिसंभर की पीड़ा असहनीय थी मगर वो किसी के सामने कमज़ोर नहीं दिखना चाहता था । इधर गाँव को नदी अपने में समाहित करती चली जा रही थी । लोगों के घरों तक गंगा मईया अपना पैर पसार चुकी थीं ।
“रे कोनो लईका डू बरहा है । कोनो बचाओ रे ।” किसी की चीख़ ने बिसंभर को उसकी काली सोच के फंदे से बाहर ला फेंका । बिसंभर दौड़ता हुआ अपने दुआर पर पहुंचा जो अब नदी का घाट बन चुका था । आधे से ज़्यादा गाँव तैरना जानता था मगर इस वक्त नदी के प्रकोप का सामना करने की हिम्मत किसी में ना थी । बिसंभर को अब पीड़ा महसूस नहीं हो रही थी, उसके दिमाग में घर कर बैठी वो काली सोच का भी कहीं अता पता नहीं था, उसे इस समय सिर्फ वो बच्चा दिख रहा था । बिसंभर बिना देर किये कमर में रस्सी बाँध नदी में कूद पड़ा । वो नदी जिसका कोई अंत नहीं दिख रहा था उसके बीचों बीच वो बच्चा बहता हुआ चला आ रहा था ।  
बिना रुके बिसंभर तैरता हुआ बच्चे तक पहुंच गया । बच्चा साहसी था, लड़ना जानता था ज़िंदगी के लिए । बिसंभर ने रस्सी बच्चे की कमर में लपेट लीऔर घाट की तरफ बढ़ने लगा । बिसंभर की देखा देखी लो चार और लोग भी कूद पड़े थे नदी में । वो बच्चे तक पहुंचे बच्चे की कमर में रस्सी बंधी थी, वो ठीक था मगर बिसंभर कहाँ गया ? अभी तो बच्चे के साथ था अभी कहाँ गायब हो गया ?
“बिसंभरा डूब गया ।” 
“सरितवा को पंडुब्बी पकड़ लिया ।” 
पूरे गाँव में दो आवाज़ें एक साथ उठीं । ना एक मिनट आगे ना एक मिनट पीछे । एकदम साथ साथ ही । नदी के एक घाट से एक आवाज़ नदी के दूसरे घाट से दूसरी आवाज़ । एक पल में ये क्या हो गया कोई समझ नहीं पाया ।
वो दर्द, वो पीड़ा, वो प्रेम जो गाँव नहीं समझ पाया उसे गंगा माई ने समझ लिया शायद । बहा ले गयी दोनों के दुःख दर्द को । इधर भिसंभर पहिलहीं अनाथ था । एक दो दोस्तों को छोड़ कोई रोने वाला नहीं था । उधर सरिता बेटी थी । 
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“ऐ सरिता, ऐ उठो । देखो हम हैं । उठ जाओ ।” सरिता का पेट दबाते हुए बिसंभर बेचैन सा हो उठा । 
मुँह से पानी उगलते हुए सरिता की भक्क से आँख खुली ।
“पगलिया, डरा दी थी हमको ।” डर को हटाते हुए खुशी ने बिसंभर के चेहरे पर कब्ज़ा कर लिया । 
“ऐतना जोखिम मरने के लिए उठाये क्या ।” सरिता मुस्कुराते हुए बोली ।
“पागल जईसे काहे कूद गयी ? अगर हम नहीं पहुंचते तो ?” सरिता के कांपते शरीर को बाहों में समेटते हुए बिसंभर बोला ।
“भरोसा अपार था । रास्ता कोई दूसरा था नहीं । वो बच्चा भगवान था, उसके पीछे तुमको कूदते देख हम समझ गये कि हमको क्या करना है । हम जानते थे तुम हमको देख लोगे और चाहे पानी में रहें चाहे आग में मगर जब तक तुमारी बाहों में रहेंगे हमारा आग चाहे पानी कोनो कुछो नहीं बिगाड़ सकता ।” विश्वास उसके चेहरे पर झलक रहा था । 
“पागल हो पूरी । अब जाएंगे कहाँ ?” 
“गाँव छोटा था प्यारे मगर दुनिया बहुते बड़ी है । अब तो तुम्हारे हैं तुम चाहे जहाँ ले चलो ।” बिसंभर ने अपनी बाहों को और ज़ोर से कस लिया ।
दोनों एक लूसरे का हाथ थामे हुए आगे एक अंजान सफर की तरफ़ निकल पड़े । बिसंभर हंस रहा।था यह सोच कर कि इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ होगा कि मंज़िल को साथ ले कर कोई अंजान सफर पर निकल रहा होगा । बिसंभर ने पीछे मुड़ कर देखा गंगा माई अपनी लहरों को उछालती हुई दोनों को आशीर्वाद दे रही थी । बिहंभर ने मन ही मन उन्हें प्रणाम किया और विनती की कि अब अपना प्रकोप कम कर लेना । 
धीरज झा 

डूबेगा_बिहार_तभी_तो_धन_आयेगा_अपार


कल भारत की आज़ादी की 71वीं वर्षगाँठ मनाई गयी । 70 साल पूरे हुये हमें आज़ाद हुये । पूरे देश में इसे ले कर जश्न कि माहौल था । देश के हर कोने से लोगों ने इस जश्न को मनाते हुए अपनी रंग बिरंगी तस्वीरें सोशल मीडिया पर शेयर कीं । सभी तस्वीरें अपने गौरव का गान सुना रही थीं मगर इन सभी तस्वीरों में एक तरह की कुछ तस्वीरों ने लोगों को बहुत प्रभावित किया । एक स्कूल की वो तस्वीर जिसमें एक मास्टर जी और तीन बच्चे तिरंगे को सलामी दे रहे हैं । लोगों को प्रभावित उनकी सलामी नहीं बल्कि उस हालत ने किया जिस हालत में वो तिरंगे को सलामी दे रहे थे । 
तीनों बच्चों की छाती तक और मास्टर जी की कमर तक पानी भरा हुआ था और वो सब इस आपदा को ठेंगा दिखाते हुए अपने देश की आज़ादी के जश्न को मनाने में लगे थे । एक तरफ मैने उस सलामी को लाल किले पर माननीय प्रधानमंत्री जी द्वारा दी गयी सलामी से ज़्यादा महत्वपूर्ण माना तो दूसरी तरफ उनकी इस दशा पर मन रो भी पड़ा । 
इस वक्त असम, बिहार, यू पी के कुछ क्षेत्रों में बाढ़ ने अपना कहर बरसा रखा है । इस बाढ़ से केवल बिहार के 13 जिलों में लगभग 70 लाख लोग प्रभावित हैं जिनमें 72 लोग अपनी जान गंवा चुके हैं । यह स्थिति कोई नयी नहीं है, हाँ इस बार इसका रूप पिछले कुछ सालों के मुकाबले ज़्यादा विकराल है और आप सब तक मिडिया द्वारा यह खबर पहुंचाई जा रही है तब आपको इसका पता लगा मगर मैं इसे बच्चपन से जानता हूँ और अपने पिता और बाबा के माध्यम से तो तब से जब बाबा ही बहुत छोटे थे । 
बिहार के सीतामढ़ी जिले के मेजरगंज थाना में स्थित मेरा गाँव बिसनपुर जो बिहार के बाक़ी गाँवों की तरह बाढ़ से हर साल प्रभावित होता है । यहाँ की बांघमति धार से बनी मनुसमारा नदी हर साल अपने रूप का विस्तार कर लेती है और हर साल यहाँ बना बम्मा पुल टूट जाता है । गाँव का इसके इकलौते बाज़ार मेजरगंज से लगभग संबंध टूट जाता है क्योंकि वहाँ तक पहुंचने का यह इकलौता रास्ता है । बाक़ी रास्ते दस कि.मी घुमा कर आपको बाज़ार वाली सड़क से जोड़ते हैं और वो भी कितनी मशक़तों के बाद । 
यह मेरा एक गाँव है और पूरे बिहार में ऐसे अनगिनत गाँव हैं जो हर साल बाढ़ की मार के कारण दुल्हन से विधवा बन जाते हैं । गाँव वाले जब तक अपने गाँव को पहले की तरह संवारते हैं तब तक दोबारा बाढ़ आ जाती है इन्हें उजाड़ने । 
मैं मानता हूँ बरसात, बाढ़ ये सब प्राकृतिक आपदाएं हैं मगर ऐसा भी नहीं की इनकी रोकथाम नहीं की जा सकती और ऐसा भी नहीं कि इनकी रोकथाम के लिए कोई कदम उठाने की मंजूरी नहीं दी जाती मगर हाँ मंज़ूरी तो दी जाती है मगर कदम उठता नहीं । उस कदम को उठाने के लिए मिलने वाली राशी ना जाने कौन से बस्ते में रखी जाती है।जो फिर दोबारा दिखाई ही नहीं देता । केवल बिहार क्यों पूरा देश ही समय समय पर इस बाढ़ नामक आपदा से प्रभावित होता है मगर इन्हें हर साल अपने मंत्रियों के उड़ रहे हैलीकाॅपटरों के दर्शन के सिवा और कुछ हाथ नहीं लगता । 

ऐसा नहीं कि केंद्र सरकारें इन आपदाओं की रोकथाम के लिए कोई राशि नहीं देती । हाँ मगर वह राशि पूरी तरह से यहाँ तक पहुंचती ही नहीं । जैसा कि गृह मंत्रालय की एक रिपोर्ट का कहना है कि बाढ़ प्रबंधन कार्यक्रम के तहत 2007 से 2017 के बीच 12,243 करोड़ रुपये की 517 परियोजनाओं को मंजूरी दी गई थी मगर इनमें से अब तक केवल 297 परियोजनाएं ही अपनी मंजिल तक पहुंच पाई है और बाकिओं को अगर अब भी पूरा किया जाए तो 13 साल तक का समय लगेगा । समय लग कर भी कुछ बेहतर हो जाए तो भी कोई बात नहीं मगर यहाँ तो राशि ही गायब हो जाती है । 

सीएजी की रिपोर्ट में परियोजनाओं के पूरा होने में लेट-लतीफी की वजह केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा पैसे जारी में देरी करने के साथ-साथ जमीन का अधिग्रहण न होना बताया गया है । 2007 से मार्च, 2016 के बीच केंद्र ने एफएमपी परियोजनाओं के लिए प्रस्तावित 18 हजार करोड़ रु में से केवल 4,723 करोड़ रुपये ही जारी किए हैं । असम में 141 परियोजनाओं के लिए कुल 2,043 करोड़ रु देने की बात कही गई थी लेकिन अभी तक 812 करोड़ रु (करीब 40 फीसदी) ही दिए गए हैं । 
बाढ़ प्रबंधन कार्यक्रम के प्रावधानों के मुताबिक राज्यों द्वारा परियोजनाओं पर खर्च की गई रकम की ऑडिट स्टेटमेंट रिपोर्ट सौंपने पर ही केंद्र द्वारा फंड जारी किया जा सकता है  लेकिन सीएजी के ऑडिट में पाया गया है कि 2007 से मार्च, 2016 के बीच स्टेटमेंट रिपोर्ट न सौंपने के बावजूद छह राज्यों (असम, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, झारखंड, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश) को 2161.79 करोड़ रु जारी कर दिए गए । इनमें से असम को सबसे ज्यादा 814 करोड़ और उत्तर प्रदेश को 402 करोड़ रु जारी किए गए । इसके अलावा पांच राज्यों (असम, बिहार, ओडिशा, उत्तराखंड और पश्चिम बंगाल) ने अब तक कुल मिलाकर 183 करोड़ रुपये के यूटिलाइजेशन सर्टिफिकेट जमा नहीं किए हैं ।
ये रकम जिसका कोई ब्यौरा नहीं बना आखिर वह गयी कहाँ  ? ये सब देखने और इस पर सोचने के बाद एक ही बात आती है दिमाग में कि शायद यह जो गाँव के फूस के छप्परों में रहने वाले अमीर लोग हैं इनका मरना ही सही है क्योंकि यह बाढ़ के नाम से बलि नहीं चढ़ेंगे तो फिर उन गरीबों के घर खुशहाली कैसे आएगी जो, कितनी मेहनत से झूठ बोल बोल कर मंत्री बने हैं, जो कुदरत के बरस रहे कहर का मुआईना कोक पीते हुए हैलीकाॅप्टर में बैठ कर करते हैं, जो दर्द से कराह रहे लोगों की आहों को नज़र अंदाज़ कर सेल्फियों के लिए पोज़ देते नहीं थकते, जिनके लिए आपदाएं सिर्फ एक मुद्दा होती हैं जिसको वो चुनाव के वक्त खूब अच्छे से भुना कर जनता को ठगते हैं । 
अगर देश में कोई आपदा ही ना हो, सब ठीक हो जाए तो भला कौन चुनाव जीतने में करोड़ों खर्च करेगा । तो इन गरीबों के बने रहने के लिए गाँव के अमीरों का डूबते  रहना ज़रूरी है । 
धीरज झा

वो मरने के बाद भी उठा सिर्फ हमारे लिए

#वो_मरने_के_बाद_जी_उठा_सिर्फ_हमारे_लिए (स्वतंत्रता दिवस विशेष)
कहानी नहीं प्रणाम है मेरा उस सभी जवानों को जो हमारे असल नायक हैं 
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“की गल्ल बलजिंदरा, बड़ा उदास जेहा लग रेहाँ ?” तौलिए से हाथ मुंह पोंछते हुए जगदीप ने बलजिंदर का उदास चेहरा देख कर उससे पूछा ।
“ना पाजी, कोई गल नहीं । बस उद्दां ही मन बड़ा उदास जेहा हो रेहा सी ।” बलजिंदर ने बात टालने की कोशिश की मगर टली नहीं ।
“ओ जा ओए, छुट्टी नई मिली तां कर के दिल ही हार गेयां तू तां ।” 
“उड़ी बाबा, केतना बार तुम लोगों को सोमझाया कि हिंदी में बात करो । परोंतु तूम लोग सोमझता ही नहीं ।” राॅयल स्टैग की बोतल कंधे पर रखे हुए कमरे में घुसते विसबास बाबू हमेशा की तरह चिढ़ाते हुए बोले । 
“ओ कहीं नहीं तुम्हारी बात कार रहे बिसबास बाबू । बेचारे को छुट्टी नहीं मिली इस लिये उदास है और तुम हो कि इस बख़त भी मजाक कर रहे हो ।” बोतल बिसबास के हाथ से लेते हुए जसपाल ने बोतल की सील तोड़ी । 
“अब होमको क्या पोता कि बोलजिंदर बाबू को भाभी का याद आ रहा है । तोभी तो कहते हूँ हिंदी में बोआत किया करो ।” बिसबास बाबू की शुद्ध हिंदी मुर्दे को भी हंसा दे, बलजिंदर तो सिर्फ उदास ही था । 
“ओ बिसबास बाबू आप ना हमको टामी बिक्की रामू शामू कुछ भी बोल लिया करो, जो आपकी ज़बान को सही लगे पर मेरे नाम की ऐसी तैसी ना किया करो ।” पहले पैग के साथ ही माहौल में मस्तियाँ छाने लगी थीं । कमरा तीनों के ठहाकों से गूंज उठा ।
“अच्छा बलज़िंदर सच्ची तेनू….” जसपाल ने बात आधे में तब छोड़ दी जब उसने अपनी पंजाबी पर बिसबास बाबू को घूरते पाया ।
“साॅरी साॅरी, बिसबास बाबू मैं भूल गया था कि नो पंजाबी, ओनली हिंदी । माई मिस्टेक जी, आई एम सौरी ।” शराब अपना कमाल दिखा रही थी क्योंकि जसपाल की भाषा अब वायाॅ इंग्लैड हो कर निकल रही थी । 
“सोमझदार है, चोलो ओब हिंदी में बोलो, किया बोल रहा तूम ईसको ।” बिसबास बाबू ने क्षमादान देने के बाद जसपाल को बात आगे बढ़ाने का हुकुम दिया और पैग का आखरी घूंट भरने के बाद अपने विचित्र मुंह को कड़वाहट के कारण और विचित्रता से फैला लिया । 
“मै पूछ रहा था इससे कि क्या सच में इसे भाबी की इतनी याद आ रही है ?” 
“ओह नहीं पाजी ।” बलजिंदर ने अगला पैग बनाने के लिए नज़रें गिलास पर टिकाये हुए कहा । या शायद वो शर्मा गया था ! पता नहीं क्या था मगर उसकी नज़रें ना उठीं । 
“तो फिर क्यों उदास है, अपने बड़े भाई को बता । योर ब्रादर इज स्टील एलाईव यार ।” जसपाल के अंतिम शब्दों के साथ ही एक आवाज़ आई जिसे किसी ने नहीं सुना । यह अवाज़ शायद क्वीन ऐलीज़ाबेथ के रोने की थी ।
“पाजी पता है, पिछली जब पिछली बार मैं घर गया था ना तब निहाल (बलजिंदर का बेटा ) मुझ से बोला “पापा जी, आप क्या करते हो ?” मैं पहले तो हँसा फिर मैने उसे बताया “बेटा मैं फौजी हूँ ।” वो थोड़ी देर कुछ सोचता रहा और फिर बोला “पापा मतलब आप करते क्या हो ?” 
“बेटा हम देश की सेवा करते हैं ।” 
“पापा टोनू के पापा डाॅक्टर हैं । वो हमेशा बताता है कि कैसे उसके पापा ने एक मरते हुए बंदे को बचा लिया । और कुलवंत के पापा ना गेम बनाते हैं, मुंबई रहते हैं और जब आते हैं तो कुलवंत के लिए खूब सारी गेम लाते हैं । और भी दोस्त हैं उनके पापा भी इंजीनियर, मैनेजर और पता नु क्या क्या हैं, वो सब हमेशा अपने पापा के काम की बड़ाई करते हैं और मैं जब कहता हूँ मेरे पापा फौजी हैं तो सब कहते हैं  ‘वहाँ कौन सी रोज लड़ाई होती है और तेरा पापा कौन सा कभी लड़ा है ।’ पापा आप कुछ ऐसे क्यों नई बने जिससे मैं भी अपने दोस्तों को बताता कि आपने ये सब बड़े काम किये हैं ।” 
“वीर जी, आर्मी में आना मेरा जुनून था । मेरे पापा जी जिद्द पर बैठ गये थे कि तू हमारी खानदानी कपड़े की दुकान ही संभालेगा । कहते थे इकलौता बेटा है मैं नहीं भेजना मौत के मुँह में । पाजी जिसे वो मौत का मुँह कहते थे ना इस मौत के मुँह में आने के लिए एक साल तक घर छोड़ा है मैने, इस मौत के मुँह में आने के लिए मैने अपनों के साथ ही लड़ाईयाँ लड़ी हैं । पाजी ये नौकरी नहीं सनक है मेरी, मेरा जुनून है । मगर उस दिन बड़ा अफ़सोस हुआ कि मैं अपने बच्चे के लिए ही आदर्श नहीं बन पाया । मैने उसे कहा था कि इस बार दिल्ली के लाल किले पर ले जाऊंगा तुझे आज़ादी का जश्न दिखाने और वहाँ तुझे दिखाऊंगा कि तेरे पापा उस सेना का हिस्सा है जिसने 70 सालों तक उस आज़ादी को संभाले रखा है जिसे पाने के लिए ना जाने कितनी माँओं के लाल किताबें छोड़ कर फांसी के तख्ते पर झूल गये । मुझे इसीलिए इस बार घर जाना था पाजी कि मैं अपनी और अपनी सेना की अहमीयत अपने बेटे को समझा सकूँ ।” बलजिंदर की बातों ने तीनों का नशा उतार दिया । जो शराब उन्होंने पी थी वो आँखों से बहने लगी । बिसबास बाबू और जसपाल ने बलजिंदर को गले लगा लिया ।
“ओह तूम उदास काहे होता है बली दादा, होम कोल सोवतोंत्रता दिवोस मनाएगा और उसका भिडियो निहाल को भेजेगा और बतायेगा कि होम लोग देस का सेबा के लिए होमेसा तईयार रहता है और देस का असल हीरो ऊसका पापा ही और उ

ऊसके पापा के साथी ही हैं ।” बलजिंदर और जसपाल मुस्कुरा दिये ।
अगली सुबह 
“ओ बिसबास बाबू आ जाओ अब, कमांडर साहब पहुंचने वाले हैं झंडा फहराने के लिए और तुम हो कि दुल्हन की तरह श्रृंगार पिटार में व्यस्त हो ।” अपना हथियार संभालते हुए जसपाल ने बिसबास बाबू को चिढ़ाया । 
“आ गिया आ गिया, तून होड़बोड़ी बहूत कोरता है । चलो ओब । अरे बोलजिंदोर कोहां हे ?” बंकर की तरफ बढ़ते हुए बिसबास बाबू ने जसपाल से पीछा । 
जसपाल कोई जवाब देता उससे पहले एक धमाके के साथ भगदड़ मच गयी । वायरलैस मैसेज आया कि सीमा पर पाँच से सात हथियारबंद आतंकियों की हलचल नोट की गयी है । जवान अलर्ट हो जाएं । 

कुछ देर बाद सभी न्यूज़ चैनल्स पर 
“कृष्णा घाटी सेक्टर में हुआ आतंकवादी हमला । जवान बलज़िंदर सिंह ने अपनी जान पर खेल कर आतंकियों को रोका और गोली लगने के बावजूद भी चार आतंकियों को ढेर कर के उनके भारत में घुसने के मनसूबे को किया नाकाम । खुफिया एजैंसियों से खबर मिली है कि ये आतंकी भारत में किसी बड़े आतंकी हमले को अंजाम देने के मक़सद से आए थे मगर भारतीय जवानों खास कर बलजिंदर सिंह की बहादुरी की वजह से वे नाकाम रहे । मगर दुर्भाग्यवश बलजिंदर सिंह इस वक्त ज़िंदगी और मौत से लड़ रहे हैं ।” 
“बलजिंदर को होश आगया है मगर खतरा नहीं टला कुछ कहा नहीं जा सकता । वो जसपाल और बिसबास को अंदर बुला रहा है ।” जसपाल और बिसबास बाबू खुद के आँसुओं को रोकते हुए, चेहरे पर झूठी मुस्कुराहट सजाए कमरे में दाखिल हुए ।
“बलजिंदर !” जसपाल ने थरथराती ज़ुबान से उसे पुकारा 
“पाजी, तुसी आ….”

“साॅरी बिसबास बाबू, फिर पंजाबी में बोलने वाला था ।” बिसबास ने मुँह घुमा लिया, शायद वो खुद रोक नहीं पा रहा था ।
“पाजी, मुझे पता है, मैने अब नहीं बचना । गोली साली दिल को छू गयी  । पाजी आप मेरा एक काम करोगे ?” बलजिंदर ने उस असहनीय दर्द में भी मजबूती से जसपाल का हाथ दबाते हुए कहा । 
“बोल ना वीरे ।” जसपाल खुद को संभालते हुए बोला ।
“फोन निकाल के कैमरा ऑन करो ।” बलजिंदर पीड़ा से भरी मुस्कुराहट के साथ बोला । जसपाल ने भी वैसा ही किया । उसके बाद बलजिंदर बोलने लगा । 
“निहाल, बेटा मैनू पता है, जब तक ये विडियो तेरे पास पहुंचना तब तक तेरा पापा भारत माँ की गोद में चैन से सो गया होगा । बेटा बात बस मेरी होती ना तो मैं कभी तेरे को ये विडियो ना भेजता । मगर बात यहाँ उन सभी जवानों की है जो रात दिन मौत के सामने सीना तान कर खड़े रहते हैं सिर्फ इसलिये की भारत की जनता आज़ाद घूम सके, आज़ादी से रह सके । पुत्तर, जब मेरे को गोली लगी ना तो मैं गिर पड़ा, शायद मर ही गया था । आँखों के आगे अंधेरा छा गया था । ऊंगली हिलाने की भी हिमत नहीं थी । फिर मेरे ख़याल में तू आया और बोला “पापा, तुसी कुछ नहीं कित्ता ? तुसी पहली गोली के साथ ही ढेर हो गये ।” मैने सोचा कि अगर आज मैं ऐसे ही मर गया तो तू कभी जान ही नहीं पाएगा कि एक जवान कैसे एक सच्चा हीरो होता है । मुझ में तभी अचानक से अथाह हिम्मत और ताक़त आगयी । और मैने गोली लगने के बाद भी चार आतंकवादियों को ढेर कर दिया पुत्तर । अब तुम लोग आज़ादी मना सकते हो । पुत्तर अपने दोस्तों से कहना कि तेरा पापा फौजी था और फौजी वो होता है।जो लगभग साँस की डोर छूट जाने के बाद भी लड़ने और दुश्मन को मार गिराने की हिम्मत……..।” बलजिंदर खामोश हो गया । कमरे में सन्नाटे ने कोना कोना घेर लिया ।  बिसबास और जसपाल की सिसकियों ने उस सन्नाटे को तोड़ा और देखते ही देखते दोनों की सिसकियाँ भयानक रुदन में बदल गयीं । 
बलजिंदर जा चुका था । इधर देश आज़ादी का जश्न मना रहा था और उधर बलजिंदर विजय रथ पर सवार साँसों की गुलामी से आज़ाद हो कर मुस्कुराता हुआ जा रहा था । 
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कहानी भले ही काल्पनिक थी मगर सच के उतने ही करीब भी थी । बेश्क हमें सरदार भगत सिंह जैसे देशभक्तों के प्राणों के बलिदान की वजह से आज़ादी मिली मगर उस आज़ादी की सुरक्षा तो बलजिंदर सिंह जैसे जवान ही करते हैं जो दिन रात मौत के सामने सीना ताने खड़े रहते हैं । जनाब, पैसे तो मज़दूरी कर के भी कमाए जा सकते हैं मगर देश के लिए जान देने का जज़्बा कुछ एक सनकियों के दिमाग में ही उपजता।है और उन्हीं सनकियों की वजह से आज हम शान से कहते हैं कि हम आज़ाद भारत के आज़ाद नागरिक हैं । ये जो आए दिन देश में दंगे, हत्याएं, बलात्कार जैसे अपराध करते हैं उन जानवरों को ख़याल नहीं कि देश में आतंक मचाना आसान है मगर देश की सुरक्षा करना कितना कठिन । 
आज स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर बधाई के पात्र सिर्फ और सिर्फ जवान हैं जो हमारे द्वारा आज़ादी की कीमत ना समझे जाने पर भी हमारी आज़ादी की रक्षा करते हैं । एक सलाम उन सभी जवानों को जिन्होंने हमारे लिए हमारी सुरक्षा के लिए अपने प्राण गंवाए या अभी भी अपनी जान की बाज़ी लगाए हुए हैं । मैं दिल से नमन करता हूँ भारत के उन महान सपूतों की जिन्होंने अपनी माँओं के आँसुओं तक की परवाह ना करते हुए भारत माता को बचाए रखने का ज़िम्मा उठाया और उसे पूरी निष्ठा से निभा रहे हैं । 
आप सबको 71वें स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं और मेरी लिस्ट या जान पहचान में जितने भी फौजी भाई हैं उन सब को मेरा बारंबार प्रणाम । 
धीरज झा

कृष्णा, के नाम पत्र 

कृष्णा, आपके लिए पत्र लिखा है, पढ़ ज़रूर लेना
हे कृष्ण
वैसे तो मुझे उसी तरह इस बात का पूर्ण विश्वास है कि आप पूर्णतः ठीक होंगे जिस तरह मुझे आपके अस्तित्व पर, महादेव की कृपा पर और अपनी माँ के मातृत्व पर हमेशा विश्वास रहता है मगर फिर भी औपचारिक्ता निभाना भी तो कोई चीज़ होती है ना । बड़े दिन हुए आपसे भेंट नहीं हुई तो सोचा इस आनंदमय अवसर पर आपको एक पत्र लिख कर वो बातें सांझा करूं जो साथ रहते कभी ना कह पाया । 
प्रभु ने भी मनुष्य नाम का बड़ा विचित्र फ्राणी बनाया है, ये कभी भी उसका मोल नहीं जान पाता जो साथ रहता है और उसके बिछड़ते ही उसे उसके अनमोल होने का आभास होने लगता है और फिर बिना कारण दुःखी होता रहता है । ख़ैर ये सब मैं आपको क्यों बता रहा हूँ, आप तो खुद सर्वज्ञाता हैं तो अच्छा होगा आपको इधर उधर से बटोरा हुआ छुटपुटिया ज्ञान देने बजाय वो कहूँ जिस कारण मैने पत्र लिखा । 
हे कृष्ण, आदर मैं आपका उतना ही करता हूँ जितना महादेव का, ना एक मिसिया ज़्यादा ना एक मिसिया कम । मैं जानता हूँ आप श्री हरि के तेईस अवतारों में पूर्ण अवतार हैं ठीक उसी तरह जिस तरह प्रभु श्री राम हैं । मगर एक बात साफ़ कहूँगा कि मैं आपको भगवान नहीं मानता । मेरे मन में आपके प्रति रत्ती बराबर भी भगवान या ईश्वर वाली भावना नहीं है । मुस्कुराईए मत सुन लीजिए फिर फैसला करिएगा कि मेरी बात बच्चकानी है या सयानी । 
बहुत छोटा था जब आपसे मिला था । मुझे तो याद भी नहीं, माँ ही बताती हैं कि अपनी पहली जन्माष्टमी जो आपके साथ मनाई थी तब आपको बहुत तंग किया था । सब ने आपको खूब अच्छे से सजा कर पालने में रख दिया था । उस चमचमाती चाँदी की मूर्ति में आपका रूप बड़ा खिल रहा था । आस पास गुब्बारे लगा दिये थे सब ने । हर कोई आता था आपको बड़े प्यार से झुलाता था, बड़ी श्रद्धा से माथा टेकता था । मगर मैं अधर्मी जिससे आपकी पूछ और सबका आपके प्रति प्रेम देखा नहीं जा रहा था, जाता था और पालने को खूब जोर से हिला कर आपको गिरा देता था । माँ आती थीं, प्यार से, थप्पड़ दिखा कर, आँखें तरेर कर हर तरह से समझाती थी कि मत कर ऐसा वो भगवान जी हैं उन्हें तंग नहीं करते मगर मैं तो अबोध था, कहाँ समझने वाला था माँ की डांट मैं फिर से आपको गिरा देता था । 
फिर मेरी नज़र आपकी बांसुरी पर पड़ी थी और मैने वो बांसुरी ले कर मुंह में लगा ली । माँ फिर दौड़ी थी मुझे डांटते हुए मगर मैं आपकी बांसुरी बजाने की नाकाम कोशिश में मग्न था । माँ ने चार बार आपकी बांसुरी धोई थी और मैने पाँच बार उसे फिर से मुंह लगा लिया था । अंत में हार कर माँ मुस्कुरा दी थी और आप तो शुरू से ही मुस्कुराते आ रहे थे । भला क्यों ना मुस्कुराते, आप तो नटखटों के सरदार रहे हैं । 
मंदिर में स्थापित आपकी वो प्रतिमा जिसमें आप बड़े लग रहे हैं मगर वो नटखटपन वो मासूमियत वो बच्चपना आपके उस स्वरूप में भी उसी तरह झलक रहा है जिस तरह उस छोटी बच्चपन वाली मूर्ति में झलकता है । आपको देख देख मैं भी बड़ा होने लगा । मैं किसी बात से परेशान हो कर आपके मंदिर के सामने वाले बरामदे में मुंह लटकाये बैठा रहता था और आप हमेशा मुस्कुराते रहते थे । मैं जितना परेशान होता था आप उतना ही मुस्कुराते प्रतीत होते थे । मगर मेरी परेशानी को हल करने का रास्ता भी तो आप ही ढूंढते थे । 
आपको याद है, मैं जब पहली बार प्रेम का अहसास बटोरे आपके पास आया था और शर्माते हुए सारी बात बताई थी ? कितना हँसे थे ना आप, आपकी मुस्कुराहट गहरी होती साफ़ दिख रही थी तब । राधा रानी आपको कनखियों से चुप रहने का ईशारा कर रही थीं मगर आपको तो मुझे चिढ़ाने में ही मज़ा आता है । लगा था जैसे आप कह रहे हैं कि “बेटा अभी नौवीं कक्षा में पढ़ते हो । ज़्यादा उड़ो मत पर कतरे जाएंगे ।” मैं बहुत गुस्सा हुआ था आपसे मगर जब मेरे ही प्रेम ने उसके प्रति मेरे प्रेम की धज्जियाँ उड़ा कर अपने पिता जी को फारी बात बताने की धमकी दी थी तो भागता।हुआ आया था आपके पास और कान पकड़ कर कहा था कि कृष्णा इस बार गिरने से बचा लो, अब नहीं उड़ूंगा और आपने मुझे बचा भी लिया था । जानते हैं अपने उस अहसास के बारे में पहले ले मैं महादेव को बताने गया था मगर उनका लाल तमतमाया हुआ मुख देख चुप चाप लौट आया और आपको आकर शर्माते हुए सारी बात बता दी । इसीलिए तो कहता हूँ कि आपको भगवान नहीं मानता । भगवान से सही गलत ऊंच नींच का डर लगता है मगर आपसे नहीं । जैसे आप विष्णु अवतार हैं वैसे ही मुझे लगता है कि आपके ही अंग का कोई हिस्सा हूँ मैं, भले ही आपके घने केशों में से ही एक मगर हूँ आपसे ही जुड़ा हुआ । 
हमेशा आप पहले मुस्कुराए हैं और फिर मेरी सहायता भी की है । हाँ सच याद आया कृष्णा, माँ की तरफ से मुझे माफी माँगनी है आपसे । जानता हूँ उसने मन ही मन माँग ली होगी और आपने मन ही मन कबा होगा कि माफी जैसा कुछ था ही नहीं । पापा जा रहे थे और माँ कैसे आपको बोल रही थी ना । उसका गुस्सा भी तो जायज़ ही था । भला कोई तीस साल की सेवा के बदले अपने सबसे प्रिय की जान भी आपसे नहीं माँग सकती ? वो कितना चिल्ला रही थी ना आपको अपनी पीड़ा सुना सुना कर । कृष्णा उस दिन पहली बार मैने आपका मलीन मुख देखा था । मुझे लगा कि कहीं मर्यादा ना टूट जाये आपके पलकों पर पड़े आँसू कहीं आपके नयनों का साथ ना छोड़ दें । मुख मलीन होता भी कैसे ना तीस साल आपकी सेवा करने वाला वो पुजारी आपको छोड़े जा रहा था जिसने आपके साथ हमेशा ऐसे बर्ताव किया जैसे आप उनके साथ हों, उनके सामने हों । आपके सामने रोये भी, आपसे गुस्सा भी हुये, आपको मनाया भी । मैं समझ ही नहीं पाता था कि कई बार वो बहुत ज़्यादा परेशान होने पर घंटों आपके सिरहाने क्यों बैठे रहते थे । मैने जब जब पिता जी से पूछा उन्होंने हंस कर टाल दिया मगर अब मैं समझता हूँ कि वो क्या करते थे । 
अभी भी जब मैं अपने प्रेम को पाने के लिए तड़प कर आपको याद करता हूँ और कहता हूँ कि “आप तो प्रेम को सबसे ज़्यादा समझते हैं, फिर क्यों हम दोनों की दशा पर केवल मुस्कुरा कर रह जाते हैं ?” तब लगता।है जैसे आप राधा रानी की तरफ़ इशारा कर के कहते हो कि “प्रेम पा लेने की वस्तु नहीं प्रेम तो जी लेने का नाम है । तुम प्रेम को जी कर देखो फिर हर वक्त उसे अपने पास ही पाओगे, जीवन के बाद भी वो तुमारे साथ रहेगा । मुझे और राधा को ही देख लो ।” 
मगर कृष्णा मैं भी इस पर यह साफ़ कर दूँ कि मुझ में आप जैसी सहनशक्ति नहीं है । आपकी तरह त्याग मुझ में नहीं । राधा को ना पा सकने की जितनी पीड़ा राधा रानी को हुई उससे ज़्यादा आपने सही मगर फिर भी त्याग उनका ही बड़ा माना गया । किसी ने आपने मन की वेदना को तो नहीं जाना । आपकी तरह मुझमें सबकी बातें सुन कर मुस्कुराते रहने का साहस नहीं । लोग आपकी रानियों और पटरानियों की संख्या गिनवाते हैं मगर कोई ये महसूस नहीं करता कि बंट जाना आसान नहीं होता और वो भी हज़ारों के बीच । किस लिये ? सिर्फ और सिर्फ सबकी खुशी के लिए । हिर्फ इसलिये कि समाज में उन्हें निरादर ना सहना पड़े । किसी एक का हो कर रह जाना कठिन नहीं मगर हज़ारों में बंट कर सिर्फ राधा का हो कर रह जाना कठिन है और यह सिर्फ कृष्णा ही कर सकते हैं । 
बहुत भावुक हो गया कृष्णा और आप तो मुस्कुराते ही रहे हमेशा की तरह । चलो अब चलता हूँ । कहना तो बहुत कुछ है मगर सब कुछ मैं कह दूँगा तो आप महसूस कैसे करेंगे वो जो अनकहा रहना चाहिए । आखिर में फिर कहता हूँ, आप मेरे भगवान नहीं हैं, आप तो मेरे मित्र हैं, गुरू हैं, मार्गदर्शक हैं, आप आराध्य हैं मेरे मगर भगवान नहीं । आपके सामपे रो सकता हूँ, हँस सकता हूँ।अपने मन की कोई भी बात कोई भी दुविधा आपको निसंकोच कह सकता हूँ । आपको भगवान बनाकर मैं अपना ये अधिकार खोना नहीं चाहता । 
जन्मदिन की हार्दिक शुभकाभनाएं मेरे कृष्णा । बस यही माँगूँगा कि भले ही  रूठ जाना मैं मना लूंगा, बुरा लगे तो डांट भी देना, बुरा करूं तो सज़ा भी देना मगर खुद को कभी मुझ से विमुख ना होने देना । भले ही अपना अंश भर ही सही मगर मेरी आत्मा में समाहित ज़रूर रहना । 
जय श्री कृष्णा 
आपका 
धीरज झा 

​स्वतंत्रता को बचा सकते हैं तो बचा लीजिए 

लेख कल ही लिख लिया था मगर पोस्ट आज कर रहा हूँ क्योंकि आज रविवार है, छुट्टी का दिन है सोचने का वक्त ज़्यादा मिलेगा ।
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ये दो दिन बाद स्वतंत्रता दिवस मनाया जाएगा । स्कूल, काॅलेज, सरकारी दफ्तरों आदि हर जगह तैयारियाँ ज़ोरों पर हैं । दो दिन बाद भारत की हवा को आज़ाद हुये  पूरे 70 साल हो जाएंगे । मैं भी सोच रहा था कि कोई ऐसी कहानी लिखूँ जिसे पढ़ते ही नसों में दौड़ता लहू लावा बन जाए, नसें तन जाएं, रोंगटे खड़े हो जाएं । जिसे जो भी पढ़े वो याद करे कि वो आज़ादी कितने मायने रखती है जिसे पाने के लिए हज़ारों देशभक्तों ने अपनी जाने कुर्बान कर दीं । वो आज़ादी किस तरह की दिखती होगी जिसके गृह प्रवेश के दिन से ही देश को चीर कर दो भागों में बांट दिया, जिसका लहू आज भी कश्मीर के रास्ते टपकता रहता है, उस क्षतिग्रस्त अंग में पनप उठे कीड़े अभी भी रह रह कर चीख़ चिल्लाहटें दे जाते हैं । आखिर कैसा रहा होगा खून से लथपथ ही सही मगर खुली हवा में सांस लेना । 
यही सब सोच कर मैने कलम उठाई और लिखना शुरू किया “आज़ाद भारत” हाँ इतना ही लिखा और फिर अचानक से दिमाग की नस फड़कने लगी । ऐसा लगा जैसे सब रुक गया है । ऐसा अनुभव हुआ जैसे किसी ने मेरे हाथ पकड़ कर कहा हो कि “ज़रा ठहरो, थोड़ा सोच लो अपनी आज़ादी के बारे में तब आगे लिखना ।” मैं सोचने लगा अपनी आज़ादी के बारे में । मगर मुझे कुछ ऐसा महसूस नहीं हुआ कि कहीं भी मेरी आज़ादी में कोई रोक हो । अपनी मर्ज़ी का पहनना है अपनी मर्ज़ी का खाना है जो मुंह में आये बक्क देना है उस बक्के हुए को लिख देना है अब भला इससे बेहतर आज़ादी और क्या हो ? इस जवाब के साथ ही मन ने एक सवाल और दाग दिया “अच्छा फिर बहन आना चाहती है तो उसे लेने कोई क्यों जाएगा ? अकेली क्यों नहीं आने देना चाहते ?” वैसे तो मन का दागा हुआ ये सवाल ज़ोर से लगा था मगर फिर भी संभलते हुये जवाभी हमले में जवाब दे मारा “अरे लड़की है ऊपर से माहौल कैसा है देख नहीं रहे ।” 
“फिर ये आज़ादी किस काम की ?” ये सवाल गोली से तेज़ लगा, कुछ पल के लिए एक दम सुन्न । 
“अच्छा ये छोड़ो, ये बताओ कि दोस्त क्या कहा जाने के बारे में ?”
“बोल रहा था 14 को या 16 को जाएंगे ?”
“15 को क्यों नहीं ?”
“कह रहा था खतरा रहता है, दिल्ली वैसे भी निशाने पर रहती है सो हर बार इस दिन सफ़र से बचते हैं ।”
“कमाल है ना ? अपने ही देश की आज़ादी के दिन अपने ही देश में खतरा महसूस होना ! सच में अजीब है ।” मैं चुप था, वो भी चुप हो गया मगर बहुत से सवाल और बहुत से मुद्दे दिमाग में छोड़ गया सोचने के लिए । एक के बाद एक कई बातें दिमाग में अव्यवस्थित ढंग से हुड़ दंग करने लगीं । वो जैसे जैसे ज़हन में उछलीं मैने वैसे वैसे पकड़ कर कागज़ पर कैद कर दीं । 

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कुछ दिनों के अंदर ही एक के बाद एक मुद्दा आँखों के सामने से ऐसे गुज़रा है जैसे ये आईना हो उस भ्रम का जो आज़ादी के नाम पर मन में पाले बैठे हैं हम लोग । अच्छा ये भी ग़ौर करने वाली बात थी कि जब देश आज़ाद हुआ तो दो हिस्सो में बंटा मगर जैसे जैसे देश पर आज़ादी का चढ़ा रंग गहरा हुआ वैसे वैसे देश आज़ादी के नाम पर ही कई टुकड़ों में बंटता गया । आज़ाद तो हम सब एक साथ हुए थे फिर कुछ लोग गुलाम क्यों रह गये ? या फिर ये आज़ादी के नाम पर मनमानी की मांग कर रहे हैं ? आज़ादी से वंचित अभी बहुत से लोग हैं मगर उन पर किसी का ध्यान नहीं जाता । यहाँ सिगरेट के छल्ले उड़ा कर शराब की बोतलें खाली कर के कहते हैं “हम ले के रहेंगे आज़ादी” । मगर आज़ादी किस से ? किसके लिये आज़ादी  माँग रहे हैं ये ? जहाँ, जिनके लिए आज़ादी चाहिए उनकी बात आते तो लाल सलाम को पीलिया पकड़ लेता है । फिर क्यों ये बेकार का हल्ला ?
अभी तो शायद साल भर या शायद उससे भी कम हुआ है जब एक पति किसी पार्टी की सुप्रीमो को गाली देता है और बदले में सुप्रीमो के समर्थक उसकी पत्नी से बेटी तक को अपने विरोध में सड़क तक ला कर नंगा करने की बात करते हैं । उन साहेब की पत्नी जनता से अपील करती है, उभर रही पार्टी से अपील करती है और पार्टी भी बेटी के सम्मान के लिये मैदान में कूद जाती है । महोदय की पत्नी को भरपूर जनसमर्थन मिलता है, नारे लगते हैं और देवी जी देखते ही देखते यू पी की महिलाओं की मसीहा टाईप बन कर सामने आ जाती हैं । हर रोज़ महिला सम्मान में रैलियाँ, आज फलानी देवी यहाँ सम्मानित हुईं तो आज यहाँ महिलाओं का सम्मान बढ़ाया । तब हम भी उभरती पार्टी के जबर प्रशंसक थे । ताजा ताजा बुलंदशहर हादसा हुआ था, मगर इनके आने के बाद सब थम गया । हमको भी लगा कि महिला में दम है । अब कम से कम यू पी की महिलाएं सुरक्षित होंगी । चुनाव आये, शोर शराबा तेज़ हुआ । गालियों से शुरू हुई राजनीति विधायक उम्मीदवार पर जा कर थमी । उम्मीदें प्रबल थीं, देवी जी जीत गईं । 
बस जीत गयीं, अब क्या ढूंढते हो ? जीत तक का तो खेल था सारा, जीत हाथ लगी खेल खत्म । चार दिन पहले बलिया के बजहा गाँव की एक छात्रा रागिनी को कुछ लड़के घेर कर उस पर तब तक वार करते हैं जब तक वो दम नहीं तोड़ देती है और सबके सामने से ऐसे निकल जाते हैं जैसे कुछ हुआ ही नहीं । ये सब बस इसलिये कि लड़का रागिनी का पीछा करता था और रागिनी पीछा छुड़ाती थी । उसी के कुछ दिन बाद मऊ के एक काॅलेज में 15 20 लड़के हाॅकी स्टिक लेकर काॅलेज में घुसते हैं और छात्राओं से छेड़छाड़ करते हैं । जब छात्रों द्वारा विरोध किया जाता है तो उनकी जम कर पिटाई करते हैं । इन सबके बावजूद यू पी की वो बेटी जिसने यहाँ कि बहू बेटियों के सम्मान की रक्षा के लिए शपथ लिया था उनका इन वारदातों एक बयान तक नहीं आया जबकि बलिया तो उनका ससुराल और मायका दोनो है । अपने ही गृह क्षेत्र की इस विभत्स घटना पर ऐसी चुप्पी कैसे कि एक संवेदना बोल तक मुंह से ना फूटा, कार्यवाही तो दूर की बात है ? क्या ये सब बस वोट भर के लिए था ? क्या हम समझ लें कि नारी सम्मान की ब्रांडऐंबेसडर बनना बस दिखावा मात्र था ? क्या ये सोच लें कि महिला हो कर महिलाओं के नाम का इस्तेमाल किया आपने सिर्फ और सिर्फ जीत के लिए ? क्या हमारी आँखों में उभरी उम्मीद को हम फिर से मार दें ? क्या मान लिया जाये कि अब बेटियों की आज़ादी छिन गयी ? उन्हें अब माँ बाप पढ़ने तक ना भेज़ें ये सोच कर कि कोई बड़े बाप की बिगड़ी औलाद उसकी सोलह सतरह साल की बेटी को छेड़ेगा और जब उसकी बेपी विरोध करेगी तो उसकी चाकूओं के वार से जान ले लेगा । 
निर्भया के साथ जो हुआ उसके बाद लगा सब बदल जायेगा मगर नहीं आज़ादी तो छिनती गयी, बिहार में नैसी झा से, हिमाचल की गुड़िया और रागीनि जैसी कितनी मासूम बच्चियाँ इस गलतफहमीं में अपनी जान गंवा बैठीं कि देश आज़ाद है यहाँ हमारे सम्मान हमारी इज्ज़त की उतनी ही रक्षा की जाएगी जितनी एक आज़ाद देश की सरकार अपने नागरिकों की करती है । इनकी आज़ादी किस दिन मनाई जाएगी ? 
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इधर गोरखपुर में बच्चे बिमारी से मर गये । हाँ भाई मर गये वो भी बिमारी से । मैं नहीं कह रहा अधिकारी कह रहे हैं । स्वास्थ मंत्री तथा माननीय मुख्यमंत्री जी का भी यही कहना है । बिमारी फैली है, हर साल बच्चे मरते हैं तो इसकी रोकथाम कौन करेगा ? या समझ लिया जाए कि गोरखपुर अब रहने लायक जगह नहीं रही इसे खाली करवा दिया जाए ? क्योंकि यहाँ तो हर साल बच्चे मरते हैं, कौन जाने अगले साल किस माँ को अपने लाल के लिये बीच सड़क चीख़ना चिल्लाना पड़ जाए । योगी जी आपके आते ही हर हर महादेव का उद्घघोष किया था । फेसबुक सहित दो चार ब्लाॅगों पर भी आर्टिकल लिखा था कि योगी से डर लग रहा है तो डरिये मगर सिर्फ वो जो अराजक्ता फैलाने के आदी हो गये हैं सिर्फ वो जो सिस्टम को अपने ठेबल पर पड़ा गोल वाला पेपर वेट समझते हैं और जब चाहे घुमा देते हैं । और साथ ही आपसे प्रार्थना भी की थी कि हमारा यकीन बनाए रखिएगा । आप आए मजनूओं की पिटाई होने लगी हालांकि बीच में बेकसूर भी पिटे पर हमने आँटे घुन वाली भात सोच कर वाह वाही की सोचा चलो लड़किया सुरक्षित हैं । बहन बेटियाँ राहत महसूस करेंगी अब । आपने बड़े बड़े भाषण दिये, राजनीति से कोसों दूर रहने वाली हमारी माँ भी बोल पड़ीं ‘ जोगी जी कुछ तो अलग करेंगे विश्वास है ।’ सोचिए सर यू पी से कोई नाता ना रखने वाली साधरण सी गृहणी ने आपसे कितनी उम्मीदें लगाईं ? आपने तो आवाज़ भी ना सुनी उन टूटती कराहती और मरती उम्मीदों की । साठ बच्चे तड़प तड़प कर दम तोड़ गये सिर्फ लापरवाही की वजह से । फिर भी कोई मानने को तैयार नहीं की मौत का असलकारण असल कारण नहीं । अरे, जो भी हो बच्चों की जान तो गयी है ना ? इसका ज़िम्मेदार कौन है ? इसका पता कौन लगायेगा ? इनसे तो साँस लेने तक की आज़ादी छीन ली गयी । 
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उपराष्ट्रपति जाते जाते अपना मुस्लिम प्रेम दिखा कर बोल गये कि मुस्लिम समाज में सुरक्षा का अभाव महसूस किया जा रहा है ।” वो गलत बोले यहाँ मुस्लिम समाज नहीं यहाँ हर कोई असुरक्षित महसूस कर रहा है । माँ बाप बेटियों को पढ़ाने में असुरक्षित महसूस कर रहे हैं, लोग इलाज के लिए अस्पतालों में जाने पर असुरक्षित महसूस कर रहे हैं, महिलाएं सड़क पर चलने में असुरक्षित महसूस कर रहे यहाँ तक कि अब तो बोलने तक में असुरक्षा महसूस होने लगी है । 
जो हो रहा है उसका तो जितना होना चाहिए उतना दुःख है ही मगर इसके खिलाफ़ आवाज़ उठाने पर जो अपने ही मुँह दबा रहे उससे और ज़्यादा दुःख होता है । इन लाशों से ज़्यादा डर उन संवेदनाओं की लाशों का है जो बच्चों की मृत्यु के बाद सरकार का बचाव करते हुए मर गयीं, जो सड़क पर छेड़ी जा रही लड़की को उल्टा बदनाम करते।हुए मर गयीं । आज़ादी से अच्छा है इन संवेदनाओं की मौत का मातम मनाया जाए । 
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60 साल कांग्रेस का राज रहा । कुछ तो बात रही होगी इतने सालों तक एकछत्र राज करने वाली इस पार्टी में । ज़्यादा तो नहीं पर कुछ कुछ याद है कि जो कांग्रेस की रैलियों में अपने पिता और दादा के पीछे पीछे निक्कर सही करते हुए हाथ छाप ज़िंदाबाद करते नहीं थकते थे जो, वो आज भाजपा के बचाव के लिए सबसे नीचले स्तर तक आने को तैयार हैं । खुद में बदलाव किये बिना लोग हमेशा सरकारों में बदलाव चाहते रहे । हम भारतीय हैं जी, हमें खुद को बदलने से आसान लगता है इल्ज़ाम किसी और पर थोप देना ।  पिता  जी चले गये मगर कभी भाजपा का साथ नहीं छोड़ा । जब वोट होती तो मैं पूछता था किस छाप को दिये वोट तो कहते अपना तो हमेशा कमल छाप ही होता है । मैं खुद समर्थक रहा हूँ क्योंकि उम्मीदें जगाई गयी थीं । पर अब उम्मीदें मरती जा रही हैं । सच कहूँ तो राजनीति और राजनीतिक पार्टियों दोनों से मन उचट गया है । सब के सब एक जैसे हैं । चुनाव के वक्त ज़मीन के नीचे चुनाव जीतते ही आसमान से ऊपर । असल बात ये है कि हम जबसे आज़ाद हुए हम तब से ही आज़ादी के लिए लड़ते आ रहे हैं । तमाम वादों से आज़ादी की लड़ाई, अपना रूप विकराल कर के तानाशाह बनती जा रही पार्टियों से आज़ादी, गीरी हुई सोच से आज़ादी । आज़ादी मिली होती तो हर बार ये विरोध क्यों होता । कोई तानाशाही दिखाता है उसका विरोध होता है, होते होते विरोध करने वाले ही तानाशाह बन जाते हैं फिर उनके विरोध के लिए कोई और खड़ा हो जाता है । इन सबके बीच पिसती रहती है वो जनता जिसे आज़ादी नाम का झुनझुना पकड़ा दिया गया मगर आज़ादी कभी दी नहीं गयी । यहाँ गलियाने की आज़ादी है मगर सही तरीके से विरोध करने की आज़ादी नहीं, चिल्लाने की आज़ादी है मगर सही मुद्दों पर बोलने की नहीं । आप राजनीति को पार्टियों में बांटते बांटते खुद को ही बांट बैठे हैं साहब । 

मैं किसी का विरोध या समर्थन नहीं कर रहा । आज़ादी की 71वीं वर्षगांठ है मुझे बेहद खुशी है इस बात की मगर उससे ज़्यादा इस बात की चिंता है कि जो आज़ादी हमें हज़ारों देशभक्तों के बलिदानों से मिली क्या उसे हमने अब भी उतना ही संभाल कर रखा है ? अगर नहीं तो कैसे संभालें उसे । साहब हम विरोधी या समर्थक होने से पहले इस आज़ाद देश की जनता हैं । कुछ तो लक्षण खुद में जगाईए आज़ाद जनता होने का । जिसे समर्थन करते हैं उसके बुरे काम की आलोचना को भी तैयार रहिये जिससे उन्हें हर हाल में सुधार करना पड़े । 
आईए इस स्वतंत्रता दिवस पर स्वतंत्र हो जाएं हर पार्टी हर सोच हर विचार से सिर्फ और सिर्फ जनता बन कर अपने विचार से सोचें और उसी पर अमल करें । आईए एक आवाज़ उठाई जाए, हर तरह से हर तरफ से । 
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नोट – स्वतंत्रता दिवस है अभिव्यक्ति की भी स्वतंत्रता है तो अगर किसी को कुछ बुरा लगे तो उसे बुरा मानने की भी स्वतंत्रता है । 
जय हिंद 

जय भारत 
धीरज झा 

चाय वाला

#चाय_वाला (काल्पनिक कहानी)
“घंटा होगा देश का, नहीं यार कहीं गया था, नहीं आज भी नहीं मिली नौकरी, हाँ चिट्ठी तो दे दी थी पता नहीं जवाब क्या आता है, यहाँ से मंदिर जाना है, मैं दारू ले कर आता हूँ तुम सब चलो ।” परेशानियों की आँच पर उबल रही ज़िंदगी की तरह ही रामसेवक की चाय उबल रही थी । वैसे तो वो चाय में चायछन्नी घुमाने में मस्त था मगर ये सब बातें जो वहाँ बैठे लोग कर रहे थे ना चाहते हुए भी उसके कानों में पड़ रही थीं । 
बाईपास पर रामसेवक का टी स्टाॅल शहर का सबसे चर्चित टी स्टाॅल था । अब किस्मत कहें या रमसेवका का दिमाग मगर जो भी हो उसका स्टाॅल था बड़ा ठिकाने पर । पास ही सी एम एच काॅलेज था वहाँ के सारे स्टूडेंट कैन्टीन की फीकी चाय पीने हे बढ़िया यहीं की चाय पीना सही समझते थे । इधर जम्मू को जाने वाली आधी खाली बसें यहीं से भरती थीं इसीलिए यात्रियों के इंतज़ार का भी यही ठिकाना था । कुछ शरीफ़ सुट्टेबाज़ सबसे नज़रें बचा कर सुट्टा लगाने शहर से बाहर रामसेवक की दुकान  पर ही आते और सुट्टे संग चाय का वो आनंद उन्हें मिलता जो भरी सभा में श्री कृष्ण का विराट रूप देख अकेले घृतराष्ट्र और विदुर को मिला था । ऊपर से पास के गज़ल ढाबे वाले स्टाॅफ भी यहीं चाय पीते । ट्रक ड्राईवरों का यही अड्डा था । मिला जुला कर रामसेवक की दुकान दुकान नहीं सोने के अंडों का पोल्ट्रीफारम था । 
सिर्फ चाय और सिगरेट बेच कर शाम तक हज़ार पंद्रह सौ से ज़्यादा का गल्ला पुरा लेता था । अफवाह थी कि वो अपनी चाय में हफ़ीम का पानी मिलाता था इसीलिए क्योंकि जिसने एक बार उसकी चाय पी वो फिर और किसी के हाथ की चाय छूना भी पसंद नहीं करता था । वैसे यह मात्र अफ़वाह ही थी क्योंकि रामसेवक के पास इतनी हफ़ीम होती तो वो भला चाय ही बेचता ?
 रोज़ सैंकड़ों लोग उसके यहाँ आते और रोज़ वो हज़ारों बातों को अपने इस कान से उस कान के बीच से गुज़रता महसूस करता मगर उन सब में से कुछ एक बातें ही उसका ध्यान अपनी तरफ़ खींच पातीं बाकि सब तो बस बकचोदियाँ होती थीं । रामसेवक खुद बहुत कम बोलता था, उसे बस सुनने में रुचि थी । सैंकड़ों में से कुछ कुछ ग्राहक उसके पक्के थे जो हर हाल में उसके स्टाॅल पर चाय पीने आते ही आते । 
एक खोखा सा डाल रखा था उसने और आगे बड़ी सी शैड लगा कर कुछ एक मेज लगा रखे थे । हेल्पर के नाम पर एक गूंगे को रख रखा था जो पहले बसों में भीख मांगा करता था पर एक दिन रामसेवक के समझाने पर भीख़ मांगना छोड़ कर उसकी दुकान में नौकरी करने लगा । 
“रामू भाई, एक बटा दो ।” चाय के उबाल को ग़ौर से देखते हुए रामसेवक का ध्यान इस आवाज़ ने तोड़ा। रामसेवक ने सर उठाया और मुस्कुरा कर सर हिला दिया । 
बड़ी अजीब और रहस्यमई ज़िंदगी थी रामसेवक की । कौन था, कहाँ से आया था, जो कमाता था उसका क्या करता था किसी को नहीं पता था । दो साल पहले ही अचानक से ढाबे वाले की ज़मीन पर चाय का ये स्टाॅल लोगों ने देखा और धीरे धीरे भीड़ जुटने लगी । स्टाॅल लगाने के बदले किराया दिया करता था वो ढाबे वाले को । 
उसके पास सारा दिन दो ही काम थे चाय बनाना और लोगों की बातें सुनना । उसे देख कर ऐसा लगता था कि वो चाय के उबाल और लोगों की बातों कुछ तलाश रहा है । अजीब शौख़ था बंदे का  । सारा दिन चाय बेच कर रात को वहीं ढाबे पर सो जाता था । 
“माँ बिमार है यार, उसी परेशानी में आज कल सो नहीं पाता । डाॅक्टर बता रहा है लाखों का खर्चा है । मैं भला इतने कहाँ से लाऊँ ? बहन को कहा तो वो यह कह कर साफ़ मुकर गयी कि वो लोग घर बना रहे सारे पैसे उसी में लग गये हैं । बड़े भाई से मदद माँगी तो वो साफ इन्कार कर गये । सोच रहा हूँ घर बेच दूँ क्योंकि घर फिर ले लूंगा पर माँ फिर नहीं मिलेगी । मैं कोशिश कर सकता हूँ वो कर रहा हूँ  बाक़ी आगे भगवान पर है जो उनकी इच्छा जैसा चाहें करें ।” चाय देते हुए रामसेवक ने बातों की पहली बोहनी इस दुःखद समाचार से की । 
“अरे सुना कल तेरे पिता जी को शेयर बाज़ार में भारी नुक्सान उठाना पड़ा ?” बीस इक्कीस साल के उस दुबले से लड़के ने अपने ही उम्र के लड़के से सिगरेट का दम मारते हुए कहा ।
“घंटा भारी, उनको चार पाँच करोड़ से कोई फर्क नहीं पड़ता । बंदे के पास इतना पैसा है कि दोनों हाथों से लुटाए तब भी कम है । अब देख मैं ट्वैल्थ में फेल हो गया था फिर भी इतने टाॅप काॅलेज में ऐडमीश्न कैसे मिल गया बता । यार सब पैसे का खेल है और मेरा बाप पैसे छापने की मशीन । इसीलिए तो अपन इतना सोचते नहीं । ये ले इसके पैसे कटा देना और एक मोर का पैकेट ले ले ।” चार पाँच करोड़ के नुक्सान को अपने आखरी कश के साथ धुएं में उड़ाते हुए लड़के ने दो हज़ार का नोट सामने वाले लड़के को दिया और मोर का पैकेट जेब में डाल कर अपनी चमचमाती गाड़ी में हवा के संग जा मिला । 
रामसेवक रोज़ इसी जहान में दो तरह की दुनिया देखता था । एक वो जो तंगी  के कारण अपना लहू तक बेच रही है फिर भी कोई हाथ फैला दे तो बेचे हुए खून की रक़म में से भी उसे कुछ ना कुछ दे दें  और दूसरी वो जिसके पास दोनों हाथों से लुटाने पर भी कोई कमी नहीं आने वाली फिर भी किसी की एक कौड़ी की मदद नहीं करना चाहते ।

रामसेवक का टी स्टाॅल मानो जैसे संसार था और यहाँ आने वाले सब लोग अलग अलग तरह की ज़िंदगियाँ । कोई रोती ज़िंदगी, कोई मुस्कुराती ज़िंदगी, चोट खाई ज़िंदगी तो कबीं बेफिक्र ज़िंदगी और राम सेवक मानों भगवान हो जो इन सब ज़िंदगियों को देख कर बस मुस्कुराता था । जैसे कि ये सब नियती का खेल हो और वो बस तमाशा देखने वाला । वो बस इंतज़ार करता था इस बात का कि कौन उसे पहचान ले और उससे मार्ग दर्शन करने को कहे । मगर वो तो सबके लिए एक चायवाला था कोई भला उससे मदद क्यों माँगता ।
रात के साढ़े दस बजे 
“टिंग टाॅग ।” दरवाज़े की घंटी बजती है ।
“आ रहा हूँ ।” अंदर से आवाज़ आती है । 

दरवाज़ा खुलता है । सामने  एक थैला बगल में दबाए रामसेवक हाथ जोड़ कर मुस्कुराता हुआ खड़ा है । 
“रामू भईया ! आप यहाँ ? कैसे आना हुआ ।” सामने वाले ने आश्चर्य से पूछा और उन्हें अंदर ले गया 
“अरे यहाँ बगल में काम था तो सोचे माँ जी का हाल पूछते चलें । कैसी हैं वो ?” कुर्सी पर बैठते हुए रामसेवक ने सामने वाले से पूछा ।  सामने वाला वही था जिसकी बातें रामसेवक ने सुनी थीं । 
“ठीक नहीं हैं भईया । बड़ा परेशान हूँ उन्हीं की वजह से । पिता जी बच्चपन में ही गुज़र गये उसके बाद माँ ने ही बड़ी मेहनत से हम सब को पाला । भाई और बहन तो अच्छी जगह सैट हो गये मगर मैं रह गया । मैं इतना कमा लेता हूँ कि माँ और बीवी बच्चों का पालन अच्छे से कर लूँ इसीलिए कभी अफ़सोस नहीं हुआ कि मैं किसी अच्छी जगह क्यों नहीं हूँ । मगर आज जब माँ को ले कर असहाय सा हो गया हूँ तब अफ़सोस होता है । भाई बहन भी शायद मजबूर हैं इसीलिए पीछे हट गये । मगर मैं तो हर संभव कोशिश करूंगा ।” उसकी आँख में माँ के लिए दर्द छलक पड़ा । 
“डाॅक्टर क्या बोले ?”
“डाॅक्टर ऑप्रेशन का बोल रहे । बीस पच्चीस लाख का खर्चा है ।” 
“माता जी कहाँ हैं ?” 
“अंदर कमरे में ।” 
दो कमरों और एक छोटे से हाॅल वाले उस घर की हालत बता रही थी कि ये किराये का मकान है । किराय के मकान उन सबकी आवाज़ें निकालते हैं जो यहाँ रह कर गये हैं । अपने मकान में बस एक अपनी यादों की आवाज़ गूंजती है । 
हाल के दाहिने तरफ वाले कमरे में एक चौकी लगी थी जिस पर माँ जी लेटी थीं । एक टेबल फैन लगा हुआ था । कमरे की दुर्गंध उनकी बारी का हाल कह रही थी । माँ जी को प्रणाम कर राम सेवक ने वो थैला सामने वाले के हाथ णें पकड़ा दिया । 
“ये क्या है भईया ?” 
“आपने कहा था ना भगवान ही करेंगे जो करेंगे तो समझ लीजिए हमको भी भगवान ही भेजे हैं । अच्छा अब चलते हैं ।” सामने वाला कुछ कहता उससे पहले रामसेवक निकल चुका था । थैला खोला तो उसमें पाँच पाँच सौ के नोट थे । जिसे गिनने पर पता चला पूरे तीस लाख थे । साथ ही एक पर्ची थी जिस पर लिखा था । 
“भगवान ने भेजे हैं, जब कभी जितने भी सक्षम रहो उतनी मदद आगे किसी की कर के भगवान का कर्ज उन्हें लौटा देना ।” सामने वाले को कुछ समझ नहीं आरहा था कि वो हंसे या आश्चर्य करता रहे। बाहर दौड़ा कि जा कर रामसेवक के पैर पकड़ ले मगर रामसेवक तो हवा हो लिये थे । 
अगली सुबह 
“अरे सुना तुमारे घर चोरी हो गयी ?” बी एम डब्लयू बाईक के पीछे बैठे लड़के ने आगे वाले से पूछा ।
“अरे यार उस दिन भी समझाया था तुझे । अपन इतने इतनों की टेंशन नहीं लेते । तीस लाख का चिल्लर था । उससे अपन को क्या फर्क पड़ता है ।” बाईक की रफ़्तार के साथ तीस लाख की फिक्र भी लड़के ने हवा में उड़ा दी । 
जब लड़के सिगरेट और चाय का अलम मारने रामसेवक की दुकान पर पहुंचे तो देखा वहाँ दुकान बंद है और उन्हीं के जैसे रामसेवक की चाय के पाँच दस दिवाने वहाँ बैठे हैं ।
“दुकान क्यों बंद है भाई ?” लड़के ने वहाँ खड़े आदमी से पूछा 
“रामसेवक चला गया इसी लिये ।” 
“चला गया मगर कहाँ ?”
“अब मुझे बता कर थोड़े ना गया है ।”
इन सबकी बातें सुन कर सामने वाला जो रामसेवक का शुक्रिया अदा करने आया था वो मन ही मन मुस्कुराते हुए खुद से ही बोला “शायद मुझ जैसे किसी की बातें सुनने किसी और शहर भेज दिया भगवान ने उसे ।” 
धीरज झा 

©धीरज झा